Sunday, 9 April 2023

tc 32

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
32-

वेनीमाधव फूट-फूट कर रो रहे थे। कुछ देर विचार करने के बाद बाबा बोले -“पुत्र, काम ने मुझें भी बहुत कष्ट दिया है किन्तु तुम्हारे प्रति तो उसने अत्याचार किया है। मैं समझ गया, अब तुम्हें सुख नहीं मिल सकता। जिस मार्ग पर अब तक इतनी ठोकरें खाकर भी तुम चलते रहे हो उसी का अनुसरण करके ही तुम्हें सदगति प्राप्त हो सकती है। अन्य उपाय नहीं। पश्चात्ताप के पाप को सतत प्रार्थना का पुण्य बनाओ।मैंने यही किया है-

“सतकोटि चरित अपार दधिनिधि मथि लियो काढ़ि बामदेव नाम-पृतु है। 
नाम को भरोसो-बल, चारिहें फल को फल, सुमिरिये छाडि छल, भलों कृतु है।”

“आपने शतकोटि चरित्रों का दधि मथकर जिस कामारि अर्द्वनारीश्वर को पाया वह मुझें एक आप ही के पावन चरित से प्राप्त होने की आशा है। मैं यह भलीभाँति समझ चुका हूँ कि आप ही मेरा वेड़ा पार लगाएगें।” वेनीमाधव जी बाबा के चरणों मे झुक गए।
उनके सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए बाबा कहने लगे- “जप में ध्यान रमाओ। नाम ही का आधार लो।तुम्हे गति मिलेगी।”
“नहीं मिलती गुरू जी। वर्षों से प्रयत्न कर रहा हूँ । धरती पर पानी डालने से वह सोखती है, मैं तो चिकना पत्थर हूँ पत्थर, पानी बह जाता है।” गीली आंखे फिर कटोरी सी भर उठीं।
बाबा ने स्नेह से झिड़का-"कैसे मर्द हो वेनीमाघव? दीवार से बार बार गिरनेवाली चींटी की कथा सुनी है न। उस अदम्य अपराजेय नन्हें जीव से शिक्षा ग्रहण करो। नाम-जप एकाग्रता सिद्ध कराता है। भाव की एकाग्रता अंतश्चेतना का वह द्वार खोलती है जिसमे सत्य सार्थक होकर बसता है” कुछ क्षणों तक रुककर वे झरने की ओर देखते रहे- “झरना नहीं रंग बह रहें थे। रंग आपस में मिलते तो नया रूप लेते, बिछुड़ते तो नया रूप लेते और जब सब रंग मिलते तो झरना बिजलियाँ बहाने लगता था।”
बाबा उमंगो से भर उठे, खडे़ हो गए, कहने लगे -“अपने जीवन-भर के संघर्ष का सुख मैंने अब पाना आरम्भ किया है। आाओ चलें।”

उस रात फिर उसी समय शक्ति जागी। बाबा को लगा कि कोई उन्हें झिंझोड़ कर जगा रहा है। वे उठ बैठे। देखा कि सामने एक प्रकाश पुरुष खड़ा है। पुरुष के चरण नख बिंदु से एक ज्योति निकलकर उनकी काया के चारों ओर इन्द्रधनुष की तरह फैल गई। ज्योति-रेखा जब उनके हृदय को स्पर्श करती है तो वह उन्हे दाहक नही लगती वरन‌ उसका ताप उनकें हृदय को गुदगुदा रहा है।उनकी साँसों में समाई रामधुन बढ़ती जा रही है। उन्हे ऐसा लगता है कि मानों उनकी देह संगीत -लहरियों से भर उठी है। उनकी दृष्टि के आगे फैले प्रकाश का अणु-अणु उसकी गूँज से निनादित हो रहा है। इस गूँज से घिरा राम- नाम सुनने में अलौकिक लग रहा है। ज्योति चारो ओर से सिमटकर फिर बिन्दु बन रही है और उनकी काया की ओर बढ़ रही है। बिन्दु उनकी नाभि,हृदय और कण्ठ को छूता हुआ ऊपर बढ़ रहा है, उनकी भवों के केन्द्र को स्पर्श कर रहा है। उन्हें अपने कपाल के, मध्य में गुदगुदी-सी अनुभव होती है और वह गुदगुदी बढ़ते बढ़ते असह्य हो जाती है। बार-बार जी चाहता है कि सिर रगड़ लें परन्तु हाथ उठ जाने पर भी वे उसे हठपूर्वक रोक लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनका सारा शरीर भीतर से खोखला हो उठा है, सायँ-सायँ कर रहा है। प्राण केवल भृकुटी में भवँर बनकर चक्कर काट रहे हैं।यह चक्कर तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है। कण्ठ से लेकर मस्तक तक ऐसा तनाव बढ़ गया है कि उनसे सहन नही हो पा रहा है। मन को बहुत कड़ा करके बाबा अपना राम-जप निरन्तर साधे रखते है। श्रद्धा के भीतर अंतर्द्वंद्व छिड़ गया है। उफन कर शब्द फूटतें हैं -

