Wednesday, 26 April 2023

tc 49

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
49-

मोहिनी और उसकी माता ने मेघा भगत के चरणों में झुककर प्रणाम किया। माँ ने दासी को संकेत किया।सीक की बुनी हुई रंगीन डोलची में सुन्दर गूँथी हुई फूल-माला के साथ रखे फल लेकर वह चट से सामने आ गई। माँ ने उसके हाथों से डोलची ली और भक्तराज के चरणों मे उसे रखकर फिर सिर झुकाकर प्रणाम किया।बच्चे के समान भोले आनंद से वह माला अपने हाथ में उठाकर मेघा भगत देखने लगे। मुग्ध स्वर में बोले- “वाह कैसी सुन्दर है यह माला। तूनें गूँथी है बहन?” उन्होनें मोहिनी की ओर देखकर पूछा।
मोहिनी ने लजाकर अपनी आँखें झुका लीं। माँ बोली- “कल आपके दरबार में गाकर मानों इसके भाग्य की रेखाएं ही बदल गई महाराज। कल शाम ही जौनपुर के राजा साहब के यहाँ से साई मिली। आपके आशिर्वाद से बड़े राज दरबार का यह पहला बुलावा मिला है।”

मेघा भगत का घ्यान प्रौढ़ा की बातों पर नही, माला की सुन्दरता पर था। फूलों में राम ही राम झलक रहे थे। कुछ देर बाद अपने आप ही कहने लगे- “बहन, तेरा यह श्रम और कला मुझसे अधिक तुलसी के लिए है। इसे पहना दूँ ?” स्वीकृति के लिए मेघा रुके नहीं , वह माला तुलसी के गले मे डाल दी। आनंद और संकोच से भरे हुये रामबोला की आँखें एक बार झुकीं फिर बरबस उठकर मोहिनी की आँखों से जा अटकीं। वह बड़े चाव से इन्हीं की ओर देख रही थी। 
आज फिर गाना हुआ। मोहिनी ने गाया, तुलसी ने गाया और फिर मेघा भगत भी आनन्दमग्न होकर गाने लगे-

“आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णा तरंगाकुला। 
राग्रग्राहवती वित्क विहगा घीर्य द्रमध्वंसिनी।
मोहावते सुदुस्तरातिगहना प्रोत्तुण चिस्तालसी। 
तस्याः पारगता विशुद्ध मनसा नन्दन्ति योगेश्वरा।”

