Wednesday, 26 April 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
48-

वे एक ही अनुसाधन के दो परस्पर पूरक रूप हैं।अच्छा, चल बैठ भाई। आज तो तू ही पहले कोई भजन सुना। कल से कोतवाल साहब की गायिका इस भवितिन के स्वर ने मेरें राममोह में एक दिव्य मादकता सी भर दी है। तेरा स्वर उस तरल मद को मेरे लिए प्रगाढ़ कर देता है।गा भाइया, गा। अभी वातावरण शांत है। भीड़ नही हुई है। मेरी आत्म- चेतना के कभी-कभी उठ आनेवाले झोंकों को सुलाने के लिए तू अपने स्वर और भाव से उसे कवचमंडित कर दे भैया, फिर इस देवी से सुनूँगा। एक जगह पर इसका स्वर इसके अनुपम रूप से अधिक सच्चा है।”
अब पहली बार तुलसी और मोहिनी की आँखें मिलीं। चारों आँखे एक-दूसरे की प्रशंसा में निछावर हुई जातीं थीं। मोहिनीबाई ने हँसकर कहा- “आपका स्वर तो अगम सरोवर का कमल है, पंडित जी, कल से मेरे कानों में भी अब तक गूँज रहा है।” 
तुलसी लजा गये, बैठते हुए बोले -“आप जैसी शास्त्र-निपुण कुशल गायिका के आगे भला मेरी हस्ती ही क्या हैं। एक भिखारिन की गोद में पला, उसने जो भजन सिखा दिए वही जानता हूँ । फिर थोड़ा स्वर का अभ्यास पूज्यपाद गोलोक वासी नरहरि बाबा ने करा दिया था।” यह कहकर तुलसी अपनी गुनगुनाहट में रम गये। आँखें मुँदने लगीं और नरहरि बाबा द्वारा गाया जानेवाला संत जी का एक भजन वे अपने घ्यान में स्व० नरहरि बाबा की छवि लाकर गाने लगे-
“प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी। जाकी अँग-अँग बास समानी।”
यह तुलसीदास नही गा रहे थे, उनके ध्यान में बैठा हुआ उनका जीवनदाता गा रहा था। इस समय तुलसी का स्वर गोलोकवासी गुरु के भाव और स्वर का वाहक मात्र था। मेघा भगत आत्मविभोर हो गए। उनकी बंद आँखों से अश्रु झर रहे थे। बीच-बीच मे उनके होंठ कुछ बुदबुदाहट भरी फड़कन से भी भर जाते थे। बाकी सारी काया निश्चेष्ट थी।
मोहिनीबाई की काया उसके अन्तर-उल्लास की प्रतिमूर्ति बन गई थी।उसकी चमकती हुई आँखें जैसे अपने से मिल कर तुलसी में समा गई थीं। कल  
जैसे तुलसी मोहिनी के स्वर से आत्मविभोर होकर उसके साथ गा उठे थे वैसे ही मोहिनीवाई भी आज स्वतःस्फूर्त होकर तुलसी के स्वर मे स्वर मिलाकर गा उठी- “प्रभुजी तुम मोती हम धागा”
तब तक कुछ और लोग भी आ गए। मेघा भगत आज संगीत सुनने की मौज में थे, इसलिए मोहिनीबाई ने संगीत का समा बांध दिया। उसकी आँखों का यह भाव तुलसी के मन मे स्पष्ट था कि वह केवल उनके लिए ही गा रही है। तुलसी आनन्दमग्न थे। स्वयं भी जयदेव रचित एक गीत गाया। उस दिन भक्तों में मोहिनीबाई सरीखी सरनाम गायिका से टक्कर लेनेवाले नये पुरुष-स्वर की धूम मच गई। सभी कोई कहे, 'वाह तुलसीदास जी, वाह तुलसीदास जी।'
मोहिनीबाई की सयानी माँ ने शीघ्र ही उठने का अंदाज साधा।तीसरे दिन मेघा भगत के यहाँ मोहिनीबाई और शेष महाराज के एक शिष्य के भक्ति संगीत होने की चमत्कारी प्रशंसाएँ सुनकर जन समुदाय अपने लिए एक नया आकर्षण पाकर, अधिक सँख्या में आया।इस तरह आते-जाते लगभग छ: दिन बीत गए । तुलसी के लिए मेघा भगत का स्थान दोहरा आकर्षण बन गया था। तुलसी को अब यह भी स्पष्ट हो गया था कि दोनों में मोहिनी के प्रति ही उनका आकर्षण अधिक तीव्र है। 

