महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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उनकी डण्ड बैठक की अवधि उनके भजन क्रम के लम्बे पाठ के साथ ही साथ पूरी हो जाती है। तन मन के इस व्यायाम में उनका आधी घड़ी से कुछ अधिक समय ही लगता है। फिर वे ध्यान में बैठ जातें हैं। बाबा का यह दैनिक कार्यक्रम जब पूरा हुआ और जब भगत आदि भी अपने दैनिक क्रम से मुक्त हुए घाट पर चहल-पहल बढ़ चुकी थी। रामजियावन नहा धोकर अपना चंदन घिसने बैठ चुके थे। घर लौटने से पहले शिव जी के दर्शन करने जाया करते थे। आज मार्ग में भगत जी ने बाबा को टोका-“भैया, का हम दीन दुर्बलों को हियें छोड़ि के सरग जाओगे?”
सुनकर बाबा खिलखिलाकर हँस पड़े और भगत जी के कंधे पर हाथ रख कर बोले-“तुमको छोड़ के जाएँगें तो स्वयं के हमारे हेतु राजापुर कौन बसायेगा?चिन्ता काहे करते हो।”
“चिन्ता बस इसी बात से भई कि दुई दिनों से हमको सोता छोड़ि के तुम चले आते हो।”
“नही भाई, इसमे हमारा कोई विशेष प्रयोजन नही। दो दिनों से अपने भीतर कुछ ऐसे अलौकिक अनुभव पा रहा हूँ कि उनकी चकाचौंधों के मारे फिर लेटा नही जाता। इसी से चला आता हूँ ।”
राजा की शिकायत मिटी, कौतूहल जागा, पूछा -“कैसे अनुभव पा रहे हो भैया?”
बाबा हँसे , कहा -“मन अभी गूँगा है राजा। वह गुड़ का स्वाद जानता तो है पर बखान नही पाता।”
राजा कुछ समझे, कुछ न समझे पर बाबा की बात से उन्हे यह संतोष अवश्य हो गया कि वे उनसे असंतुष्ट नहीं हैं। किन्तु वेनीमाघव जी मन ही मन में राजा भगत से भी अधिक कुण्ठित थे। उन्हें रामू के प्रति ईर्ष्या थी। वे मन से चाहने पर भी बाबा की वैसी सेवा नही कर पाते जैसी रामू करता है। उन्हें कहीं यह गुमसुम शिकायत भी थी कि बाबा रामू को अधिक चाहते हैं।
बाबा को लगा कि बेनीमाधव दास का मन उनके मन के भीतर बोल रहा है। उन्होंने वेनीमाधव जी के मुख पर एक सतर्क दृष्टि डाली।उनके म्लान मुख पर अपनी नवानुभूति का समर्थन पाकर बाबा को लगा कि उनके मन ने अब दूसरों के मन की तरंगों को आत्मसात करने शक्ति पा ली है। अभी तक वे दूसरों की आँखें देखकर उनके मन के भाव ताड़ा करते थे, रामजी ने इस दिशा में भी कृपा करके उनका एक डग और बढ़ा दिया है। उनका मन अब निर्मल हो गया है। अपने मन की अवस्था को और भी सही प्रमाणित सिद्ध करने के लिए उन्होंने वेनीमाधव जी से कहा-“यह लड़का तुमसे कुछ नही चाहता। इसमें अपना नाम अमर करने की आकांक्षा तक नही है। फिर इससे ईर्ष्या क्यों करते हो वेनीमाधव? मै पक्षपात नही करता। न्याय करता हूँ । अपने मन को निर्मल करो, तब समझ जाओगें।”
बेनीमाधव जी बात सुनकर चौंक पड़े। झटपट हकलाकर कहा-“मे मे मेरे मन में कोई ईष्या नहीं”- बाबा से आखें मिली तो कहते-कहते चुप हो गए, फिर सिर झुकाकर अपराध ज़ड़ित स्वर में कहा-“अपराध हुआ गुरू जी, क्षमा करें।”
