महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
28-
“अरे भाई, राम जी के तो सभी लड़का हैं और लड़के दंगा भी करते हैं। क्या तुम नहीं दंगा करते हो?”
रामबोला झेंप गया। बाबा ने कनखी से उसकी ओर देखा और मुस्कराकर कहा -“तुम भले लड़के हो, कभी कभी दंगा करते हो।” हल्के विनोद का परिचय देकर बाबा ने बच्चे के मन को थाम लिया।
एक बड़े फाटक के सामने आकर बाबा रुके। उन्होंने फाटक का कुण्डा जोर से खटखटाया और आवाज दी -“अंजनी शरण, ऐ अंजनी शरण? ” भीतर से कोई आवाज नही आई। कहीं दूर पर 'जय जय सीताराम' का उद्धघोष गूँजा। नरहरि बाबा ने फिर कुण्डा खटखटाया और जोर जोर से अंजनी शरण को पुकारा। फाटक की खिड़की के पीछे से आवाज आई-“कौन है?”
“हम नरहरिदास।”
“कौन दास, कहाँ से आए हैं?”
“वाराहक्षेत्र से नरहरिदास।”
“तुम्हारे साथ कोई और भी है”?
“अरे, द्वार तो खोलो भाई, हमें पहचाना नही, अजंनी शरण कहाँ है? सियाराम शरणदास हैं? जाके उनसे कहो कि वाराहक्षेत्र से नरहरि बाबा आये हैं?“
फाटक के पीछे से एक नया स्वर सुनाई दिया- “हाँ, हम चीन्हि गए। फाटक खोल दे जयरमवा।”
कुण्डी खटकी। खिड़की का एक पल्ला तनिक सा खुला। दो आँखों ने झांक कर देखा और पल्ले झट से खुल गए। “आओ बाबा। अरे ऐसी प्रलय मे आप कैसे आकर फँस गए बाबा? जय सियाराम।”
“जय सियाराम। बड़ा उत्पात मचा है यहाँ तो....”
“कुछ समझ में नही पड़ता है महाराज, क्या होगा? जिस बाबर ने जन्मभूमि को नष्ट-भ्रष्ट किया उसी का बेटा आज दण्ड पा रहा है। हार के भागा बिचारा। अब यह पठान क्या करेंगे सो कौन जाने।”
“राम करे सो होय, कलिकाल है भाई।”
रामबोला बड़ों की बातें सुन सुनकर अपने मन में कुछ विचित्र सा अनुभव कर रहा था। उसके हृदय में कौतूहल भरी सनसनाहट और आंतक की उठती गिरती तरंगे भरी हुईं थीं। नई जगह का अनजानापन भी मन को अस्थिर बना रहा था। उसके मन में शब्दों का भण्डार मानों चुक गया था।मन का यह गूँगापन रामबोला को और भी आतंकित कर रहा था।
भीतर दालान में एक वृद्ध साधु चौकी पर बैठे माला जप रहे थे।नरहरि बाब़ा को देखते ही वे उठ खड़े हुए और प्रेम से उनकी अभ्यर्थना की। बातों के दौर में बाबा ने रामबोला का परिचय दिया। पैनी दृष्टि से बालक को देखकर महन्त जी बोले- “यह तो जन्म से ही यज्ञोपवीत घारण करके आया है बाबा, इसे आप क्या संस्कार देंगे”
“सांसारिकता निभानी ही पड़ती है महन्त जी, स्वयं राम जी को भी पृथ्वी पर आकर संस्कार-सम्पन्न होना पड़ा था।”
“हाँ, यह तो ठीक हैं तो क्या परसों रथयात्रा के दिन इसे संस्कार देगें?”
