महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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उस दिन नगर में कुछ मुगल सिपाहियों ने दर्शनार्थ जाती हुई कुछ स्त्रियों को देखकर छेड़छाड़ भरे गन्दे शब्द कहे थे। एक अहिर युवक सिपाहियों की इस अभद्रता को सहन न कर सका। उसने अपनी लाठी तानकर उन्हें चुनौती दी।गली में आते-जाते कुछ भद्र पुरुष आगे बढ़कर समझावन-बुझावन करने लगे। उन्होनें मुगलों से क्षमा माँगी और अहिर युवक को डाँट -डपटकर भगा दिया।एक व्यक्ति ने भेघा भगत के सामने इस प्रसँग की चर्चा की। इस पर कई लोग कलिकाल का रोना रोने लगे।मेघा भगत ने इसी प्रसँग को लेकर राम के शौर्य को बखानना आरम्भ कर दिया। राम अनाचार को कदापि सहन नहीं कर सकते। उन्होंने ऋक्ष, वानर जैसी अर्ध सम्य जातियों का सहयोग लेकर प्रचण्ड प्रतापी अनाचारी रावण को दण्ड दिया था। मेघा भगत के प्रवचन में आज करुणा नही वरन ओज बरसा। उन्होंने राम-रावण के युद्ध का ऐसा चमत्कारिक वर्णन किया कि कमरे में बैठे हुए हर व्यक्ति को उनकें शब्दों की सम्मोहिनी शक्ति ने बाँध दिया। हर दृष्टि मेघा भगत के मुख पर मानों टिक गई थी। केवल तुलसी की टकटकी मोहिनी के मोहक मुखड़े से ही बंधी रही। मोहिनी चतुर खिलाड़िन थी, बीच-बीच में उसकी दृष्टि घूमकर तुलसी को देखने लगती। मोहिनी की माँ भी अपनी बेटी के इस खेल से अनभिज्ञ न रह सकी। उससे अपनी बेटी के घुटने को दबाकर उसे बरज दिया और मोह मुग्घ तुलसी की दृष्टि को अपनी आँखों की कठोर मुद्रा से डाँटा। मन के रंगीन आकाश में स्वच्छन्द उड़ानें भरते हुए नवयुवक तुलसी की आँखों के आगे सहसा अंधेरा छा गया। ऐसा लगा मानों सतखंडी हवेली की छत पर खड़े होकर पतंग उड़ाने वाला बच्चा अचानक ही नीचे गली में आ गिरा हो।तुलसी आत्मग्लानि से भर उठे, उनका सिर फिर ऐसा झुका कि मानों उनके गले में किसी ने भारी बोझ लटका दिया हो- “मेरा पाप पकड़ा गया।अब वह अवश्य ही गुरू जी के पास जाकर मेरा अपराध बखानेगी। कैसा गहरा धक्का लगेगा गुरूजी को। विद्यार्थी समुदाय मेरी खिल्ली-उड़ाएगा। मैंने यह क्या किया राम।मुझसे ऐसा अपराध क्यों हुआ? पर- नारी को क्यों ताका? पर मोहिनी पराई कहाँ, वह तो मेरी है। छि, अपने को छलते हो, रामबोला? उसका स्वामी कोतवाल है। देख पाए तो तेरी बोटी बोटी कटवाकर कुत्तों के आगे फेंक देगा। तेरे कारण मोहिनी की भी यही दुर्दशा होगी।” इस विचार मात्र से तुलसी का मन थरथरा उठा।बेबसी में तुलसी के अरमान घुटने लग। साँस लेना पहाड़ ढकेलने के बराबर हो गया।
मेघा भगत बोलते-बोलते सहसा मौन हो गए थे।मोहिनी ने दबी कनखी से तुलसी को देखा, पीड़ा के समुद्र में तल पर बैठा हुआ मोती सा वह प्रिय भला मोहिनी से क्योंकर देखा जा सकता था। न किसी ने कहा, न सुना, पर मोहिनी अपनी तड़प से आप ही आप गाने के लिए मचल उठी-
“हरि तुम हरो जन की पीर। द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढ़ाए चीर॥”
