Thursday, 6 April 2023

tc29

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
29-

अभी कुछ दिनों तक तो यह अच्छे प्रबन्धक बने ही रहेंगे। उन्हे अपना शासन जमाना है।”
“आपने सत्य कहा महात्मा जी, पर अब क्या रामराज्य कभी लौटकर नहीं आएगा?”
“जब रामकृपा होगी तब रामराज्य भी आ जायगा।” 
“रामराज्य कैसा होता है बाबा?” बालक तुलसी ने प्रश्न किया।
“जहाँ बाघ और बकरी एक ही घाट पर पानी पीते हैं। राह में सोना उछालते चलो तो भी कोई तुमसे छीनेगा नहीं। जैसा न्याय राम जी करते है वैसा कोई नही कर सकता है बेटा। रामराज्य में कोई दीन-दुर्बंलो को सता नहीं सकता। कोई भूखा नही रहता, कही भी चोरी चकारी और अन्य अपराधजनित कार्य नहीं होते हों”
“ऐसा रामराज्य कब आएगा बाबा?”
नरहरि बाबा मुस्कराए, कहा-“तुम आठों पहर अपने मन में प्रेम से गोहराओ, राम जी जाओ, राम जी आजाओ, तो राम जी तुम्हारी गोहार अवश्य सुनेंगें।” 
“राम जी आजाओ, राम जी आजाओ, राम जी आजाओ” - बालक का भोला
मन गुरु से राह पाकर सीधा सरपट दौड़ चला। मार्ग भर वह इधर उधर से मन
हटा कर बार बार यही रटता चलता था। उसकी बुदबुदाहट पर बड़ी देर बाद नरहरि बाबा का ध्यान गया। तब तक वे अपनी कही बात को भूल भी चुके थे।उन्होंने पूछा-“क्या बुदबुदाता है रे”
"राम जी को गोहरा रहा हूँ , बाबा।”
तुलसी के सिर पर प्रेम से हाथ रखकर बाबा बोले -“गोहराए जाओ, रुकना नहीं। कभी तो गरीब निवाज के कानों में भनक पड़ ही जाएगी।”
एक व्यापारी काफिला इन साधुओं के साथ चल रहा था, इसलिए इन्हें मार्ग मे भोजन-पानी की तनिक भी चिन्ता न करनी पड़ी।वे सकुशल काशी पहुँच गए। 
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बाबा का मन अपनी जीवन कथा से तटस्थ होकर पुनरावृत्ति करते हुए एक जगह पर शून्य स्थिति में आ गया और जब सूनापन आता है तो आदत से सधा हुआ राम शब्द तुरंत उस शून्य का केन्द्र-बिन्दु बन जाता है। कुछ क्षणों तक वे शब्द रूपी कमल की केसर में मधुप बनकर चिपके रहे फिर कहा- “अच्छा, बेनीमाधव आगे की कथा अब कल होगी।” 
रात में स्वप्न देखा कि एक सर्पिणी अपना फन कुंडली में दबाए पड़ी है और बाबा उसे ध्यान से खड़े हुए देख रहे हैं। अकस्मात्‌ उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे उनका हृदयाकाश असँख्य वाद्य ध्वनियों की गूँज से भर उठा है। उन्हे स्वप्न में भी ध्यान आने लगा कि जो बाजे उन्हे अब तक राम ध्वनि के साथ कानों में ही सुनाई पड़ा करते थे वे अब हृदय की घड़कनों में ऐसे अद्भुत नाद करते सुनाई दे रहे है कि वे स्वयं ही उसके जादू से बँध गए हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे वे एक बहुत बड़े सोने के फाटक के सामने खड़े हैं। अपने साहब की ड्योढ़ी देखकर उनके हृदय को आह्लाद का दौरा पड़ा ।वे डरते हैं और अपनी राम आस्था से संभलते हैं। 
प्रभु जी की ड्योढ़ी पर आना क्या कोई हँसी -ठट्ठा है ! कैसा चमत्कार है। भय तो लगेगा ही। पर भय तेरा क्‍या कर लेगा, रे तुलसी ! तू जिसका साँस गुलाम है यह उसी मालिक गरीब-निवाज तुलसी-निवाज की ड्योढ़ी है।इन्द्र यहाँ भी न छूटा, दूसरा मन खिल्ली उडाते हुए पूछ बैठा- “क्या प्रभु भी तुझे अपना “मानते हैं?”
“मानते हैं”
“फिर खुलती क्यों नही? खास गुलाम को भला ड्योढ़ी पर रोक-टोक?”
पहला मन इस प्रश्नाघात से स्तम्भित होता है। आाह्वाद रूक गया। मन की खीझ बढ़ी। फिर वह सिसक उठा। नींद खुल गई। वे उठकर बैठ गए।आँखों में आँसू छलछला आए, होठ काँपने लगे। दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना की करूणा में बह चले-

