Sunday, 16 April 2023

tc 36

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
36-

कई बालक, युवक और प्रौढ़ लोग वहाँ डण्ड-बैठकें लगाते, मुग्दर घुमाते अथवा मालिश करवाते या फिर अखाड़े में कुश्ती लड़ते दिखलाई पड़ रहे थे। घाट पर भी थोडी बहुत भीड़ भाड़ थी। अधिकतर लोग घाट की सीढ़ियों अथवा चबूतरों पर बैठे पूजामग्न थे।शहर से आए हुए कुछ देहाती स्त्री-पुरुषों का स्नान भी चल रहा था। 
बाबा को देखकर अखाड़े के लड़कों ने 'बाबा आ गए, बाबा आ गए’ कहकर वैसे ही चिल्लाना आरंभ किया जैसे सूर्य भगवान को देखकर चिड़ियाँ चहकती हैं। थोड़ी ही देर मे बाबा अपने भक्तों से घिर गए। रामू और बाबा दोनों ही बनारस वापस आकर अत्यंत मगन थे। बेनीमाधव और राजा भगत को मकान के ऊपरी भाग में दो कोठरियों में बसाने का आदेश देकर बाबा अपनी कोठरी की ओर बढ़े।कोठरी का द्वार सफेदी से पुता हुआ था। द्वार के चारों ओर रामनामी से अंकित गणेश जी बने हुए थे। द्वार के अगल-बगल दीवारों पर ऐसे ही राममय स्वस्तिक और कमल बने थे। कई युवक बाबा को सहारा देते अथवा उनके आगे-पीछे लगे हुए उनके साथ बढ़ रहे थे। बाबा ने कोठरी मे प्रवेश किया। कोठरी लिपी पुती स्वच्छ थी।उनकीअनुपस्थिति में किसी भक्त ने चारों ओर गेरू और चूने से राम शब्द के बड़े ही कलात्मक और सुन्दर वेल बूटे चीत दिए थे। चौकी के सामने की दीवार पर राम नाम की तरंगों में एक रामनामी हंस भी बताया गया था और जिधर बाबा की चौकी लगी थी उधर दीवाल में हनुमान जी की एक विशाल काय मूर्ति भी राम शब्दों से अंकित की गई थी। चारों ओर देखकर बाबा मगन हो गए। बोले- “वाह, तुम लोगों ने तो इस कोठरी को बैकुण्ठ बना दिया, किसने किया यह सब?“
बाबा को सहारा देकर चौकी पर बैठाते हुए एक युवक बोला- "कन्हई इसे एक दिन पुतवा रहें थे तभी सुमेरू रंगसाज इधर आए। उन्होंने आपके नाम की कुछ मानता मानी थी सो पूरी हो जाने पर बड़ा परसाद-वरसाद लेकर आपके दर्शन करने आया था। उसी ने कहा कि हम इस कोठरी का राम-श्रृंगार करगें।”
“वाह, बड़ा रामभक्त है। उसका सदैव मगंल हो।” 
आने के दूसरे दिन बाबा ने विद्वनाथ और विन्दुमाधव के दर्शन की तीव्र इच्छा प्रकट की। उन्हें ले जाने के लिए डोली का प्रबन्ध हुआ। काशी का मध्य भाग अन्‍तगृह ही कहलाता था और श्रेष्ठ पण्डितों, सेठ, साहुकारों तथा सम्पन्न हाट-बाटों से सदा जगमगाया करता था। क्षत्री, ब्राह्मण और बनियों की बस्ती इस भाग में अधिक थी। लगभग छत्तीस-सैतीस वर्ष पहले राजा टोडरमल के पुत्र राजा गोवर्धनधारी ने सुलतानों के समय तोड़े गए काशी विश्वेश्वर के मन्दिर को फिर से बनवाकर नगर का तेज बढ़ा दिया था। भक्तों की भीड़ से मन्दिर में बड़ी चहल पहल थी। ब्राह्मणों के समवेत मन्त्रोच्चार से वह विशाल मंदिर गूँज रहा था। काशी विश्वेश्वर की पावन मूर्ति के पास पुजारियों और दर्शनार्थियों की भीड़ लगी हुई थी। “गोसाईं जी महाराज आ रहे हैं।रामबोला बाबा आ रहे हैं।हर-हर महादेव, जै-जे सीताराम” आदि ध्वनियों  से मंदिर का आँगन गूँज उठा। कइयों ने घृणा और उपेक्षा से मुहँ भी बिचकाएँ किन्तु बाबा के लिए मार्ग बनता गया और वे मदिर में पहुँच गए। मन्दिर के पुजारियों में बाबा के विरोधी अधिक थे किन्तु महन्त जी उनका बड़ा आदर करते थे। कुछ दूर से ही उन्हें देखकर महन्त जी का मुख खिल उठा। बाबा सहारा लेकर बढ़ रहे थे किन्तु शकंर जी की मूर्ति को देखते हुए वे बड़े आनन्द- मग्न थे। दर्शन करते ही वे हाथ बढ़ाकर सस्वर काव्यपाठ करने लगे- 

