Sunday, 16 April 2023

tc 37

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
37-

रविदत्त रामू को मारने के लिए झपटे।वेनीमाधव और बाबा के आगे जो युवक खड़े थे वे भी उनकी ओर बढ़े। दर्शनाथियों की कौतूहल भरी दृष्टि उस नाटक को खड़ी देखती रही। पंडित रविदत्त बावले की तरह से प्रलाप कर रहे थे। बाबा शान्त स्वर में बोले -“रविदत्त जी शांत हों। आप जैसै सुप्रतिष्ठित
तंत्रविद्या-विज्ञारद .....”
“चुप कोर, चुप कोर शाला शोण्डो।”
एक युवक ने तैश में आकर पंडित रविदत की दाढ़ी पकड़ ली। बाबा ने उसे वरजा- “कन्हाई, दूर हटो।” 
फिर विनम्र स्वर में रविदत्त जी से कहा- “देवस्थान में कोध प्रदर्शन न करें । मैं जा रहा हूँ, चलो हो, राजा।” कहकर बाबा ने भोले बाबा को प्रणाम किया और रविदत्त की तनिक भी परवाह करके लगड़ाते हुए बाहर निकल गए। रविदत्त चिल्लाते रहे। उन्होंने तुलसीदास को पृथ्वी से उठा देने की प्रतिज्ञा की।
मंदिर के आगँन में अनेक भक्त गोस्वामी जी, महाराज की महत्ता बखान रहे थे और रविदत की निन्दा कर रहे थे। एक ने कहा-“अरे, जब बंटेश्वर महाराज जैसे प्रकाण्ड तांत्रिक गोस्वामी बाबा का कुछ न बिगाड़ सके तो ई रवीदत्तवा का उखाड़ लेगा ?”
मन्दिर के भीतर समझाने वालों की भीड़ से घिरे पडित रविदत्त यह सुनकर बड़ी जोर से उखड़े। अपने शुभचिन्तकों का घेरा तोड़कर बाढ़ के प्रचंड प्रवाह की तरह बाहर निकले- “हाम क्‍या उखाड़ शोकता, देख” कहकर वे द्वार तक पहुँच जाने वाले बाबा की ओर, एक बूढ़े का लठ्ठ उसके हाथ से छीनकर, झपटे किन्तु हड़बड़ी में चौखट लाँघते हुए ठोकर खाकर धड़ाम से गिर पड़े। भीड़ में कुछ लोग उन्हे फर्श पर गिरा देखकर एकाएक जोश में बजरंगबली और बाबा विश्वनाथ की जै-जैकार कर उठे।
थोड़ी ही देर मे काशी की गली-गली में यह खबर गूँज गई कि विश्वनाथ बाबा के मंदिर में गोस्वामी तुलसीदास जी पर आक्रमण करनेवाले रविदत्त पंडित को हनुमान जी ने उठाकर पटक दिया।बाबा की महिमा इस कारण से और बढ़ गई। नगर में तरह-तरह की बात सुनकर कई शुभचिन्तक बाबा के दर्शनार्थ आए। पंडित गंगाराम ज्योतिषी, पंडित काशीनाथ, कवि कैलास, सेठ जैराम, आदि लोग यह खबर सुनकर आए थे कि रविदत्त पंडित ने बाबा पर लाठी से प्रहार किया और प्रहार होते ही उन्होंने हनुमानजी को गोहराया।
सुनकर बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े, बोल-“अरे मैया, बजरंगबली के मारने के लिए अनेक दुष्ट पड़े हैं , बेचारे रविदत्त का तो केवल एक यही दोष है कि वह निर्वुद्धि है। बेचारा अपने ही आवेश में गिरकर चुटीला हो गया। राम करें शीघ्र ही स्वस्थ हो जाए।”
“स्वस्थ? अरे महाराज, उसकी तो हड्डी-पसलियों तक का चूरा हो जाना चाहिए। दुष्ट दिन रात माँ माँ चिल्लाकर ढोंग रचाया करता है और इस उमर में भी महरियों और मेहतरानियों के पीछे मारा-मारा डोलता है।”
कलास कवि की बात सुनकर पंडित गगांराम मुस्कराकर बोले- “आप तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बात कर रहे है कवि जी। रविदत्त के कतिपय विरोधियों ने उसके विरुद्ध बहुत-सी भूठी बातें उड़ा रखीं हैं। रविदत्त निर्बृद्धि-अहंकारी अवश्य है, जगदम्बा के नाम पर वारुणी का सेवन भी करता है किन्तु वह कट्टर धर्माचारी तांत्रिक है, व्यभिचारी कदापि नहीं।मैं जानता हूँ।”
