Tuesday, 15 August 2023

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
158-

फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को।

कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले हो। वाह-वाह-वाह।” 
तुलसी मुस्कराए, कहा- “कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू - अब तो दो होकर भी दो नहीं रहा कैलास।” 
कहते कहते फिर एकाएक टीस उठी। आगे कुछ और कहने जा रहे थे कि एकाएक कराह कर राम राम पुकार उठे और फिर अचेत हो गए। आँखों में आँसू भरकर राजा भगत ने गंगा राम से कहा-“हमे लगता है कि अब तो भैया का दर्शन  मेला ही रह गया हैं।”
गंगाराम ने कुछ न कहकर एक गहरी नि:स्वास दी। राजा बोले- “भौजी गईं, इनके बेटे को भी अपने हाथों से ही मसान में ले गया था और अब ये भी जा रहें हैं।” कहकर वे रोने लगे।गंगाराम ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- “अपने हृदय में मेरा भी हृदय देखो राजा। क्या किया जाय। कल सन्ध्या तक इनका मारकेश और है।वह समय बीत जाय तो फिर सब मंगल होगा।
 राजा टूटे हुए स्वर में बोले- “हाँ, वैसे तो जब तक साँस तब तक आस। बाकी क्‍या कहें?” 
रात में प्रायः सन्‍नाटा हो चुका था।सावन का महीना था,बादल गरज रहे थे।राजा, कैलास, बेनीमाधव और गंगाराम चुपचाप दीवार से टेका लगाए थके हारे बैठे थे। रामू अपने प्रभु जी की चौकी के पास बैठा टकटकी लगाकर उन्हें देख रहा था।
तुलसीदास स्वप्न देख रहे थे। हाथ में अरजी का लम्बा कागज लिए तुलसी दास राम जी के महलों की ओर जा रहें हैं। पहले गणेश जी मिलते हैं, उन्हें प्रणाम करते हैं फिर क्रमशः सूर्य, शिव-पार्वती, गंगा-यमुना, काशी, चित्रकूट आदि की झलकियाँ एक के बाद एक खुलती ही चली जाती हैं। भीतर की ड्यौढी पर खास दरवार के आगे हनुमान जी खड़े हैं। तुलसी उन्हें देखकर प्रसन्‍न होते हैं और अपनी अर्जी का कागज उनकी ओर बढ़ाते हुए कहते है- “इसे राम जी तक पहुँचा दीजिए।हनुमान जी मुस्कराकर लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की ओर इशारा करके कहते हैं- “इनकी स्तुति करो। जगदम्बा को प्रणाम करो। उन्हीं की चिरौरी करने से तुम्हारी विनयपत्रिका साहब की सेवा मे पहुँच सकती हैं।”
तुलसी तीनों भाइयों की वन्दना करते हैं। माँ के चरणों मे नत होते हैं। सीता जी प्रसन्न होकर मुस्कराती हैं। हनुमान का मन और भरत का रुख देख कर लक्ष्मण तुलसीदास के हाथ से विनयपत्रिका ले लेते है और राम जी के सम्मुख उसे सविनय बढ़ा कर कहते हैं- “हे नाथ, इस कलिकाल से भी आपके एक अकिंचन सेवक ने आपके नाम के प्रति, अपनी प्रीति और प्रतीति को निबाहा है। कृपानिधान, अब इस पर कृपा करें।” भगवान रामचन्द्र विनीत भाव से हाथ बाँधे खड़े हुए तुलसीदास को बड़े स्नेह से देखकर कहते है- “हाँ , मेरे भी ध्यान में यह बात आई है।” 
यह कहकर राम जी हाथ बढ़ाते हैं। लक्ष्मण जी उन्हें कलम दवात देते हैं, राम जी अपने हाथ से कलम लेकर तुलसीदास की “विनयपत्रिका' पर सही कर देते हैं।
उसी समय आकाश में बादल गड़गडा उठते हैं, मानों रामकिंकर तुलसीदास का जयघोष कर रहे हों। बिजली बार बार कड़क उठती है मानों राम की भक्ति  माया के अन्धकार को मिटा रही हो। पानी ऐसे बरसता है कि जैसे भक्त के मन में अविरल राम रस धारा बहती है।

राम के पत्रिका पर सही करते ही स्वप्न भंग हो गया। बादलों की गड़गड़ाहट से तुलसीदास की आँखें खुल गई- “रामू”
“हाँ प्रभु जी”
“आज कौन तिथि है?”
गंगाराम मित्र को बातें करते देखकर तुरन्त बोल उठे- “श्रावण कृष्ण तीज, अब तो ब्रह्म बेला आ गई।”
तुलसीदास एक क्षण चुप रहे, फिर कहा- “पिछले वर्ष रत्नावली आज ही के दिन गई थी।”
राजा पास आ गए। उनके हाथ पर पोले से अपना हाथ रखकर कहा- “अब कैसा जी है भइया?”
“निर्मल गंगा जल जैसा। गाने को जी चाहता है, रामू।”
“जी, प्रभु जी ”
“आज स्वप्न में मैंने 'विनयपत्रिका' के अन्तिम छन्द को दृश्य रूप मे देखा है। मेरी काव्य स्फूर्ति अन्तिम बार उसे अंकित करने को ललक रही है। एक बार मुझे सब जने सहारा देकर बैठा तो दो।” झटपट सहारा दिया गया।रामू तत्पर बैठ गया। 
बाबा धीरे धीरे गाने लगे--
“मारुति-मन, रुचि भरत की लखि लखन कही है। 
कलिकालहु नाथ, नाम सो प्रतीति- प्रीति।
एक किंकर की निबहीं हैं॥१॥
सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है।
कृपा गरीब निवाज की, देखत 
गरीब को साहब बाँह गही है॥२॥
विहँसि राम कह्यो, सत्य है, सुधि मैं हूँ लही है।
मुदित माथ नावत, बनी तुलसी अनाथ की, 
परी रघनाथ हाथ सही है॥३॥

अंतिम पंक्ति उन्होंने स्वर खींचकर गाई, उसके पूरी होते ही गर्दन टेढ़ी हो गई। रामू उनके सिर को सहारा देने के लिए लपका।बेनीमाधव तलवे सहलाने लगे। कैलास ने नाड़ी पर हाथ रखा। बोले-“इन्हें लो भगत जी, जल्दी करो। मेरा यार चला।” कहते हुए उनक़ा गला भर आया, उसी भाव मे फिर कहा--
“राम नाम जस बरनि के, भयो चहत अब मौन। 
तुलसी के मुख दीजिए, अबहीं तुलसी सोन।”

रामू ने जल्दी जल्दी धरती पर कोने में पहले ही से रखा हुआ गोबर लाकर लीपा।गोस्वामी जी धरती पर ले लिए गए। तुलसी दल, गंगा जल उनके घरघराते कण्ठ में डाला गया।सब लोग मौन होकर उनकी ओर दृष्टि लगाए बैठे थे। गले की घरघराहट में भी मानों राम शब्द गूँज रहा था। आँखें एकाएक खुल गईं, सबके चेहरों को देखा, दीवार पर  हनुमान और सियाराम के चित्रों की ओर देखा। देखते ही रहे…. देखते रहे, देखते ही देखते चले गये।बाहर ऐसी बिजली चमकी कि उसकी कौंध भीतर तक आ पहुँची जोर से बरस रहा था।सबकी आँखें भी वैसी ही बरस रहीं थीं।
(जय जय सीताराम)
(समाप्त)

157

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
157-

“यह चिन्ता हमारी है महाराज। आप तो बस आज्ञा भर दें, काम हो जाएगा। मेरा धन और किस दिन काम आएगा।वैसे आपके रुपयों मे भी बड़ी राशि बाकी है।”
मित्रों से आश्वासन पाकर तुलसीदास उत्साह में आ गए। उन्होंने एक नये उत्साह की धूम बाँध दी। जगह जगह हनुमान जी के मन्दिरों की प्रतिष्ठा हुई। पूजा पाठ से वहाँ के लोगों मे उत्साह आता और तुलसी कहते- “घबराओ मत, हनुमान जी हर दिशा के पहरेदार बने बैठे हैं। वे हर जादूगर भूत प्रेत यक्षादि को मार डालेंगे। राम जी ने हनुमान जी को अब तुम्हारी सेवा के लिए यहाँ नियुक्त कर दिया है। घबराओ मत।”
मानसिक यंत्रणाओं से जड़ीभूत पागलों को होश में लाने वाला यह आस्था का महायज्ञ रचने में तुलसीदास स्वयं अपना आपा खोकर रमे हुए थे।
एक दिन टोडर और गंगाराम दोनों ने उनसे विनय की। गंगाराम ने कहा-“तुलसी दास, तुम निश्चय ही सिद्ध महात्मा हो, किन्तु तुम और तुम्हारा यह हनुमान दल जो इतना अधिक परिश्रम कर रहा है वह यदि…..।”
मुस्कराते हुए तुलसी ने बात काटकर कहा- “ज्योतिषाचार्य जी, तनिक प्रश्न कुण्डली बनाकर देख लो न। अरे यह राम का काम है। मेरी तो छोड़ दो, इन बच्चों का भी बाल बांका न होगा। श्रद्धा और विश्वास ऐसी संजीवन बूटी है कि जो एक बार घोलकर पी लेता है वह चाहने पर मृत्यु को भी पीछे ढकेल देता है, फिर भी देखते हो मैं कितना सतर्क हूँ , मैने केवल उन्ही बालकों और युवाओं को लिया है जो कसरत करते हैं। जब तक रक्‍त शुद्ध है तब तक कोई रोग छू नहीं सकता। यह भी देख रहे हो कि मैं नीम के काढ़े और पत्ती का कितना उपयोग करता हूँ।”
टोडर बोले- “राम जाने यह महामारी कब तक चलेगी। अभी तो इसका अंत नहीं दीखता।”
“अरे, चार दिन में गर्मी की ऋतु आते ही यह महामारी अपने आप चली जाएगी, और हनुमान जी की कृपा मान कर नर नारियों का श्रद्धा और विश्वास बढ़ेगा। राम रूपी नैतिकता का झण्डा भूत भावन की इस परम पावन नगरी से ही एक बार  सेतु से हिमाचल तक फिर फहराएगा। देख लेना।”
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बेनीमाधव गदगद होकर बोले- “पंडित गंगाराम जी ने स्वयं एक बार आपकी उस समय की भविष्यवाणी मुझे बतलाई थी। सचमुच शिव की काशी से ही इस बार राम की ज्योति जागी है।”
“बस, अब कोई विशेष बात तो हमारे जीवन में कहने को रह नही जाती पुत्र, फिर तो स्वयं तुम लोगों के देखते ही देखते जो तुलसी भाग्य से भी भोंडा था वह रामनाम के प्रताप से गोस्वामी तुलसीदास बनकर पुज रहा है। चलो आज मैं तुमसे भी उऋण हुआ। हमारी जीवनी कदाचित्‌ तुम्हें आस्था के संघर्ष की कथा बनकर प्रेरित करे। तुम्हारा उपकार होगा किन्तु एक बात ज्योतिषी तुलसीदास की भी गाँठ में बाँध लो।”
“वह क्‍या गुरू जी?” 
“कालांतर में तुम्हारा ग्रन्थ मेरे भक्तों के द्वारा वह न रह जाएगा जो तुम लिखोगे। वह कुछ का कुछ हो जाएगा। हाँ तुम अवश्य अमर हो जाओगे।” 
गुरू जी के चरणों में श्रद्धापूर्वक मस्तक नवाकर बेनीमाधव बोले- "अमरता मिलेगी तो मैं देखने नहीं आँऊगा।महाराज, किन्तु इस जीवन में आपके इस आस्था के महायज्ञ से प्रेरणा लेकर मैं अपने मन की काली छायाओं से मुक्त हो सका तो अपना अहोभाग्य मानूँगा। मैं एक बार अपने भीतर वह मन देखने के लिए तड़प रहा हूँ गुरू जी जिसकी निर्मलता से परम ज्योति आभासित होती है।आशीर्वाद दें कि इस जन्म में यदि उस दिव्य ज्योति को न देख पाऊँ तो भी मेरा मन निर्मल हो जाये। मेरे आस्था दुर्ग की नींव आपके चरणों के प्रताप से दृढ़ हो जाये।” 
सन्त जी के माथे पर हाथ फेरते हुए बाबा ने स्नेहपूर्वक कहा- “होगा, अवश्य होगा,जैसे ठग साहुकार के पीछे पड़ता है न, वैसे ही तुम राम जी के पीछे लग जाओ बेनीमाधव। उनका प्रसाद तुम्हे अवश्य मिलेगा। सत्य, आस्था और लगन जीवन सिद्धि के मूल हैं।”  “आपके कथा प्रसँग में केवल एक जिज्ञासा और है गुरू जी, आपके मित्र टोडर जी का क्या हुआ?”
यह प्रश्न सुनते ही बाबा की आँखें भर आईं। कुछ क्षणों के लिए वे भाव विगलित हो गए। फिर एक दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए 'राम' कहा और कुछ रुककर फिर बोले - “महामारी शांत होने के बाद मैं कुछ समय के लिए मथुरा चला गया था। लौटकर जाना कि कुचाली गोस्वामियों ने मेरे उपकारी को दण्ड देने के लिए धोखा देकर उसका वध कर डाला था। टोडर ऐसा परोपकारी मनुष्य इस कलिकाल में कम ही देखने में आता है। टोडर के स्मरणमात्र से ही मैं अब भी अपने आँसू नही रोक पाता भैया।” बाबा की आँखें फिर उलछला उठीं।

गोस्वामी तुलसीदास जी रोग शैया पर पड़े हैं। उनके सारे शरीर में फुंसियाँ ही फुंसियाँ निकल आई हैं। मवाद की कीलें सी पड़ जाती हैं। शरीर भर से निकलती है। आज चार दिन हो गए, न रातों की नींद आती है और न दिन को चैन पड़ता है। बीच बीच में मूच्छित हो जाते हैं। राजा, गयाराम, कैलास, जयराम साहु, स्व० टोडर के पुत्र और पौत्र तथा काशी के दो नामी वैद्य कोठरी के भीतर उन्हे घेरकर बैठे हैं। रामू नीम के उबाले पानी से उनके घाव धोता और एक लेप लगाता चल रहा है। झोपड़ी के बाहर दर्शनार्थियों की भीड़ खड़ी है। लोग उत्सुकतावश मना किए जाने पर भी दरवाजे से झाँक झाँक कर गोस्वामी जी के दर्शन करते हैं। कभी कभी वे जोर से कराहकर राम राम कह उठते हैं फिर पीड़ा शांत होने पर मुस्कराकर कहते हैं-“सुख से दु:ख भला जो राम को याद तो कराता रहता है।”
दरवाजे से झाँकते कई दर्शनाथियों की आँखों से आँसू बह रहे थे। बाबा उन्हें मुस्कराकर देखने लगे, कुछ देर तक टकटकी बाँधकर देखते रहे फिर गर्दन घुमाकर दीवार पर बनी सीताराम की छवि को देखते हुए हाथ बढ़ाकर कहतें हैं-“यह भी इनकी असीम करुणा है,

