महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
26-
“हैं”- वेनीमाधव हड़बड़ाकर आगे झुके और अपने गुरू जी के सामने भूमि पर
मत्था टेककर कहा- “ऐसा शाप न दे गुरू जी, मेरे यह लोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जायंगे।”
बाबा हँसे, कहा -“तुम्हारी श्रद्धा सात्विक होती तो मेरी सीधी-सादी बातों, में तुम्हे शापभय न दिखाई पड़ता।”
वेनीमाघव सतर्क होकर बाबा का मुख देखने लगे। वे कह रहे- “श्रद्धा के सात्विक न होने के कारण तुम्हारे द्वारा लिखा हुआ मेरा जीवन-चरित भूत देह के समान ही काल की चिता पर भस्म हो जायगा। यह यथार्थ है।”
बेनीमाधव के चेहरे पर परेशानी झलकी, किन्तु उन्होंनें मन की उमड़ती, घबराहट को थामकर कहा-“जिस काव्य के सहारे इस अकिंचन के अमर होने की बात आप कहते हैं वह कार्य ही यदि नष्ट हो गया तो फिर अमरता कैसे सुलभ होगी गुरू जी?”
“तुमनें खंडहर हवेलियाँ अवश्य देखी होंगी, वेनीमाधव। वे खण्डहर होकर अपने आकार के वैभव को तो खो देतीं हैं, किन्तु नाम चलता रहता है कि यह अमुक व्यक्ति की हवेली थी। इसी प्रकार तुम्हारा काव्य खो जायगा और उसकी स्मृतियों के खंडहर में तुम्हारे नाम पर टटपूजियों के भाव जम जायगें।”
“नही गुरू जी, मेरी श्रद्धा राजसी भले ही हो किन्तु उसमे मेरी सात्विकता भी निश्चित रूप निहित है। मैं लोक मंगल की भावना से भी यह कार्य कर रहा हूँ।
“यह ‘भी’ ही तो तुम्हें खा रहा है वेनीमाधव। तुम एक ओर तो प्राण की सूक्ष्म गति करना चाहते हो और दूसरी ओर उसकी स्थूलता को एक क्षण के लिए भी क्षीण करने का प्रयत्न नहीं करते। मेरा जीवन-चरित यदि स्वयं तुम्हारा भला नहीं कर सकता तो वह लोक-मगंल कैसे कर पाएगा भाई ?”
सुनकर वेनीमाघव स्तब्ध हो गए। उनका बँधा मन अपनी थाह पाने के लिए तेजी से गहराई में डूब चला।
तभी रामफेर कोठरी में घुसकर वहाँ के वातावरण को अनदेखा करके अपनी बात सीधे बाबा से कहने लगा-“बाबा, बाबा, राम जी और कृष्ण जी दो हैं कि एक है?”
बाबा समेत सबका ध्यान रामफेर की ओर गया। सबके चेहरे मुस्कान से खिल उठे। बाबा ने हँस कर कहा-“यह बताओ कि रामफेर और सुगना एक ही लड़का है कि दो हैं?”
बाबा का प्रश्न सुनकर वह झेंप गया और फिर मानों उस झेंप को मिटाने के लिए उसने कहा-"हम भी तो यही कह रहे थे सुकवी भैया से कि दोनों एक ही हैं। बाबा जब एक ही भगवान है तो उनके जनमदिन काहे को अलग अलग होते हैं।”
“अरे भाई, भगवान तो पल-पल में जनम लेते है तुम लोग भला पल-पल मे उनकी झाँकी कला मना सकते हो? ”
“नहीं “
“बस, इसीलिए साल में दो बार जनमदिन मनाया जाता है। भगवान तो एक ही हैं।”
"तो बाबा तुम भगवान जी से कह देव कि आज पानी न बरसाव।आज हम लोग बड़ी बढ़िया झाँकी सजा रहे हैं। खूब घटा-उठा बनाए हैं।कैलाश पर्वत बनाया है, चित्रकूट बनाया है, चित्रकूट पर राम जी बैठाए हैं।”
बच्चे की भोली-भोली बाते सुनकर बाबा बड़े मगन हुए, बोले- “वाह वाह, बड़ी सजावट की है तुम लोगों नें, लेकिन एक बात बताओ, तुम लोग हमको भगवान जी की झाँकी दिखाओगे?”
