Sunday, 2 April 2023

tc 25

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
25-

राम जी की सुन्दरता का अनुमान पुष्पसमूह से लगाने की लालसावश ही उसने इस फुलवारी में प्रवेश किया था। माली को विश्वास न हो तो वह चलकर चबूतरे पर देख ले। राम जी की सौंह, हनुमान स्वामी की सौंह, वह चोरी करने नहीं आया था। वह नरहारि बाबा की कुटिया में रहता है। नाली के मुहाने से घुसकर भीतर आया था, इस प्रकार मार खाते हुए अपनी ईमानदारी सिद्ध करने के लिए उसने सभी दलीले रो-रोकर पेश कर दीं।दो-एक माली और भी आ गए। चबूतरे पर बनाआ हुआ बच्चे का खेल देखा।नरहरि बाबा का नाम सुना, तो दो-चार हाथ मारकर फिर उसे बाहर निकाल दिया।

इस प्रकार राम मुख छवि निहारने की पहली ललक पर मुझे मार खानी पड़ी। जब पिट-कुट के घर पहुँचा तो बाबा के चरणों में गिरकर खूब रोया। मुझे याद है।बाबा का वह वाक्य भी मुझे कभी नहीं भुलता जो उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुये कहा था। बोले कि पराये फूलों से अपने राम को देखेगा? पहले अपने मन की बगिया लगा ले फिर तुझे राम अवश्य दिखाई पड़ेंगे।
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“पर अब तो आपने राम जी के दर्शन अवश्य पा लिए होंगे प्रभु जी” रामू ने प्रश्न किया।
सुनकर बाबा कुछ बोले नही, केवल मुस्करा दिए, उनकी दृष्टि प्रश्नकर्ता रामू के चेहरे के पार कहीं दूर जाकर टिक गई। फिर राजा भगत ने पूछा- “राम जी क्‍या बहुत सुन्दर है?”
“सौन्दर्य व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। साकार की सीढ़ियों पर चढ़कर तुम निराकार सौन्दर्य को निहार सकोगे। अच्छा, कल मेरे साथ चलना।राम-सौन्दर्य देखनें के लिए तुम्हे इस चित्रकूट से बढ़कर भला और कहाँ अवसर मिलेगा? यहाँ पत्थर भी छवि-अंकित होता है।”