असन-बसन हीन, विषम-विषाद-लीन, 
देखि दीन दूबरों करै न हाय-हाय को? 
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, 
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय
को।
नीच यहि बीच पति पाई भरुहाइगो, 
विहाय प्रभू-भजन बचन मन काय को। 
तातें तनु पेखियत घोर बरतोर मिस, 
क्रमशः

Friday, 11 August 2023

156

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
156-

वे खटिया से उठने का उपक्रम कर रहे थे कि तुलसीदास उनके पास पहुँच गए। एक हाथ पीठ और एक उनकी छाती पर रखकर धीरे धीरे सहलाते हुए वे बोले -“आप आयु में मुझसे बड़े हैं, ब्राह्मण हैं, बैठे बैठे मेरा प्रणाम स्वीकार करें।बस-बस, आपको आनन्द अवश्य हुआ है, यह माना, पर उसे रोग का कारण न बनाएँ। शांत हो जाइए मेरे लिए तो सबका घर अपना ही घर है। सहज रूप से सबके घर पहुँच जाता हूँ। इसमें आश्चर्य की क्या बात है।”
बुड्ढा रो पड़ा, उनके हाथ पर अपने दोनों हाथ रखकर बोला- “जैसा सुना था वैसा ही आपको पाया। सुना है गंगा आपके सहपाठी रहे।”
“हाँ, महाराज।” 
“तनिक दूर के नाते से वे हमारे भाई लगते हैं।”
“यह जानकर प्रसन्न हुआ। मैं आपसे आज एक भिक्षा माँगने आया हूँ। मुझे घर दिखाने के लिए जटाशंकर मिल गए हैं। उन्हीं के साथ यहाँ तक आ सका।”
“अरे महाराज, मैं निर्धन ब्राह्मण, अंधा अभागा। भला आपको क्या दे सकता हूँ? पुत्र- पुत्रवधु नौका से गंगा पार कर रहे थे सो गंगा जी में ही समा गए। उसके छह महीने बाद ही में अन्धा हो गया। यह पौत्र है, इसे थोड़ा बहुत पढ़ाता हूँ।यह मेरी सेवा करके फिर श्याम जी शास्त्री के यहाँ वेद पढ़ने जाता है। बस यही मेरा धन है, बल है, सहारा है।”
“मैं इसी बालक को आपसे माँगने आया हूँ।”
अंधे बाबा चौंके, कहा -“काहे के लिए महाराज?”
“राम जी की सेवा कराने के लिए।आज्ञा है? आपकी सेवा के समय यह सदा आपके पास रहेगा। या आप चाहे तो मेरे साथ अस्सी घाट चलें, वही रहे, मैं स्वयं आपकी सेवा करूँगा।” कहकर तुलसीदास बाबा की खाट पर ही बैठ गए।
बाबा गदगद हो गए, बोले- “आपकी मैं क्या बड़ाई करूँ गोसाईं जी महाराज, आप ऐसा प्रस्ताव लेकर इस समय पधारे हैं कि मेरी वाणी बोल करके भी भीतर से गूँगी हो गई है। पहले में अपने मन की बात आपसे कहता चाहता हूँ?”
“आप बड़े है महाराज, कहिए कहिए।”
“पिछले एक पखवारे से मेरा मन मुझे सचेत कर रहा है कि मेरा अन्तकाल अब निकट है।अपने जाने की चिन्ता नहीं किन्तु तब से रामू की चिन्ता मुझे अवश्य सता रही है। यही मेरे वंश का एकमात्र आशा दीप है।”
सुनकर तुलसीदास गंभीर हो गए, फिर उनके घुटने पर टिका हाथ अपने दोनों हाथों मे दबाकर उन्होंने कहा- “पण्डित जी, हानि-लाभ जीवन-मरण यश- अपयण विधि हाथ, फिर भी मैं वचन देता हूँ कि ऐसी स्थिति में यह बालक मेरे पास रहेगा और मैं स्वयं इसे पढ़ाऊँगा।”

कृतज्ञता के भावावेश में बुड्ढा बैठे ही बैठे उनके घुटने पर झुक के रो पड़ा, कहने लगा- “साक्षात्‌ परमात्मा ही मेरी चिन्ता हरने के लिए आ गए हैं। बस अब मुझे कुछ नहीं कहना है । रामू, इधर आ पूत।”
रामू आगे बढ़ा, उसने घुटने पर हाथ रख कर कहा- “हाँ बाबा।”
उसका हाथ तुलसीदास के हाथ में रखते हुए गद्गद वाणी में वृद्ध बोला-“अब आज से यही तेरे माता पिता गुरु सभी कुछ हैं। मैं नहीं जानता कि यह तुझे अपने किस काम के लिए मुझसे माँगने आए हैं, पर अब तू इन्हीं का है।अब चाहे जितने दिन जिऊँ मुझे चिन्ता नहीं है।”

जिन क्षेत्रों में प्लेग की महामारी फैली हुई थी उनमें लगभग पाँच सौ लड़के काम कर रहे थे।उनमें से अधिकाँश बारह से पंद्रह वर्ष तक की आयु के थे। घूरे साफ हो रहे हैं। नीम के काढ़े से रोगियों का उपचार हो रहा है ।शव उठाए जा रहे हैं। लड़के बारी बारी से परिश्रम कर रहे हैं।बड़ी लगन से सेवा कर रहे हैं। इस समय सभी का डेरा अस्सी घाट के पास खुले मैदान में झोंपड़ियों में पड़ा है। नियम से सबके व्यायाम, विश्राम और खाने का प्रबन्ध स्वयं गोस्वामी जी की देख रेख में उनके बरसों पहले गंगाराम के द्वारा जमा करवाए गए धन से हो रहा है। टोडर और जयराम साहु प्रबंधक हैं। बालकों के पुण्य ने नगर के अन्य पुण्यशीलों के भीतर भी उत्साह जगाया।तभी एकाएक गली गली में अफवाह उड़ी-
“अरे, मोहना, कुछ सुना?”
“क्या भया भगेलू ?”
“हमने सुना है किसी जादूगर ने अपने कुछ चेले छोड़ें हैं। वो भैया, कुप्पों में भरकर कोई रसायन अपने साथ लातें हैं और जहाँ छोड़ा नहीं, वहीं चूहे मरने लगते हैं और बस बीमारी फैलती चली जाती है।”
“अरे, नहीं भगेलू, किसी की उड़ाई हुई बात है।”
“उड़ाई हुई? अरे, मैं अपनी आँखों देखी कह रहा हूँ। मेरे सामने चार कुप्पे वाले पकड़े गए। उन्होंने सब कबूल दिया।”
“क्या कबूला? ”
“यही कि हमारे जादूगर उस्ताद ने कहा है कि बनारस भर में ये दवा छिड़क आओ, जिससे वहाँ के सब लोग मर जाएँ और उनके घरों का रुपया टका मालमता आसानी से लूट लें।”
“अरे नही, गप्प है।”
“गप्प, अच्छा तो गप्प ही सही। नाई नाई बाल कितने कि जिजमान आगे आएँगे। दो चार दिनों में आपहीं देख लेना। अब किसी की जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं है।” 
सामने से एक खोमचे वाले को जाते देखकर भगेलू ने आवाज लगाई- “अरे ओ कचौड़ी वाले, यहाँ आना भाई। कौन जाने कल जिये कि मरें, आज कचौड़ी तो खा ही लें।” 
जादूगर के कुप्पों की अफवाह काशी में बड़ी तेजी से फैली। गली गली में घबराहट फैल गई। मौहल्ले मौहल्ले में रातों में पहरे बैठने लगे। दिन और रात में पचासों बार जहाँ तहाँ- वो आए, की भेड़िया गुहार मच जाती थी। बेचारे कई निरपराधी लोग जादुगर के शिष्य माने जाकर पीटे गए। नगर में एक आंतक सा छा गया।
तुलसीदास ने सुना, वे उत्तेजित हो गए। कहा- “यह निश्चय ही किसी दुष्ट बुद्धि के द्वारा उपजाई हुई बात है। अपने क्रूर विनोद से वह इन बेचारे मरे हुओं को मार रहा है।” लोगो का भयातंक देखकर तुलसी विचार में पड़े। जन जन की असीम निराशाजनित घोर अनास्था का उचित उपचार होना ही चाहिए। आस्था हीन मनुष्य का जीवन ही उसका असह्य बोझ बन जाता है। यह स्थिति भयावह है। गोस्वामी जी ने टोडर और जयराम साहु को बुलाकर कहा- “मै अब इस महामारी को बाँधूँगा। काशी की दसों दिशाओं में संकट-मोचन हनुमान जी की मूर्तियाँ स्थापित करूँगा। इसके निमित्त भी धन चाहिए कैसे जोगाड़ होगा साहू जी?”
क्रमशः

155

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
155-

“मैं बैठने नहीं, तुम्हें उठाने के लिए आया हूँ पुत्र। काशी में राम दुआ से अब हनुमान अखाड़ों की कमी नहीं रही।” “नहीं बाबा, अरे पचास से ऊपर अखाड़े वालों को तो मैं जानता हूँ। इनके सारे दगलं मैं ही कराता हूँ।”
तभी गोसाईं जी ने बातों की जटा बढ़ाने वाले जटाशंकर को बीच में ही टोककर कहा- “बेटा, इस शंकर शहर सरोवर के नर नारी रूपी मच्छ-मछलियाँ इस समय बड़ें ही व्याकुल हैं। जैसे नदी के जीवों में माजा की बीमारी पड़ती है न, और उतरा-उतरा कर तट पर मृत जीवों के ढेर के ढेर आकर बिछ जातें हैं, वैसी ही दशा है।” 
“हा बाबा, बचपन में अपने गाँव के तालाब में देखा था। आज वही हाल काशी के नर नारियों का है, आपने ठीक कहा।” 
“पुत्र, व्यायाम प्रिय युवकों के एक बहुत बड़े दल को तुम जानते हो। इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ।” 
“आज्ञा करें, बाबा।” 
“क्या कहें जटाशंकर। अपनी इस परम पावन पुरी की दशा तो देख ही रहे हो। घूरों पर चूहों के ढेर पड़े हैं। कहने को तो महामारी का आज दसँवा दिन है पर नगर में ऐसे कितने ही घर है जहाँ मरे हुए शवों को सद्गति करने वाला भी कोई नही बचा है। बेटा, तुम हनुमान अखाड़े के युवा लोग इस समय यदि राम जी की सेवा करोगे तो तुम्हें अपार पुण्य मिलेगा। बोलो, हनुमान जी के नाम की लाज रखोगे? है तुममे राम सेवा करने का साहस?”
हट्टा कट्टा पहलवान जटाशंकर यह सुनकर एक बार तो सिर से पाँव तक सिहर उठा, परन्तु दूसरे ही क्षण वह सिहरन स्फूर्ति बनने लगी, बोला- “यों तो बाबा, यह काम जान से खेलने जैसा है, पर जब आपकी आज्ञा है तो फिर कुछ सोचने का सवाल ही नहीं उठता।”
“जीते रहो पुत्र, राम तुम्हारा सब विधि भला करेंगें। मैं आठों पहर रामरक्षा कवच मंत्र का पाठ करता रहूँगा। हनुमान जी की कृपा से कोई भी युवक इस ज्वर से पीड़ित नहीं हो पाएगा।”
जटाशंकर बोला- “हम तो आपका नाम लेके आग में भी कूद पड़ेंगे। बाकी औरौं के जी की बात मैं कैसे कहूँ। दो चार लोगों से बातें करके बताऊँगा।”
“मैं देखा चाहता हूँ कि परम योगेश्वर महामृत्युँजय की इस नगरी में अभी कितना पुण्य शेष है।”
“अरे बाबा, यों कहने को तो राम-राम शिव-शिव सभी जपते है पर आप जैसी भक्‍ती न हम जवानों में है और न बूढ़ो में। बाकी, मैं आपकी सेवा में हाजिर हूँ।”
“हाँ, यहाँ तो ऊँचे नीचे, बीच के धनिक, रंक, राजा, राय सब श्रेणियों के लोगों को एक करके मैंने इतने दिनों में देख लिया। जब पीड़ा देखतें हैं तो पीठ फेर लेतें हैं। देखना चाहता हूँ कि इन पीड़ितों की सहायता करने का उत्साह तुम्हारे समान और कितनों लोगों के मनों में उमंगता है।” 
जटाशंकर बोला- “अच्छा तो ठहरिए, मैं घर मे अम्मां से कह आऊँ कि द्वार बन्द कर लें। आपको लेके कुछ अखाड़ों के गुरुओं के यहाँ चलूँगा। पहले एक बालक सरदार के यहाँ चलूँगा। आपके प्रभाव से लोगों को राजी करने में सुभीता होगा।” 
जटाशंकर कुप्पी लिए अपने घर की दहलीज तक गया और जोर से आवाज दी- “अम्मां, कुण्डी लगवाय लेव।हम गुसाईं बाबा के साथ एक काम से जाय रहे हैं।” कहकर वह उल्टे पावँ लौट आया। बाहर से किवाड़े उढ़का दिए और गुसाईं जी के साथ तीन चार छोटी छोटी गलियों को पार करके एक घर के सामने पहुँचा और जोर से आवाज लगाई- “ए राम ! रामचन्द्र ! ओ रामचंद्र!”तुलससीदास का मन मुदित हुआ।जब जटाशंकर के सहायक रामचंद्र हैं तो काम बना समझो। 
उसी समय भीतर से किसी पुरुष का स्वर आता है- “अरे कौन है?” 
“हम हैं बाबा, जटाशंकर, जरा राम को जगाय दीजै। अन्दर से खाँसते हुए पुरुष स्वर ने कहा- “अच्छा।” 
इतनी देर में जटाशंकर गोसाईं जी से कहने लगा- “है तो बाबा यह छोटा ही, चौदह पंद्रह बरस का लड़का ही पर ऐसा तेज और फुर्तीला है कि जब आपके सामने आवेगा तो आप भी कहेंगें कि वाह जटाशंकर क्या ततैया भिड़ छाँट के लाए हो।” गोसाईं जी ततैया भिड़ की उपमा सुनकर हँस पड़े।जटाशंकर बोला- “आपके चरणों की सौं बाबा, मैं झूठ नहीं कहता। ये लड़का दस बारह टोलों के लड़कों का मुखिया है समझ लीजिए।यदि यह हिम्मत दिखाजाए तो……।”
कुण्डी खुली, एक कसरती बदन का चौदह-पन्द्रह वर्ष की आयु का बालक मिट्टी की ढिबरी लिए एक हाथ से आँखें मींजते हुए आया।
“जे बजरंग दादा, अरे ! अरे ! अएरे ! ” कहकर ढिबरी वहीं पर रखकर दो सीढ़ियाँ उतरने के बजाय सीधे गली में ही कूद पड़ा और गोसाईं जी के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।
झुककर उसे, उठते हुए गोसाईं जी बोले- “राम-राम ! आयुष्मान निष्ठावान हो। सुखी हो। अरे बस-बस, अब उठो बेटा। अभी जाड़ा गया नहीं तुम उधाड़े बदन हो। गली ठंडी है।”
गोसाईं जी के पीठ थपथपाकर उठने का आदेश देने से जिस समय रामू उठ रहा था, उसी समय जटाशंकर हसँकर कहने लगा- “आपके सामने बित्ता सा दिखा रहा है, हमको भी मानता है पर ऐसा विकट है कि जिससे भिड़ जाये…”
“जाओ दादा, पर गोसाईं बाबा हमारे घर आए, कैसा अचम्भा-सा लग रहा है। भीतर पधारें महाराज। घर में हमारे बाबा को छोड़कर और कोई नहीं है।” कहकर वह चौखट से ढिबरी उठाकर मुस्तैदी से खड़ा हो गया। उन्हें प्रकाश दिखाते हुए भीतर एक अंधेरे दालान को पार कर एक कोठरीं में ले गया।वहाँ दिया जल रहा था और एक दमे का रोगी अंधा वृद्ध बैठा दोनों हाथों से अपनी छाती दबाए हुए धीरे धीरे हांफ रहा था।
रामू बोला- “बाब़ा, गोसाईं जी महाराज पधारे हैं।”
“कौन गुसाईं, रामू ? हम दीन दरिद्रन के यहाँ तो बस एक गोसाईं धोखे से आय सकते है।”
जटाशंकर ने पूछा- “कौन से गोसाईं आ सकते हैं बाबा?”
रामू ने तब तक चटाई बिछा दी थी और गोसाईं जी को जब बैठने का सविनय संकेत कर रहा था तभी अंधे बाबा अपने दम को बाँधकर धीरे-धीरे बोले- “हम दीन दुखियन का गुसाईं तो एके है भइया, रामायण वाला।”
राम सोत्साह बोला- “वही आए हैं बाबा।”
उत्साह के आवेग में जब कलेजे में हलचल मची तो अंधे बाबा का दम फूल गया।
क्रमशः