बेनोमाधव के चेहरे पर लहराती हुई पश्चात्ताप की कठिन पीड़ा बाबा लक्ष्य कर गये।उन्होंने राजा भगत से कहा-“रजिया, तुम और रामू घर चलो मैं थोड़ी देर के बाद आऊँगा। मुझे बेनीमाधव से कुछ काम है।”
पहाड़ी के पीछे एक छोटे से झरने के पास बैठ गए। आकाश पर बादल मंडरा रहे थे। मौसम सुहाना था। पक्षियों का कल कुँजन बेनीमाधव जी के मन की तरह नाना स्वरों में बोल रहा था, अन्तर केवल इतना ही था कि पक्षियों के स्वर में जहाँ आनन्द था वहीं वेनीमाधव के मन की तहों में भय, करुणा, दीनता, क्षोभ और कुण्ठाएँ बोल रहीं थीं। “गुरूजी सब जानतें हैं। यह मुझे यहाँ क्यो लाए हैं? मैं पापी अवश्य हूँ पर उसके लिए इतना विवश हूँ, क्या करूँ। मुझे यह निरर्थक जीवन क्यों मिला रामजी मैं बहुत दु:खी, बहोत-बहोत, बहोत ही दु:खी हूँ राम जी। मुझ पर दया करो, दया करो।”
“बेनीमाधव तुम्हारे भीतर कोई अनबुझी चाहना है वही विद्रोह करती है और फिर कुण्ठित भी होती है।”
वेनीमाधव चुप रहे। सिर झुकाए सुनते रहे।बाबा ने आगे कहा-“धन का तुम्हें लोभ नहीं, नारी है। मैंने तुम्हारी आँखों से कामना के तीर चलते देखे हैं।तुम विवाह कर लो।गृहस्थ होकर तुम राम पद नेह इस स्थिति को अधिक सुगमता से......” कहते-कहते वे सहसा रुक गए। सहसा वेनीमाधव के कंधे पर हाथ रखकर कहा -“इधर देखो”
गुरु-आज्ञा टाल न सकने की मजबूरी में बेनीमाधव जी ने उनसे आँखें तो मिलाई पर ऐसा करते हुए वे अपने आँसू रोक न सके। उनकी दृष्टि मिलकर फिर झुक गई। बाबा गम्भीर स्वर में बोले-“लगता है नारी को लेकर तुम्हारे मन मे श्रद्धा और अश्रद्धा का भयंकर अंतर्द्वंद्व निरंतर चलता रहता है। मैं ठीक कह रहा हूँ न?”
“हाँ गुरूजी”
"कारण”
बेनीमाधव जी अपने बचपन में ही अनाथ हो गए थे। चाचा-चाची ने पाला। बेचारे कुत्ते की तरह दुरदुराए गए। सोलह-सत्रह वर्ष की आयु थी जब इनके गावँ में एक संन्यासिनी आई। परम तेजस्विनी थी। गाँव भर उसका भक्त हो गया। वेनीमाधव भी माता के सेवक हो गए। उन्हीं के साथ साथ वे गाँव से निकल गए। जिस माता स्वरूपणि संन्यासिनी नें उन्हें आरम्भ में भक्ति का ऐसा प्रबल भाव दिया कि बेनीमाधव अपने भीतर एक चामत्कारिक परिवर्तन का अनुभव करने लगे, वही संन्यासिनी कुछ महीनों बाद तपोश्रष्ट हुई। एक रात सोते हुए वेनीमाधव पर उसने ऐसा कामुक आक्रमण किया कि वे जीवन-भर के लिए झटका खा गए। संन्यासिनी से भागे लेकिन अपने मन से भागकर कहाँ जायें ब्रह्मचर्य साधते रहे, सध नहीं पाता। ब्रह्मचारी के रूप में प्रसिद्धि पाई है इसलिए साधु सेवा की भूखी बदनाम कामिनियों को भजने में भय लगता है। काम के प्रबल हठ से जब जब ऐसे संयोग लुक छिपकर साधें हैं तब-तब उन्हे अपने आप से घोर ग्लानि हुई है। राम और नारी की खींचतान में स्तब्ध होकर खड़े खड़े उनका मन अब काठ हो गया है। अहर्निशि उनकी आत्मा सिसकती है, कहीं जी नही लगता। वेनीमाधव जी के आत्मसंघर्ष को बाबा यों तो वर्षों से देख रहें थे किन्तु उनका मर्म वे आज समझ सके। गम्भीर हो गए।
क्रमशः
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