Thursday, 30 March 2023

tc 22

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
22-

रामबोला फिर बोला- “हमे क्या देखते हो, आओ।हमारी बात की लाज रख लो भैया, नही तो ललकऊ, हम सच्ची कहते हैं कि हम आज ही तुम सबको छोड़कर यहाँ से चले जाएगें। आओ...  आओ,आओ न।” सरदार इस बार सचमुच चल पड़ा और उसके पीछे पीछे चालीस-पचास बानरों की टोली भी दौड़ने लगी। आगे- आगे रामबोला और ललकऊ, उनके पीछे तथा आसपास बन्दरों की टोली दौड़ती चली। हनुमान जी के चबूतरे पर घमासान मचा हुआ था। रामबोला के हुकाँरते ही बन्दर चबूतरे पर चढ़े हुये भिखारियों पर टूट पड़े। थोड़ी देर में ऐसी ले दे मची कि भिखारियों की टोली वहाँ से संत्रस्त होकर भागी। 
रामबोला बड़ा प्रसन्‍न हुआ। चबूतरे पर चढ़कर हनुमान स्वामी से बोला- “देख लियौ हनुमान स्वामी, अरे हमारे ललकऊ सरदार बड़े वीर हैं और तुम देख लेना, ललकऊ अब किसीको यहाँ पैर तक न रखने देगा। (मुड़कर अपनी जुयें बिनवाते हुए ललकऊ को देखकर) ललकऊ सुना, हनुमान स्वामी क्या कह रहे हैं।अब यहाँ कोई आने न पावे।परसों राजा के घर चलेगें, मजे से माल उड़ाना। हम? नहीं हम तो न जायगे भाई। हमें न्योता कहाँ मिला है फिर बिना बुलाए हम किसीके घर क्‍यों जायें।राजा होगें तो अपने घर के होगें। हमारे राजा रामचन्द्र जी से बड़े तो हैं नही।हमारे हनुमान स्वामी आज ही जाके राम जी से कहेंगें कि राम जी, राम जी, तुम्हारा रामबोलवा कल से भूखा है। उसे ऐसी कसके भूख लगी है कि तुम उसे खाने को न दोगे तो वह रो पड़ेगा।”