Thursday, 10 August 2023

152

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
152-

यहाँ कुछ लोग अकारण ही हमारे शत्रु हैं। हमारी रामायण की रक्षा के लिए भी टोडर ने तुम्हीं लोगों को कष्ट दिया था।”
“कष्ट महाराज? भरे ई तौ हम पंचो का सुख है, जो आपकी सेवा करने का अवसर मिलेगा। आप निसा खातिर रहैं। हमारी बिरादरी का एक एक लठैत आपकी सेवा में हाजिर रहेगा। जिसे चाहें बानर बनाय लें और जिसे चाहे पहरेदार। बाकी एक हमारी अरदास है। आज्ञा होय तो अरज करूँ?”
“कहो कहो”
“पहले इस बीच में एकाध दुइ छोटी छोटी लीलाएँ आप करवाय ले तो फिर बड़े काम में हाथ डालने पर और आनंद आएगा।”
तुलसीदास इस सुझाव से खिल उठे, बोले- “तुमने बहुत अच्छी बात कही है हिरदै। अच्छा, पहले दो छोटी छोटी लीलाएँ करेंगे, एक नागनथैया लाला और दूसरी नरसिंह लीला।”
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“अन्यायी कालिय नाग और क्रूर हिरण्यकशिपु दोनों ही के अत्याचारों का सामना नवयुवक ही करतें हैं। एक में कृष्ण की गोप मण्डली है, दूसरे में सत्य-निष्ठ प्रह्लाद। मेरी इन लीलाओं का नगर में, विशेष रूप से युवकों की टोली में , बड़ा ही असर पड़ा वेनीमाधव। अब राम लीला के लिए हर वर्ग में बड़ी उत्सुकता और उत्साह बढ़ गया था। 
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एक दिन टोडर के साथ अपने अस्सी घाट वाले स्थान पर गोसाईं जी बैठे बातें कर रहे हैं। वे कह रहे थे- “हमनें हर बिरादरी में और हर मोहल्ले में सबसे बात कर ली है टोडर। जिस मोहल्ले में जो लीला होगी उसका खर्चा और प्रबंध उसी महल्ले वाले करेंगे और रामायण मैं सुनाऊँगा।”
टोडर बोले- “महात्मा जी, आप जो चाहेंगे वह अवश्य होगा, लेकिन यह‌ न भूलें कि इस नगर के कट्टर शैवपंथी, वल्लभ संप्रदाय वाले और उनके साथ ही साथ बटेसुर महराज जैसे प्रभावशाली दुर्जन लोग आपकी सभाओं में तरह तरह से विध्न डालनें में कोई कसर न उठा रखेंगे।”
गोसांईं जी शांत स्वर में बोले- “टोडर, अबकी यह विध्न डालेंगें तो राम जी की दया से सारा नगर इनके विरुद्ध जायगा। मैं इसीलिए रामलीला प्रदर्शन के साथ रामचरित मानस सुना रहा हूँ। मेरे वानर सब प्रकार के असुरों को दण्ड देने के लिए तैयार रहेंगे।”

उसी समय घाट के एक अधेड़ व्यक्ति घबराए हुए तुलसीदास जी के पास आए, कहा- “अरे बड़ा गजब हुई गया गुसाईं जी महाराज। पूरा कलिकाल आ गया। चारों चरन ठेक के कलजुग खड़ा होइ गवा है ससुरा। कुछ न पूछो।”
“क्या हुआ श्रीधर?”
“अरे एक कोई ससुर वैरागी रहा, वह तांत्रिक रहा, तौन किसी बड़े हाकिम की बड़ी पतुरिया को लैके भाग गवा। अब जितने छोटे बड़े साधू बैरागी हैं सब पकड़े जाय रहे हैं। भला बताओ इ कहाँ का न्याव है महाराज? ”
“तो तात्रिकों को कौन पहिचनवा रहा है भाई?”
“सब मिली भगत है, महाराज। बटेसुअर मिसिर को किसी ने नही पकड़ा महराज, उन्होंने सुना है कि पांच सौ रुपये रिसपत चटाय दी और….”
मुँह की बात मुँह में ही रह गई और आठ दस सरकारी प्यादों को लेकर जमादार और एक ब्राह्मण युवक तुलसीदास की कोठरी के सामने आ पहुँचा। टोडर ने इस ब्राह्मण को बटेश्वर मिश्र के साथ कई बार देखा था। उनके कान खड़के। वह युवक वैसी ही शान और शेखी के साथ, जैसी केवल मूर्ख और दम्भी दिखला सकतें हैं, आगे बढ़ा और चिल्लाकर बोला- “यही है तुलसीदास। इन्हें सम्मोहिनी विद्या सिद्ध है। बड़ी बड़ी सुन्दर स्त्रियों को नित्य फँसाना ही इनका काम है। आज इस शठ के पाप का घड़ा भर गया सो आय फँसा है।” कहकर अपने कंधे पर लटकी हुई लाल झोली से एक काठ की डिबिया निकाली और जल्दी जल्दी मंत्र बुदबुदाते हुए उसका सिदूंर बिजली की फुर्ती से तुलसीदास की छाती पर उछाल दिया। ह ह ह ह ह, बकरे की मिमियाहट की तर्ज पर भैंस की डकराहट जैसी वह हँसी उस कायर वीर के गले से निकलने लगी।
टोडर का हाथ अपनी तलवार की मूठ पर चला गया। तुलसीदास ने दृढ़ता पूर्वक उनका हाथ पकड़ लिया। उनके चेहरे पर परम शांति विराज रही थी।
बटेश्वर का वह कायर वीर शिष्य अपने इस भीषण तांत्रिक प्रहार के बाद भी अपने गुरू जी के गुरुभाई को वैसी ही ज्ञात मुद्रा में देखकर कुछ कुछ भयभीत तो अवश्य हुआ पर दस सिपाहियों की शक्ति उसे अपने गुरू की तंत्र शक्ति से अधिक बल दे रही थी। हँसते हुए बोला-  “हें हें हें हें हमारे गुरू जी से टक्कर लेने चला था। जाने ससुर कौन नीच जात, ठगहारी विद्या करके दो चार मंत्रों के बल पर सच्चे गुरुओं से होड़ ले रहा था।जाओ बेटा, अब चक्की पीसो हें हें हें हें।”
सिपाहियों में दो पठान तुलसीदास को अयोध्या की बाबरी मस्जिद के पास फकीरों के बीच में नित्य रात को देखा करतें थे। उनसे बातें भी हुआ करतीं थीं। उन दिनों यह दोनों पठान अपने सरदार के साथ अयोध्या की मस्जिद पर तैनात थे।दोनों ने आपस में एक दूसरे से बातें की और फिर एक ने तुलसीदास से पूछा- “साधु बाबा, पहले तुम्हारे दाढ़ी मुच्छा था?”
तुलसीदास ने पठान को ध्यान से देखा, पूछा-“आप नूर खां पठान हैं और ये वली खां हैं।कैसे है आप लोग?”
तुलसीदास का स्वर इतना सहज और शांत था कि जैसे यह सिपाही उन्हें पकड़ने नही वरन‌ साधारण आन्तुकों की तरह बोलने बतियाने आए हैं। वली खा ने जमादार से कहा -"हुजूर, हम दोनों इनको अजुध्या से जानता है, ये बाबरी मस्जिद में रोज हमारे फकीरों के साथ उठता बैठता सोता था। बहुत उम्दा गाता है हुजूर ! ऊपर वाले का सच्चा, दुनिया वाले का दोस्त है।”
जमादार ही नहीं, साथ आया हुआ हर सिपाही इस बात में एक मत था कि अब तक जितने वैरागी पकड़े है उनमे यह निराला है। जमादार बोला-“इनके लिए खासतौर से कोतवाल साहब का हुक्म है। इस बिरहमन के गुरू ने कोतवाल साहब की बेगम का कुछ काम किया था।उसकी पहुँच थी, उसी ने इनका पता दिया है।”
“हूँ ” फिर तुलसी की ओर देखकर जमादार ने विनीत स्वर में कहा- “साईं, हम खतावार नहीं , महज हुक्म के बन्दे हैं।
तुलसीदास मुस्कराए, कहा- “चलिए चलिए, आप अपना फर्ज अदा कीजिए और हमे भी अपने मालिक की मर्जी पूरी करने दीजिए।”

“तुलसी जस भविव्यता तैसी मिले सहाइ। 
आपुनु आवइ ताहि पै ताहि तहा ले जाइ॥”
क्रमशः

153

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
153-

जब कोतवाल के सामने तुलसीदास पेश किए गए तो उनकी बेगम साहबा भी पर्दे के पीछे मौजूद थीं। कोतवाल ने उन्हें सर से पैर तक घूरकर देखा और पूछा-“सुना है, तुमने बहुत शोहरत हासिल की है। तुम बड़े बड़े पण्डितों को भी अपने जादू से बाँध लेते हो।”
तुलसीदास बोले- “मैं जादू टोने नहीं करता, केवल रामनाम जपता हूँ और इसी का प्रचार करता हूँ।”
पर्दे के पीछे से बेगम साहबा ने कोतवाल साहब के कानों मे फरमाया- “मेरी बाँदी बतलाती है, यह बहुत बड़ा फकीर है। इससे कोई करिश्मा दिखलाने को कहिए।” 
कोतवाल ने तुलसीदास से कहा-“हमें अपना कोई कमाल दिखला सकते हो।” 
तुलसीदास हँसे, बोले-“कमाली तो एक ही है या फिर उसका सिपहसालार है।” 
“कौन है उसका सिपहसालार?”

“हनुमान बजरंगवली” - यह कहकर वे सहसा आावेश में आ गए। ऊँचे सशवत स्वर में उनके मुख से एक छप्पय स्रोते सा उमड़कर बह चला।आँखें सामने वाले खम्भे पर ऐसी सध गईं जैसे वहाँ उनका हनुमान हठीला दृढ़ आस्था का स्तम्भ बनकर प्रत्यक्ष खड़ा हो। वे उसे ही अपना छप्पय सुना रहे थे-

“सिधु-तरन, सिय सोच-हरन, रवि वबलवरन-तनु। 
भुज विशाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥
गहन दहन निरदहन लंक निःसंक बंक, भुव। 
जातुधान बलवान माच मद दमन  पवन सुव॥ 
कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकंट। 
गुन गनत, नमत, सुमिरत, जपत, समन सकल-सकट विकट॥”

