महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
27-
जब उन्होंने आँखें खोली तो वेनी माधव जी ने उनसे सविनय प्रश्न किया-“कृष्ण भगवान को आपने केवल सर्व जन हितकारी क्यों माना गुरू जी?”
“मेरे लिए श्रीकृष्ण अथवा श्रीराम की जन्म-भूमियों के नाम एक सीमित क्षेत्र का बोध नहीं कराते। यह समस्त चराचर जगत ही भगवान का ब्रज-अवध है। कौन सी भूमि भगवान की जन्मभूमि नहीं है वत्स? रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द नाना आकार-प्रकारों में मेरे रामभद्र को छोड़ कर प्रतिपल के सहस्रांसों में भला और कौन जन्मता है?”
रामघाट पर नित्य बाबा रामचरित मानस सुनाते हैं । कोल-किरात आदि गण दूर-दूर से आकर आजकल चित्रकूट में ही अपना डेरा जमाए हुए हैं। वे बाबा के लिए फल, फूल, कन्द, मूल, दूध, दही आदि लेकर आते हैं। इस समय रामजियावन के घर में मानों आठों सिद्धि नवोनिधियों का वास है। तीसरे पहर कथा होती है और फिर भक्तों की भीड़ रामजियावन के घर में सजी हुई झाँकी देखने के लिए आती है। चित्रकूट की गली-गली में भक्तों की भीड़ यत्र- तत्र अपने बसेरे बसाए पड़ी है। पक्षियों का कलरव तो रात को थम जाता है पर यह जनरव मध्यरात्रि से पहले कभी शांत नहीं होता।
तुलसीदास जी के दर्शन करने अथवा रामकथा सुनने की श्रद्धा के साथ- साथ ही उनका समस्त माया-प्रपँच भी अभिन्न रूप से जुडा हुआ है। इधर वे भक्ति भावना से उद्दीप्त होते है और उधर पारस्परिक ईर्ष्या द्वेष से उतने ही संकीर्ण भी हो जाते हैं। न वे उदात्त हैं न संकीण, वे दोनों का मिश्रण हैं। कभी एक रस उमगता है कभी दूसरा। वे मानों सागर की लहरें मात्र हैं जो उछलना भर ही जानतीं हैं, उनमें गहराई तनिक भी नही होती।
एक दिन कथा के उपरात बाबा घर लौट रहे थे तो आती जाती भीड़ को देखकर बोले-“अयोध्या में ऐसी भीड़-भाड़ अब नहीं होती। वहाँ दर्शनार्थी अब प्राय: नहीं के बरावर ही आतें हैं।
बेनीमाघव जी ने पूछा - “पहले किसी समय वहाँ भीड़ आती रही होगी बाबा?”
“हाँ हाँ, बचपन में जब हमारे पंच संस्कार कराने के लिए गुरू जी हमें अयोध्या ले गए थे उस वर्ष अंतिम बार रामभक्तों और राजसेना के बीच में बड़ी करारी झड़प हुई थी। हमे स्मरण है अयोध्या रणभूमि बन गई थी।”
बेनीमाघव जी बोले-“एक बार मुझे भी अयोध्या में जन्मस्थान के समय का स्मरण है। उसमें मैंने भी चार-पाँच लाठियाँ खाईं थीं, महाराज परन्तु ऐसे छोटे-मोटे संघर्ष तो वहाँ प्राय: हुआ ही करते हैं।”
“हाँ , मेरे भी देखने में आए हैं किन्तु जैसा संघर्ष मैने बचपन में वहाँ पर देखा था वैसा फिर कभी नहीं देखा। उस समय हुमायूँ बादशाह शेरशाह पठान से हारे थे, चारों ओर भगदड़ पड़ी थी। तभी कुछ विरक्त साधुओं ने जन्म स्थान के उद्धार करने की योजना बनाई। अपार भीड़ थी। गुरू जी हमें लेकर अयोध्या पहुँचे।
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दिन का चौथा पहर है। नरहरि बाबा, रामबोला को साथ लेकर सरयू के
एक घाट पर नाव से उतर रहे हैं।घाट पर सन्नाटा है, बस, दो-चार व्यक्ति इधर-उधर आते-जाते दिखाई पड़ रहे हैं। नाव से उतरी हुई आठ दस सवारियाँ स्थिति को देखकर चितित हो रही हैं । एक कहता है-“जान पड़ता है कोई उत्पात होनेवाला है। बड़ा सन्नाटा है।”
ऊपर आकर तख्त पर बैठे एक बुड़ढे साधु से नरहरि बाबा पूछते है - “आज बडा सन्नाटा है बाबा जी, कोई उत्पात हुआ है यहाँ?”
