Monday, 10 April 2023

tc 33

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
33-

तबीयत का हाल जब पूछा जाता तब वे मगन होकर कह देते, “चिन्ता न करो, बहुत अच्छा हूँ।” उनका स्वर मानों किसी खोह से ऐसा झूमकर आता था कि लगता था उन्होंने मटकों भागँ पी ली हो।उस दिन के बाद बाबा की कोठरी में रामू किसी को आने न देता था। पर राजा भगत अड़ गए, बोले- “हम तुम्हारे जी का मरम समझतें हैं, बाकी तुम अभी निरे बच्चे हो महाराज। हम हियाँ ही पौढे़गें।” कहकर वे कोठरी के द्वार पर आए, देखा कि बाबा तकिये का टेका लगाए मग्न अधलेटे से पडे़ हैं। ऊँची आवाज में भगत जी ने पूछा-“मैया, भीतर आय जायें?”
“आव, आव राजा”
“भैया, हमारी ऐसी इच्छा है कि आज तुम्हारे ही पास रहें। हम सब समझ गए हैं। हमारा हियाँ रहना जरूरी है।”
“रहो, रहो,” गहरा और मूमता हुआ स्वर फूटा-“सब कोई रहो, हमे क्या? हमारे तो एक रामचन्द्र हैं-

“राम रावरो नाम साधु सुर तरु है। 
राम रावरो नाम साधु सुर तरू है।
सुमिरे त्रिविधि घाम हरत, पूरत काम।
सकल सुकृत सरसिज को सरू है।”