नगर में गोस्वामी तुलसीदास जी के पकड़े जाने की खबर बिजली सी फैली।
काशी की ऐसी कौन सी गली थी, जिसे तुलसीदास ने अपना न बना लिया हो। शहर में सैकड़ों ऐसे युवक थे जिन्होंने उन्हीं की प्रेरणा से हनुमान अखाड़े आयोजित किए थे। ब्राह्मण, राजपूत, गोप, अहिर, गोड, कहार, केवट, नाऊ, जुलाहे, छोटी कौमों के मुसलमान, तमोली, छोटे-छोटे सौदागर सभी तो रामबोला बाबा को अपना मानते थे। उनके पकड़े जाने के समाचार ने क्या छोटे, क्या बड़े सभी के मनों में बड़ी कड़वाहट उत्पन्न कर दी। सारी काशी में बटेश्वर मिश्र की थू थू हो रही थी। टोडर ने भूख प्यास सब बिसार कर दौड़ धूप आरंभ की। जयराम साहु बोले- “अबकी भिड़के ही दिखा दो टोडर। अकबर जैसे न्यायप्रिय बादशाह के राज्य में भी ऐसी मनमानियाँ हो रहीं हैं। मिश्र जी जैसे घमण्डी स्वार्थी आपसी ईर्प्या द्वेष में सारे नगर की नाक कटा रहे हैं। एक बार इनसे निबटे बिना निस्तार नहीं। आगे जो होगा सो भुगत लेगें।”
टोडर बोले- "हिरदे अहीर महात्मा जी का बड़ा भक्त है। अच्छे लड़वैये ठाकुर समरसिह भी दे देंगे।”
जयराम बोले- “दो सौ लठैत मैं भी दूँगा।ये कोतवाल बड़ा ही दुष्ट आदमी है, और ये बक्शी, जिसकी पतुरिया भागी है, एक नम्बर का धूर्त है। इन लोगों ने हमें दुखी कर रखा है।”
“ठीक है, अब आपकी सलाह मिल गई है तो आज रात तक हम भी कुछ कर दिखाएँगे।”
टोडर हिरदै से मिले तो वह बोला- “भैया, कासी जी का अहिर खून उबल रहा है। जब आप सब लोग पीठ पर हो तो हम भी आज इन्हें ऐसा सबक सिखाएँगे की छठी का दूध याद आ जाएगा। हमारे गुसाईं बाबा हमारे लड़कों को रामलीला में बानर सेना बनाने वाले थे, सो आज कोतवाल की कोतवाली पर हमारी वानर सेना ही टूटेगी। देख लेना,पहली रामलीला वानर लीला से ही हो होयगी।टोडर बोले -“ठीक है, पर हमला खूब सोच विचार के बड़े संगठित ढंग से होना चाहिए, हिरदे। सिपाहियों पर ऐसे अचानक टूटों कि उनसे कुछ करते धरते न बनें। फिर कहीं पर अहिर टूटेगें, कहीं पर केवट और कहीं पर ठाकुर बृंदहार धमकेंगे और हिरदै, कल सबेरे काशी जी में बटेश्वर मिश्र कहीं चलता फिरता न दिखाई दे।”
“भैया, हम बिरमहत्या न करेंगे। उस धर्मराक्षस को हनुमान जी आप ही समझेंगे।”

रात पहर भर भी न बीती थी कि छावनी में हुल्लड़ मच गया।मुगल पठान सिपाही अचानक में घिर गए। कइयों की मुश्कें कस गईं। सैकड़ों तोपचियाँ विद्रोहियों के कब्जे में आ गईं।लठैतों का आक्रमण इतना व्यापक और फुर्तीला था कि सिपाही बिना लड़े ही उनके जादू में बँधकर परास्त हो गए।कोतवाली पर सारे शरीर में सेंदुर लगाए लाल लंगोटेधारी अहिर युवा बानर टूट पड़ें थे। हरम में ऐसा हाय तोवा मचा कि बेगम बाँदिया बेहोश हो हो गईं। अफीम की पिनक में गाना सुनते और झूमते हुए कोतवाल साहब की दाढ़ी नुची। उन्होंने कैदखाने के जमादार को बुलाके हुक्म दिया कि तुलसीदास को फौरन छोड़ दो। तुलसीदास बोले- “जब तक सब वैरागी नही छोड़े जाएँगें तब तक मैं बंदीगृह से नहीं निकलूँगा।” 
सारे बरागी छोड़े गए। नगर में रात के तीसरे पहर सैकड़ौं मशालों के साथ तुलसीबाबा और सारे वैरागियों का जुलूस निकला। पूरा नगर जाग पड़ा। एक विचित्र उत्साह काशी के जन जन में लहरा उठा था। तुलसीदास और काशी उस रात सदा के लिए एक हो गए।
टोडर की इच्छा भी पूरी हुई। बटेश्वर मिश्र नया सूर्योदय न देख पाया।कोतवाली के सिपाहियों ने अपनी इस अपमान भरी पराजय का बदला लेने के लिए रात ही मे बटेश्वर मिश्र के घर जाकर उन्हें सोते से जगाया, बाहर बुलाया और कत्ल कर डाला।

नगर में इस विद्रोह से जहाँ युवकों में जान आई, वहाँ दूसरी ओर शासन तंत्र भी चूर चूर हो गया। सभी आला हाकिम इस बात से चिन्तित थे कि आगरे के किले मे जब यह समाचार पहुँचेगा तो बादशाह न जाने हमारी क्या दुर्गति करे। इस घबराहट में वसणी, दीवान, मीर अदल, कोतवाल,छोटे बड़े सिपहसालार सब आपस में एक दूसरे को दोषी तथा अपने को सतर्क स्वामिभक्‍त सेवक सिद्ध करने के लिए आगरे में अपने पक्ष के आला हाकिमों के पास मूल्यवान भेटें और संदेश भिजवाने लगे। अकवर के दरवार मे काशी के इस युवक विद्रोह की इतनी और इतनी प्रकार की सूचनाएँ पहुँची कि बादशाह ने काशी जौनपुर सूबे के लिए पुराने सुबेदार का तबादला करके अब्दुरहीम खानखाना को सूबेदार बनाकर व्यवस्था सँभालने के लिए भेजा।वह अभी आागरे से चल भी न पाए थे कि उनके आने की सूचना काशी में पहुँच गई । उस समय नगर में अकाल ग्रस्त जनसमूह मारा मारा डोल रहा था। श्रमजीवी, किसान आदि सभी भिखारी बन गए थे। पेट भरने के लिए लोग अपने बेटे-बेटियों तक को बेच देते थे।
क्रमशः

154

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
154-

भूतभावन भोलानाथ की नगरी करुणा से चीत्कार कर रही थी और प्रायः उसी समय राजा टोडरमल के पुत्र राजा गोवर्धनधारी काशी के पण्डित शिरोमणि नारायण भट्ट जी, विश्वनाथ जी का नया मन्दिर बनवाकर शिवलिंग की प्रतिष्ठा कराने आए थे। मन्दिर में बड़ी धूमधाम थी। पण्डित मण्डली में हर जगह राजा गोबर्धन, धारीदास टंडन की जै-जैकार हो रही थी। फकीरों को अन्न दिया जा रहा था। नगर मे सबको शांत किया जा रहा था। एक भिखारी बोला- यहाँ सब बड़े बड़े पण्डित दिखाई दिए पर हमारे रामबोला बाबा के दरसन नहीं भये।” 
“अरे भइया, जो गरीबों का साथ दे उसे बड़े लोग अपने बीच में नहीं बैठाते हैं। बाबा हमारे तुम्हारे हैं कि इनके हैं।” “सच्ची कहा मंगलू, बाबा हमार हैं। सुना है बिचारो की बाँह मे गिल्टी निकल आई है। आज कल वे बहुत पीड़ा पाय रहे हैं।”
तुलसीदास की कोठरी में टोडर आदि कई भक्तों की भीड़ जमा थी। तुलसी अपनी पीड़ा से विकल थे। बार-बार हनुमान को गोहराते थे- “है हनुमान हठीले, तुमने पहाड़ उठाया, लंका जलाई, बड़े-बड़े बलशाली राक्षसों को चुटकी बजाते मसल डाला, मेरी यह जरा सी पीर नही हरी जाती? मेरी ही सहायता करते समय क्या तुम बूढ़े हो गए हो? तुम्हारी शक्ति क्षीण हो गई है ? आओ मेरे साहब, मेरा कष्ट हरो। बड़ा काम करने को पड़ा है। राम जी का काम है हनुमान हठीले, मेरी लाज रखो।” 

तभी एक सरकारी ओहदेदार के आने की सूचना मिली। टोडर उठकर बाहर गए। हाकिम को मुजरा इत्यादि करने के बाद उससे बातें करने पर टोडर ने जाना कि नये सूबेदार बनारस आये हैं और गोसाईं जी से मिलना चाहते हैं।
टोडर ने कहा- “हुजूर, भीतर चलकर महात्मा जी की हालत अपनी आँखों से देख लें। इस समय तो गिल्टी में बड़ी पीड़ा होने से वे कराह रहे हैं।”
हाकिम टोडर के साथ भीतर आया, सब लोग अदब से उठ खड़े हुए। हाकिम ने गोसाईं जी को झुककर सलाम की और कहा- “हुजूरे आली खानेखाना ने मुझे आपकी मिजाजपुर्सी के लिए भेजा है।”
“उनसे हमारा सलाम कहिएगा। उनके कुछ दोहे हमने सुने हैं। उन्हें हमारी सराहना की सूचना दीजिएगा और इस कृपा के लिए मेरा आभार भी प्रकट कीजिएगा।”
दूसरे दिन पैदलों और घुड़सवारों की सेना के साथ अपने हाथी पर अब्दुरहीम खानेखाना गोस्वामी तुलसीदास जी के दर्शनार्थ पधारे।उनके आने की सूचना पहले ही भेज दी गई थी। बड़ा सरकारी प्रबंध हुआ था। सूबेदार को देखने के लिए बाबा के निवास स्थान के आस पास बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। तुलसी और रहीम बड़े प्रेम से मिले। खानेखाना साधारण आसन पर बैठकर एक दूसरे से बातें करने लगे। उनके बंदी बनाए जाने के कारण रहीम ने क्षमा माँगी।उनके उपचार के लिए अपने खास हकीम को भिजवाने की बात भी कही। रहीम ने अकवर बादशाह के सम्बंध में कहा- "महाबली सब प्रकार अन्याईयों को कुचल रहें हैं। वे ऐसे धर्म का प्रतिपादन करते है जो मानव मात्र को एक कर सके।”
तुलसी बोले- "इसमें कोई संदेह नहीं कि अकबर शाह के काल में बड़ी व्यवस्था आई है। फिर भी समाज और शासन को और अधिक संगठित और न्यायशील होना चाहिए।”
“आपका कहना यथार्थ है गोस्वामी जी, अच्छा, तो अब आज्ञा लूँगा। स्वस्थ हो जायें तो एक दिन मुझे दर्शन देने की कृपा अवश्य करें। एक और निवेदन भी करना चाहता हूँ। मेरी इच्छा है कि आप जैसे महात्मा महाकवि को राज्य संरक्षण मिलना चाहिए।मैं यदि शाहंशाह सलामत को आपको कोई जागीर प्रदान करने के लिए लिखूँ तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?”
तुलसी हँसे, बोले-“आपकी बड़ी कृपा है खानखाना साहब, परन्तु ….
हम चाकर रघुवीर के, पढ़ौ लिखौ दरबार। 
तुलसी अब का होहिंगें, नर के मनसबदार।”

काशी की अँधेरी गलियों दर गलियों का जाल अपने कुतरे जाने की आशंका से सहसा चौकन्ना हो उठा था और उसे कुतरने वाले थे चूहे। घरों, खंडहरों और मैदानों के अँधेरें बिलों से रेंगते लड़खड़ाते चूहे निकलते, दो चार डग भरते और मर जाते थे। बिल्लियाँ तक अब उन्हें बिलों से बाहर देखकर नहीं झपटती थीं। एक घर से एक लड़का मरा हुआ चूहा दुम से पकड़कर हिलाता हुआ बाहर निकला और घूरे पर छोड़ आया। लौटकर घर पहुँचा तो माँ ने कहा- “अरे सिबुआ, तुम्हें बेटा एक बार और जाना पड़ेगा।”
"क्यो माँ“
“अरे बेटा, भंडारे वाली कोठरी के भीतर पाँच सात चूहे एक के पीछे एक लड़खड़ाते भए निकते और मर मर गए। ये क्या हुई गया है राम?” 
दूसरे दिन घर घर में तेज बुखार फैल गया था। नगर के छोटे बड़े किसी भी वैद्य हकीम को दम मारने का अवकाश नही था। गिरजादत्त वैद्य के बैठक और चबूतरे पर भीड़ जमा थी। एक कह रहा था- "ये तो भगवान का कोप भया है भैया।”
दूसरा बोला-“पण्डित गंगाराम ज्योतिषी हमारे लाला से कहते रहे, भेरौं कि ये रुद्र बीसी पड़ी है जो न हुई जाय सो थोड़ा है।” 
तीसरे ने कुछ सोच भरी मुद्रा में कहा- “भाई, हमनें तो इन दुइ तीन दिनों में यह अजमाया कि जिस घर से चूहे मरतें हैं, उसी घर में ये जानलेवा ज्वर आता हैं। हमारे पड़ोस में एक बुढ़िया, उसकी बहुरिया और पोते पोती, चारों के चारों पड़े हैं। चारों की बाँह में गिल्टियाँ निकली भई है। हमसे बिचारी का दुःख न देखा भया सो दवा लेवे आए हैं। यहाँ तो पानी देनेवाला भी कोई नही है।” पहले ने चिन्तित दुःखी स्वर में कहा-“हमरी घर में से बुखार में पड़ी है। अब हम भी जाने किसी दिन पड़ जायें। कौन ठिकाना। श्मशानों की ओर लाशें जा रहीं हैं। किसी के मुँह से बोल नहीं निकलता।किसी भी गली में घुसों, दो चार घरों से आती रोने चिल्लाने की आवाजें सुनने वाले के कलेजे पर आरियाँ चलाए बिना नही रहतीं।”

तुलसीदास रात के समय अकेले उदास मन, गलियों से गुजरते हुए कहीं जा रहें हैं। एक द्वार की कुण्डी खटखटाते हैं। एक तगड़ा सा युवक कुप्पी लिए बाहर निकलता है। गोस्वामी जी को देखते ही आश्चर्य चकित होकर जल्दी से कुप्पी चौखट पर रखकर चरण छूने को झुक कर पूछता है- “अरे बाबा, आप इतनी रात में?” 
“जटा शंकर, मैं तुमसे एक भिक्षा माँगने आया हूँ। 
“पहले भीतर तो चलें। हुकुम करें बाबा।” 
क्रमशः

Monday, 7 August 2023

151

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
151-

पूरे नगर में यह कथा बाँचीं जाए।”
जिनकी दूकान पर तुलसीदास जी विराजमान थे, वह लाला जी आाश्चर्य चकित मुद्रा से गोस्वामी जी को देखते हुए बोले- “बड़ी अनोखी बात कह रहे हैं महाराज जी। सारे नगर में कथा कैसे बाचेंगे आप? आज यहाँ कल वहाँ?”