अपने पोपले मुँह से कुछ कुछ अस्पष्ट स्वर में उस चिन्तामग्न बूढ़े साधु ने कहा -“हुमायूँ हार गया। मुगल और पठान लोग कल और परसों दिन भर एक दूसरे से गुँथे रहे। देखो, क्या होता है। तुम लोग जल्दी जल्दी अपने अपने स्थानों पर चले जाओ भाई। आजकल किसी बात का ठिकाना नही है कि कब क्या हो जाये।”
उस घाट से आगे बढ़ने पर श्रृँगारहाट नामक मुख्य बाजार में आए। निर्जनता
के कारण वह चौड़ी सड़क और भी अधिक चौड़ी लग रही थी।कुत्ते तक उस मार्ग पर नहीं दिखलाई पड़ रहे थे। रामबोला ने इतना बड़ा नगर, पक्के मकान, पक्की सडक और घाट-बाट जीवन में पहली ही बार देखे थे। इस दृश्य से वह चमत्कृत भी हुआ, मन मे बतियाता चला- “राजा रामचन्द्र जी की अयोध्या है इसे तो ऐसे ठाठ-वाट का होना ही चाहिए था।यह बीच-बीच मे इतने खण्डहर क्यों पड़े हैं ? राम जी की अयोध्या में मुगल-पठान क्यों लड़ रहे हैं? किसी और बादशाह की हार जीत का प्रश्न क्यों उठ रहा है?” ऐसे कौतुहल भरे प्रश्न उसके अबोध मन को चौंकाने लगे।
एक जगह आठ दस लड़वैये तीर कमान लिए कमर में तलवारें बाधें एक चबूतरे के पास खडे थे। नरहरि बाबा ने उनसे कहा- “जै सियोराम”
“जे सियाराम, बाबा अरे नन्हें से बच्चे को लेकर काहे घूम रहे हो आप?”
“बाहर से आए हैं भगत। ठिकाने पर जा रहे हैं। यह प्रलय काल कब तक रहेगा भाई?”
एक सिपाही ने खिसियाई हुई हँसी हसँकर उत्तर दिया-“कौन जाने महाराज, राम जी तो अयोध्या छोडि़ के बैकुण्ठ वासी हो गए। अब जो न हो जाय सो थोड़ा है।”
“यह हवेली कौन सेठ की है?”
“बिस्सूमल जौहरी की। वह तो फटे-पुराने चिंदें पहनकर भाग गए हैं और हमें मरने के लिए यहाँ छोड़ गए हैं । माया उनकी और रक्षा हम करें।”
दूसरा सिपाही बोला-“तो क्या उपकार कर रहे हो तुम”
एक तीसरे सिपाही ने कहा -“यह घुरहना जब बोलता है तब अण्ट सण्ट ही बकता है। अरे पापी पेट की गुलामी कर रहें हैं हम लोग। जिसका नमक खाते है उसके लिए जान भी देंगे।”
नरहरि बाबा शांत स्वर में बोले-“पेट ही तो राम जी की माया है। पेट और नारी इन्हीं दो से संसार नाचता है। तो सब सेठ साहूकार भाग गए होंगे?”
“हाँ , महाराज बस एक रतनलाल सेठ मूछों पर ताव दिए डटे हैं। दो हजार बैरागी लड़वैये उनके साथ हैं। कोई मुगल-पठान ऊपर मुँह करने की हिम्मत नहीं करता है।”
इस हवेली को पार करके बाबा एक गली में मुडे़। गली यहाँ से वहाँ तक सूनी पड़ी थी। सारे द्वार खिड़कियाँ झरोखे बन्द थे।
रामबोला ने पूछा -“बाबा, राम जी मुगल पठानों को अपनी अयोध्या में दंगा काहे मचाने देते हैं।”
क्रमशः
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