“खायो कालकूटु, भयो अजर अमर तनु, भवनु मसानु गथ गाठरी गरद की॥ डमरू कपालु कर, भूपन कराल व्याल, बावरे बड़े को रीफ बाहन बरद की॥तुलसी बिसाल गोरे गात विलसति भूति, मानो हिमगिरि चुरु चाँदनीसरद की॥
ग्रंथ धर्म काम मोच्छ बसत बिलोकनि मे, कासी करामाति जोगी जागति मरद की॥

अपना दु:ख दरद आसपास के वातावरण को अतंर के उभरे भावावेश से रंगकर मानो सूर्य के प्रकाश में अन्धकार सा विलीन हो गया। दृष्टि के सम्मुख केवल विश्वनाथ थे और वह भी भाव सरिता के मस्त प्रवाह से बहकर अपना प्रत्यक्ष स्थापित रूप परिवर्तित कर चुके थे। भाव के दूध में उमंग रूपी चीनी जैसे जैसे घुलती गई वैसे वैसे ही आँखों का स्वाद बदलता चला गया। मूर्ति के स्थान पर जागते जोगी मरद की आकृति अपने आप उभरती ही चली गई। पिगंल वर्णी मस्तक पर जटाजूट से प्रवाहित पावन गगांजल, विशाल अरुणाभ नेत्रों की ज्योति की दमक, ललाट पर द्वितीया का, चन्द्र, भस्मीभूत, सर्पभूषित, दिगम्बर वेशधारी, परम कल्याणकारी शिव भोलानाथ गोसाईं बाबा की आँखों के आगे खड़े श्रंगी बजा रहे थे, जिसकी गूँज उनके रोम-रोम मे अद्भुत नाद जगा रही थी। अन्तमर्न के आखँ कानों से देखते-सुनते बाबा अपने में तन्मय हो गए थे। बाबा एक के बाद एक दो-तीन कवित्त सुनाते ही चले गए। सारा वातावरण बँधकर महाभावयुक्त हो गया। उनके विरोधियों के मन का लोहा तक उनकी भावाभिव्यक्ति के ताप से पिघलकर रस बन गया था।

“अहो ए ई शाला शोण्डो गोशाई ए बार फिर एशे देखे दी।”
लगभग साठ-पैसठ वर्ष के प्रकाण्ड तान्त्रिक पण्डित रविदत्त लाल वस्त्र पहने, लाल टीका लगाए, लाल-लाल आँखों से आग बरसाते हुए मन्दिर में प्रविष्ट हुए। महंत जी ने हाथ उठाकर उन्हें शान्त करना चाहा किन्तु रविदत्त जी का क्रोध उस समय और भी अनर्गल हो गया। वे बोले-“हामको आप चुप नही कोरने शकता मोहोत जी। हामको मा बोला जे तुलशीदा शोण्डो दगाबाज के दोण्ड दामो रोबीदत। ए बार आमि एइ दुष्ट के निशचोइ मारबों।” 
अपने कमंडलु से चुल्लू में जल लेकर - “ओम- ओम‌, आग्रच्छ-ग्रागच्छ, मारय-मारय”- मंत्र का पाठ जोर से आरम्भ करके फिर धीरे-धीरे होठों में बुदबुदाते हुए अंत में कर्कंश स्वाहा शब्द के साथ झटके से हाथ उठाकर बाबा पर जल छिड़कना चाहा, किन्तु पहले से ही सावधान राय ने छपाक से आगे बढ़कर उनके उठे हुए चुल्लू को ऐसा झटका दिया कि पानी स्वयं रविदत्त के मुख पर ही पड़ गया। अब तो रविदत्त के रोष का ठिकाना न रहा। साँप का विषदंत मानों उसके ही शरीर में संयोग से चुभ गया।महंत जी उठे, बाबा ने भी दृष्टि फेरकर देखा।
क्रमशः

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