तुलसीदास हँसे, कहा- “और क्या करेंगे।हम रामचरितमानस सुनाने के साथ तुम लोगों को रामलीला भी दिखाएँगे। बोलिए, आज के समय में पूरी रामलीला का खर्चा कौन उठाएगा भला?”
लाला जी गंभीर भाव से सिर हिलाकर बोले- “आप बिलकुल ठीक कहते हैं। आजकल बाजार बहुत मंदा है। दिन दिन भर दुकान खोले बैठे रहते हैं, और किसी किसी दिन तो गाहक भगवान के दर्शन भी नही होते हैं। क्या धनी, क्या निर्धन सभी एक से दुखी हैं और देखिए फिर अकाल पड़ रहा है। जब गाँव में प्रलय आती है तो वहाँ की परजा सीधे शहरो की ओर ही दौड़ती है और शहरों में भी कोई कहाँ से भीख दे महराज? बुरे समय में बड़े बड़े लछमीवालों की लछमी भी लजवंती हो जाती है, बाहर नहीं निकलती।”
“इसीलिए तो हम बिन टके का महायज्ञ रचाएँगे। यह अकाल की स्थिति ही हमें इस समय विशेष रूप से रामलीला रचाने की प्रेरणा दे रही है। जन करुणा को करुणासागर राम की लीलाओं को देख देखकर अपनी भक्ति की थाह मिलेगी। देखो, राम जी ने चाहा तो अगले पितृ पक्ष के बाद नवरात्र में रामलीला प्रदर्शन के साथ साथ तुम्हें रामचरित मानस सुनाई जाएगी।” 
गली में खड़ा हुआ एक बोला- “बात बहुत ऊँची कह रहे हो बाबा। नट बाजीगरी तो बहुत होती है और भद्दे भद्दे स्वाँग भी गली गली में होते हैं।राम लीला होगी तो अच्छा मन भी अच्छा बनेगा।”
“यही बात है। देखो, राम ने चाहा तो उनकी लीला बड़े धूमधाम से होगी।”
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बेनीमाधव जी बड़े ध्यानमग्न होकर बाबा के संस्मरण सुन रहे थे।एकाएक पूछा-“गुरू जी, ये आपकी सारी योजना बिना पैसे कौड़ी के सफल कैसे हो सकी?” 
“जो काम धनबल नहीं कर सकता वह जनबल से सहज सम्भव हो जाता है। हम नगर में जहाँ कहीं डोलते हुए पहुँच जाते वहीं हमसे रामयण बाँचने का आग्रह किया जाता। हम भी फिर अपनी जुगाड़ में लग गए। 
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तुलसीदास ने ठठेरों कसेरों से कहा-“चौधरी, अबकी नौरातों में हम रामलीला करना चाहते हैं।”
बनारसी चौधरी बोला- “यह तो बड़ी अच्छी बात है महाराज। फिर हमारे लिए क्या आज्ञा होती है? ”
“देखो चौधरी, जब लीला होगी तो राम जी, सीता जी, लछ्मन जी आदि देवी देवताओं के लिए मुकुट होने चाहिए। रावण का दस सिर वाला मुखौटा होना चाहिए और भी देवी देवताओं असुरों के मुखौटे होने चाहिए।”
“महराज जी, मुखौटे हम बनवा देंगे। सियाराम, लछिमन, चारों भइयों के ताँबे के मुकुट हम बनाय देगें। बाकी और सजावट का सामान आप गोदे वालों से कहके बनवाइए। हम अपनी बिरादरी के हर आदमी को एक एक मुखौटा बनाने का जिम्मा सौंप देंगे। जैसे आप कहेंगें वैसे बन जाएँगें और किसी पर बोझ भी नहीं पड़ेगा।बर्तन बनाते भए पत्तरों की काँट तरास और छीजन में ही आपके काम लायक पीतल ताँबा निकल आएगा।”
तुलसी बोले- “तुम्हारी बिरादरी में जो लोग उत्साही हो उनको कहो कि लीला भी खेलें। धर्म का काम है, दूसरे अपना और सबका मन बहलेगा। ठीक कहता हूँ न चौधरी?” 
चौधरी हाथ जोड़कर बोला- “अरे, हमरी बिरादरीवालों में यह सुनके ही उमंग भर जाएगी।सोचेंगें हमें ही लीला भी करनी है। घबराइए नही, बड़ी जल्दी ही सबको इकट्ठा करके मैं ले आऊँगा।” 

तुलसीदास केवटों के चौधरी रामा से बातें करने के लिए जब नौका घाट पर पहुँचे तो वहाँ बड़ा उत्पात मचा हुआ था। लड़के एक बजरे को घेरे खड़े थे और उसके बन्द कमरे के सामने ललकार रहे थे- “सीधी तरह निकल आओ, लाला तो थोड़ा सा दंड देकर ही छोड़ देगें। नहीं तो कुठरिया का दरवाजा तोड़के मारते मारते तुम्हारा और उस निगोड़ी झुनिया का कचूमर निकाल डालेंगे, जिसने हमारी बिरादरी की नाक कटा रखी है।”
तट के ऊपर बड़े-बूढ़े केवटों की भीड़ खड़ी चुपचाप तमाशा देख रही थी। गोस्वामी जी के पहुँचते ही सब पैर छूने आगे बढ़े। उन्होंने पूछा- “यह किस बात का उत्पात हो रहा है, भइया?” 
रामा बोला- "क्या कहें महराज, कलिकाल है। झूरन साहु हम लोगों को कर्जा क्या देता है कि ब्याज में हमारी आबरू भी लूटता है। इसी बस्ती की एक चुड़ैल है महाराज, वही हर घर से उसके सिकार पकड़ पकड़कर लाती है। आज लड़कों ने पकड़ लिया है सो दंड दे रहे हैं।” 
लड़के तब तक कोठरी का द्वार तोड़कर झूरन और झुनिया को अन्दर से बाहर घसीट लाए और उनकी मरम्मत करने लगे। तुलसी ने कहा- “अच्छा है, जब सेर पर सवा सेर पड़ता है तभी दुष्ट मानतें हैं । जैसे कृष्ण ने नागनथैया की थी वैसे ही हमारे युवकों को दुष्टो की नागनथैया भी करनी चाहिए।” थोड़ी देर तक झूरन की धुनाई होती रही, फिर गोसाईं जी ने ही आगे पढ़कर उसे और झुनिया को कुछ युवकों के घेरे से मुक्त कराया। आदेश देकर सबको शान्त किया, फिर केवटों के चौधरी से कहा-“रामा भइया, हम राम लीला करवाना चाहते हैं।”
“यह कैसे होयगी गुसाईं जी ?”
“ये ऐसे होगी कि जब सियाराम जी, लछ्मन जी गंगा पार करके वन को जाएगें तो तुम्हीं उन्हें पार उतारोगे और राम जी के चरण पखार के अपना जीवन सार्थक करोगे।”
“सच्ची महाराज? ”
“हाँ, रामा, तुम यहाँ के केवटों के चौधरी हो, निषादराज से क्या कम हो?”
“अरे, गोसाईं जी, हम और हमारी सारी बिरादरी आपके साथ है। जैसे कहोगे वैसे करेंगे।”
हिरदे अहिर की गौशाला के तखत पर गोस्वामी जी विराजमान हैं। हिरदे तखत के नीचे सविनय बैठा हुआ कह रहा है- “इत्ती सी बात कहने के लिए आप दौड़ के आए। अरे, हमें कहलाय दिया होता तो हम आप आ जाते। बाकी हमारे जवान तो यह सुनते ही फड़क फड़क उठेंगे महाराज। स्वागँ भरने का चाव किसे नहीं होता और फिर राम जी के बानर बनने की बात सुनकर तो लड़के ऐसे मगन होंगे कि कुछ न पूछिए।”
“उन्हें वानर तो बनना ही है हिरदे, बाकी यह है कि स्वरूपों की सुरक्षा के लिए भी तुम्हें कुछ लठैत देने होंगे।
क्रमशः

Sunday, 6 August 2023

149

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
149-

वे राजी हो गए।
“यह सभा तो विश्वनाथ जी के मन्दिर में हुई थी न गुरू जी?”
“विश्वनाथ जी का यह मन्दिर उन दिनों निर्माणाधीन था किन्तु उसके पास ही यह पण्डित सभा जुड़ी। मैंने रामायण बाँचना आरम्भ कर दिया। राम जी का ऐसा स्नेह वर्षण हुआ वेनीमाधव, कि ज्यों ज्यों कथा आगे बढ़ती जाती थी, त्यों त्यों पण्डित मण्डली पर उसका प्रभाव भी बढ़ता जाता था। कथा के अन्तिम दिन….
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“राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल हरनि मनोमल हरनी। 
संसृति रोग संजीवनी मूरी। राम कथा गावहिं स्रुति भूरी॥”

पंडित सभा में सभी के चेहरे मंत्रमुग्ध से लग रहे थे। स्वर की मधुरता, शब्दों का जादू और भक्ति रस की अजस्र निर्मल धार काशी के प्रमुखतम शंकर मतानुयायी सर्वमान्य महापण्डित परम चरित्रवान संन्यासी मधुसूदन जी सरस्वती के रोम रोम को आनन्दप्लावित कर रही थी। केवल बटेश्वर मिश्र और उनके जैसे कुछ लोग ही जले भुने जा रहे थे। मधुसूदन सरस्वती से लेकर सभा में बैठा हुआ प्रत्येक बोधवान संन्यासी और पण्डित का चेहरा उन्हें शत्रुवत‌ लग रहा था।वे और उनके पक्ष के अंध शिवभक्त और कुटिल वैष्णव एक दूसरे को देख देखकर आँखें मिचमिचा रहे थे। खीझ, हार और क्रोध की चढ़ती उतरती लहरें उनके चेहरो को विद्रुप बना रहीं थीं।
कथा चलती रही। गोस्वामी जी ने अंतिम दोहा पढ़ा और पढ़ते पढ़ते राम के ध्यान में वे ऐसे मग्न हो गए कि उन्हें अपने तन बदन का होश तक न रहा। हाथ जोड़े बैठे हुए तुलसीदास की गौर काया संगमरमर की सजीव मूर्ति सी लग रही थी। उनके मुख पर परम सन्तोष और अपार आनन्द छाया हुआ था।
कथा समाप्त हुई, मधुसूदन जी सरस्वती भी कुछ देर तक आँखें मूँदे आनन्दमग्न बैठे रहे, फिर धीरे धीरे उनकी आँखें खुलीं। वे बड़े प्रेम से ध्यानावस्थित तुलसी दास को देखने लगे, फिर अपने आसन से उठे, तुलसीदास के पास आए और बड़े स्नेह से उनके सिर पर हाथ फेरने लगे। तुलसीदास की आँखें खुलीं, सिर उठाकर देखा, उन्हें लगा कि गंगा चन्द्र सर्पो और बाघाम्बर से विभूषित साक्षात्‌ शिव उनके सिर पर हाथ फेर रहें हैं। जटाशंकरी गंगा की धारा उनके ग्रन्थ पर पड़ रही है। पृष्ठों की चौहद्दी अपना रूप परिवर्तित करके सात सीढ़ियों वाले एक विशाल सरोवर के रूप मे बढ़ती ही चली जा रही है। उसमें गंगा भरती ही चली जा रही है। धारा में , सरोवर की उठती लहरों में, जहाँ देखो वहीं सिया राम की छवि ही दिखलाई पड़ रही है। तुलसी गदगद हो उठे। मधुसूदन जी सरस्वती ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा-
“आनन्द कानने ह्मस्मिन्‌ जंगमस्तुलसीतरु:। 
कविता मंजरी यस्थ रामभ्रमरभूषिता॥”

सभा मण्डप से निकलकर भीड़ गली के 
बाहर आ रही थी। रामचरित मानस ग्रन्थ काठ की पेटी में बन्द था। टोडर पेटी को अपने हाथों में लेकर तुलसी और गंगा राम के पीछे पीछे चल रहे थे। अनेक पण्डित तुलसीदास जी के साथ ही साथ चलते हुए उनकी प्रशँसा का सुमेर भी खड़ा करते चल रहे थे। सभा मण्डप के बाहर पचास लठैत खड़े थे।टोडर के पास पहुँचते ही वे लठैत उनके आगे पीछे, चारों ओर मजबूत दीवार बनकर चलने लगे। बटेश्वर मिश्र और उनकी दुष्ट मण्डली बड़ी तेजी के साथ लठैतों की भीड़ में धँसकर उन्हे बिखेरने का प्रयत्न करने लगी किन्तु सफल न हो सकी। बटेश्वर के सामने पड़नेवाला अहिर उनके आगे बढ़ने पर जब तनिक सा भी इधर उधर न हुआ तो लाल लाल आँखें निकालकर वे बोले-“सरक उधर, रस्ता दे।”
लठैत बोला- “इत्ता तो रस्ता पड़ा है महाराज, चले काहे नही जाते?”
बटेश्वर जी गरज उठे- “ससरऊ, जानता है हम कौन हैं? मै अभी का अभी तुमको भस्म कर सकता हूँ।”
अहिर युवक भी तेज पड़ा, वह भी आँखें निकालकर बोला- “ए बटेसुर महराज, जो तोहे आपन इज्जत प्यारी होय तो चुप्पे तें निकल जाओ। नाही तो ई जान लेव कि चाहे हमें बराहम हत्या का दोष लगे, चाहे जो हुइ जाय, हम तोहरी ई तंत्र मंत्र भरी खोपडि़या एके ते दुइ बनाइ देव। समझयौ कि नाहीं। ”
लड़ाई झगड़ें की आवाजों से तुलसीदास और उनके साथ चलने वाली भीड़ इधर देखने लगी।
 “क्या बात है, क्या बात है?” की गुहार पड़ी। तुलसीदास के साथ वाली भीड़ गली में ज्यों ही एक ओर सिमटी त्यों ही रामायण की पेटी लिए टोडर ने अपने आगे के लठैत अहिर से कहा- “बढ़े चलो हिरदै, हम लोग रुकेंगे नहीं।”लठैतों की अगली पँक्ति बढ़ी तो पिछली स्वाभाविक रूप से अपने साथियों के पीछे चली।तुलसीदास के साथ वाले पण्डित उन्हें रास्ता देने के लिए गली में और सिमट आए। अब तुलसीदास और बटेश्वर आमने सामने थे। बटेश्वर तुलसी दास को देखते ही क्रोध के मारे बौरा गए। लाल आँखें दिखलाते हुए हाथ बढ़ाकर वे गरजने लगे- "रे नीच नराधम, सम्मोहिनी मंत्र से मधुसूदन जी महाराज को तथा इन सारे पण्डितों को बाँधकर तूने अपने दम्भ का जो जाल फैलाया है उसे मैं निश्चय ही तोड़ फोड़ कर नष्ट-भ्रष्ट कर डालूगा।अरे नीच मैं तेरी हत्या कर डालूँगा।”
लठैतों की भीड़ पोथी लेकर आगे बढ़ गई थी। तुलसी हाथ जोड़कर बोले - “मिश्र जी, आप मुझसे बड़े है, गुरुभाई हैं, आपके इन वचनों को मैं प्रसाद के रूप में ग्रहण करता हूँ।” 
एक बूढ़े पण्डित बोले- “अरे बटेश्वर, मिथ्या क्रोध और दर्म्भ को बढ़ाकर क्यों अपनी फजीहत करते हो? सूर्य पर थूकोंगे तो वह तुम्हारे ही ऊपर गिरेगा भैया।” 
अपने साथ के कुछ लोगों के द्वारा शांत करके आगे बढ़ाए जाने पर बटेश्वर बढ़े तो अवश्य किन्तु तुलसीदास और गंगाराम के पास से गुजरते गुजरते वे एक बार फिर भड़के बिना न रह सके। अपनी तर्जनी हिला हिलाकर वे कहने लगे- “अरे, मैं पन्द्रह दिनों के भीतर ही तुमको, इस नीच गंगाराम को, टोडर को, तुम्हारे सभी पक्षधरों से भरी सारी काशी का सत्यानाश कर डालूंगा।” 
उन लोगों के आगे बढ़ जाने के बाद पंडित घनश्याम शुक्ल ने कहा- “गोस्वामी जी, भाषा में काव्य रचने के लिए मैं अनेक वर्षो से अपने मन ही मन में तड़प रहा था किन्तु साथी पण्डित सदा मुझे भाषा में कविता लिखने से निरुत्साहित करते रहे। आपके मानस महाकाव्य से आज मुझे अपार मनोबल और स्फूर्ति मिली है। मैं भी अब भाषा में काव्य रचूँगा।” 
क्रमशः

