महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
35-
बेनीमाधव ने फूँककर चुल्लू से उसके अधखुले होठों में पानी डाला। पानी का स्पर्श पाते ही गर्दन थोड़ी हिली।राम-राम जपते हुए बेनीमाधव ने उसके मुँह पर पानी का एक हल्का सा छींटा दिया। युवती ने आँखें खोली।
“राम-राम जपो बिटिया”
गाड़ीवान और भगत जी का सहारा लिए हुए बाबा गाड़ी से उतरकर लँगड़ाते हुए इसी ओर आ रहे थे।
युवती ने बेनीमाधव से पूछा-“उइ मरि गए?”
बेनीमाधव ने समझा कि युवती शत्रुओं के सम्बन्ध में पूछ रही है। प्रेम से आश्वासन दिया-“हाँ, बिटिया, अब तुम्हारा कोई भी शत्रु बाकी नही बचा। राम-राम जपो।”
युवती की आँखें मुँद गईं , हफँनी तेज हो गई।बाबा तब तक निकट पहुँच चुके थे। बेनीमाधव जी निरन्तर जोर-जोर से राम-नाम जप रहे थे। बाबा जब उसके सिरहाने पहुँचे तब उसके होठ फिर पानी के लिए बुदबुदाए। बेनीमाघव अपनी रामधुन में युवती के होंठों की हरकत पर ध्यान न दे पाए। रामू ने लोटें से एक चुल्लू जल लेकर उसके होंठों में डाला। पानी का स्पर्श पाते ही होंठ कुछ और खुले और पानी के गले से नीचे जाते ही आँखें भी एक बार खुलीं।बाबा को देखा, आँखें कुछ और ऊपर उठी, पेड़ पर लटकती लाश की पीठ दिखलाई दी। युवती बिलखी -“रा..रा.....जा..”
उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा बोले-“सुख से जावो बेटी, तुम्हारा पति अमर गति पा गया। राम-राम भजो।”
युवती की आँखें बाबा को एकटक निहारते हुए ही थम गईं।उनकी ज्योति बुझ गई। बाबा बोले-“कलिकाल में यह आए दिन का खेल हो गया है। वीर थी वह स्त्री जिसने आतताइयों द्वारा अपवित्र होने से पहले ही अपनी हत्या कर ली। वीर था उसका पति भी जिसने अकेले ही इतने आदमियों को समाप्त कर दिया।”
“तब इस व्यक्ति को फाँसीं किसने दी होगी?”
“कुछ और सिपाही भी रहे होगें जो बदला लेकर चले गए। लेकिन उनकी स्वामिभक्ति देखो, अपने सरदार तक का शव ठिकाने नहीं लगा गए। वस्त्र मूल्यवान हैं किन्तु रत्नालंकार एक भी नहीं दिखलाई दे रहे है। दुष्ट उन्हें लेकर आगे बढ़ गए। वाह रे स्वार्थी दुनिया, अब मैं इन शवों की सद्गति हुए बिना आगे नही जाँऊगा। वेनीमाधव ! रामू। तनिक गाँव में जाकर दो-चार व्यक्तियों को बुला लो, बेटे। इन यवनों को धरती तथा इस वीर दम्पति को अग्नि के सुपुर्द किया जाए।”
भगत जी बोले- “अच्छा अब तुम तो चलकर गाड़ी पर बैठो, भइया ई कैंकरन और गिद्धन तें हम पंच जूझि लेब।”
गाड़ीवान बोला- “आप सब महात्मा लोग बराजिये, हम हियाँ खड़े हैं।”
गाड़ी पर बैठे हुए बाबा गम्भीर भाव से कहीं अदृश्य में देख रहे थे।
भगत जी बोले-“हमार तो जनम बीत गवा इहिं सब कलिकाल के अत्याचारन का देखत देखत। मनुष्य के प्राणन का मानों कौनो मूल्य नाहीं रहा।”
बाबा बोले- “अकबरशाह के समय में थोड़ा-बहुत सुशासन आया था, अब वह भी समाप्त हो गया। शासक दिल्ली में रहता है। उसे नित्य हीरें, मोती, जवाहिर और सोना चाहिए। स्त्री और धन की लूट का नाम ही कलिकाल है। सारे पाप यहीं से आरभ होते हैं। हम जब पहली बार गुरु परमदेव के साथ यहाँ आए थे तब तो ओर भी बुरी दशा थी।”
