Saturday, 29 April 2023

tc 52

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
52-

यों कहने- सुनने की बात और है पर व्यवहार की दृष्टि से देखा जाय तो भगवान की भक्ति और परनारी प्रेम में पड़कर मनुष्य की एक ही सी दशा होती है, वह निकम्मा हो जाता है।” नंददास सुनकर हंस पड़ा, बोला-“धृष्टता क्षमा करें मामा, जान पड़ता है आपने कभी न कभी परनारी से अवश्य ही प्रेम किया होगा, अन्यथा ऐसे गहरे भेद की बात भला आप क्यों कर बतला सकते थे।”
मामा हँसने लगे, कहा-“अबे गावँ नहीं गया पर कोस तो गिनें हैं। बताए देता हूँ बेटों, यदि दुनिया में सफल होकर रहना चाहते हो तो इन दो बातों पर कभी गंभीरता पूर्वक अमल न करना।”

तीसरे दिन तुलसी ने अपने मन को बहुत-बहुत बरजा किन्तु उनके पैर अपने आप ही मेघा, भगत के निवास की ओर बढ़ गए। उस दिन आँखे बार-बार द्वार की ओर दौड़ती रहीं पर मोहिनी न आई। लोगों के आग्रह से उन्होंने मीरा और कबीर के भजन भी गाए पर आज उन्हें गायन में सुख न मिला। तुलसी के कंठ में विरह पीड़ा व्याल-सी लिपटी थी। भक्त मंडली सुनकर आत्मविभोर हो गई परन्तु मेघा भगत ने स्वगत भाव से केवल इतना ही कहा- “हे राम, नारी के विरह में जैसी टीस कामी के कलेजे में उठती है वैसी ही मेरे कलेजे में भी अपने लिए भर दो।” तुलसी को लगा कि भगत जी ने उसके मन का पाप पहचान लिया है। इससे मन में अपार लज्जा और असहाय ग्लानि का बोघ हुआ- “कहाँ जा रहा है रे रामबोला, हीरा छोडकर काचँ की चमक ने लुभाया है?” सोचकर आखें भर आईं। कल्पना में विराजी सीताराम की छवि ऐसे हिल रही थी जैसे पानी मे परछाईं, और उस परछाई के तल में एक अस्पष्ट प्रतिबिम्ब था जो तुलसी की भावना के अनुसार भय से कांप रहा था।“छल है। छल है। चेत रे मन, चल । इस नगरी में तुझे वह वस्तु नहीं मिलेगी जिसे तू चाहता है।प्रेम किए जा रे दीवाने।प्रेम तो अपने आप में ही एक अनुभव है रे।वह देना जानता है और लेने की कल्पना तक नही करता। प्रेम ऐसी मूसलाधार बरसात है जिसमें बरसात का पानी दिखलाई तक नही पड़ता पर घरती तर हो जाती है, सूर्य का ताप अग्नि की लपटों-सा लगता अवश्य है पर वह जलन शीतल है, उर्वेरा है। चल रे मेघ, कहीं और बरस।इस नगरी में सबके मन पत्थर-हैं। वह भले ही मणि-माणिक से चमकते हो पर पत्थरों पर तेरे बरसने से क्या भला कुछ उपज सकेगा ? नहीं नहीं, राम, अब लोकेपणा में नही फँसूँगा।”
मेघा भगत अपने आप से बतियाते हुए आँखें मूँदें बैठे थे। उनके भक्‍तों के लिए उनकी यह बातें एक ऐसा ही रहस्य मात्र थी जिसे भेदकर मर्म पहचानने की विशेष लालसा किसी भी लोकव्योहारी पुरुष में नहीं होती। 
तुलसी के मन में ग्लानि का अथाह‌ सागर फैला हुआ था- “नही, मैं नही फंसा।मेरा मन अब भी राम चरण लीन है। मैं यह कभी नहीं सह पाऊँगा कि लोग-बाग मुझ पर अँगुली उठाकर कहे कि यह किसी अन्य का दास है। यह ग्लानि, यह पश्चात्ताप मैं कदापि नही सह पाऊँगा। हे राम, मुझे इस पाप पंक में पड़ने से बचाओ। राम, मैं तुम्हारा हूँ और किसी का नही।छिटक, छिटक कर कहाँ जा रहा है रे मन? भाग, भाग।”