150

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
150-

तुलसी बोले- “भैया….
“का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिये साँच।
काम जो आवे कामरी, का ले करे कुमाच।”
भाषा लाखों लोग समझते हैं। भाषा की शक्ति राम शक्ति है।” 
एक पण्डित ने पूछा- “अब तो आप काशी में कहीं अवश्य ही जन जनार्दन को पूरी रामायण सुनाएँगे?” 
“हाँ, विचार तो यही है।” 
“परन्तु इस बार आपको कथा सुनाते समय लठैतों और धनुर्धरों की पूरी सेना ही अपनी और ग्रंथ की सुरक्षा के लिए रखनी होगी।काशी के अनेक धनी मानी सज्जन और उनके पिट्ठू, बहुत से हाकिम हुब्काम भी इन लोगों के साथ हैं।आपके द्वारा गली गली में ये जो अखाड़े खुलवाए गए हैं और युवकों का दल जिस तरह आपके साथ संगठित हो रहा है उसे यह लोग फूटी आँखों से भी नहीं देख पा रहे।हाँ महाराज, सावधान रहिएगा, ये दुष्ट लोग जो न कर डालें सो थोड़ा है।” 
“मैं सावधान हूँ घनश्याम। सदा सावधान रहने के लिए ही मैं राम को अपने मन में समाए रखता हूँ। चिन्ता न करो बन्धु, इस बार काशी में मैं नये ढंग से रामायण सुनाऊँगा।”
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मठ के अपने वाले दालान में गोस्वामी तुलसीदास अपनी मित्रमंडली टोडर, कैलासनाथ और गंगाराम के साथ विराजमान हैं। तुलसीदास बात आरम्भ करते हुए बोले- “मैंने आपको आज एक विशेष कारण से बुलाया है। मैंने खूब दत्तचित्त होके सोच विचार कर एक निर्णय लिया है। मैं यह मठाधीशता अब छोड़ना चाहता हूँ।”
टोडर बोलने की विकलता में आगे बढ़ आए और अपने दोनों हाथ आगे की ओर बढ़ाकर बोले- “कोई निर्णय लेने से पहले तनिक मेरी भी सुन लीजिए। यह माना कि गोसाइयों के प्रबल विरोध से इस मठ की आमदनी को धक्का पहुँचा है पर आप चिन्तित न हों। चाहे इस मठ के सारे सहायक उन दुष्टों के बहकावे में आकर सहायता देना बन्द कर दें, तब भी आपका यह सेवक अपने जीते जी कुल खर्चा उठाने को तैयार है।”
कैलास बोले- “टोडर जी, जहाँ तक मैं समझता हूँ, तुलसीदास का दृष्टिकोण आपके दृष्टिकोण से सर्वथा अलग है। इन्होंने किसी दूसरे कारण से यह निर्णय लिया है। क्यों तुलसी, में गलत तो नहीं कह रहा हूँ?”
तुलसी बोले- “जो कारण टोडर के ध्यान में आया है वह अंशतः ठीक है, पर, तुमनें सही कहा, मूल कारण और है। मैं यह रजोगुणी परिवेश अब सह नहीं पाता गंगाराम। यह मुझें आठों याम खलता है। टोडर, मैं अस्सी घाट पर
तुम्हारे बनवाए हुए अपने उसी प्राचीन स्थान पर लौट जाना चाहता हूँ । वहाँ 
हर प्रकार का आदमी आठों याम मेरे पास स्वतन्त्रता पूर्वक आ सकेगा। मेरी वह गली गली घूमने और नाम प्रचार करने की पुरानी परिपाटी जब फिर से आरम्भ होगी, तभी मुझे सुख मिलेगा।”
गंगाराम बोले- “टोडर, सूर्य को कोठरी में बन्द नहीं किया जा सकता। यह जैसा जीवन बिताना चाहते हैं वैसा ही बिताने दो।”
कैलास बोले- “यह जब तक अपने घट घट व्यापी राम से न मिलते रहे तब तक इनका योग पूरा नहीं होता। मैं इन्हें सदा से जानता हूँ।”
तुलसीदास मुस्कराए, बोले- “कवि के साथ प्रारब्ध ने मुझे कथा वाचक भी बनाया है। मैं रामायण सुनाना चाहता हूँ और राम नाम प्रचार करना चाहता हूँ। आज के हारे थके, हर तरह से टूटे बुझे हुए जनजीवन को इस आस्था से भर देना चाहता हूँ कि न्याय, धर्म, त्याग और शील आज भी इस जग में विद्यमान हैं। कोई चिनगारी को छोटा न समझे, वह किसी भी समय अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर निश्चय ही महाज्वाला बन जाएँगी। राम थे, राम हैं, राम सदा रहेंगे और इस पृथ्वी पर एक दिन रामराज्य आकर रहेगा।”
टोडर बोले- “आपकी इच्छा ही मेरे लिए वेद वाक्य है महात्मा जी, परंतु मेरे सामने फिर वही की वही समस्या आ जाती है, इस मठ का गोस्वामी पद किसे प्रदान किया जाए?”
गंगाराम बोले-“तुलसीदास, मैं जब जब तुम्हारे इस मठ में आया हूँ, मुझे इस मठ का तुम्हारा वह शिष्य, जिसके छोटी सी दाढ़ी है, क्या नाम है उसका….”
“हरेकृष्णदास”- कहते हुए तुलसीदास की आँखों में चमक आ गई,कहा-“तुमने ठीक सोचा। मूल मथुरावासी है, शांत शिष्ट और भावुक है।”
टोडर बोले- “वह तो पहले भी था महात्मा जी, किन्तु लोग कहते हैं कि वह अभी बहुत युवक है।”
तुलसी हल्की झिड़की सी देते हुए बोले-“यह बेकार का तर्क हैं। उसकी आयु पैंतीस छत्तीस वर्ष से कम तो है नहीं। तुम चिन्ता न करो, मैं तुम्हारी बिरादरी वालों की समझा लूँगा। मेरे जाने से कुछ लोग जो अन्य गोसाइयों के प्रभाव में है, निश्चय ही संतुष्ट होंगे और हरेकृष्ण दास का नाम सहर्ष स्वीकार कर लेंगे।”

“मैं फिर से अस्सी घाट पर आ गया। अखाड़े पर अब पहले से अधिक जमाव होता था। टोडर ने एक भवन में मेरे लिए रहने की सुखद व्यवस्था कर दी। मैं जो पहुँचा तो पुराने लोग बड़े प्रसन्‍त हुए। नगर में अपने सभी पुराने परिचितों से स्वच्छन्दता पूर्वक घूम घूमकर मिलना आरम्भ किया।”
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विश्वनाथ मंदिर की गली में तुलसीदास एक बर्तनवाले की दूकान पर बैठे हैं। गली में आते जाते लोगों की एक छोटी सी भीड़ उनके आसपास खड़ी है। सब लोग बड़े प्रसन्‍न हैं। गोस्वामी जी हँसकर कह रहे हैं- “बन के पंछी को चाहे सोने के पिजड़े में क्यों न बिठला दो, हीरे मोती मानिक जड़ी कटोरियो में दाना पानी क्‍यों न दो, पर उसे वह सुख नहीं मिलता जो डाल डाल पर डोल डोलकर चहकने में मिलता है।” 
एक निर्धन, फटेहाल सा आदमी, जो गली में खड़ा हुआ था, बोला- “ठीक कहा, गुसाईं जी, अरे नामी ग्रामी बड़े बड़े दिग्गजों में एक आप तो रहे जिन्हें हम अपना समझते रहे और आप भी पालकी वालकी में चढ़कर तुरही वरसिधे के साथ आने जाने लगे तो हमारा सच्ची मानों, मन का सारा मजा चौपट हुइ गया रहा गुसाईं जी। अब हमें फिर से लगा कि नहीं जो हमारा है सो हमारा ही है। जियो महाराज, जुग-जुग जियो महाराज।”
दूसरा बोला- “महाराज जी, अब कहीं अपनी वह रामायण बाँचिएगा न जिसके पीछे पंडितों में इतने अखाड़े दंगल हुए।” सभी ने एक साथ उल्लसित होकर, हाँ हाँ, कहा।
गोसाईं जी बोले- “हम भी रामायण बाँचना चाहते हैं।हमारे मन में यह विचार हो रहा है कि इस कथा में सभी लोग सम्मिलित हो।
क्रमशः

Friday, 4 August 2023

148

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
148-

तुलसी बोले- “आदि कवि के परम पावन ग्रन्थ से उसकी तुलना न करो देवी। वैसे यह जानकर मैं संतुष्ट हुआ कि तुमने वह ग्रन्थ पढ़ लिया।”
“राम चरित मानस की एक प्रति…….।”
“शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँच जायेगी।टोडर प्रतिलिपियाँ कराने की व्यवस्था कर रहे हैं।”
“एक बात और पूछना चाहती हूँ, आज्ञा है।”
“पूछो देवी”
“महर्षि ने उत्तर कांड में धोबी द्वारा निंदा सुन कर श्री रामजी के द्वारा सीताजी का त्याग कराया है।आपने मानस में वह प्रसँग क्यों नहीं उठाया।”
तुलसीदास सुन कर चुप।चुप्पी लम्बी रही।
“यदि मेरा प्रश्न अनुचित हो तो क्षमा करें।”
“नहीं, तुम्हारा प्रश्न जितना सहज है मेरे लिए उत्तर देना उतना सरल नहीं है।”
“कोई बात नहीं, जातीं हूँ।”
“उत्तर सुन जाओ देवी, मैं तुमसे कुछ न छिपाऊँगा।जो अन्याय मैं तुम्हारे प्रति कर सका, वह मेरे रामचंद्र जगदम्बा के प्रति नहीं कर सकते थे।”
रत्नावली की आँखें बरस पड़ीं।कुछ देर रुककर तुलसी गोसाईं ने पूछा- “गईं”
रुदन कंपित स्वर में रत्ना बोली- “जा रही हूँ”
“रो रही हो रत्ना ?”
“संतोष के आँसू हैं”
“अब न बहाओ, देवी नहीं तो मेरे मन का धैर्य और संतोष बंट जायगा। सेवक का धर्म कठिन होता है।” कहकर गोसाईं जी ने एक गहरी ठंडी साँस ली। 
“जाती हूँ, एक भिक्षा और माँग लूँ?”
“माँगो”
“मेरी मृत्यु से पहले एक बार मुझे अपना श्रीमुख दिखलाने की कृपा करें।”
“वचन देता हूँ, आऊँगा।” 
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“रत्नावली चली गई। उसका जाना मुझसे शत्रुता रखनेवाले लोगों की रोषवृद्धि का एक और प्रबल कारण बन गया” 
“क्यों गुरू जी?” बेनीमाधव ने पूछा।  “गृहस्थ गोस्वासियों को लगा कि ऐसा करके मैंने उनकी मान प्रतिष्ठा को गिराया है।”
“उनके लिए यह सब सोचना कदाचित्‌ स्वाभाविक ही था। पापी लोग पुण्य- शील महात्माओं के नैसर्गिक शत्रु होते ही हैं। तो उन्होने किस प्रकार से आपका विरोध किया गुरू जी?” 
“पहला विरोध मठ की अर्थव्यवस्था को भंग करने की चेष्टा के रूप में हुआ।”
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मठ के द्वार पर दो सण्ड-मुसण्ड वैरागी चौखट के दोनों ओर बैठे थे। उनमें से एक प्रात.काल दर्शन करने और प्रवचन सुनने के लिए आये हुये नर-नारियों की छोटी सी भीड़ को बड़े रोष के साथ सम्बोधित कर रहा था- “यहाँ कोई मत आओ। यह धर्म का नहीं वरन‌ अधर्म का मठ है। नये गोस्वामी के आगमन से यहाँ पापाचार बहुत अधिक बढ़ गया है।”
एक संभ्रांत भक्त सविनय हाथ जोड़कर सतेज स्वर में बोला- “यहाँ तो मैंने एक दिन भी पापाचार नहीं देखा गुसाँई जी। महात्मा तुलसीदास जी पर आप जैसे पूज्य पुरुषों का मिथ्या दोप लगाना अच्छी बात नहीं है।”
कई अधेड बूढ़ी स्त्रियाँ प्रायः एक साथ ही चेंचा-मेचीं कर उठीं-“अरे इत्ती अच्छी कथा सुनाते हैं। ऐसा भजन भाव करते हैं। उनके मुँह पर ऐसा तेज टपकता है कि बनारस भर मे किसी साधु महात्मा के मुँह पर वैसा तेज देखने को नहीं मिलता।”
युवक गोसाई उत्तेजनावश उठकर खड़ा हो गया, चिल्ला चिल्लाकर कहने लगा- “उसके मुह पर तेज देखती हो? तेल फुलेल से अपना मुँह चमका के ढोंग  रचाने वाला पापी जिसे तेजवान महात्मा दिखाई पड़े वह मूर्ख है। जो ढोंगी हमारे इष्टदेव नन्दनन्दन गोपीवल्लभ राधा रमण श्री कृष्ण परमात्मा को गौण बताकर अपने इष्टदेव को ऊँचा बताए, उससे बड़ा ढोंगी और पापाचारी भला और कौन होगा? भागवत‌ जैसे परम पवित्र ग्रन्थ को छोड़कर वह यहाँ अपनी रची हुई रामायण सुनाएगा।कहाँ तो महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवत्‌, जो अठारह पुराणों से भी श्रेष्ठ है और कहाँ एक ढोंगी तुक्कड़ की भ्रष्ट कविता।न उसे मात्राओं का ज्ञान है व छन्द का। हम यहाँ अनशन पाटी लेकर पड़ेंगे। हम अपने जीते जी ऐसा पापाचार कदापि नहीं होने देंगे।”
उनके धरना देने से गोस्वामी तुलसीदास जी की क्रोध रूपी गौ भड़क उठी। उन्हें लगता था कि जैसे लंका पर चढ़ाई करने के लिए राम जी सेना सहित समुद्र के तट पर खड़े थे और समुद्र उन्हें जाने की राह नहीं दे रहा था वैसे ही यह दुष्ट उनके राम कथा प्रसार मे बाधक बने हैं। वे टोडर तक को मन्दिर के भीतर नहीं आने देते थे।
एक दिन क्रोध को अपने वश में न रख सकने के कारण तुलसी बाहर निकल आए। टोडर से कहा- “कथा मैं अवश्य सुनाऊँगा।तुम डुग्गी पिटवा दो कि कथा अब अस्सी घाट पर होगी।”
एक गोसाईं युवक उत्तेजित हो गया, बोला- “कथा तुम्हारे बाप दादे भी नहीं सुना सकते। हमारे जीते जी काशी में यह अनाचार नहीं होगा।अपनी रामायण को गंगा जी में डुबा दो।”
“मेरी रामायण, जन-जन की हृदय गंगा में प्रिय बनकर तैरेंगी।राम कृपा से यह कथा अवश्य होगी। शंकर भोलानाथ स्वयं मेरी कथा सुनेंगे।”
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“डुग्गी पिटी। वैष्णवो और शैवों में कुटिल प्राणियों का प्रबल संगठन मेरे विरुद्ध बन गया। कहाँ तो वे लोग आपस में एक दूसरे को गालियाँ देते फिरा करते थे और कहाँ अब दोनों मिलकर मेरे विरुद्ध प्रचार करने लगे। मेरे पुराने विरोधी बटेश्वर मिश्र कुछ पण्डितों की ओर से यह निर्णय ले आए कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमातस एक अत्यन्त निकृष्ट काव्य है। इसमें धर्म, दर्शन तथा भक्ति का गलत निरूपण हुआ है। काव्य की दृष्टि से यह एकदम हीन और अशुद्ध है। इसे सुनने वाले को घोर रौरव नरक भोगना पड़ेगा। यमदूत उसके कानों में खौलता हुआ तेल डालकर उसे दण्डित करेंगे।
मेरे लिए वे दिन बड़े ही दुखदाई सिद्ध हुए, किंतु गंगाराम तथा टोडर की दौड़ धूप से काशी के पण्डितों का एक और निर्णय भी गली गली में प्रचारित होते लगा। इन पण्डितों ने पहले, प्रचारित किए निर्णय को भ्रामक बतलाया। कुछ पण्डितगण, जिन्होंने कि रामायण के थोड़े बहुत अंश सुन रखे थे, यह कहने लगें कि यह तुलसी के प्रति मिथ्या प्रचार है। नगर का जनमत भी पहले वाले निर्णय के विरुद्ध था। स्वयं पण्डितों में ही विकट द्वंद्व मचने लगा। उन दिनों काशी में मेरा बाहर निकलना दूभर हो गया था। जिघर जाओ उधर ही निन्‍दक भी मिलते और प्रशंसक भी। मैंने सोचा कि रामकथा को लेकर ऐसा राग द्वेष बढ़ाना उचित नहीं। स्वामी मधुसूदन जी सरस्वती काशी के सभी पण्डितों को मान्य थे। मैंने उससे जाकर निवेदन किया कि महाराज, आप रामचरित मानस सुनें, यदि आपकी दृष्टि में वह ग्रन्थ हीन सिद्ध हुआ तो मैं उसे तुरन्त जाकर गंगा जी में प्रवाहित कर दूँगा।
क्रमशः

