महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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ज्योनार का समय हो गया था। बुलावा आने पर शेष जी की शिष्य मंडली के साथ ही कुछ और ब्राह्मण गृहस्थ भी मेघा भगत को प्रणाम करके उठ खड़े हुए। जब तुलसी उनके आगे नतमस्तक हुए तो मेघा ने उनका हाथ पकड़कर उठा लिया और उनकी आँखो में आँखें डालकर देखने लगे। तुलसी का मन अचम्भे से बंध गया- “यह इतने ध्यान से मेरी आँखों में क्या देख रहे हैं? मैं तो कुछ भी नहीं समझ पाता।”
मेघा बोले- “अब ,तुम बराबर आना भाई। तुम्हारे बिना यह मेघ सूखा रहेगा। तुम्ही मेरी वर्षा हो। वचन दो, कि तुम नित्य आओगे।”
अपनी प्रशंसा से तुलसी सकुच गए, कहा- “गुरू जी से आज्ञा लेकर अवश्य आऊँगा।”
“कौन है तुम्हारे गुरु?”
“परमपूज्यपाद आचारयंपाद शेष सनातन जी महाराज।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“रामबोला तुलसी।”
सभी विद्यार्थी कमरे से बाहर निकलकर दालान में खड़े थे। मामा जी की भूख भाँग के नशे के साथ ही भड़क चुकी थी। उन्हें तुलसी का मेघा से खड़े खड़े बतियाता उबा रहा था। तुलसी मेघा को प्रणाम करके जो चले तो द्वार की चौखट पर फिर अटक गए। किवाड़ से टिकी हुई गायिका खड़ी थी। पास पहुचनें पर उसने तुलसी को आँखों ही आँखों में प्रणाम किया।तुलसी का मन गुदगुदी में भर उठा। आपे से बाहर होकर वे उसके रूप में लीन हो गए।
”आप इतना सुंदर गाते हैं, किससे सीखा।”
“आपसे”
“आईये”- कहते हृए गायिका की आँखों की पुतलियाँ शोखी से फिरीं।उन्हें देखते ही तुलसी के मन में कुछ कुछ होने लगा। उन्हें लगा कि उनका सारा कलेजा उनके भीतर से निकल कर सामने वाली की आँखों में समाया जा रहा है। अपनी इस विषम मुग्धता पर वे ठगे से उसे देखते ही रह गए।
बाहर से मामाजी चिल्लाये- “अरे अब आओ भी कि साली पतुरिया के रूप से ही पेट भरोगे।”
तुलसी हड़बड़ा कर चले तो चौखट की ठोकर लगी। लड़खड़ाए तो गायिका ने उन्हें थामने के दिए हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ तुलसी की कलाई से छू गईं। सारा शरीर बिजली की सनसनाहट से भर गया। यह एकदम नव अनुभव था, मन चक्कर में पड़कर चौकन्ना हो गया। तुलसी के कसरती कुश्तीबाज शरीर ने उसी बिजली से फुर्ती लेकर ऐसी सफाई से पैंतरा लिया कि तन और मन दोनों ही गिरने से बच गए। दूर छिटककर खड़े होते हुए उन्होंने फिर मुड़कर भी न देखा। अनुभवहीन नवयौवन मन इस अपूर्व आनन्द से दहल गया था।मोहिनीबाई की चोर आँखें मृग मरीचिका की-सी प्यास से बँधी टकटकी से अपने जाते हुए मन-भावन को कनखियों से ताक रहीं थीं।
