Saturday, 1 April 2023

tc 24

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
24-

रामबोला जब बाहर आने लगा तो नरहरि बाबा ने उससे कुटिया का द्वार बाहर से उड़का जाने का आदेश दिया। आदेश का पालन करके रामबोला बाहर आया। बाड़े में एक ओर गाय-बछड़े को बँधे देखकर वह थम गया। देख- देख कर उसके मन मे हर्ष नही समाता था- “कैसा नीका लगता है। कैसा सुन्दर है।एक तरफ यह फूल खिल रहें हैं और एक तरफ यह गाय-बछड़ा है।अरे बहुत सुन्दर है। ऐसा सुख मुझे कभी नही मिला। बाहर-आते हुए बाड़े का टट्टर बन्द किया और फिर चबूतरे पर जाकर बैठ गया, मूर्ति को देखते हुए मगन मन उससे बतियाने लगा- “हनुमान स्वामी, आप बड़े अच्छे देवता हो। हमको बाबा से मिला दिया, इससे हमें बड़ा सुख मिल गया। इतनी बड़ी मड़ेया है कि पानी नहीं पानी का बाप भी बरसे तो भी हमें नहीं भिगो सकता है। हमारी पार्वती अम्मा बिचारी ऐसी झोपड़ी में नहीं रह सकी। यह हमारी फुलवारी और गाय-बछड़ा कैसा सुन्दर लगता है, जो सारे फूलों के बीच यह गाय-बछडा खड़ा कर दिया जाय तो बहुत ही अच्छा लगेगा।पर हमने तो कभी सब फूलों को देखा ही नही है। एक बार देख लें।”
सब फूलों को एक साथ देखने की इच्छा रामबोला के मन में इतने उत्कट रूप से जागी कि उन्हें देखने के लिए वह उतावला हो उठा। रामबोला चबूतरे से उठा ओर राजा जी की फुलवारी की ओर दौड़ पड़ा। फुलवारी बहुत बड़ी थी। उसके चारों ओर इतनी ऊँची -ऊँची दीवारें थी कि हाथी पर बैठा हुआ आदमी भी फुलवारी के भीतर का दृश्य न देख सके। रनिवास की स्त्रियाँ इस प्रमद वन में मनोविनोद के लिए प्रायः आती थीं। फाटक पर कड़ा पहरा रहता था। रामबोला फाटक के तगड़े मुछाड़िये सिपाहियों को देखकर सहम गया। उधर से निराश होकर लौट आया। चहारदीवारी के किनारे- किनारे चलते हुए बार-बार नजर ऊँची उठाकर देखे, पर कुछ भी दिखाई न पड़े । बच्चे को फूल देखने की हुडक-सी लग गई 'हे राम जी कैसे देखें , कैसे तुम्हारा स्वरूप दिखाई पड़े ? अब तो हमसे देख बिना रहा ही नही जाता है। क्या करें?' रामबोला अपने भीतर ही भीतर बावला हो उठा था। दीवार के सहारे सहारे वह चलता ही चला गया। दूसरे सिरे पर पहुँच कर उसे एक जगह से बाहर आती हुई एक बड़ी नाली का मुहाना दिखाई दिया। नाली सूखी पड़ी थी और रामबोला का मन अपने उत्साह मे वह रहा था।उसने एक बार नाली के मुहाने में झाँक कर भीतर देखा, फिर जोश में झुक कर वह उसमे घुस गया। बदन ईंटों से छिला, कष्ट भी हुआ परन्तु ज्यों -त्यों करके बच्चा नाली के भीतर से रेंग ही गया। अन्दर पहुँच उसे अपार सन्तोप हुआ। वह घूम-घूम कर देखने लगा। भाँति - भाँति के रंग-बिंरगे मनोहर पुष्पों के वृक्षों और क्यारियों को देखकर उसका मन मगन हो गया। सचमुच ऐसी सुन्दरता उसने अब तक नही देखी थी। सरोवर मे कमल खिले थे।उसके किनारे मोर चहलकदमी कर रहे थे।