Thursday, 3 August 2023

147

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
147-

रत्नावली पालकी से उतर कर ऊपर चली गईं।नाथू नाई गोस्वामी जी की सेवा में पहुँचा, उनके चरणों में ढोका लगाया।एक भृत्य ने आकर गोसाईं जी को पंडित गंगाराम के घर से माताजी के लौट आने का समाचार दिया।तुलसीदास ने उससे कहा- “उनसे बराबर पूछते रहना, उनकी सेवा में किसी प्रकार की कोई कमी न आए।”
भृत्य के द्वारा जो आज्ञा कह कर जाते ही, पानी की कटोरी लेकर गोस्वामीजी के पास आते हुये नाथू नाई बोला- “माताजी आ गईं सरकार, यह बड़ा सुभ भया।”
तुलसीदास चुप रहे।गोसाईं जी की ठोड़ी को पानी से तर करके मींजते हुये नाथू ने अपना राग अलापा- “ये दुनिया वाले बड़े कमाने होते हैं महाराज।कलयुग में सबका मन काला हो गया है।” तुलसीदास आँखें मींचे बैठे रहे।नाथू ने बात को फिर आगे बढाया- “जब से माताजी आईं हैं तब से लोग बाग रोज हमसे पूछतें हैं कि माताजी क्या अब यहीं रहेंगीं।अब हम क्या कहें सरकार।अरे माताजी का मन जहाँ चाहे रहें? भला उनका क्या जाता है? बड़ी हवेली वाले गोसाईं महाराज भी तो गिरहस्त हैं, उनको कोई कुछ नहीं कहेगा।आपके लिए सारी रोक टोक? कहते हैं चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी पाख है।अब ये तपस्या छोड़ कर भोग विलास…….।”
तुलसीदास के मन का संतोष और शांति बालू की दीवार की भाँति ढह गया।वे उत्तेजित हो गये, बोले- “इस प्रसँग को अब यहीं और इसी समय समाप्त कर दो।”
नाथू नाई तुलसीदास का रूख देख कर, सहम कर चुपचाप अपने काम में लग गया।तुलसीदास के मनोलोक में अंधड़ उठने लगे।कभी अपने ऊपर, कभी दुनिया पर, कभी रत्नावली पर और कभी राजा भगत पर क्रोध आता कि ये लोग उनकी शांति भंग करने यहाँ क्यों आये।हजामत बनती रही, सिर और गालों पर उस्तरा चलता रहा।तुलसीदास  जी का मन इन सारी बाहरी क्रियाओं से अलिप्त होकर अपनी करूणा से आप विगलित होने लगा।जब अपनी विकलता को सह न पाया तो रामजी के चरणों में शांति पाने के लिए दौड़ पड़ा- “हे दीनबन्धु सुखसिंधु कृपा कर, कारूणीक रघुराई।सुनिए नाथ, मेरा मन त्रिविध ताप से जल रहा है।वह बौरा गया है।कभी योगाभ्यास करता है तो कभी वह शठ भोग विलास में फँस जाता है।कभी कठोर और कभी दयावान बन जाता है। कभी दीन, कभी मूर्ख कंगाल और कभी घमंडी राजा बन जाता है।वह कभी पाखंडी बनता है तो कभी ज्ञानी।हे देव मेरे मन को यह संसार विविध प्रकार से सता रहा है।कभी धन का लालच सताता है, कभी शत्रु भय सताता है।मैं अपने मन से बहुत दु:खी हूँ रघुनाथ।संयम तप जप नियम धर्म व्रत आदि सारा औषधियाँ करके हार गया किंतु मेरा मन मेरे काबू में नहीं।कृपा इसे निरोगी बनाइए।अपने चरणों की अटल भक्ति देकर इसे शांत कीजिए नाथ।मैं अब बहुत तप चुकाँ हूँ।”- बंद आँखों से आँसू टपकने लगे।
नाथू ने जो यह देखा तो अपना उस्तरा रोक दिया।उसके उस्तरे और हाथ का स्पर्श हटते ही तुलसीदास बाहरी होश में आ गये।भरी हुईं आँखें खोल कर एक बार देखा, फिर पास रखे अगौछें से आँखें पोंछ कर बोले- “तुम अपना काम करो नत्थू, मेरा मन तो राम बावला है कभी हँसता है कभी रोता है।”
नाथू नाई जब काम करके जाने लगा तो तुलसीदास बोले- “अब जो तुमसे कोई पूछे तो कह देना कि माताजी अपने मोहवश चार दिन के लिए आईं हैं, शीघ्र ही चली जायेंगीं।”
“काहे महाराज,रहैं न। दो ही दिनों में मठ के सारे लोग उनकी बढ़ाई करने लगे हैं।गोसाईं लोग तो घर गिरहस्ती वाले होते हैं।”
“मैं दूसरे गोसाईयों की तरह अनीति की चाल कदापि नहीं चल सकता।मैंनें ग्रहस्थाश्रम का त्याग किया सो किया।”- उनके चेहरे पर हठभरी अहंता दमक उठी।थोड़ी देर बाद ही उन्होंने नौकर को बुलाकर रत्नावली को कहलवाया कि वे शीघ्र ही राजापुर लौट जायें।रत्नावली ने उसी दास से कहलवाया कि वे उनसे मिलना चाहतीं हैं।एक बार तुलसीदास का मन हुआ कि वे मना कर दें, फिर कहते कहते रूक गये और कहा- “भेज दो।कोठरी का पर्दा गिरा दो और उनके बैठने के लिए बाहर आसन भी बिछा दो।”
रत्नावली आईं।अपने और पतिदेव के बीच में टँगे परदे को देखा और सिर झुका कर खड़ी हो गईं, पल भर बाद धीरे से खँखारा और कहा- “जै सियाराम”
“जै सियाराम, बाहर आसन बिछा होगा विराजो।”
“मैं आपके दर्शन नहीं कर सकती।”
तुलसी एकाएक उतर नहीं दे सके, कुछ रूक कर शांत स्वर में कहा- “लोक धर्म बड़ा कठिन होता है देवी।व्यर्थ निंदा से बचने के लिए रामजी को जगदम्बा का त्याग करना पड़ा।तुम घर कब लौट रही हो।”
“मैं अब काशी में ही रहना चाहती हूँ।”
“नहीं”
“मैं मठ में नहीं रहूँगी।पंडित गंगाराम जी की गृहिणी ने मुझे…..।”
“पंडित गंगाराम या टोडर के यहाँ तुम्हारा रहना उचित नहीं है।”
“मैं स्वयं यह उचित नहीं समझती।अलग घर लेकर रहूँगी।”
“नहीं”
रत्नावली का टूटता मन उनके चेहरे पर दिखाई देने लगा, गिड़गिड़ा कर बोलीं- “मैं यहाँ आपको कष्ट देने के लिए कभी नहीं आऊँगी।कभी आपके सामने नहीं पड़ूँगीं।आपके तप में कोई बाधा नहीं डालूँगी।”
“नहीं, तब भी नहीं”
“आप रामजी का सानिध्य चाहते हैं,यदि वे इसी प्रकार आपसे न कह दें तो।”
सुन कर तुलसी एक बार तो निरूत्तर ही हो गये।मन लड़खड़ाया, परंतु तुरंत ही उसे कस कर कहा- “श्री राम और इस अधम तुलसी में अंतर है देवी।लोक का चरित्र गिराहुआ है।उसे उठाने की कामना रखने वाले को कठिन त्याग करना होगा।लोक कल्याण के लिए तुम भी तपो देवी।अब इस जन्म में हमारा तुम्हारा साथ नहीं हो सकता।”
पर्दे को दोनों ओर कुछ देर चुप्पी रही, फिर रत्नावली ने रूँधे हुये गले से कहा- “जो आज्ञा, मैं कल ही चली जाँऊगी।”
पर्दे के उस पार फिर चुप्पी छा गई।कुछ पलों बाद रत्नावली ने कहा- “जाने से पहले एक बार चरण स्पर्श करने की……।”
“मेरा मन अभी दुर्बल है देवी, तुम्हारे स्पर्श से मेरी तपस्या पर आँच आ जायेगी।”
“जो आज्ञा”- गला रूँध गया।पर्दे के आगे झुक कर धरती पर मस्तक टेक दिया।आँसू उमड़ पड़े।भीतर से तुलसी दास ने पूछा- “गईं?”
“जा रही हूँ…. एक भीख माँगतीं हूँ।”
“बोलो”
“पंडित गंगाराम जी के घर मैनें आपके द्वारा रचित राम चरित मानस का पारायण किया था।मैंने उसे वाल्मीकि जी की कृति से श्रेष्ठ भक्ति प्रदायक ग्रन्थ पाया।”
सुनकर तुलसी को संतोष हुआ।
क्रमशः

146

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
146-

हाँ भोजन के समय उन्हें अपनी थाली में हर व्यँजन में रत्नावली के हाथ का स्पर्श मालूम पड़ता था।वे थाली के सामने बैठ कर बार बार रत्नावली का छवि के साथ बँध जाते थे।
पंडित गंगाराम के यहाँ सूचना पहुँची तो रत्नावली को लिवा जाने के लिए तुरंत उनके यहाँ से पालकी आ गई।रत्नावली प्रह्लाद घाट गई तो भोजन का वह स्वाद भी चला गया।रात के समय वे और राजा भगत बैठे हुये धर्म चर्चा कर रहे थे।रसोइया दो गिलासों में दूध ले आया।तुलसीदास बोले- “अरे भाई गोसाईं क्या बना हूँ कि आठों पहर तर माल चबाते चबाते दु:खी हो गया हूँ।” एक घूँट पिया,मलाई चबाते हुये मुँह बनाया, फिर मुस्कराए- “वाह रे रामजी, कहाँ तो एक वह दिन था कि कटोरी भर छाछ पाने के लिये मैं ललचाता था और अब कहाँ इस सौंधे दूध की मलाई खाने में भी खुन्नस लगती है।”
राजा बोले- “काहे खुनसाते हो भैया। तुम्हारी जिभ्या से भगवान जी स्वाद लेते हैं।गोसाईंयों में हमें यही बात तो अच्छी लगती है कि गोसाईं लोग दुनिया का हर भोग राजी होकर ग्रहण करते हैं, पर अपने स्वाद और सुख को वे भगवान का ही मान कर चलते हैं।”
गोस्वामी जी महाराज चुप रहे।दूध पीते रहे।बात में उन्हें राजा के मन का हल्का सा संकेत मिल गया था।उन्होंने तुरंत ही राजा भगत की मनोधारा का मुहाना बंद करने का निश्चय किया, कहा- “है तो ऊँची बात, पर खरा गोस्वामी ही इस पानी पर बिना पैर भिगोये चल सकता है।पूर्ण गोस्वामीत्व पाने के लिए मैं अभी तक रामजी की ड्योढ़ी का भिखारी हूँ।”
राजा तुलसी का पैंतरा समझ गये।उन्होंने भी अपने पक्ष को दृढ़ता से प्रस्तुत करने की ठानी, कहने लगे- “दो तापसी जब मिल जातें हैं तब दोनों को एक दूसरे  से आगे बढ़ने का हौसला मिलता है।तुम्हारी तपस्या तो भैया सारा जग देख रहा है पर हम तो भौजी का तप देख देख कर अपने मन को ठिकाने पर ला पाये हैं।इस कलि काल में ऐसा कठिन जोग साधने वाली जोगिनि मैनें नहीं देखी।”