भगत जी, वेनीमाधव जी, रामजियावन, हरवचन वैद्य और रामदुलारे उस छोटी-सी कोठरी में भीड़ बनकर जम गए। रामू उनकी चरण सेवा मे लग गया। बीच में दो-एक बार बाबा ने अपने दोनों हाथ उठाकर अपना सिर दबाय। देखकर बेनीमाघव और राजा भगत साथ ही साथ उठे। उस समय भगत जी में नवजवानों की सी फुर्ती आ गई थी। सन्त जी के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें धीमे से ढकेलते हुए वे बोले -“बैठो बैठो, सन्त जी हमने जवानी में भैया की बहुत मालिस की है।” कहकर वे बाबा के सिरहाने बैठकर उनका सिर दबाने लगे।
“कौन? भगत है,अच्छा अच्छा भगत है।”
“हाँ , भैया”
“हम छोटे से रहे तो हमारा सिर बहुत पिराता था। पार्वती अम्मा ऐसे ही दबाती थी। वह अमृतरस आज फिर पाया। राम तुम्हारा भला करे। हमारी पार्वती अम्मां साक्षात‌ पार्वती जी रहीं। उनकी बड़ी याद आती है।”
संत वेनीमाधव का कथा रस कुछ पूछने को उत्सुक हुआ। भगत जी का बाँया हाथ सिर दबाते-दबाते रुक गया, नाक पर उँगली रखकर उन्होंने चुप रहने का संकेत किया।संत जी मन ही मन बड़े कुण्ठित हो गए। उन्हें लगता था कि तुलसीदास जी पर मानों दो ही व्यक्तियों का पूर्णाधिकार हैं। उनका मन दु:ख और क्षोभ के भाव से भरने लगा। 
सर्व जन चिंताओ की गठरी लेकर इस महान सन्त के द्वार पर अपने दु:ख भार छोड़ने के लिए आए थे परन्तु यह कौन जानता था कि दूसरों का कष्ट हरने वाला महापुरुष इस समय अपनी ही मानसिक यंत्रणाओं से अत्यधिक त्रस्त था। ऐसा लगता था कि दण्ड देने के लिए नियति ने एक ऐसे अदृश्य यंत्र में बाबा को बन्द कर दिया है जिसमें उतनी ही सुइयाँ जड़ी हैं जितने कि शरीर में रोम छिद्र होते हैं। ऐसी चुभन है कि न कहते ही बनता है और न सहते ही। किन्तु सेवा से सेवक का निस्तार नही, उसे अपना कर्तव्य तो निभाना ही होगा। जो अनेक बार प्रतीति पाकर अपने आपको खास सेवक समझता रहा है वही इस समय अपने साहब के द्वारा अव्यक्त और तिरस्कृत है।
“क्या जीवन के अन्त में अब निराशा ही निराशा हाथ लगेगी?”
संत वेनीमाधव बाहर लोगों को मना करने चले कि आज बाबा अस्वस्य होने के कारण किसी से नहीं मिलेंगे, परन्तु जैसे ही वे चले वैसे ही बाबा के मन में उनके मन की बात दर्पण सी प्रतिबिम्बित हुई। वे हाथ उठाकर बोले- “नही, वेनी माधव मालिक के काम की अवहेलना करने का साहस यह गुलाम कभी नहीं कर सकता। अनेक रूप रूपाय राम प्रभु लोक-यंत्रणा को दर्शा कर मेरी यंत्रणा की लघुता सिद्ध करने के लिए पधारे हैं।” 
किसी के बच्चे को तिजारी का ज्वर नही छोड़ता, किसी का बेटा घर त्याग कर चला गया है। किसी की सास कष्ट देती है तो किसी की बहू कर्कशा और जादू- गरनी है। किसी निर्बल की जमा जमीन किसी सबल ने हड़प ली है और कोई सबल किसी दुर्बल की भामिनी को बलात हर ले गया है। किसी को भूत सताता है तो किसी को चुड़ैल।रोग, शोक, अत्याचार, अनाचार, पाप-शाप आदि त्रिविध तापों की कष्ट-कथा बहती चली जा रही है और वे झाड़ फूकँ करते, भभूत-गण्डे बाधँते हनुमान जी और राम जी के प्रति निष्ठा जगाते हुए मध्यान्ह तक अपने तन-मन को यंत्रवत्‌ परिचालित करते रहे। उन्हें देखकर रामू को ऐसा लगता था कि मानों किसी संगमरमर की मूर्ति में बोलने और अपने हाथों को गति देने की शक्ति अवश्य आ गई है, किन्तु है वह निष्प्राण। इतने वर्षो के साथ में रामू ने बाबा के उल्लास, उमंग , वेदना-भरे मन की सैकड़ों झाँकिया देखीं थीं पर ऐसा उदास कभी नहीं देखा। रामू अत्यधिक चिन्तित था, कहीं कुछ गड़बड़ी तो नहीं होने वाली है। कुण्डलिनी की ऊर्ध्व गति में क्या कोई बाधा आई है? कौन जाने ? प्रभु जी अपने श्रीमुख से ऐसे गोपन अनुभवों की बातें कभी किसी को नहीं बतलाया करते, फिर जानने का उपाय ही क्‍या है। किन्तु ऐसा हो नही सकता। प्रभु जी के समान शुद्ध मन और आचरणवाला एक भी व्यक्ति रामू ने नही देखा “प्रभु जी अपने मुख से यद्यपि बार बार अपने आपको अति अधम श्रौर पातकी आदि कहा करते हैं, किन्तु रामू ने उन्हें न तो किसी के प्रति नीचता बरतते हुए देखा है और न कोई पाप करते ही। उसके मन मे वर्षों से यह पहेली बनी हुई है कि आखिर पुण्यात्माओं का पातक होता किस प्रकार का है। बाबा दूसरों का दुख दर्द मेटने के लिए वर्ष की कुछ विशिष्ट तिथियों पर यंत्र-तंत्रादि सिद्ध करते हैं लेकिन रामू ने आज तक कभी यह नही देखा कि बाबा ने किसी को मरने, या बदला लेने की भावना से कभी ऐसे प्रयोग किए हो। फिर भला यह कौन सा कष्ट सह रहे हैं। इस नब्बे वर्ष के सरल निर्मल शिशु से भला कौन सा पाप हो सकता है?  रामू सोच सोच कर रह गया पर उसे कुछ न सूझा।
दिन में बाबा ने भोजन न किया। बहुत चिरौरी करने पर एक अमरूद के दो टुकडे़ खा लिए।तीसरे पहर कथा भी कही, पर खींचकर कही।
क्रमशः

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