“हाँ हाँ, हमारी अम्मा कह रहीं थीं कि आज बाबा भगवान का जनम करवाएंगे। पर हमारी आजी क्या बनाय रहीं हैं, जानते हो बाबा....”
“क्या बना रहीं हैं भाई?”
“हूँ... अररे बड़े बड़े माल बन रहे हैं।बीज पापड़ी, चिरौंजी-मखाने की खीर और तुमका का क्या बताएँ बाबा, चरणामृत बनेगा।”
“अच्छा, भला उनको कौन खायगा रामफेर?”
“भगवान जी खायंगे और फिर हम पंचन को प्रसाद मिलेगा।”
“और भगवान जो सब माल खाय गए रामफेर, तो तुम पंच क्या करोगे?”
“वाह, तुम इतना भी नहीं जानते हो बाबा , भगवान जी अपने खातिर बनवाते हैं और सबको खिलाते हैं।”
बाबा ने बेनीमाघव की ओर देखा और कहा-“यह बालक सत्व को पहले प्रतिष्ठित करके ही सत्य को स्वीकारता है। यह सत्य को पहचानता है।”
“अच्छा बाबा, पहले आप हमारा काम कर देव, पीछे इनसे बात करो। हमको बहुत काम पड़ा है।”
बच्चे की गम्भीरता ने बाबा का मन मोद से भर दिया। बोले-“हाँ हाँ , अपना काम बताओ, वह जरूर महत्त्वपूर्ण होगा।क्या काम है, सुगना?”
“हमारा काम यह है कि हम पंच मिलकर झाँकी सजा रहे है और आप यहाँ बैठकर भगवान जी से कहिए कि आज पानी न बरसावें।”
“काहे न बरसावें भाई, पानी न बरसेहँ तो अन्न कैसे होगा?”
“अरे बस छठी तक न बरसे, इतना तो बरस चुका है। आगे चाहे और जोर से बरसे। हमारा सब सुख बिगड़ जायगा।”
बच्चे की बात सुनकर सब हंस पड़े। बाबा ने कहा-"अच्छा भाई सुगना राम, तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा। कृष्ण भगवान, आप हमारे सुगना रामफेर की अरज सुन लेव। राजा इन्द्र को बाँधकर रखो, जिससे कि हमारे बच्चों का मजा न बिगड़ पावै। जयकृष्ण परमात्मा। जय योगेश्वर नटनागर बालमुकुन्द।”
बच्चा सन्तुष्ट होकर चला गया और उसे संतोष देने के लिए बाबा आँखें मूँदकर जो प्रार्थना भाव में आए तो फिर उसी में रम गए। मनोलोक में बाल- मुकुन्द की झाँकी सज गई। सुगना उर्फ रामफेर की बातों से उपजा सुख आनन्द बनने लगा। सुगना-मुख कृष्ण-मुख बना। कृष्ण अपनी चिर परिचित बालरूप राम की मनोछवि में प्रतिलक्ष्यित होकर बाबा का मन मोहने लगे। वात्सल्य भाव की गूँज में यशोदा मैया का आकार उभरने लगा। अपनी जाँघ पर थपकी देते हुए उछाह-भरे स्वर में वे गा उठे -
माता ले उछंग गोविन्द मुख बार-बार निरखे।
पुलकित तनु आरनंदघन छन छन मन हरषे।
पूछत तोतरात बात मातहिं जदुराई।
हे अतिसय सुख जाते तोहि मोहि कहु समुझाई।
देखत तब बदन कमल मन आनंद होई। कहे कौन रसन मौन जाने कोइ कोई।
रामू लिखना रोककर बाबा के साथ ही साथ उनके शब्दों को धीरे-धीरे गुनगुनाने लगा। वेनीमाघव जी भी भावमग्न होकर अपने पैरों पर थाप दे रहे थे। बाबा के स्वर का माधुर्य इस आयु में भी ऐसा चुम्बक है कि वातावरण का चेतन स्वरूप मुग्ध होकर बँध जाता है। गायन समाप्त करने के बाद बाबा कुछ देर तक उसी प्रकार ध्यानावस्थित मुद्रा में बैठे रहे।
क्रमशः
No comments:
Post a Comment