महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
50-
आश्वासन पाकर मेघा के राम की आँखें आनन्द से छलछला उठती है- “मेरी प्रिया अब मुझे अवश्य मिल जाएगी। हनुमान के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।”
तुलसी के मनोबिम्ब में अपने लाड़ले वीर हनुमान के पीछे तुलसी भी हाथ जोड़ अर्जी लगाए बैठ गए हैं।वह कहना ही चाहते हैं कि हनुमान जी, मेरा भी विरह ताप हरो।पर सहसा हिचक जाते हैं। मनोबिम्ब में तुलसी चोर-से हनुमान के पीछे से गायब हो जातें हैं और उनके गायब होते ही सारा मनोबिम्ब, अंधेरे मे डूब जाता है, मन सूना हो जाता है। उधर मेघ की वाणी में श्रीराम सहारा पाकर अपनी प्रिया के शोक भरे चिन्तन में डूब जाते हैं- “न जाने कैसे होगी, कहाँ होगी मेरी प्राणवल्लभा जानकी जिसे मैंने अपनी पलकों की सेज पर सदा सुलाया, सहलाया, जिसकी एक दृष्टि में ही मुझे अनन्त ब्रह्माण्डों का साम्रीप्य प्राप्त हो जाता था, उस प्रिया की हँसती
हुई आँखें इस समय दुःखों का अपार सागर बनकर कहाँ लहरा रही होंगी? प्रिये, प्राणवल्ल्भे, मैं कैसे तुम्हारा दु.ख हरूँ? कैसे तुम्हें झटपट अपने अंक मे भरकर तुम्हारा और अपना दुर्भाग्य मोचन करूँ? सिया सुकुमारी, तुम्हारे बिना यह राम जंगल के ठूँठ की तरह जल रहा है। तुम कब वर्षामंगल मनाने आओगी?”
मोहिनी का मनभावना मुखड़ा फिर आँसू टपका रहा है। हाय, कितना भावुक
है यह जवान ! ऐसा सलोना मर्द रो रहा है, हाय जी चाहता है, यहाँ अकेलापन हो जाय और मै इसे लिपटाकर चूम लूँ।
मेघा भगत का राम-विरह वर्णन पूर्ण हो चुका था। आँखें बन्द किए आँसू बहाते हुए वे होंठों ही होठो में बुदबुदा रहे थे। उनका मुख अपार शोकमग्न होकर और भी अधिक तेजस्वी हो उठा था।
सहसा तुलसी ने धरती पर साष्टांग
लेटकर भगत जी को प्रणाम किया और उठकर चल पड़े। मोहिनी की प्यासी आँखें अपने पानी के पीछे पीछे तड़पकर भागी। तुलसी दरवाजे तक पहुँच गए थे। मोहिनी ने अपना सबसे तीव्र शक्ति शाली तीर चलाया। तड़पकर संत रैदास का भजन गाने लगी -
“अब कैसे छूटै राम, नाम रट लागी,नाम रट लागी।
प्रभुजी तुम चदंन हम पानी।
जाकी अंग अँग बास समानी॥
प्रभूजी तुम घन हम बनमोरा।
मुँह जैसे चितवत चन्द चकोरा॥
अब कैसे छूटे राम नाम रट-लागी।”
मोहिनी के स्वर ने तुलसी के पावँ बाँध दिए। वह वहीं के वहीं खड़े हो गए, गाते हुए मोहिनी के मुखड़े पर हँसी खिल उठी। सभा की चतुर आँखें मेघा भगत के चेहरे से लेकर भीड़ में जिस-तिस की आँखों की ढइया छूती हुई अपने मनभावन की आँखों से जा टकरातीं थीं और उन टकराहटों से राम का तुलती मोहिनी का तुलसी बना जा रहा था-“छि:, कोई देख लेगा। क्या कहेगा? भागो।” और तुलसी तेजी से बाहर निकेल गए। गलियाँ पार करते जाते है । अपने घर भी पहुँच जाते हैं। दोस्तों की जिस तिस बातों का जवाब देने के लिए मजबूर होतें हैं। नदंदास अपनी किसी दाशर्निक गुत्थी को लेकर आ गया, वह भी सुलझानी पड़ी। उसके जाने के बाद किताब खोलकर पढ़ने का प्रयत्न किया, मगर सब कुछ करते-धरते हुए भी तुलसी के कानों में अपने मन बसी मोहिनी की आवाज़ ही सुनाई पडती जा रही है---'अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी।” और यह नाम राम नही, मोहिनी है 'मोहिनी ! मोहिनी !! मोहिनी !!! अब कैसे छूटे राम....”