तुलसी सचमुच भाग खड़े हुए। वह्‌ वातावरण उन्हें काट रहा था। गली के मोहाने पर एक युवक ने बड़े आदर से उन्हें प्रणाम किया किन्तु तुलसी ने ध्यान न दिया। युवक ने उनके कंधे को छूकर उनका ध्यान आकर्षित किया और कहा-“आज आप बड़ी जल्दी चल दिए।”  इस युवक को तुलसी ने मेघा भगत के यहाँ कई बार देखा है किन्तु परिचय नहीं था। एक अपरिचित-परिचित के टोकने से तुलसी ने सहसा कड़े संयम से मन की लगाम साधी, यथाशक्ति प्रसन्‍न मुख बनाकर कहा -“मुझे, एक काम है।” “आपने जब से वटेश्वर के भूतों को मिथ्या सिद्ध कर दिया तभी से मैं आपसे मिलना चाहता था। भगत जी के यहाँ अब आपकी उच्चकोटि की भावुकता से भी प्रभावित हुआ हूँ । कई दिनों से सोच रहा था कि आपसे बोलें करूं। पर वहाँ तो रस ऐसा गाढ़ा बरसता है कि मन मे उठनेवाली और बहुत-सी बाते बिसर- बिसर जातीं हैं।”
ध्यान साधते साधते भी उड़-उड़ जाता था, कुछ सुना, कुछ न सुना। चेहरे पर रूखी यांत्रिक मुस्कान आई, हाथ जोड़े, कहा-“अच्छा तो चलूँ।”
उड़ी -उड़ी आँखें , खोया-खोया चेहरा देखकर युवक अचानक मुस्कुराकरा उठा।उसकी मुस्कराहट तुलसी को और भी घुटन दे गई। यह सारी दुनिया तुलसी को एक पिंजरे जैसी घुटन-भरी लग रही थी। उन्हें ऐसा लगता जैसे गलियों में आता-जाता हुआ हर व्यक्ति पिंजरे में बन्द तुलसी रूपी केहरी को निन्‍दा भरी, नोकीले भालों-सी दृष्टि से देख रहा हो। गलियों में व्यापा जगत कलरव अपने मन के भीतर उन्हें पश्चात्ताप और निन्दा-भरे शोर-सा लग रहा था- 'मुझे जीवित नहीं रहना चाहिए।मुझे मर जाना चाहिए। डूब मर रामबोला, डूब मर।”मन अपनी ही प्रताड़ना से बिलख पड़ा।
गलियों में लोग देख रहे थे कि एक सुन्दर युवक अपने आप से रोता-बड़बड़ाता चला जा रहा है। वह अपने आपे में नहीं है। राह चलते मनुष्यों से टकरा जाता है। कोई झिड़कता है, कोई समझाकर कहता है कि देख के चलो, बचकर चलो।

“अरे, तुलसी, इधर कहाँ जा रहे हो?"
गंगाराम का स्वर मानों तुलसी तक पहुँच न सका।जो गली गुरू जी के घर जाती थी उसे छोड़कर वह सामने गंगा जी की ओर जानेवाली गली की दिशा में बढ़ रहे थे। जब गंगाराम ने अपनी बात तुलसी के कानों में पड़ती न देखी तो उनका ध्यान भंग करने के लिए तेजी से आगे बढ़कर उनका रास्ता रोक लिया। गति में बाधा पड़ने से तुलसी की बहकी आँखें सध कर ऊपर उठीं।
“यह कैसी गत बना रखी है तुमनें? इधर कहाँ जा रहे थे?”
“कहीं नहीं। मुझे जाने दो।”
“पागल तो नहीं हो गए हो तुलसी? रो क्यों रहे हो? कोई देखेगा तो क्या समझेगा ? क्‍या हुआ?” 
तुलसी तब तक बहुत कुछ सावधान हो चले थे। प्रिय मित्र को देखकर उन्हें एक सहारा मिला था।
क्रमशः

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