आज जब पहुँचे तो भक्तवर नें उन्हें बड़े प्रेम से देखा, लेकिन तुलसी की आखें उन्हें न देखकर कुछ और देखना चाहती थी।भक्तराज की प्रशंसक मंडली में बहुत से लोग बैठें थे पर वह न थी जिसे देखने की लालसा उन्हें यहाँ ले आई थी। मेघा भगत मुग्धभाव से तुलसी को ही देख रहे थे। उनका इस प्रकार देखना तुलसी के मन में संकोच भर रहा था। उनका मन कचोट रहा था कि वह ऐसे सात्विक भक्‍त को धोखा दे रहें हैं। पहले जिस उत्सुकता को लेकर वे यहाँ पर मेघा भगत के दर्शनार्थ आए थे वह उत्सुकता अब उनके प्रति कम होकर किसी और के प्रति थी। बीच-बीच में चौंककर चोरी से द्वार की ओर ताक लेते थे, मानों उन्होंने मोहिनी आवन की , आवाज सुन ली हो।
मेघा पूछ रहे थे- “वाल्मीकीय  रामायण पढ़ी है तुलसी?”
“हाँ महाराज, मेरा रसस्रोत उसी से फूटा है।”
“घन्य हो, मेरी दृष्टि मे रामायण से बढ़कर और कोई काव्य नही, महाकवि इतने महान‌ थे कि अन्य कोई भी कवि मुझे उनके आगे ऊँचा पूरा ही नहीं लगता।”
“आप ठीक कहते है महाराज।”
“मेरी इच्छा होती है कि वाल्मीकि जी की रामायण का पाठ हो। तुम पाठ करो, में सुनूँ।”
“इसके लिए मुझे गुरू जी से आज्ञा लेनी होगी महाराज।”
“ओह, अभी कितने वर्ष और पढ़ोगे?”
“राम जाने महाराज, वैसे तो अब गुरू जी की पाठशाला में पढ़ाता हूँ । वही मुझ अनाथ के पिता भी हैं।”
“आखिर कब तक तुम वहीं रहोगे?”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “जब तक राम रखेंगे।”
“तुम मेरे साथ रहो। हम दोनो भाई राम और भरत के समान रह लेंगे। क्या तुम विश्वास मानोंगे तुलसी कि इतने ही दिनों के संग में तुम अब दिन रात मेरे और मेरे राम के साथ ही रहने लगे हो। कल सपने मे भी प्रभु ने मुझसे यही कहा कि मेघा, मेरी इस घरोहर को तुम वहुत सहेजकर रखना। क्या जाने तुम में ऐसा क्या है जो मेरे राम तुम्हारे प्रति इतने रीझ गए हैं। देखो तो सही, तुम्हारी आँखों में कैसी अलौकिक मोहनी छिपी है।”
मेघा भगत अपने बावले उत्साह में तुलसी की बाँहें अपने हाथों से थामकर उनकी आँखो में आँखें डालकर देखने लगे। तुलसी संकोच से जड़ीभूत हो गए। सारी भक्त मंडली उधर ही देख रही थी और तुलसी की आँखों में सूरज चमक उठा। द्वार पर वह खड़ी थी जिसे देखने के लिए प्राण तड़प रहे थे।ऐसा लगा कि मानों कमरे में प्रकाश ही प्रकाश भर उठा हो। लगा कि वह मुक्त प्रकृति के वातावरण में पहुँच गए हैं जहाँ सैकड़ौ फूल अपने रंग लुटाते हुए आन्नद के झोंकों से झूम रहे हैं। बेसुधी को मन की चतुराई ने झँकझोर कर चेताया- 'सावधन, ध्यान कर कि तू किसके दर बार मे बैठा है।'
चोर चोरी से तो गया, पर हेराफेरी से भला क्यों कर हठे।
क्रमशः

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