Wednesday, 29 March 2023

tc 21

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
21-

अरे तुम्हरी ये खीसें न तोड़ डाली तो हमार नाम रामबोला नहीं। खौखियात हैं ससुर? हम तुमसे जोर से खौखिया सकते हैं।” बन्दरों की तरह ही खो-खो करता हुआ बालक रामबोला दोनों हाथों में संटिया लेकर उनपर झपटता है। बन्दर जब दूर जाते हैं तो एक हाथ की संटी रखकर अपने अगौछे में भुने हुए गेहूँ आदि रखता जाता है, बन्दरों को भी देखता जाता है, फिर हनुमान जी की दीवाल का सहारा लेकर बैठ जाता है और ठाठ से चने चबाता है। 
एक दिन रामबोला मुँह अँधेरे ही चबूतरे पर झाड़ू लगाता हुआ बड़बड़ा रहा था-“हे हनुमान स्वामी, देखो अब तुम्हारा चबूतरा कितना साफ सुथरा रहता है। हम बड़े मन से सेवा करते हैं।बजरंगबली अब तो तुम राम जी के दरबार में हमारी अरदास पहुँचा दो। हम भी और दूसरे लड़को की तरह अ-आ-इ-ई पढ़ें और हमको दुइ रोटी का सहारा होइ जाय। ये चने गुड़धानी चाब चाब के कब तक पेट भरें ? रोटी खाए बहुत दिन हो गए। देखो कल तुम्हारे होठकटवा बन्दर ने हमको कैसा पंजा मारा है।खून कलभलाय उठा। हमारी बाँह ऐसी पिराय रही है कि तुमसे क्या कहें। तब भी हम तुम्हारी सेवा कर रहे हैं। अब तो तुम हमारी जरूर सुन लो नाथ। पार्वती अम्मा कहतीं रहीं कि दीन-दुर्बलों की गुहार तुम्हीं सुनते हो। सुन लो बजरंगबली हनुमान स्वामी। हम तुम्हारी हा-हा खाते है, चिरोरी करते हैं। सुन लो नाथ, अरे सुन लो।”
रामबोला अव कहीं भिक्षा माँगने के लिए नही जाता। वह सबेरे उठकर हनुमान जी के स्थान को बुहारता है और नहा-धोकर चबूतरे पर बैठे-बैठे भजन गाया करता है। बच्चे के सरल कंठ स्वर और हनुमान जी के प्रति उसकी सेवा निष्ठा ने दर्शनार्थियों के मन में उसके प्रति थोड़ा बहुत प्रेमभाव जगा दिया है। कुछ भगत-भगतिनियाँ बन्दरों के साथ-साथ रामबोला को भी चने भौर गुड़धानी दे दिया करतें हैं। बन्दरों से रामबोला की दोस्ती भी हो गई है। ललकवा सरदार अब कभी कभी रामबोला के पास चबूतरे पर आकर बैठ भी जाता है। बन्दरों के बच्चे स्वच्छन्दता पूर्वक उसके साथ खेलने लगे हैं। इससे रामबोला का मन अब आठों पहर सुखी रहता है।जब कभी एकाध फल मिल जाता है तो रामबोला उसी में से आधा भाग सदा ललकऊ सरदार को देता है। यदि कोई उसके माता-पिता के सम्बन्ध में पूछता हे तो उत्तर में वह उसे सीता और राम के नाम बतलाता है। बच्चे की इस हाजिर जबाबी से लोग प्रसन्न होते हैं।यदि कोइ यह पूछता है कि दाल भात रोटी खाने को तुम्हारा जी नहीं करता, तो उसे चट से यह उत्तर मिलता है कि बजरंगबली हमें जो कुछ खाने को देगें वही तो खाऊँगा।