राम राखिये सरन, राखि आये सब दिन। चित्रित त्रिलोक तिहुँ काल न दयालु दूजों।
झरत प्रनत पाल को है प्रभू बिन।
स्वामी समरथ ऐसो, हो तिहारो जैसो। तैसो काल चाल हरि होति हिये घनी घिन।
खीकमि-रीमि, विहेंसि-अनख क्यों हूँ।एक बार 'तुलसी तू मेरो’ बोलि कहियत किन? 
जाहिं सूल निर्मूल, होहिं सुख अनुकूल,
महाराज राम, रावरी सी तेहि छिन।”

रामू फटाफट उठ कर बैठ गया। वह सहसा मन में लज्जा का अनुभव करने लगा। कई वर्षो के साथ में यह पहला ही अवसर था जब रामू अपने प्रभुजी के जागने के बाद जागा। बाबा का भजन चलता रहा। वह पीछे खड़ा खड़ा होठों मे दोहराता रहा। प्रभु जी के स्वर में आज कैसी अगाध करुणा है। बाबा फिर जब चैतन्य होकर भीतर मुड़े तो उसने बाबा के चरणों मे अपना प्रणाम निवेदन किया और फिर अपना, टाट समेटकर उसे रखने के लिए बाहर दालान में चला गया। बाबा उसके पीछे ही पीछे बाहर दालान में आ गए, आकाश देखा, बोले - “लगता है कि हम जल्दी उठ आए। स्वप्न में सर्पिणी को देखा तो आँख खुल गईं।” 
बात कहते हुए उन्हें लगा कि वे चीखकर स्वर निकाल रहे हैं और कान में बजने वाले ढोल धमाड़े की गूँज में जैसे उनका स्वर अपने ही में दबा जा रहा है। उन्हें लगा कि उनके प्राणों में बाढ़ आ रही है और प्रवाह के वेग से वे स्वयं भीतर ही भीतर कही बहे चले जा रहें हैं।
“रामू ”- गूढ़ किन्तु धीमे स्वर में पुकारा।
“जी, प्रभु जी”
“अरे लगता है कि जीवन, में अभीप्सित क्षण आ पहुँचा है। सावधान रहना।मेरे शिशु मन की परीक्षा का कठित क्षण भी है। कुछ भी हो सकता है।”

सुनकर रामू का मन काँप उठा।लड़खड़ाए, घबराहट-भरे, सिसकते स्वर में मुँह से निकला,-“प्रभु जी”
“लय है, मृत्यु नही पगले, जीवन की बात सोच। चल, अब उठ पड़ें है तो घाट पर ही चलें।”
“भगत जी और सन्त महाराज को जगा लूँ तो....”
"वे अपने समय से जागेंगे। तू मुझे ले चल।” 
रामू के लिए बाबा की बात कुछ पहेली-सी तो थी किन्तु वह इतना अवश्य समझ गया कि बाबा के भीतर कोई रहस्यमय परिवर्तन हो रहा है। उनके स्वर में कुछ भारीपत और खिंचाव भी था। ऐसा लगता था कि वे भीतर कहीं पीड़ित है परन्तु वह पीड़ा उनके लिए दुखदायिनी होते हुए कही पर सन्तोष भरी और सुखदायिनी भी है। वे चेहरे पर ही खोए खोए से लग रहें हैं। स्वर, चाल-ढाल सबमें यही बात है। ऊपरी तौर से वह दिन अनमना बीता। बाहर से मानों उनकी सारी क्रियाएँ शिथिल पड़ गईं थीं।
क्रमशः

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