महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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बोलना-चालना, भीड़ -भड़क्का, खाना-पीना कुछ भी रुचिकर नहीं लग रहा था। रामजियावन ने वैद्य को लाने की बात कही किन्तु बाबा ने मना कर दिया, बोले - “मेरे वैद्य स्वयं पधार रहे हैं।”
रामू अनुभवसिद्ध भले ही न हो किन्तु काशी में जन्मा है। ऐसे वात्तावरण में पला बढ़ा है जहाँ आध्यात्मिक प्रँसग जनसाधारण की गप्पों तक में सुने बखाने जातें हैं। चौदह-पंद्रह वर्ष की आयु में बाबा के पास आया था और इन्हीं की सेवा में जवान हुआ। अनेक संत सन्यासियों और ज्ञानियों के साथ बाबा की बातें भी सैकड़ों बार सुनी हैं, इसलिए रात में जब बाबा लेटे तो पैर दबाते हुए उसने कुछ कुछ सहमे हुए स्वर में पूछा-“प्रभु जी, काया में कोई आध्यात्मिक परिवर्तन?”
"हूँ, किसी से कहने सुनने की आवश्यकता नहीं है।”
दूसरे दिन रात में फिर उसी समय शक्ति जागी। इस बार बाबा भी जाग पड़े। बैठने लगे तो भीतर से आदेश गूँजा - ‘श्वासन साधे पड़े रहो '-बावा अचम्भे में आ गए। सोचते, 'यह स्वर है तो मेरा ही पर इतना गम्भीर और गूँज भरा है कि मानों रामजी का ही स्वर हो।' अभ्यास-भरी साँस राम-राम जप रही है।अन्तर्दृष्टि के आगे दृश्य आ रहें हैं।उन्हें भासित हो रहा था कि उनका मन मानों एक गुफा है। जिसमें बीचों बीच एक दिया जल रहा है। वह गुफा राम नामी वाद्यध्वनियों से गूँज रही है और वह गूँज बढ़ती ही जा रही है। फिर उन्हें लगा कि प्राण मानों उनके नाभिचक्र से नाचते हुए ऊपर उठ रहे हैं, पंचेन्द्रिय अजीव सनसनाहट में भर उठी हैं । सारे राग एक सम्मिलित नाद बनकर उन्हें अपने आप में लपेटते ही चले जा रहे हैं, नाद बवण्डर की तरह उनके मन के चारों ओर नाच रहा है। दीप-शिखा नाद के बवण्डर को नागिन की जीभ बनकर छू लेती है। जैसे ही उसका स्पर्श होता है वैसे ही नादमयी काया आह्नाद की विवश गुदगुदी, कौतूहल और भय की सनसनाहट से भर उठती है। मन गुफा के कण कण से ऐसा रस भरने लगता है कि वह उर्वचूम हो जातें हैं, आनन्द और भय में ऐसा द्वंद हो रहा है कि ऊपर से कुछ कहते नहीं बनता, पर मन में कहीं से बात भी उठ रही है कि धैर्य धरो, प्रतीक्षा करो।मन दीप की शिखा मीनार सी ऊँची उठती है और उसकी नोक से एक नन्हा ज्योति-बिन्दु गिरकर गुफा के शून्य में नाचने लगता है। वह क्रमशः बढ़ा होता है और बन्द कमल कली सा नीचे उतर आता है। कली खिलती है, खिले कमल से तुलसीदास ही का एक आकार पद्मासन साधे बैठा हुआ प्रकट होता है।फिर उसके स्पर्श से एक दूसरा ज्योति बिन्दु उठकर नाचता है और वैसे ही संक्रमण करते हुए क्रमश: कमल और कमलासीन तुलसी प्रकट होकर बाबा के बाएँ विराजते हैं। क्रमश: आकार से आकार निकलते चले आतें हैं। प्रत्येक आकार पहले से अधिक रीता होता है और इन सात आकारों के गोलचक्र के बीच में एक नन्हा-सा सूक्ष्माकार विराजमान हो जाता है किन्तु यह किसी का आकार नही, यह सूर्य है जिसकी किरणें सुनहरी नागनों सी चारों ओर बढ़ रहीं हैं। मन चकित और बड़ा ही विकल है। सूर्य उनके आकारों को आत्मसात करता हुआ बढ़ रहा है।