एक दिन रानी साहब ने ब्रह्म भोज दिया। उसकी धूम कई दिनों पहले से ही मच गई थी। गोण्डा और अयोध्या के हलवाइयों की एक पूरी सेना बुलाई गई है। बड़ा शोर है कि राजमहलों में मिठाइयाँ पर मिठाइयाँ बन रहीं हैं। आस-पास के गाँव के हर ब्राह्मण परिवार को न्योता मिला है। भिखमंगों में उत्साह की लहर दौड़ गई है। चींटियों की तरह से रेंगते हुए जाने कहाँ -कहाँ से झुण्ड के झुण्ड भिखारी अभी से ही आने लगे हैं। बहुतों ने हनुमान जी के चबूतरे के आस- पास भी डेरा डाल दिया है। उनके कारण बन्दरों और रामबोला को अपना दैनिक भोजन भी नहीं मिल पाता। एक मुड़चढ़ा भिखारी कल से बराबर इसी घात में रहता है कि कोई भगत हनुमान जी की खोंची डालें और वह उसे हड़प जाय। रामबोला ने जब आपत्ति की तो मार खाई। कल सारा दिन रामबोला और बन्दर भूख ही रहे। दूसरे दिन से ही बन्दर तो वहाँ से हट गए पर सबरे जब दर्शनार्थी आए तो रामबोला ने गुहार लगाई- "देखो, ये लोग हमें मारते हैं। कल से न हमने ही कुछ खाया है और न हमारे बन्दरों को कुछ मिला है। यह सब लोग मिलके हनुमान जी का स्थान भ्रष्ट करतें हैं। उनको आप सब यहाँ से हटा दें।”
अपनी शिकायत सुनकर भिखारी और भिखारिनें रामबोला को चें चें करके कोसने लगे।हनुमान जी के सारे चबूतरे पर गंदगी फैलाने लगे।भिखारी दल किसी भी दर्शंनाथियों के बस का नहीं था और हनुमान जी के नाम पर निकाले जाने वाले चने गुड़ को भी चबूतरे पर से उठा कर खा जाता था। हनुमान जी की खोंची डाली गई और मिखमंगों ने उसे लूट लिया। यह देखकर रामबोला को बड़ा ताव आ गया। उसने बजरंगबली से शिकायत की, “हनुमान स्वामी तुम साखी हो, हम कल से इनके कारन बड़े दुखियाय रहे हैं। तुम्हारे बन्दरों को भी खाने को नहीं मिलता और ऊपर से ये हमको मारत हैं। अच्छा अब हम भी बदला लेंगे।” लेकिन बदला लेने का कोई उपाय न सूझा। सारे दिन भिखारी- भिखारिनों से लड़त झगड़त और खाखियाते ही बीत गया। नींद भी न आई।सबेरे चबूतरे पर भाड़ लगाने लगा तो भिखारी बच्चों ने उसे चिढ़ाने के लिए गंदगी का अभियान चलाया। रामबोला तप गया-“बदला लेगें, जरूर लेगें।कैसे लेंगे, बताएँ? अच्छा तो ठहरो, हम तुम्हे दिखाते हैं। अब या तो ये दुष्ट राक्षस लोग ही यहाँ रहेगें या फिर हम और हमारे बंदर।”
बड़े ताव से रामबोला चबूतरे से उतरकर अनाज मण्डी की ओर चल पड़ा। परसों से बन्दर वहीं डेरा डाले पड़े हैं। मन्डीवाले अनाज की फटकन और थोड़े बहुत चने भी उनके आगे डाल देतें हैं।रामबोला बन्दरों के ललकऊ सरदार को खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। पीपल के पेड़ के नीचे बानर परिवार को बैठा देखकर वह बड़े ताव से ललकऊ से बोला- “वाह, अच्छे साथी हो, हम वहाँ मार खायें और तुम हियाँ बैठे-बैठे माल खाइवो .... वाह वाह वाह।” ललकऊ सरदार ऐसे चुप होकर बैठ गया कि मानों उसे रामबोला की शिकायत सुनकर लाज लगी हो। वह अपनी कनपटी खुजलाने लगा, फिर जल्दी-जल्दी दोनों हाथों से आसपास के पड़े दाने बीन-बीनकर रामबोला के आगे रखने लगा। वह बोला- “ये नही, तुम सब जने हमारे साथ चलो और राक्षसों को वहाँ से भगाओ। देखो ललकऊ हम हनुमान स्वामी से बद कर आए हैं। हमारी नाक नीची न होय,आओ चलो।” भारी भरकम शरीर वाला ललकऊ रामबोला का मुँह देखने लगा।
क्रमशः

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