शाम को गुरु-पत्नी ने कहा-“जान पड़ता है, यह भी एक दिन मेघा जैसा ही राम बावला हो जायगा।”
रात में अपनी कोठरी में आने से पहले नित्य नियम के अनुसार मामा जी के लिए जब वह दूध का गिलास लेकर पहुँचा तो वे बोले- “अबे, अभी से ज्यादा भगतवाजी के फेर में न पड़। मेघा के यहाँ जाना छोड़। सरयू मिश्र की लड़की पर तेरे लिए मैं आखँ गड़ाए बैठा हूँ बे। इकलौती लड़की है, देखने में भी तेरे ही जैसी गोरी-चिकनी है।अबे बीस-पच्चीस हजार से कम की माया नहीं होगी सरयू की विधवा के पास। यहाँ से जाने पर सीधा अपने ही घर घरनी और हजारों की सपंदा का मालिक बनकर बैठ जायगा। काशी के पंडितों में पुज जायगा। पहले दस-पाँच चेले और दस पाँच बाल-बच्चे तो पैदा कर ले रे, फिर भगतबाजी करना।”
भागँ के नशे में तुलसी के प्रति अपनी चिन्तनाओं का प्रसार करते हुए मामा जी जरा गहरे रस के बहाव में भी आए, कहने लगे- “अबे, जवानी में मर्द को औरत की छाती में ही शरण मिलती है । राम की शरण तो बुढ़ापे में ही खोजनी चाहिए। अभी तूने दुनिया देखी ही कहाँ है बेटा।”
तुलसी के लिए यह सारी बातें दोहरी मार थी। ऊपर अपनी कोठरी में जब वह अकेले बैठे तो मुक्त निरालेपन में अपनी ओर प्यार भरी दृष्टि से ताकती हुई मोहिनी पल भर के लिए मांसल होकर उनकी आँखों के सामने उभर आई। मन की बाँछें खिल गईं- “मोहिनी, तुम चंदन हम पानी.... नही राम ...नही, यह धोखा है। मैं जग को धोखा दे रहा हूँ । लोग समझें हैं कि यह मेरा राम-विरह है। मुझे ऐसा ढोंग भी नहीं करना चाहिए।”
परतु मन के भीतर वाला अतृप्त कामी तुलसी विद्रोह करता है। कहता है कि मोहिनी मुझे चाहती है।नगर की सर्वश्रेष्ठ गायिका, हाकिम के ऊपर भी राज करनेवाली सलोनी प्रियतमा मुझे चाहती है। तब मैं क्यों न उसे चाहूँ, प्रेम का प्रतिदान देना क्या पाप है? विवेकी तुलसी समझाता है, 'वह कोतवाल की चहेती है। उससे आँख लड़ाओगे तो कोड़े बरसेगे कोड़े। दुनिया तब तेरे मुँह पर थूकेगी। तेरी यह सारी धोखा-धड़ी लोक उजागर हो जायगी।” सुनकर विरही तुलसी का विद्रोह ठिठक गया। लोहे की मोटी साँकल में फँसे हुए पैर वाला जगंली गजराज बरगद के मोटे तने से बँधी अपनी ज़ंजीर को तोड़ने के लिए रात भर मचलता रहा- “अब कल से वहाँ नहीं जाऊँगा, नहीं जाऊँगा, नही जाऊँगा।
लेकिन दूसरा दिन आया, समय हुआ तो तुलसी के पैर अपने आप ही मेघा भगत के घर की ओर भागने लगे। जब सड़क पार कर वे गली की ओर मुड़ने लगे तो रथ से उतरकर मोहिनी अपनी एक दासी के साथ गली की ओर बढ़ रही थी। मोहिनी ने तुलसी को देखा तो खिल उठी।
क्रमशः
No comments:
Post a Comment