महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
23-
वे कहते थे कि पानी की कोई जाति नहीं होती, जो रंग मिलाओ वह उसी रंग का हो जाता है। बाबा नरहरिदास यद्यपि ब्रह्मभोज में सम्मिलित होने के लिए राजमहल में न गए पर रानी साहिबा ने उनके लिए ढेर सारी भोजन-सामग्री भिजवा दी। रानी का विश्वास था कि नरहरि बाबा के आशीर्वाद से ही उन्हें ऊँची उमर में पुत्र का मुख देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। बाबा ने रामबोला और अपने बन्दरों को छक-छक कर खिलाया, फिर स्वयं सारी भोजन-सामग्री को एक में मींज कर तथा उसे पानी में सानकर आप खा गए।रामबोला को उनकी भोजन-पद्धति देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। बाबा जब खा-पीकर चैन से बैठे तो रामबोला ने उनसे पूछा-“बाबा, एक बात बताओगे?”
“पूछौ बेटा।”
“यह इतने बढ़िया-बढ़िया मोतीचूर के लड्डू, पूरी, खस्ता-कचौरी, रायता सब एक में मिला के गाय-बैल की सानी की तरह आप खा गए तो इसका स्वाद क्या मिला?”
नरहरि जी मुस्कराए, कहने लगे-"भोजन से पेट भरता है कि स्वाद?”
“दोनों भरते हैं”
“अच्छा तो स्वाद भर दिया जाय किन्तु पेट न भरा जाय तो क्या तुमको तृप्ति हो जायगी, रामबोला?”
रामबोला इस प्रश्न से चक्कर से पड़ गया, फिर सिर हिलाकर बोला-“नहीं”
“बस, तो फिर यही बात है। पेट को कोई स्वाद न चाहिए। यह तो बीच की दलाल जिभ्या ही है जो स्वाद की दलाली लेती है।”
रामबोला चक्कर में पड़ गया, उसने कहा-“पेट तो बाबा हमारा भी रोज भर रहा था परन्तु ऐसा स्वाद हमनें कभी नहीं पाया। हमारा तो जी होता है कि हम रोज-रोज ऐसा ही सुन्दर भोजन करें।”
“रोज-रोज यह षटरस भोजन तुम्हें कहाँ से मिलेगा? क्या चोरी करोगे रामबोला।”
“नाहीं”
बाबा बोले-“राम जी जब तुम्हें दे तो खाओ, न दें तो न खाओ। स्वाद के पीछे न जाओ, पेट की चिन्ता करो।”
“अच्छा, बाबा”
रामबोला बाबा नरहरिदास के साथ ही रहने लगा। वह हनुमान जी का चबूतरा बुहारता, बाबा की कुटिया और आगे की छोटी-सी फुलवारी वाला भाग स्वच्छ करता और दिन में विश्राम के समय वह अपने नन्हें-नन्हें हाथों से बाबा के पैर दबाता था। नित्यप्रति मण्डी के एक अनाज के व्यापारी के घर से बाबा के लिए सीधा आने लगा था। नरहरि बाबा बच्चे को रोटियाँ बनाना और पोना सिखलाते थे। रामबोला धीरे-घीरे अच्छा भोजन बनाने लगा। उसे खिला कर तथा बन्दरों के आगे टुकड़े डालकर शेष सामग्री नित्य वे सानी बनाकर खाते थे।
एक दिन रानी साहिबा अपने राजकुँवर को लेकर बाबा के दर्शन करने आईं। बाबा के बन्दरों के लिए और घाघरा-सरयू के सगंम-तट पर बसने वाले कंगलो के लिए वे लड्डू-कचौड़ियाँ बनवाकर लाई थीं। नरहरि बाबा को वे एक गाय भी पुन्य करके दे गईं। गाय पाकर रामबोला को ऐसा उत्साह आया कि वह उसे तथा उसके बछड़े को देखते नहीं अघाता था।नरहरि बाबा से बोला “हम औरों के यहाँ गाय देखें तो दूध और छाछ पीने को हमारा भी जी करे।अब बाबा हम रोज-रोज दूध दुहेंगे और फिर मजे से हम तुम दोनों छक के पिया करेंगे। वाह रे, हनुमान स्वामी, तुमने हमारी खूब सुनी।”
नरहरि बाबा बच्चे की भोली बातें सुनकर हँस पड़े, फिर पूछा- “हनुमान स्वामी कहाँ हैं रे?”