“स्वारथ साधक़ परमारथ दायक नाम, राम-नाम सरीखो न और हितु है।
तुलसी सुभाव कहीं साचिये परेगी सही, सीतानाथ नाम रिक्त चितहूँ को चितु है।” 

चेतना सिमटकर शून्य बन जाती है। इन्हें ऐसा लगता है कि राम शब्द मानों कील की नोंक क बनकर उनकी भृकुटी में घंसता ही चला जा रहा है। वे केवल भीतर से ही नही, बल्कि बाहर से भी अचेत हो जाते हैं।
उस दिन बाबा सारे दिन मौन रहे। हर वस्तु से अलिप्त और अपने में तनन्मय रहे। बातों का उत्तर भी सिर को हाँ -ना में ही हिलाकर दिया। भक्‍तों की भीड़ यथावत्‌ ही आाई। उन्होंने सबको मौन भाव से ही ग्रहण किया। उन्हें भीतर से लगता था कि जैसे उनके बोलने की शक्ति और इच्छा ही चुक गई हैं किन्तु तीसरे पहर कथा सुनाते समय उनका स्वर अचानक खुल गया । 
उस दिन नर-नारियों को कथा मे अपूर्व-अलौकिक रस मिला। प्रत्येक जन यही अनुभव कर रहा था कि मानों चित्रकूट में राम जी का अतिथि समाज इसी समय उनके बीच में उपस्थित है और फलाहार कर रहा है। लोग भाव मन्दाकिनी में बह रहे थे। उस दिन कथा समाप्त होने पर भक्तों की भीड़ भौंरा बनकर तुलसी चरण कमल स्पर्श का रसपान करने के लिए बावली बनकर उमड़ी। बाबा का आह्वाद वेग भी साथ ही साथ उमड़ पडा, मानों मन रूपी समुद्र में ज्वार आ गया हो।आँखों के सामने नर-नारी साधारण जन न रहकर सीता- राम की छवि से भासित हो रहे थे।बाबा की आँखें छलछला आई, कण्ठ गदगद हो गया और 'सीताराम-सीताराम' कहते-कहते ही वे सहसा अचेत हो गए।
बाबा को भीड़ से बचाकर एकान्त में लाना सहज काम नहीं था, किन्तु रामू वेनीमाघव और रामजियावन आदि की तत्परता से बाबा को व्यासपीठ से उठा- कर घाट के तख़्त पर लाया गया। बाबा को अचेत देखकर भीड़ व्याकुल हो उठी थी। वह सारा दिन चिन्ताकारक रहा। बाबा दो बार और अचेत हुए। सहसा बातें करते, जहाँ उनकी आदत के अनुसार मुख पर राम शब्द आ जाता था वहीं वे भाव विगलित होकर गिर पड़ते थे। हरवचन वैद्य बुलाए गए थे पर वे उसमें भलाक् या टोह पाते, माथे पर बदाम रोगन की मालिश की जाने लगी।उस दिन सभी व्याकुल रहे बाबा की खाने की इच्छा ही मानों समाप्त हो चुकी थी। उन्हे अपना पेट भरा-भरा लगता था।
क्रमशः

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