महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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पर इस ऐन परीक्षा के अवसर पर वह कट्टर हो गया है, तनिक सी कुनमुनाहुट तक नहीं हो रही है- “हे प्रभु, मैं बड़ा अपराधी हूँ। मेरा कलेजा बड़ा ही कठोर है जो ऐसा निर्मल भवितिरभाव-भरा वातावरण पाकर भी अब तक उमड़ न सका।सारा वातावरण करुणा के अपार सागर में डूब गया है। तुलसी से कुछ ही दूर बैठी कुछ स्त्रियां रो रही हैं। पुरुषों में अनेक चेहरे अश्रु-विगलित दिखाई दे रहे हैं। मेघा भगत के करुणा सागर में डूबे हुए स्वर का प्रभाव सभी के चेहरों पर बोल रहा है, लेकिन तुलसी की आंखें मरुभूमि-सी उजाड़ हैं। मेघा भगत के मौन भावमग्न होते ही सभी कुछ क्षणों तक तो भावावेश मे गूँगे बने रहे फिर हल्की हलचल होने लगी।
दर्शनार्थी भक्तमंडली में एक तरुणी अपनी माँ के साथ बैठी हुई थी। तुलसी गंगाराम और नंददास उससे कुछ ही दूर पर बैठे थे। एक प्रौढ़ व्यक्ति ने प्रौढ़ा से कहा- “मोहिनी से कहो एक भजन गाए। महाराज को शाति मिलेगी।” मेघा भगत आँखे मूँदें करुणा में डूबे बैठे हैं। तरुणी गायिका ने अपनी प्रौढ़ा माँ के संकेत पर कुछ क्षणों तक गुनगुनाते रहने के बाद मीराबाई का एक भजन गाना आरम्भ कर दिया- ‘सुनी री मैंने हरि आवन की आवाज’।
स्वर मीठा तड़प-भरा था। गाने वाली कला निपुण थी और मनमोहक भी।थोड़ी ही देर में गीत और गायिका की मघुरिमा वातावरण पर जादू बन कर छा गई। मेधा भगत के भक्तों में आधे से अधिक लोग राम को भूलकर रागरंजित हो गए।गानेवाली के भावमग्न चेहरे पर अनेक आखें लालच के गोंद से चिपक गईं। स्वर सभी के मनों की भौतिक सतह को छेदकर कहीं अवश्य गहराई में हवा की तरह छा रहा था। लोगों की रसमग्न आँखों में गायिका का रूप किसी हद तक समाया तो था, कितु कानों में गूजने वाली मिठास रूप के मोह को बहा ले जाती थी। ऐसा लगता था कि गायिका के स्वर और मीरा के शब्दों ने जन-मानस को त्रिशंकु की तरह अधर में औंधा लटका दिया है। केवल मेघा भगत आँखें मूँदें पत्थर की मूर्ति बने ध्यानावस्थित हो गए थे।
गायिका का स्वर प्यासा चकोर बनकर तुलसी के हृदय के पर्दे हिलाने लगा। हरि आवन की आवाज ही मानों गायिका के स्वर में सुनाई पड़ रही थी। कठिन कलेजा पिघलकर ऐसा तरंगित हो उठा था कि तुलसी का मानस इच्छित गति पाकर बड़ी शाति और सुख का अनुभव कर रहा था। उस दु:ख के बहाव में ही गाने वाली के लिए प्रशंसा की बिजली भी कौंधी। “कितना मधुर गा रही है।भक्तराज इससे अवश्य ही प्रभावित हो रहे हैं। धन्य हैँ यह स्त्री, जो वेश्या होकर भी इतनी भक्तिभावपूर्ण है। मेरे मन मे भी राम रमते हैं। मेघा जी भक्त है, अब यह भी मानी जायगी। इसमें भक्ति भाव जो है सो है पर यह कला कुशल है। मेरे मन में भाव भी है और मैं गा भी सकता हूँ। ऐसे ही गा सकता हूँ।”