मोहिनी के स्वर मे ऐसी टीस थी कि किसीका भी मन उससे अछूता न बच सका। तुलसी शब्दों से अधिक स्वर से बँधे थे। तुलसी से फिर वहाँ बैठा न जा सका। गायन समाप्त भी नही हुआ था सारे शिष्टाचार भुलाकर वह सहसा उठ कर बाहर चले आए। उन्हें ऐसा लगा कि उनके बाहर आने से गाने वाली का स्वर लड़खड़ा गया है। उन्हें लगा कि वह स्वर उन्हें पुकार- पुकार कर कह रहा है, मत जाओ, लेकिन पश्चात्ताप का आवेश इतना प्रबल था कि तुलसी के पैर तेजी से आगे बढ़ते ही रहे। वह घर, वह गली, दो-तीन और गलियां भी पार हो गईं।घर आया। मामा जी ड्योढ़ी भीतर वाली अपनी कोठरी में चौकी पर बैठे हुए किसी दासी पर गरमा रहे थे। आँगन के चारों ओर बने दालानों में विद्यार्थीगण पाठमग्न थे। तुलसी इस समय न किसी को देखता चाहते हैं और न किसीसे बोलना ही चाहते हैं। सबकी नजरें कतरा कर वह सीधे तिमंज़िले की सीढ़ियों पर चढ़ गए। अपनी कोठरी में पहुँच कर उन्होंने भीतर से किवाड़ बंद कर लिए और घम्म से अपनी बिछावन पर बैठ गए। मोहिनी का स्वर उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था- 'हरि तुम हरो जन की पीर।”
भोजन का समय हुआ पर तुलसी भोजनशाला में न पहुँचें। मामा जी ने दासी की लड़की बेला को उन्हें बुलाने के लिए भेजा। कोठरी के बाहर एक महीन-मीठी आवाज सुनाई दी- “भैया, मामा बुलाय रहें हैं।”
तुलसी के कानों में शब्द तो पहुचें ही नही और स्वर भी दासी-पुत्री का होकर न पहुँच सका। उन्हें लगा कि द्वारे खड़ी हुई मोहिनी पुकार रही है। नहीं नहीं , यह छलावा है। उठ, देख कौन आया है। तुलसी बड़ी कठिनाई से उठे। इस समय उनके मन पर एक सुन्दर कोमल फूल का इतना भारी बोझ लदा था कि तन उठ ही न पाता था। बाहर से बेला की आवाज पर आवाज चली आ रही थी, “भैया ! भैया ! भैया !”
तुलसी उठे, द्वारे का बेड़ना हटाया और एक कपाट खोलकर बेला से कहा-“कह दे बेला कि आज हम भोजन नहीं करेगें।
“काहे भैया?”
“हमारा सिर पिरा रहा है बेला। इस बेरिया न खाऊँगा तो तबियत ठीक हो जाएगी। जा कह दे।
तीसरे पहर गुरू जी ने एक विद्यार्थी को भेजकर तुलसी के हालचाल पुछवाए। अपने होश मे पहली बार तुलसी ने झूठ बोला। उन्होंने असह्य शिरो पीड़ा का नाटक साधा। गुरू जी से झूठ बोलने की ग्लानि मन पर अवश्य चढ़ी किंतु इस समय तुलसी अपने गुरू जी का सामना नहीं कर सकते थे। पाप और पुण्य की ऐसी गहरी खींच -तान उनके मन में चल रही थी कि वह उस समय आचार्य जी से दृष्टि मिलाने का साहस कर ही नहीं सकते।
दूसरे दिन तुलसी अपने मन की छटपटाहट को हठपूर्वक बरज कर मेघा भगत के यहाँ नहीं गए। उन्होंने सारे दिन अपने-आपको अध्ययन में व्यस्त रखने का प्रयत्न किया पर अनमने ही बने रहे। नन्ददास, गंगाराम आदि निकटतम मित्रों ने दो एक बार पूछा भी परन्तु उन्होंने कोई उत्तर न दिया। उनके उतरे हुए चेहरे को देखकर मामा जी बोले -“जान पड़ता है, मेघा के छुतहे रोग ने हमारे रामबोला को भी ग्रस लिया है। अबे, फिर कहता हूँ , इस भगतबाजी की चकल्लस में मत पड़।
क्रमशः
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