सामने हिरनों का एक जोड़ा घास चर रहा था। वृक्षों पर पक्षी चहक रहे थे। सब कुछ बड़ा ही अच्छा था, बस दूर पास पर यदि उसे किसी मनुष्य की आहट सुनाई पड़ती थी तो वह डर के मारे चौंककर दुबक जाता था। अपनी यह स्थिति ही उसे असुन्दर लगी थी, बाकी सब कुछ सुन्दर था। चलते-चलते वह एक सरोवर के निकट पहुच गया। यह स्थान एकान्त में था और चारो ओर कई फूल वृक्षों से घिरा हुआ था।उसके बीच मे संगमरमर का एक छोटा सा सिंहासन नुमा चबूतरा बना हुआ था। बच्चा वहाँ खड़ा हो गया। चारों ओर फूलों की शोभा देखकर उसने फूल चुनने आरम्भ कर दिए। रंग-बिंरगे फूल चुन लिए, फिर उन्हें चबूतरे पर सजाने लगा। रामबोला सजाता जाय और फिर खड़ा होकर उनकी शोभा निहारता जाय। कभी एक रंग के फूल एक जगह से उठाकर दूसरे फूलों की गडडी के पास रख दे और फिर शोभा निहारे। पर उसका जी न भरा। उसने अलग अलग रंग के फूलों के गोले दर गोले बनाने आरम्भ किए। फिर शोभा देखी, सोचा, और थोड़े फूल समा सकते हैं।बच्चा उस कुँज से बाहर निकल कर और भी रंग -बिंरगे फूल तोड़ लाया। फिर सजाकर देखा। बच्चे के चेहरे पर अब पहले से अधिक सन्तोष झलका। फिर लगा कि इतने सन्तोष से भी उसका मन अभी भरा नही है। बाबा कहते थे कि सब फूलों को मिला दो तो राम जी उससे भी ज्यादा सुन्दर साबित होगें, पर सब फूल कहाँ से पाँऊ? अच्छा, वो जो सरोवर मे कमल खिले है उनको ले आँऊ।बच्चा सरोवर के किनारे-किनारे के छोटे-छोटे कमल भी तोड़ लाया। गोलों के बीच में उन कमलों से उसने दो आँखें बनाई, होठ बनाएँ, कान और नाक भी बनाई, फिर देखा। अच्छा लगा। मगर मन फूलों की शोभा निरखता जाय और संतोष भरी हूँ हूँ करता जाय। राम जी का पूरा मुख कमल जैसा होगा? वह जो आगे बड़े वड़े कमल खिले हैं उन्हें तोड़ कर लाऊ।यह सोचकर फिर सरोवर में घुसा। पानी में थोड़ा ही आगे जाने पर पानी गहरा हो गया। पैरों में कमलों की जड़े भी उलझी। आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई, लौटने लगा। लौटते हुए एक जगह उसका पैर कमल की जड़ों के जाल में ऐसा उलझा कि वह डर गया। पैर निकाले पर न निकले। प्रयत्न से खीचंतान करने पर उसका दूसरा पैर भी फंस गया। बच्चा भय और घबराहट के मारे चीख पड़ा -“बचाओ, बचाओ।”

किसी माली के कानों में आवाज पड़ी।वह झपटकर आया। रामबोला पानी से बाहर निकलने के प्रयत्न मे बार-बार उठता और गिर पड़ता था। गनीमत यही थी कि वह बहुत गहराई में नहीं था। गिरने पर दोनों हाथों के टेके लगाकर सिर ऊँचा कर लेता था। पर अपने पैर के फसाँव और फिसलन के कारण वह अपने आपको पूरी तरह से संभाल नहीं पा रहा था।
“तू कौन है रे ? यहाँ घुस कैसे आया?” कहते हुए माली ने पानी में अपना पाँव जमाकर रखा और उसका पाँव पकड़कर जोर से खींच लिया। फिर तो रामबोला को बहुत मार पड़ी। उसने बार-बार रोते हुए यह सिद्ध करने का भरसक प्रयत्न किया कि वह चोर नहीं है।
क्रमशः

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