मन गायिका के स्वर में स्वर मिलाकर बहने लगा, आँखें मुदँ गईं। गानेवाली तुलसी के मन की गुफा में श्रद्धा दीप के पास बैठी गा रही थी और मन वाले तुलसी का स्वर मानों गुप्त सरस्वती की भाँति उसके स्वर में अंतर्धारा बनकर प्रवाहित हो रहा था।तुलसी एक ऐसे मोड़ पर पहुँच कर स्तब्ध हो गए थे जहाँ फूलों के रगों से भरी हरीतिमा उनके आभ्यंतर को अपने में लपेट रही थी। उनके मन-प्राण में केवल स्वर और शब्द ही थे और कुछ भी न बचा था।
गायिका का स्वर ज्यों ही अपने पूर्ण विराम पर थमा त्यों ही तुलसी का स्वर अनायास गतिमान हो गया- ‘सुनी री मैंने हरि आवन की अवाज।’
गायन शैली वही थी, शब्द भी वही किंतु स्वर नया था। सुनने वालो को लगता था कि वे जैसे अपने अंतर में हरि के आने की आहट पा रहे हैं। हरि से मिलने की छटपटाहट हर प्राण में बस गई। लोग मुग्ध होकर इस अनजाने युवक को देख रहे थे। गायिका चकित गौर रसमग्न दृष्टि से एकटक होकर तुलसी को निहार रही थी।तुलसी मेघा भगत की ओर देखते हुए गा रहे थे- ‘मीरा के प्रभु गिरधर नागर बेगि मिलो महाराज’।
महाराज तक पहुँचते -पहुँचते वातावरण प्रायः सभी के लिए आत्मविस्मृत- कारी बन गया था। गायिका के स्वर को सुनते हुए जहाँ मेघा भगत की आँखें मुँद गईं थीं, वहाँ तुलसी का स्वर आँखे खोल देने वाला वन गया। स्वर में एक ऐसी सचाई थी जो कोरी कला के सिद्ध से सिद्ध रूप की भी पहुँच के बाहर थी।
भजन समाप्त होने पर मेघा भगत गद्गद स्वर में बोले- “कहाँ से आ गया रे तू मेरे स्वरूप? तू तो मेरी अनचाही चाह बनकर आया है रे भैआ, मैं तेरी बलेया ले लूँ।” मेघा भगत भावावेश में उठकर तुलसी के पास आ गए और उसे अपने कलेजे से चिपटाकर रोने लगे। बोले- “मैं जिसे अपने भीतर पुकार रहा था वह यों बहाने से मुझे बाहर प्रत्यक्ष होकर मिल रहा है।तू बड़ा दयालु है, बड़ा ही दयालु है मेरे राम।”
सब दृष्टियाँ भगत और तुलसी के मिलन दृश्य पर लगीं थीं। मेघा की आँखें बरस रहीं थीं।
तुलसी की आँखें प्रयत्न करने पर भी न बरसीं। जिसे रिझाने के प्रयत्न में उनका कलेजा उमड़ा था उससे इच्छित प्रशंसा पाकर मानों वह फिर घमण्ड की ठसक में ठोस बन गयीं। अपने प्रति किए गए भगत जी के संबोधन और प्रशंसा का विचित्र प्रभाव तरूण तुलसी के सद्य सफलता से उल्लसित मन को पहेली सा उलझा गया। काया पर प्रसन्नता और विनय मुद्रा, मन में घमंड। अंतर्चेतना में घुड़की की गूँज- सावधान, घमंड नहीं ।मन अपराध भावना से सकुच गया और उससे कतराने के लिए ही तुलसी की दृष्टि भीतर से बाहर आ गईं। सामने गायिका उन्हें अपलक दृष्टि से देख रही थी।
उसकी आँखों में अपने लिए चमकता हुआ प्रशंसा का भाव पाकर वे लोहे की तरह उस चुंबक की ओर खिंचते ही चले गए। उन्हें ऐसा लगा कि मानों मेघा से अधिक उन्हे गायिका की प्रशंसा की ही चाह थी और उसे उसकी आँखों में पाकर वे निहाल हो गए हैं।
क्रमशः
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