मेघा भगत के द्वारा गाया गया श्लोक तुलसी के अबीर गुलाल भरे बसंती मन पर पानी सा पड़ा । रंग उजड़ गए,कीचड़ हो गई। मेघा भगत से दृष्टि मिलाने में भय लगता था। मोहिनी के सुख कमल पर पुतलियों के भौरे जा चिपकने के लिए मचलते तो बहुत थे पर इस श्लोक ने सब कीचड़ कर दिया था। सिर भुकाए हुए युवा तुलसी अपने ही में मन मारे बैठे अपने पश्चात्ताप और सत्या- चरण के मतवाले मुर्गे लड़ाते रहे। मन नीचे से ऊपर की ओर खौल रहा था, ज्यों चूल्हे की आग पर चढ़ा पतीली का पानी खौलता है।
मेघा भगत से फिर क्रमशः अपनी भाव वाचालता में आना आरंभ कर दिया। अपनी कल्पना स्वयं अपने ही को सुनाने में तन्मय होकर यों सीता के खो जाने के बाद श्रीराम के विरह-प्रसँग को लेकर वे अपने जी का दुखड़ा बाँधने लगे-“कुटिया सूनी है। राम का मन भी कुटी की तरह ही सूना हो गया है।भीतर बाहर के यह सूनेपन एक जैसे ही भयावह हैं। कहाँ गई सीता महारानी? क्या हो गया उनकों?”- राम के भय आँसू और विरह की बेसुधी से भरे हुए प्रलापों का वर्णन मेघा भगत की वाणी में चलने लगा।बीच बीच में प्रसँग से सम्बन्धित वाल्मीकि के श्लोक भी गाने लगते थे। विरहरूपी रामकीर्तन बढ़ रहा ह।
“श्रीराम जैसा कर्मयोगी केवल आँसू बहाता तो बैठ नही सकता। विरह भी उनके लिए शक्ति और कर्मंदायक ही बनता है।वे सीता महारानी को खोज कर ही रहेगें।उनकी बुद्धि उन्हें यह निश्चय भी कराती है कि शूपर्णखाँ के अपमान और उसके पति की हत्या का बदला लेने के लिए ही किसी ने उनकी प्रिया को हर लिया है। विचारों की इन्हीं उथल-पुथल में उन्हें जटायुराज मित्रते हैं जो सीता को हर ले जानेवाले रावण से लड़े थे....” 
आरंभ में तुलसी अपने भीतर के दु.ख से सने हुए अनमने बैठे रहे, फिर क्रमशः मेघा भगत के शब्द चित्र उनकें कानों में गूजँने लगे। कल्पना के पट पर मनोपीड़ा अपने चित्र झाँकने लगी। कभी मेघा भगत के शब्द के सहारे हबहू उन्हीं के मन की तरह से छटपटाते हुए श्री राम झलकते और कभी जंगले के आरपार अपने और मोहिनी के बिम्ब। राम और तुलसी मन नें पूछा, कौन रहे?मन ने ही अपने कठिन मोह जाल को भेदकर सत्य को स्वीकारा और फिर कुछ पल पश्चात्ताप में गूँगा हो गया। आँखें बरसने लगीं मोहिनी की ओर दृष्टि गई।यह टप-टप आँसू टपकाता हुआ गोरा, सुन्दर, कुवाँरा चेहरा मोहिनी की आाखों में अटक गया।जो क्षण मेघा भगत के लिए श्रीराम की विरह ज्वाला में और रामबोला के अपने पहले-पहले विरह ज्वाल में जलने का था, वही क्षण मोहिनी के मन मिलन का भी था।आयु में मोहिनी तुलसी से लगभग दो-चार वर्ष बड़ी ही थी और मन से अभी तक कवाँरी भी।उसका तन काशी के कोतवाल का जुठारा हुआ था। चिरअतृप्तिदायक बूढ़े हाकिम की गुलामी की घुटी-घुटी दारूणता और भक्ति- भावना में बह मेघा भगत का माहात्म्य सुनकर उनके दर्शन करने आती थी। सहज प्यास में तुलसी जैसे सुन्दर जवान का रूप-कूप अचानक मिल गया-'हाय, कितना प्यारा, कितना सुहाना चेहरा है । ये सपन भरी बड़ी बड़ी काली पुतलियों वाली आम की फाँकों जैसी आँखें ये लम्बी सुतवा नाक, ठोड़ी, रोएदार जवानी भरा भोला-भोला सुहाना मुखड़ा, ये कूसरती बदन।हाय, जो कहीं इसे वह खाना नसीब हो जो हमारे बुढऊ सैंया को खाने और फेंकने के लिए रोज मिलता है तो चार ही दिन में ये गवरू जवान हुस्न के मैदान में रुस्तम की तरह झूमने लगे। हाय, गाता भी खूब है।’

मेघा भगत के वर्णन में विरही राम श्रौर सेवक हनुमान की भेट हो चुकी है। तुलसी के आँसू सूख चुके हैं। झुका सिर उठकर मेघा भगत को एकटक निहारने लगा है। मेघा के चेहरे का आधार उनकी कल्पना को रामविम्ब में रहने के लिए आत्मबल देकर साधता है। इस समय जैसे मेघा भगत के मन में , वैसे ही तुलसी के मन में भी हनुमान हाथ जोड़े हुए वीरासन पर विराजमान हैं। उनके पास ही पीपल तले बने अनगढ पत्थरों और मिट्टी के चबूतरे पर शोक चिन्ता मग्न श्री राम विराजमान हैं। बाँई ओर चबूतरें से सटकर वीर लखनलाल क्रोध और चिन्ता से भरे हुए खड़े हैं और मेघा भगत के हनुमान जी कह रहे है, तुलसी के हनुमान जी सुन रहे है- “नाथ, आपके चरणों की कृपा से एक रावण तो क्या में सौ रावणों से एक साथ जूझकर जगज्जननी को छुड़ा लाऊँगा।”
क्रमशः

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