रामू बोला- “तब तो महाराज उसे अपने ही मंत्रपूत जल के छीटों से मर जाता चाहिए।” पूछे जाने पर उसने सारी कथा सुनाई।
पंडित काशीनाथ बोले- “अरे भाई उसके मंत्रपूत जल से शक्ति  उत्पन्न नहीं   होती। हाँ, वारुणी के एक चुल्लू से ही वह कदाचित्‌ ......”
“उल्लू भले ही बन जाता पर मरता तब भी नही काशीनाथ जी। वह बड़ा ही चीमड़ है।” कैलास जी ने हँसते हुए कहा।
बाबा बोले- “इसके पिता मेरे और गंगाराम के सहपाठी थे। ज्योतिष विद्या में हम लोगों के आगे जब उसकी दाल न गली तब वह हम लोगों से चिढ़ कर तांत्रिक बना था। भोला और भड़भडि़या था।”
“किन्तु यह रविदत्त परम कुटिल है, तुलसीदास, स्मरण करो कि इसकी तामसिक सिद्धियों ने तुम्हें कितना सताया है।” गंगाराम ने कहा।
“अरे हमका का सतइह ! भूत-पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावे। संकटमोचन के आगे कौंन खड़ा हो सकता है।”
“धन्य हैं महात्मन आपकी, अटल श्रद्धा से हम सदा हाँ ना में कूलनेवाले मोह-आत्माओं को ऐसा लगता है जैसे बंद तहखाने में ताजे पवन झकोरे आनें लगें
हों।” जैराम सेठ ने गदगद भाव से कहा।
“वाह कैसी बढ़िया बात कही जैराम। हमें गर्व है कि गोस्वामी जी महाराज के निकट आने का सौभाग्य पा सके। पिछले चालीस बरसों से यही तो हमारी संजीवन बूटी हैं। राम तुम्हारी जय हो !”
पंडित काशीनाथ की बात से गर्व-स्फूर्ति लेकर कैलास जी बोले- “अरे, हमें तो तिहत्तर वर्षों से यह वरदान प्राप्त है। हम इनसे चार वर्ष छोटे हैं। पहली बार मेघा भगत के यहाँ बात भई रही, फिर तो साथ-साथ बदरी-केदार, मान- सरोवर, द्वारका तक की यात्रा की।”
कैलास जी की बातें सुनते हुए गंगाराम जी मद-मंद मुस्कराते रहे। जब उनकी बात समाप्त हुई तो घीरे से गर्दन उठाई और कहने लगे- “इन देवता को,मित्र मानकर तुलसी, तुलसिया, रामबोला आदि कहकर पुकारने का सौभाग्य आप लोगों के बीच में सबसे पहले मुझे ही मिला था। बारह-तेरह वर्ष की आयु
से हम दोनो साथ साथ पढ़े हैं । राम-भक्ति तो मानो इनकी घुट्टी में ही पड़ी है। पर भाई भूत से ये भी कुछ कम नही सताए गए है। हः-ह.-ह , कहौ तुलसी, बताबैं तुम्हारे हाल?” 
बेनीमाधव की उत्सुकता उनकी आँखो में गेंद सी उछलीं। बाबा बड़ी स्नेह भरी दृष्टि से अपने सहपाठी को देखते हुए बोले- “सुनाओ सुनाओ। इन सब का मनोरंजन और मेरा आत्मलोचन होगा।”
पंडित गयारास ज्योतिषी का मुखमडल हर दृष्टि के लिए चुम्बक बन गया।
पालथी पर बायाँ हाथ थोड़ा रखकर उसपर अपनी दाहिनी कोहनी टिकाकर अधबढ़ी दाढ़ी पर मुलायमियत से उँगलियाँ फेरते हुए पण्डित गंगाराम पिचहत्तर- छिद्त्तर वर्ष पूर्व के अपने स्मृति-प्राकाश में शब्दों के पंख लगाकर उड़ने लगे।बाबा ने अपनी आँखें बंद कर लीं। सहपाठी के शब्दों का लंगर बाँधकर उनकी ध्यानमग्न काया स्मृति के समुद्र में गहरी पैठने लगी और अपनी अनुभवगम्य बिम्ब सजीवता को सागर के तल से मोतियों की तरह उबारकर लाने में तल्लीन हो गई।
गंगाराम जी कह रहे थे -“हमारी इनकी भेंट पूज्यपाद प्रात:स्मरणीय देव जी महाराज की पाठशाला में हुई थी।
क्रमशः

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...