महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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शाम को दर्शन के लिए पधारी हुई रानियों, सेठानियों को भी उपदेश दिया। रात मे केवल तनिक सा दूध साबुदाना लेकर ही रह गए।
अगली रात भी सूनी ही गई, शक्ति न आई। बाबा अपने आप से बड़े दु:खी थे। मैंने पार्वती अम्मा का आग्रह क्यों किया? श्रीचरण भक्ति छोड़कर मैंने और कुछ क्यों चाहा ? सेवक को भला क्या अधिकार है कि वह अपने स्वामी से किसी वस्तु की माँग करे। स्वामी की जो मर्जी होगी वही मिलेगा। तुलसी जो बात स्वयं तूने अपने से तथा दूसरों से बारबार कही है, उसी जाने समझे सत्य को नकार कर तूने अपने प्रभु को क्यों अप्रसन्न किया। मन का अवसाद काव्य-तरंगो मे लहराने लगा-
“जानि पहिचानि मैं बिसारे हो कृपानिधान एती मान ढीठ हौं उलिटि देत खोरि हो।
करत जतन जासों जोरिवें' को जोगी जन तासों क्यों जुरी,
सो अभागो बैठो तोरि हो।
मोसो दोस कोस को भुवन क़ोस दूसरो न आपनी,
समु किन सुक्ति आयो ठकटोरि हौ। गाड़ी के स्वान की नाई, माया मोह की बड़ाई
छितहिं तजत छिन भजत्त बहोरि हो।
मन की ग्लानि उमड़ती ही गई - “हे प्रभु, मैं आपके सुनाम की करोड़ों कसमें खाकर अब तो यही कहूँगा, मुझ जैसे लवार, लालची और प्रपंची को अपने द्वार से दूर फेंकवा दीजिए, नहीं तो मैं कही इस सुधा सलिल के समान चमकते हुए आपके पवित्र द्वार पथ को सूकरी की भाति गन्दा कर दूगाँ। हे प्रभु, सत्य कहता हूँ , अब मुझें इस धरती से उठा लीजिए। अब जीने की लालसा नहीं और यदि आपने ढील दे दी, मैं जीवित रह गया तो आपके सुयश् को अपने पातकों से मैं निश्चय ही कही गहरे में डुबो दूगाँ।”
अपने को प्रभु से दण्ड दिलाने की तीव्र चिढ़ भरी इच्छा करते करते बाबा की आँखों से गंगा-जमुना बह चली। उनके शब्दों को मन में दोहराते हुए अश्रु-विगलित स्वर के प्रभाव से रामू भी बिलख-बिलख कर रो पडा़। बाबा के दोनों जाँघों में कई दिनों से गिल्टियाँ निकल आई हैं। उनमें से दो अब पक भी चलीं हैं। पीड़ा भोगते हुए बाबा के मन में बार-बार आया कि जागी किंतु रूठी हुई शक्ति के कोप के कारण ही उनकी काया पर यह विकृत प्रभाव पड़ा है, किन्तु राजा भगत, संत वेनीमाधव जी तथा रोज आने जाने वालों में से कई अनुभवी लोगों का यह विचार था कि बलतोड़ के फोड़े हैं। कई लोग रामू को दोष देते थे कि उसने मालिश करने में असावधानी बरती।वह बेचारा सुन कर लज्जित हो जाता था। रामू पिछले दस-बारह वर्षों से बाबा की मालिश करता आया है। अपनी प्रबल श्रद्धा एवं सेवा-भाव के कारण उसने मालिश की विद्या को अब ऐसी बना लिया है कि बाबा परम प्रसन्न होते हैं। उसने श्रपनी जानकारी में ऐसी रगड़ नहीं की कि बाबा के बलतोड़ हो जाते, वह भी एक-दो नही चार पाँच, फिर भी जब बडे़ बुजुर्ग कहते है तो कदाचित् उससे चूक हो गई हो। बाबा इन दिनों अधिक बातें नही किया करते थे। वे प्राय: उपदेश ही दिया करते थे, किन्तु अब कथा के समय को छोड़कर बाकी समय “राम कहो' अथवा 'रामराम जपो' से बड़ा वाक्य नहीं कहते थे।