रामबोला ने देखा नहीं था, उसके पीछे एक वयोवृद्ध सौम्य साधु आकर खड़े हो गए थे। वे हनुमान जी तथा ललकऊ सरदार से होनेवाली उसकी बातें सुन-सुनकर आनंदमग्न हो रहे थे। रामबोला की बात समाप्त होने पर वे सहसा बोले -“बेटा, राम जी ने तुम्हारे लिए यह पेड़े भेजे हैं। लो खाओ।” इतने ही मे कुछ दूर पर एक पेड़ के नीचे जुएँ बिनवाते हुए ललकेऊ ने साधु को देखा। वह आन्नद से चिचियाते हुए छलाँग मारकर उनके पास जा पहुँचा और उनकी टाँग पकडकर खूब उमंग से चिचियाने लगा। सरदार को यह करते देखकर कई बन्दर साधु के आसपास पहुच गए। साधु अपनी दाढ़ी मूँछों में मुस्कान बिखेरकर बोले-“हाँ हाँ , जान गए, तुम सबको आनन्द हुआ है। ठहरो ठहरो, तुम सबको भी मिलेगा।पहले इस बाल संत को देने दो। तुम सब तो हनुमान जी के बन्दर हो, पर यह बालक तो साक्षात्‌ राम जी का बन्दर है।” कहते हुए अपने झोले से अगौछा निकालकर उसके एक छोर पर बंधे लगभग पाव डेढ़ पाव पेड़ों में से बाबा ने कुछ तो बन्दरों के आगे डाल दिए और एक मुट्ठी रामबोला के हाथों में देकर बोले-"लो खाओ, खत्म करो तो और दें।” रामबोला कृतज्ञ दृष्टि से साधु को देखने लगा। भूख बड़ी जोर से लगी
थी, उसने जल्दी जल्दी तीन चार पेड़े मुँह में भर लिए, फिर एकाएक उसे ध्यान आया, उसने साधु के पैर नही छुए। हड़बड़ा कर उठा और साधु के सामने धरती पर अपना मस्तक टेककर उसने भरे मुँह से कहा-“बाबा-बाबा, पाव लागी।” पेड़ों भरे मुँह से शब्दों का अशुद्ध उच्चारण सुनकर तथा बच्चे का भाव देखकर साधु हँस पड़े। पेड़ों से पेट भरा, फिर नदी से पानी पिया और जब लौटकर आया तो उसने देखा कि चबूतरा खाली था और मन्दिर के पासवाली बन्द कुटी के द्वार खुले हुए थे। बच्चे को लगा कि हो न हो कृपालु साधु इसी कुटी के अन्दर हैं । वह भीतर चला गया। साधु अपनी कुटी बुहार रहें थे। रामबोला आगे बढ़कर उनके हाथ की झाड़ू पकड़कर बोला-“आप बैठों बाबा जी, हम सब साफ किए डालते हैं।”
“रहने दे, रहने दे, तुझसे नही होगा।अभी नन्‍हा सा ही तो है।”
“अरे, हम रोज हनुमान जी स्वामी का चबूतरा बुहारते हैं। आप किसी से पूछ लें। आप खुद ही देख लेना कि हम कैसा बुहारते हैं।”
बच्चे के आग्रह को देखकर साधु ने उसे झाड़ू दे दी। रामबोला बड़े उत्साह से अपने काम मे जुट गया। बच्चा झाड़ू लगाते हुए एकाएक बोला-“हम रोज-रोज अपने मन में सोचे कि कुटिया बन्द क्‍यों पड़ी है। यहाँ कौन रहता है। एकाघ जने से पूछा तो उन्होने कहा कि नरहरि बाबा रहते हैं। तो क्या आप ही नरहरि बाबा हैं?” 
“हाँ, तू कहाँ से आया है रे ? ”
“हम बहुत दूर रहते रहे बाबा,फिर हमारी पार्वती अम्मा मर गई और उसके बाद पुत्तन महाराज ने हमें बहुत मारा-पीटा। हमारी झोपड़ी गिरा दी और खूब जोर-जोर से आँखे निकालकर कहा कि अब जो तू कल से हमारे गाँव में दिखाई पड़ा तो हम ऐसे ही तेरी हड्डी-पसली भी तोड़ डालेंगे।”
बच्चे ने पुत्तन महराज के क्रोध और अकड़ का ऐसे अभिनय किया कि नरहरि  बाबा दुखी होने पर भी हँस पड़े कहा-“तुमसे कुछ अपराध अवश्य हुआ होगा, नहीं तो वे तुम्हें क्यों मारते।”
“अपराध हमारा नही, उनके अपने लड़के का रहा। ससुर अपना ही खेले और दूसरे को दांव न देवे। तो हमने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि दांव देव, तो वह हमको मारे-पीट लगा। तब हमें भी गुस्सा आ गया। हमसे वह बड़ा रहा बाबा, लेकिन हमने उसको उठा कर पटक दिया और खूब मारा। जो अन्याय करे उसे तो दण्ड देना चाहिए, है न बाबा? राम जी ने रावण को इसीलिए तो मारा था, है न बाबा?“
नरहरि बाबा हँस पड़े,कहा-“अरे, तू बड़ा विद्वान है रे, तू तो खास राम जी का बन्दर है।”
कोने में सिमटा हुआ कूड़ा अपनी नन्‍हीं हथेलियों में समेटते हुए थम कर बच्चे ने साधु की ओर देखा। चार आँखें दो दिलों के अन्दर बैठ गई। रामबोला खिलखिला कर हँस पड़ा। पार्वती अम्मा के मरने के बाद रामबोला को ऐसी मुक्त हँसी कभी नहीं आई थी।

बावा नरहरिदास का उस क्षेत्र में बड़ा मान था। वे कथा बाँचा करते थे, और एकतारे पर ऐसे तन्मय होकर भजन गाते थे कि सुननेवाले आत्मविभोर हो उठते थे। उनकी जाँति-पाँति का किसीको पता न था। उनके भक्त उन्हें ब्राह्मण कहते थे और विरोधी उन्हें हनुमानवंशी डोम बतलाया करते थे। बाबा नरहरि दासजी ने पूछने पर भी कभी अपनी जाति नहीं बतलाई।
क्रमशः

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