मेघा भगत के द्वारा की जाने वाली तुलसी की प्रशंसा का प्रसार पूरी पाठशाला में हो चुका था। दूसरे दिन अपने विद्यार्थियों को समय से पहले ही पढ़ाने के लिए बुला लिया।आज सबेरे ही से उनके मन मे उत्साह की हिलोरें उठ रही थी। मन में भाव-सूत्र अभी सब गड्ड-मड्ड थे। तुलसी का मन अपनी खोह में नन्हा-मुन्ना बनकर गेंद-सा उछलकर अपने श्रद्धा दीप के चारों ओर नाच रहा था। वह मगन था। उसके मगनपने में राम थे। उसकी भक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रश्न अभी तुलसी के मन में उदय नही हुआ था। मोहिनी इन सबके बीच में एक विशेष आभा लेकर उभर आई थी, यह बात उनके भीतर-बाहर की चेतना में स्पष्ट रूप से जरूर संकेत कर रही थी। मोहिनी की आकर्षक छवि भी उनकी बिम्ब- गुफा में कभी कभी उनके साथ ही साथ श्रद्धा दीप के चारों ओर नाचने लगती है। मोहिनी अपनी यथार्थ आयु में और तुलसी बालक के रूप में एक साथ एक ही लय और गति में यह आनन्द ताण्डव कर रहे थे। उसी उल्लास में जब वे पढा़ने बैठे तो कालिदास के मेघदूत वर्णन में ऐसे तन्मय हुए कि विद्यार्थी भी तन्मय हो गए। विद्यार्थी यों भी पंडित तुलसीदास की अध्यापन कला पर मुग्घ रहते हैं किन्तु आज तो वे छक-छक गए। तुलसीदास की इस तन्मयता को भंग करनेवाली केवल एक ही वस्तु थी, छत की घूप। समय के संकेतों पर उनका ध्यान बीच-बीच से अपने-आप ही जा पड़ता था। चलते हुए विचारों के रंगीन पर्दो के भीतर मोहिनीबाई की आकर्षक छवि बार-बार आकर उनका मोद बढ़ा जाती थी। तुलसीदास ने समय से ही अपने सारे कार्य उत्साहपूर्वक निबटा लिए और मेघा भगत के यहाँ जाने के लिए गुरू जी की आज्ञा लेने जा पहुँचे। तब तक उनके शिष्यों ने पाठशाला के समस्त विद्याथियों के आगे अध्यापक तुलसी की ऐसी महिमा बखान की थी कि उसकी भनक गुरू जी के कानों में भी पड़ चुकी थी।
गुरू जी बोले- “हमने सुना है कि आज तुमने अपनी व्याख्यान कला से पाथिव और अपार्थिव के बीच में प्रेम रज्जु का लक्ष्मण झूला निर्मित कर दिया है।” सुनकर तुलसी गद्गद हो गए । गुरू जी के चरणों में तुरंत अपना सिर नवाकर वे बोले- “आप मुझसे ये न कहे। सबकुछ आप ही का प्रसाद है और स्वर्गीय बाबा जी के दिए हुए संस्कार हैं। मैं तो आपका अनुचर मात्र हूँ।”
तुलसी की पीठ अपने दोनों हाथो से थपथपाकर गुरू जी बोले- “विश्वेश्वर तुम्हें अपने इष्टदेव के प्रसाद का सर्वेश्रेष्ठ वितरक बनाए। महामृत्युन्जय-तुम्हारी रक्षा करें, सर्वत्र विजयी हो, सिद्ध हो।”
मेघा भगत के यहाँ आज भी कल जैसा ही संसार जुड़ा था। मोहिनीबाई
अपनी माता के साथ पहले ही आ चुकी थी। उसका रथ और सरकारी प्यादे गली के मुहाने पर ही खड़े दिखाई दिए। देखते ही तुलसी का उल्लास रंगीन होकर चमक उठा लेकिन प्रवेश करते समय से अपने- आपको संयत बना लेने का होश रहा। मोहिनीबाई ने वातावरण से बेहोश होकर भर नजर तुलसी को देखा । एक उचकती कनखी से इस आनंद के कण को समेटकर तुलसी बराबर मेघा भगत से अपनी श्रद्धापूरित आँखें मिलाए रखने में सतर्क रहे।मेघा भगत के चरण छूते समय उनके मन ने सहसा व्यंग्य किया 'जो भाव कल तक सहज था उसमें आज सतर्कता क्यों बरती जा रही हैं?'
मेघा भगत ने तभी दोनों हाथों से प्रेमपूर्वक तुलसी के दोनो कंघे हिलाते हुए कहा- “आ गया आत्मन् ? अरे तुझे तो मैं अपने साथ ही भगा ले जाऊँगा। राम और भरत मे कोई अंतर नही है।
क्रमशः
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