पद्रह-बीस व्यक्ति रामू के साथ आ पहुचें। लाशों पर उचकती दृष्टि डाल कर पहले वे गाड़ी की ओर ही भागते हुए आए। रामू ने उन्हे बतला दिया था कि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज नें उन्हें बुलाया है। सबने गाड़ी को छूकर सिर नवाया।दो बुड्ढे भी साथ आए थे, उन्होंने सबसे कहा-“जाव- जाव, इन वीर पती-पतनी की चिता तैयार करो और दुष्टन सारेन को पड़ा रहै देव। खाय गिद्ध-कौवा।”
बाबा ने तुरत ही हाथ उठाकर कहा-“ना-ना, मनुष्य मनुष्य हैं। काया को सदगति मिलनी ही चाहिए।”
बुड़्ढ़ा बोला- “अरे महाराज, हम तौ इनकी सद्गति करें और जो अभी इनके साथी संगी लौट आवें तो सब मिलके हमारी ही गति बना डालेंगे।”
“राम हैं, भइया, राम हैं। कभी होम करते हाथ जल अवश्य जाता है पर राम जी सबकी दया विचारतें हैं।”
बुड्ढ़ा बोला- “यह दुष्ट किसी की दया नही बिचारते।”
उत्तर सुनकर बाबा हल्की सी हँसी हँस कर बोले-"दुष्ट यह हो या वह, वे किसी की दया नहीं विचारते”
काशी नगरी की सीमा में प्रवेश करते देखकर दूर से ही कुछ लोधियों ने उन्हें 'इधर आवा हो जजमान' कह कर ललकारना आरम्भ किया। दो पण्डे दौड़ते पास भी आ गए।गाड़ी में बाबा को बैठा हुआ देख कर एक प्रौढ़ पहलवान नुमा पण्डे ने घृणा से मुहँ बिचकाकर कहा-“अरे ई तौ गुसैंया सरवा।”
रामू, बेनीमाधव आदि के चेहरों पर तमक आ गई, किन्तु बाबा खिल खिलाकर हँस पड़े। कहा-“हाँ रे, अब तुम्हारे यजमान करवत लेने के बजाय राम-नाम लिया करेगें।”
“अरे तुम्हें भवानी खायै, अधर्मी, तोरे रोम-रोम मा एराम रमे।” बाबा ने पण्डे की गाली को अपने भाव से सह लिया और कहा-“राम कहा कर बचवा। इस शंकर जी की नगरी में भला काली गुण्डई का क्या काम हैं?”
“रे जा सारे। सबेरे सबेरे तुम्हार राम मुख देखकर हमार तो बोहनी बिगड़ गई।”-कहते हुए वे लौट गए। दूसरा युवक पग दो पग उसके साथ जाकर फिर लौटा और हाथ जोड़कर बाबा से कहा- “ई मंगली के कारण आप हम सबको सराप न दीजिएगा। महाराजौ, आप ऐसे महात्मा से कुबचन बोलकर जाने कौन से नरक में ठिकाना मिलेगा इस नीच को। बाकी हमें आप क्षमा कर दीजिए।”
वो करवत का वह कटुमापी पण्डा अपनी जगह से ही चिल्लाया-“अबेआता है कि नहीं। सारे, जिजमान न मिला तो तुझें ही ले जाके करवत दे दूँगा और तेरी बिटिया-मेहरुआ को बेचकर अपने दक्षिणा के पैसे वसूल कर लूगाँ।”
दूसरा पंडा उसकी ओर बढ़ते हुए चिल्लाकर बोला- अरे, जा-जा, तेरे बाप-दादे सात पीढ़ी तक के आयें तो भी हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।”
दोनों पण्डे आपस में गाली-गलौज करते हुए तेजी से दौड़ पड़े और बाबा की गाड़ी भी उन्हीं के पीछे पीछे धीरे धीरे बढ़ती गई। गंगा और अस्सी के संगम पर घाट के ऊपर एक पक्की इमारत बनी थी। उसके पहले एक अखाड़ा भी था जिसके ऊपर छप्पर छाया हुआ था।
क्रमशः
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