“वह चबूतरे पर खड़े है गदा पहाड़ ले के।अच्छा बाबा एक बात बताएँगे आप?”
“पूछो”
“यह तो संजीवनी बूटी का पर्वत है...है न?”
“तुमको कैसे मालूम, रामबोला? ”
“हमारी पार्वती अम्मा ने एक बार हमको बताया रहा।ठीक बात है न बाबा ?”
“हाँ , ठीक बात है।”
“पर संजीवनी बूटी से लछिमन जी तो पहले ही ठीक हो गए,अब ये क्यों पर्वत लिए खड़े हैं?”
बच्चे के इस प्रश्न पर नरहरि बाबा हँस पड़े, बोले-“इसलिए खड़े हैं कि और किसी को जरूरत पड़े तो उनसे संजीवनी बूटी ले ले। तुमको चाहिए।”
“संजीवनी बूटी? हमको शक्ति थोड़े लगी है बाबा, हम मरे थोड़े....”
“जिसके हृदय में राम जी नहीं रहते वही मरे के समान होता है, बेटा। तुम तो साक्षात् रामबोला हो।”
“नाम से क्या होगा बाबा, हम जरूर मरे हुए हैं, बाबा।”
“काहे ?”
“अरे हम नान्हें से लड़के, हमारे पास न ओढ़ने को है और न बिछाने को। हमारे हिरद में सियाराम जी काहे निवास करेगें? और फिर राम जी तो बाबा बहुत बड़े हैं और हमारा हिरदे तो अबहीं नन्हा सा है।”
“तो राम जी भी नन्हें से बनकर निवास करते हैं।”
रामबोला सुनकर स्तब्ध हो गया।आँखें फाड़कर बाबा को देखने लगा। फिर बोला-“पर हमने तो बाबा उनको कभी देखा नहीं। क्या राम जी छोटे भी होते हैं”
“हाँ हाँ , वे छोटे से छोटे हो सकते हैं, इतने छोटे कि किसी को न दिखाई पड़ें और इतने बड़े भी हो जाते हैं कि कोई उनको पूरा देख नहीं सकता है।”
“राम जी कैसे हैं बाबा? आप देखे हो?”
नरहरि बाबा बच्चे के प्रश्न पर एक क्षण के लिए चुप हो गए, फिर अदृश्य में आँखें टिकाकर कहा-“एक बार झलक भर देख पाया था उन्हें। तब से बराबर एक बार फिर देखने की ललक में हम पड़े हैं बचवा।”
“पर बाबा, आप तो बड़े हैं, आपका हिरदे भी बड़ा है।”
“काया बड़ी हो जाने से तो हृदय थोड़े बड़ा हो जाता हे रे। वह तो राम जी की दया से ही होता है।”
रामबोला चुप हो गया।बात उसकी समझ में ठीक तरह से न आई। फिर कुछ सोचकर पूछा-“अच्छा बाबा, राम जी कैसे हैं? बड़े सुन्दर होगें”
“हाँ , बहुत सुन्दर”
“जैसे अपनी फुलवारी में फूल सुन्दर लगते हैं, वैसे होगें?”
“इस जगत में जितने सुन्दर-सुन्दर फूल हैं उन सबको मिला दो तो उनसे भी अधिक सुन्दर है राम जी।”
सुनकर बच्चा हताश हो गया-“हम तो सब फूल भी नही देखा बाबा, हम कैसे जानें। (फिर एकाएक आखे सुख से चमक उठीं) राजा जी की फुलवारी में सब सुन्दर-सुन्दर फूल होगें। है न बाबा?”
“हमको नहीं मालूम बचवा। हम कभी राजा जी की फुलवारी में नही गए हैं। परन्तु जब इतनी बड़ी फुलवारी है तो वहाँ बहुत-से फूल भी होगें। अच्छा, अब तुम हनुमान जी के चबूतरे पर जाकर बेंठो और राम जी राम जी जपो। हम भी अब जप करेगें”।
क्रमशः
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