“हाँ”
“अब तो अयोध्या से रथयात्रा का उत्साह ही समाप्त हो गया, बाबा। श्रीराम की अयोध्या रावण की लंका हो गई है।”
“लंका तो यहाँ नही बन सकती।अब तक दिल्ली में थी, अब चाहे जौनपुर में बने। राम जी की इच्छा, क्या कहा जाये।”
दो दिन बीत गए। अयोध्यापुरी आंतक और अफ़वाहों से तो भरी रही किंतु कोई घटना न घटी। रथयात्रा के दिन ब्रह्म मुहर्त में ही रामबोला का मुण्डन और फिर उपनयन संस्कार हुआ। रामबोला को गायत्री मंत्र की दीक्षा स्वयं नरहरि बाबा ने दी। संस्कार समाप्त होने के बाद रामबोला को, तुलसी मण्डप के नीचे काठ के छोटे से पलके में विराजमान राम जी को प्रणाम करने के लिए भेजा गया। रामबोला जब भगवान को साष्टांग प्रणाम कर रहा था तब तुलसी की एक पत्ती वृक्ष से कटकर उसके मस्तक पर गिरी। उसे देखकर महन्त जी प्रसन्न मुद्रा में बोले-"उठ उठ बच्चा, तेरा कल्याण हो गया। राम जी ने तेरे मस्तक पर भक्ति-भार डाल दिया है।”
सुनकर नरहरि बाबा पास आए। बालक के मस्तक पर चिपकी तुलसी की पत्ती को देखकर वे बोले- “आपने सत्य ही कहा महन्त जी, श्रीराम ने इसे नि:सदेह स्वभक्ति का ही वरदान दिया है। आज से इसका नाम तुलसीदास हुआ।”
उसी दिन महन्त जी ने बालक का अक्षरारम्भ संस्कार भी कराया।रामबोला उर्फ तुलसीदास अब विधिवत संस्कार पाकर ब्राह्मण बटुक बन गया था। महन्त जी ने बाबा से पूछा-“बालक को क्या आप अयोध्या में ही छोड़ जाना चाहते हैं?”
“इसे काशी ले जाऊँगा महन्त जी, आचार्य शेष सनातन ही इसे पण्डित बनाएँगे।”
“हमारा विचार है कि अभी आप कुछ दिनों तक अयोध्या न छोड़ें।राजनीतिक स्थिति ठीक हो जाने पर ही यात्रा करना उपयुक्त होगा।”
“राजनीतिक स्थिति अब तो सदा ऐसी ही रहेगी महन्त जी। शेर खाँ आये चाहे चीता खाँ आये। वस्तुतः धर्म धर्म से नही लड़ रहा है, यह बात अब सिद्ध है। नहीं तो पठान भला मुगलों से लड़ते? राम जी कालदधि मथकर मानव मन का माखन निकाल रहे हैं।”
संस्कार तथा नया नाम पाकर तुलसी के जीवन में सहसा एक विराट परिवर्तन आ गया। वह बड़ी लगन से पढ़ता।उसे जो कुछ भी पढ़ाया जाता वह दिन भर उसे ही याद करता था। यज्ञोपवीत के सात-आठ दिन बाद ही नगर में डौडी पिटी -“खल्क खुदा का, मुल्क जेरशाह का अमल।”
स्थानीय पठान शासनाधिकारी के नाम की घोषणा हो जाने के बाद सबको अपनी दुकानें खोलने ओर कारोबार चलाने का आदेश दिया गया। समय देखकर नरहरि बाबा ने काशी जाने की योजना बनाई।
तुलसी बोला-“बाबा, तुम तो कहते थे कि अयोध्या जी में राम जी का महल है।हमें भी दिखाय देव।”
सुनकर बाबा की आँखें उदास हो गईं। होंठों पर खिसियान भरी पराजित मुस्कान की रेखा खिंच गई, वे बोले- “राम जी का पुराना महल टूटकर अब नया बन रहा है बेटा।”
“तो राम जी आजकल कहाँ रहते है?”
“मेरे तेरे अपने चाहने वालों के हृदय में रहते है।”
बात इतनी गम्भीरतापूर्वक कही गई थी कि बच्चा उसका प्रतिवाद करने का साहस तक न कर सका। यद्यपि उसके मन में गहरा प्रश्नचिन्ह बना ही रहा।
मार्ग इस समय निरापद था। जगह जगह पठानों की चौकियाँ थीं। वे लोग व्यापारी काफिलों को आने-जाने के लिए प्रोत्साहन दे रहे थे। बाबा नरहरिदास जी के साथ ही काशी जाते हुए एक अन्य साधु ने यह देखकर कहा-“यह पठान मुग़लों से अधिक व्यवहार पटु लगते हैं। इनका व्यौहार मीठा है। नरहरि बाबा हँसे, कहा -“चवया धोवी कथरी में साबुन।
क्रमशः
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