जन्माष्टमी का दिन है। रामजियावन महाराज के कच्चे आँगन में बच्चे लोग मण्डप सजा रहे हैं। पत्थरों के ढोकों से पहाड़ बनाए जा रहे हैं। पत्थरों की आड़ में एक बड़ा टोटीदार गंगाल रखा जा रहा है। दो नवयुवक ऊँची चौकी पर गंगाल जमा रहे हैं। दो लड़के उसके अगल-बगल खड़े होकर पत्थरों के ढोकों से गंगाल का वह भाग ढँक रहे हैं जो सामने से दिखाई पड़ सकता है।एक लड़का सामने खड़ा होकर आलोचक की दृष्टि से निहार रहा है, “हाँ,अभी बाँई तरफ का भाग दिखाई दे रहा है।दो पत्थर और रखो तो बात बन जाय।” गंगाल की बाँई ओर खड़े पहाड़ बनाते लड़के ने दो ढोकें और चढा़ए और पूछा-“अब बताओ?”
“हाँ, अब ठीक है। अब नीचेवाली गुफा में शंकर भगवान लाकर रख दें, मनोहर भइया?”
“अभी ठहर जावो भाई, यह पर्वत अच्छी तरह से बन जाय।एक एक पत्थर जम जाय तब ले आना। पुरानी मूरत है, खूब सँभाल के रक्खी जायगी।”
दो लड़के बाँस के छोटे-बडें कई पोले टुकड़े और छोटी पत्तियों वाली कई टहनियों का एक ढेर लिए बैठे थे।एक बाँस के टुकड़ों के आधे-आधे भाग में चारों ओर चक्‍कू से छेद बना-बनाकर रखता जाता था और दूसरा उन छेदों में छोटी-छोटी टहनियाँ काटकर खोंसता जा रहा था।वे बाँस के पीले डंडे विभिन्‍न प्रकार के वृक्षों के लघु संस्करण बनते चले जा रहे थे।यह पेड़ पर्वत की शोभा बढा़ने के लिए जगह-जगह खोंसे जा रहे थे। मण्डप के ऊपर भी बल्लियाँ गाड़कर तख्ते बिछाए गए थे और उन पर गोले पत्थरों की बटिया लुढ़का कर बादलों की गरज का ध्वनि-आभास दिया जा रहा था। जमुना की लहरें और घटाओं की छटा दिखलाने के लिए पुराने रंगे हुए घटाओं के पर्दे और झालरें टाँगीं गईं थीं। बड़ी तैयारियाँ हो रहीं थीं ।
एक लड़का हँसकर बोला-“हम तौ हियाँ नकली पानी बरसाइत है और जो ऊपर तें राजा इन्दर फटि पड़े तौ का होई।”
पेड़ बनाता हुआ लड़का बिगड़ उठा- “ए सुखिया, अंट- संट न बोलो भाई, अबकी परसाल की तरह दुर्दशा न होने पावे। अबकी हमारे घर बाबा आए हैं। झाँकी देखने के लिए सैकडों आदमी आएँगें हमारे यहाँ , देख लेना।” 
“तब बाबा से कहो जाके कि राम जी से कह दें कि राम जी आज पानी न बरसाना।” हैं हैं सुखिया फिर हँसा, बोला-“राम जी कहेगें कि हमें क्या पड़ी है? पानी बरसे, चाहे न बरसे, हमारा जन्मदिन थोड़े है।” 
“वाह, भगवान-भगवान एक, राम जी ऐसी बात कभी नहीं कहेंगें।” 
“एक कैसे हो सकते है। राम जी का जनमदिन रामनौमी को पड़ता है और कृष्ण जी का आज पड़ रहा है जो एक होते तो एक जनमदिन न पड़ता? एक हो ही नही सकते हैं।” एक दूसरे लड़के ने जोरदार समर्थन किया।
“अच्छा तो चलो पूछौ बाबा से कि भगवान एक है या दो।” एक छोटी आयु का लड़का पूछने के लिए कोठरी की ओर भागा। 
रामसुखी चिल्लाया-“ए खबरदार, यह न पूछौ। ए सुगनवा, सुनता नहीं है।” लेकिन रामफेर उर्फ सुगना बाबा की कोठरी में पहुँच गया।कोठरी में बाबा चौकी पर विराजमान थे। उनकी आँखें खुली होनें पर भी बाहर नहीं, भीतर देख रही थीं। रामू दिये के प्रकाश में बैठा तख्ती पर लिखे लेख को कागज पर उतार रहा था। वेनीमाधव जी गोमुखी में हाथ डालकर माला जपते-जपते रुक कर बोले-“गुरू जी, जपते-जपते मन कभी-कभी सहसा शून्य हो जाता है।पहले भी एक बार ऐसा ही अनुभव हुआ था परन्तु सतत्‌ अभ्यास से वह सँभल गया था। पर अब तो ऐसी विस्मृति चढ़ती है कि कुछ समझ में ही नही आता है। कभी-कभी अत्यन्त लज्जा का बोध होता है महाराज।” 
“लज्जा क्यों आई ? तुम्हारा जप तुम्हें प्रज्ञा के क्षेत्र मे प्रवेश कराता है और तुम उसकी नई गति को पहचान भी नही पाते। तुम्हारी श्रद्धा कहाँ है वेनीमाघव।”“मेरी श्रद्धा आप में है।” 
“कौन-सी श्रद्धा ? सात्विक या राजसिक, तुम मेरे बारे में चिन्तन करते हो या मेरे जीवन चरित्र लेखन के?” 
“हैं “- वेनीमाधव चौंक गए, कहा-“आपने मेरे चोर को ठीक जगह पर पकड़ा है गुरू जी, आपकी जीवन कथा लिखकर अमर हो जाना चाहता हूँ।” 
“स्वर्ग की सीढ़ियाँ सूक्ष्म होती है वत्स, तुम स्थूल पर ही क्यों टिके हो?” 
“वस्तु जगत के धरातल पर अभी जिज्ञासाएँ शान्त नही हुईं, गूरू जी।”
“वेनीमाधव, तुम मेरा जीवन-चरित्र जिस उद्देश्य से लिख रहे हो वह परिपूरित होकर भी पूरित न होगा।” 
क्रमशः

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