एक ओर वे अपने तन की पीड़ा तथा दूसरी ओर आशा और प्रार्थना को अनवरत सहते हुए अन्तर्लीन ही रहा करते थे। चित्रकूट में सभी लोग बाबा के इस परिवर्तन से चकित थे। भादों मास के शुक्लपक्ष की नवमी को रामचरित मानस का पाठ पूरा हुआ।अन्तिम दिन आरती में डेढ़ हजार रुपयों से कुछ अधिक ही रकम चढी़। बाबा ने चित्रकूट के आदिवासियों और भिखारियों की टूटी झोंपड़ियों को छवाने और उन्हें आगामी सर्दी के कपड़े दिलाने के लिए दान कर दी।
इसके बाद ही बाबा बोले -“अब हम काशी जी जायंगें। गंगामैया की याद आ रही है।बाबा विश्वनाथ बुलाते हैं।”
त्रयोदशी के दिन बाबा ने चित्रकूट से प्रस्थान किया। हजारों जन उन्हे सीमा तक छोड़ने के लिए आए।एक छोटी बैलगाड़ी पर उनकी यात्रा के लिए व्यवस्था की गई थी। विदा का दृश्य बड़ा मार्मिक था। चित्रकूट वाले बाबा को सब अपना ही समझते थे। सबको ऐसा लग रहा था मानों परिवार का बड़ा बूढ़ा अपने अन्तकाल में गृह त्यागकर काशी लाभ करने जा रहा हो।अधिकतर लोगों के मन से यह पुकार उठ रही थी कि बाबा का यह अन्तिम दर्शन हैं। भगवान अपने परम भक्त को भाव-भीनी विदाई दे रहे थे।क्षितिज पर काशी दिखलाई पड़ने लगी। गंगा दूर से रुपहली गोटे की पट्टी जैसी चमक रही थी। देखते ही बाबा आत्मविभोर हो गए। गंगा की ओर हाथ बढ़ाकर मस्ती में कविता फूट पड़ी -
“देवनदी कहें जो जन जान किए मनसा, कुल कोरि उधारे।
देखि चले भंगरे सुरनारि, सुरेस बनाइ विमान सँवारें।
पूजा को साजुँ विरंचि रचे तुलसी, जे महातम जाननिहारे।
श्लोक की नींव परी हरिलोक बिलोकत गंग ! तरंग तिहारे।”
गाड़ी ज्यों ही कुछ और आगे बढ़ी त्यों ही सबको सामने वाले पेड़ पर एक शव लटकता हुआ दिखलाई दिया।रामू बोला- “लगता है किसी को फाँसी दी गई है।”
और आगे बढ़ने पर सारा दृश्य स्पष्ट रूप से दिखलाई देने लगा। तीन सिपाही वेषधारी और एक मूल्यवान वेषधारी सरदार की लाशें पड़ी थीं। उनसे कुछ हटकर लहू के ताल में डूबी एक स्त्री की लाश थी। फाँसी पर लटका हुआ शव भी जगह जगह से रक्तरंजित था। कौवे वृक्ष पर काँव -कावँ मचा रहे थे और कुत्ते लाशों से जूझ रहे थे। आकाश पर कहीं से उड़कर आते हुए गिद्धों का छोटा सा झुण्ड भी दिखलाई दे रहा था। दृश्य देखकर हर एक का मन भारी हो गया था। गाड़ी लाशों से जरा सरकाकर निकाली जाने लगी। बाबा अत्यन्त करुण स्वर में निरन्तर राम-राम जपने लगे। गाड़ी स्त्री के शव से जरा आगे ही निकली थी कि बाबा तनिक हड़बड़ाकर बोले-“गाड़ी रोक दो। रामू, यह लड़की पानी माँग रही है। अभी मरी नहीं है।” कहने भर की देर थी कि रामू चट से गाड़ी पर से कूद पड़ा और उस स्त्री के सिरहाने के पास पहुँचा। सचमुच वह पानी माँग रह थी। तब बेनीमाधव लोटा लिए पास आ गए।
“पानी पानी है”-
कराहता हुआ धीमा स्वर दोनों के कानों में पड़ रहा था।
क्रमशः
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