रामू जाग पड़ा। उसने आश्चर्य से देखा कि अंधेरे मे बाबा की काया तहखाने में रखे सोने जैसी लग रही है। झिलमिल देह मानों यथार्थ से एक उच्च यथार्थ है।
कुछ देर तक अन्तपट के दृश्यों को देखते रहे और फिर वह दृश्य भी तिरोहित हो गए। केवल काला अँधेरा बचा और शेष रहा कपाल- बिन्दु पर एक अनोखा और सचल भारीपन। बाबा को उन दृश्यों के खो जाने का बड़ा दु:ख था। उन्हें वैसा ही लग रहा था जैसे उनका पैसा गाँठ से खिसककर कहीं गिर गया हो। दु:ख को शब्दों का जामा पहन लेने की आदत पड़ गई है। लेटे ही लेटे बाबा अपने आप ही से बोलने लगे-
“कहो न परत, बिनु कहे न रह्मो परत बड़ों सुख कहत बड़े सो बलि दीनता। प्रभु की बड़ाई बड़ी,अपनी छोटाई छोटी, प्रभु की पुनीतता, आपनी पाप-पीनता। दुह और समुक्ति सकुचि सहमत मन, सनमुख होत सुनि स्वामि-समीचीनता। नाथ गुणनाथ गाये, हाथ जोरि माथनाये, नीचऊ निवाजे प्रीति रीति की प्रबीनता।”
इसके बाद बाबा ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उठ बैठे। उन्हें बैठते देखकर रामू ने तुरन्त चरणों में माथा टेककर प्रणाम किया ।
“रामू”
“हाँ, प्रभु जी”
“घाट पर चल बेट”
“जैसी आजा प्रभु जी, किन्तु अभी तो रात शेष हैं।”
“हुआ करे, मुझे ले चल।”
इस लालच से रामू के कंधे पर हाथ रखकर बाबा आँखें मींचें हुए ही चल रहे थे कि कदाचित वे प्रकाश-दृश्य फिर उनके अस्त:पटल पर आ जायें, पर नही आ रहे। तुलसीदास, इस नब्बे वर्ष की आयु में भी तुमने बच्चों जैसी उतावली दिखलाई ? याद रख रे मूढ़, यही तो वह दरबार है जहा गर्व से सर्व हानि होती है।यहाँ तो अपनी आध्यात्मिक गरीबी एवं न्यूनता को प्रदर्शित करने में ही कुशल-क्षेम है। मूर्ख तू भूल जाता है कि राम सरकार रावण जैसे मद मोटो को नही वरन् विभीषण जैसे दीन-दुर्बल पुरुष को शरण देते हैं। इस दरबार में तू जो चतुर बनकर आता है तो तुमसे बढकर मूर्ख और कोई नहीं है। हे अज्ञानी, तूने जटायु, अहल्या और शबरी की कथाएँ क्यों बिसार दीं जिनमें अंहकार रहित प्रेम भाव लहराता है। वे ही प्रभु को प्यारे हैं।रामभद्र मुझे क्षमा करें। मैंने बड़ी चूक की।
सकल कामना देत नाम तेरो कामतरु, सुमिरत होत कलिमल छल छीनता॥ करुनानिधान वरदान तुलसी चहत, सीतापति भक्ति सुरसरि नीर मीनता॥
दो दिनों से भगत जी और वेनीमाघव जी पिछड़ जाते हैं। बेनीमाधव जी को इस बात से गहरा दु:ख और लज्जा का बोध होता है। कल जब घाट पर आए थे तब बाबा नहाकर व्यायाम कर रहे थे किन्तु आज तो वे अपने ध्यान में भी बैठ चुके हैं। बाबा का विचित्र हिसाब है। नहाकर व्यायाम करते है और उस समय वे गणेश भैरव शिव सरस्वती हनुमान और प्रभु सीतापति समेत चारों भाइयों की वन्दना में अपने अथवा पराए रचे हुए श्लोकों का मानसिक पाठ भी करते चलते हैं।
क्रमशः
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