तुलसी चुप रहे, रत्नावली की कठिन साधना के प्रति अपने मित्र से ये उद्गार सुन कर उन्हें भला लगा।उन्हें वैसा ही संतोष हुआ जैसै कि अपने सम्बन्ध में सुन कर होता है, किंतु यह संतोष जिस तेजी से अपने चरम बिंदु पर पहुँचा, उतनी ही तेजी से मन का पर्दा फड़फड़ा कर पलट भी गया।कुछ क्षणों के लिए भूला राम नाम फिर से घटमें गुजरना आरम्भ हो गया।
राजा भगत कह रहे थे- “गाँव में तुम्हारी रूचि की रसोई बनाती रहीं और किसी भूखे कंगले को खिलाती रहीं।आप बिना चुपड़ी, बिना साग भाजी के दो रोटी खाकर दिन बिताती हैं।रोज तुम्हारी धोती धोकर, तुम्हारी पूजा की सामग्री लगाना, तुम्हारे बैठने के स्थान पर झाड़ू लगाना, तुम्हारी एक एक चीज को सहेज सम्हाँल कर रखना, कहाँ तक कहें भैया भौजी जैसी तापसी हमनें नहीं देखी।तुम घर से निकल गये पर उन्होंने अपनी भक्ति से तुम्हें अब तक बाँधरखा है।”
मन का राम शब्द राजा की बातों से उपजे संतोष से बीच बीच में बिखरने लगता और फिर बार बार राम शब्द प्रबल होता।वे दूध का गिलास रख कर कुल्ला करने के बहाने से उठ गये।वैरागी मन कह रहा था, चेत खबरदार सम्हँल।दूसरा मन रत्नावली की क्षणिक छवि भी निहारने के प्रयास में था।कुल्ला करके दोनों जब फिर अपनी अपनी चौकियों पर बैठे तो राजा ने कहा- “सीता के बिना रामजी भी कभी सुखी न रह पाये,तुमसे अधिक भला कौन समझ सकता है।तुमने तो सारी रामायण रच डाली।जब रावण उन्हें हर ले गया तो भी, धोबी की निंदा के कारण वाल्मीकि मुनी के आश्रम में भेज दिया, तब भी, रामजी सुखी न रह पाये।बाँया अंग जब कट जाये तब दाँया भला कैसे सुख पा सकता है।”
तुलसी को ये बातें अच्छी भी लग रहीं थी और कहीं वे इस ओर से उचटने का भी प्रयास कर रहे थे।तुलसी ने लेट कर चादर तानते हुये वाग्धारा को विराम देते हुये कहा- “अच्छा तो अब हम विश्राम करेंगें।” और लेट गये। करवट बदल ली।राम राम जपना आरम्भ कर दिया।मन में एक बार ध्यान आया ‘मैं राम के लिए तड़फता हूँ, वह मेरे लिए।क्या मैं रत्नावली से ज़्यादा निठुराई बरत रहा हूँ।’-झटके से तुलसी ने अपना मन उधर से हटाया और राम शब्द में लीन होने का प्रयत्न करने लगे।उन्हें रात में अच्छी नींद न आई।
सबेरे पंडित गंगाराम के यहाँ से न्यौता आया तो उन्होंने कहलवा दिया कि वे नहीं आयेगें।टोडर आये और उन्होंने अपना प्रस्ताव दोहराया, कहा-“ महात्मा जी आप दोनों एक दिन पहले मेरी कुटिया पर अवश्य पधारेंगे।”
तुलसी को लगा कि राम उनकी परीक्षा लेने के लिये ही यह प्रस्ताव टोडर के मुँह से कहलवा रहें हैं।वे बोले- “विरक्त अब फिर से राग के बंधनों में नहीं बँध सकता।”
“आप उन्हें यहीं रहनें दें महात्मा जी…”
बात पूरी भी न हो पाई थी कि गोस्वामी ने झटके से उसे काट दिया और उत्तेजित स्वर में बोले- “क्या तुम चाहते हो कि मैं अपने तथा अपनी पत्नी के सुख के लिए समाज की आस्था को अधर में लटका दूँ? यह असंभव है टोडर।”
“क्षमा करें महात्माजी, किंतु इससे लोगों की आस्था क्यों बिखरोगी? वल्लभ गोस्वामी की घर ग्रहस्थी उनके साथ रहती थी फिर भी उन्होंने मोक्ष लाभ किया।”
तुलसी ने मीठी झिड़की देते हुये कहा- “तुम समझते क्यों नहीं हो टोडर, आज का समय वल्लभाचार्य जी के दिनों जैसा नहीं है।कबीरदास वाला समय भी बीत गया।यह घोर कलि काल है।नैतिकता का इतना ह्रास हो गया है कि उसे यदि एक स्तर तक उठाये न रखा जायेगा तो फिर सारा संसार अनैतिकता की लपेट में आये बिना कदापि न रहेगा।” टोडर चुप हो गये।

राजा भगत ने इस बार तुलसी रत्नावली का मेल कराने के लिए पूरा षड़यन्त्र रचा था।उन्होंने पंडित गंगाराम, टोडर यहाँ तक की कैलास कवि को भी अपने पक्ष में कर लिया था।गंगाराम आये उन्होंने कहा, कैलास आये उन्होंने कहा, मठ में रहने वाले शिष्यों ने भी कहा- “माताजी परम विदुषी हैं, उनके यहाँ रहने से हमारे अध्ययन में बहुत सहायता मिलेगी।”
तुलसीदास ने सहमति नहीं जताई।एक दिन नाथू नाई उनकी हजामत बनाने आया, उसी समय मठ के द्वार पर रत्नावली जी की पालकी आई।
क्रमशः

145

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
145-

इसका भला बुरा परिणाम जो कुछ होगा, आगे आ ही जायेगा।”
तीनों सज्जनों के चेहरे आन्नद से खिल उठे।चतुर्मास आरम्भ होने से पहले ही एक शुभ तिथि पर महाकवि भक्त तुलसी भगत गोस्वामी तुलसीदास हो गये।दाढ़ी मूँछ और सिर के लहराते केश मुँड़ गये।

गोस्वामी जी लोलार्क कुंड में मठ में भगवान श्री कृष्ण की आरती करते हुये कृष्ण भक्ति का एक पद गा रहें हैं।मठ के आँगन में संभ्रांत भक्तों की भीड़ है।सभी उनके भजन पर मुग्ध हैं।  आरती के बाद दर्शनार्थियों को गोस्वामी जी कृष्ण भक्ति का महत्व बतलाते हैं।सभी अवतारों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।’जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ वाली अपनी चौपाई का भाव अपने प्रवचन में निरूपित करतें हैं।शिव का गुणगान करते हैं।लोगों को समझाते हैं कि जैसे चुटकी में डोर सधी होने पर पतंग को आकाश में चाहे कहीं भी विचरे, कोई बाधा नहीं पहुँचती, वैसे ही अपने इष्ट को साध कर भाव की डोर से मन पतंग को सारे आकाश में उड़ाओ, सब देवों के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करो तो तुम्हारा इष्ट भी सर्व व्यापी और सर्व सामर्थ्य वान के रूप में अपने आपको प्रकट करेगा।”

भक्त गये, एकांत हुआ।अपना प्रवचन आप ही खाने लगा- “ हे रामजी, मैनें सब कुछ किया और कर रहा हूँ।वेद पुराण शास्त्र और संतों की वाणी में आप को पाने के लिए जो जो साधन बतलायें हैं, वे सब मैं बड़ी ललक के साथ करता हूँ, फिर भी आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन क्यों नहीं देते। मेरे ध्यान में जैसे कभी कभी हनुमान जी प्रकट हो जातें हैं वैसे आप क्यों नहीं आते? मैं प्रीति तो बढ़ाता चलता हूँ पर प्रतीति क्यों नहीं होती?”
गोस्वामी तुलसीदास अपने आप में उदास थे।अपने दु:खमय जीवन के सारे क्षण संताप के झरने के में दृश्य धार बन कर तेजी से उतरते गये और उनके संताप  को और गहरा कर दिया।
एक शिष्य पूछने आया कि आज भगवान के भोग के लिए भोजन में कौन कौन से व्यँजन बनें।इस प्रश्न ने गोस्वामी जी को और अधिक खिन्न कर दिया, कहा- “जो भगवान को रूचता हो वही बनवाओ।”
शिष्य बोला- “ गोलोक वासी गोस्वामी जी बड़े कुशल पाकशास्त्री थे।वे स्वयं अपने हाथ से नाना प्रकार के व्यँजन भगवान के लिए तैयार करते थे।”
“उन्होंने निश्चय ही अपनी स्वाद शक्ति प्रभु की स्वाद शक्ति बना ली होगी।मेरी स्वादरूपणी गऊ अभी भड़कती है।जाओ जो रूचे सो बनाओ।”
शिष्य खिन्न होकर चला गया।दालान में मंदिर की चौखट का टेका लगा कर वे राधा मुरलीधर की मूर्तियाँ निहारने लगे- “हे कृष्ण रूप रामजी मेरा मन अभी सधा भी नहीं था कि आपने मुझे इस वैभव की भट्टी में डाल कर और अधिक तपाना आरम्भ कर दिया है।हे हरि मुझ दीन दुर्बल की इतनी कठिन परीक्षा आप क्यों ले रहे हैं।एक ओर तो दुनिया मुझे महामुनि और दूसरी ओर कपटी कुचाली समझती है।केशव यह दोनों परस्पर विरोधी विशेषताएँ तो मुझमें कदापि नहीं हो सकतीं।फिर भी लगता है कि मैं अति अधम प्राणी हूँ तभी आप मुझे प्रतीति नहीं देते।मुझे एक बार भरोसा दिला दो रामजी।एक बार यह कक्ष तुम्हारे आश्वासन भरे स्वर से गूँज उठे, तुम कह दो कि तुलसी तू मेरा है तो बस फिर मुझे कुछ नहीं चाहिए।मुझे केवल आपका सानिध्य चाहिए।”- इस प्रतीक्षा में कि भगवान अब अवश्य बोलेंगे भोले भावुक गोस्वामी जी युगल मूर्ति की ओर टकटकी लगा कर भिखारी जैसी दीन मुद्रा में देखने लगे।
“विक्रमपुर से राजा भगत पधारे हैं।”
नाम सुनते ही तुलसीदास का उदास भाव तिरोहित हो गया, प्रसन्न और उत्साहित होकर बोले- “कहाँ है राजा?” कह कर वे मंदिर वाले दालान से बाहर आये और आँगन पार करते हुये तेजी से फाटक की ओर बढ़े।चौखट पर पैर रखते ही उत्साह ठिठक गया।राजा तो सामने थे ही, रत्नावली भी थी।उनका तपोमुख पहले से अधिक दिव्य लग रहा था।रत्नावली ने एक बार पति की आँखों से आँखें मिलाईं।राजा भगत दाढ़ी केश विहीन तुलसी के नये रूप को देख कर चकित दृष्टि से देखते हुये हाथ फैला कर आगे बढ़े- “अरे भैया तुम तो एकदम बदल गये।”
परंतु तुलसीदास का उत्साह अब ठंडा पड़ चुका था।औपचारिक आलिंगन करके तुरंत अपने को मुक्त किया।किंचित रूखे स्वर में पूछा- “इन्हें क्यों लाये?”
रत्नावली तब तक तेजी से आगे बढ़ कर उनके पैरों में गिर चुकी थी।तुलसीदास ने अपने पैरों पर रत्नावली की उँगलियों का स्पर्श अनुभव किया।राजा भगत से बोले- “भीतर चलो, विश्राम करो, फिर बातें होंगी।”
फिर शिष्य की ओर देख कर बोले- “प्रभु दत्त”
“आज्ञा सरकार”
“अपनी माताजी को ऊपर के कक्ष में पहुँचा दो।भगत जी के रहने की व्यवस्था  मेरी बगल वाली कोठरी में कर दो।माताजी यदि गंगा स्नान के लिए जाना चाहें तो किसी को उनके साथ भेज दो।”

रत्नावली के चेहरे पर पति के इन शब्दों ने संतोष की आभा प्रदान कर दी।नहा धोकर रत्नावली मठ में लौट आईं।राजा भगत गंगा जी से ही अपने एक काशी स्थित नातेदार से मिलने चले गये।मठके सारे शिष्यों और सेवकों को मालूम हो गया कि गोस्वामी जी की पत्नी आईं हैं।सभी उनके प्रति आदर प्रकट कर रहे थे।एक बार तुलसीदास ने किसी भृत्य से माताजी के सम्बन्ध में पूछा तो पता चला कि वे रसोई घर में रसोईये को सहायता दे रहीं हैं।तुलसीदास निर्लिप्त से भागवत बाँचते रहे।भोजन के समय रसोई में वर्षों पूर्व का नित्य मिलने वाला स्वाद आज फिर मिला।संतोष हुआ।राजा से उन्होंने गाँव जवार में सबकी खैर खबर पूछी।अपने राम चरित मानस रचने, अयोध्या मिथिला और सीतामढ़ी आदि यात्राओं की चर्चा भी उनसे की, पर रत्नावली के विषय में एक शब्द भी न पूछा।दूसरे दिन टोडर आये।तुलसीदास ने उनसे राजा भगत का परिचय कराया और पत्नी के आने की भी सूचना दी।तुलसीदास बोले- “गंगाराम को इसकी सूचना दे देना।हम चाहेंगें कि रत्नावली हमारे बाल मित्र की धर्मपत्नी के प्रति आदर प्रकट करने जायें।”
टोडर उल्लसित स्वर में बोले- “हाँ हाँ वहाँ जायेगीं और मेरे यहाँ भी पधारेंगी।जिस दिन गठजोड़े से महात्मा जी की जूठन गिरने का सौभाग्य मेरे घर को मिलेगा, उस दिन मेरा जन्म सार्थक हो जायेगा।”
दो चार दिन बीत गये।इस बीच में तुलसी और रत्नावली का सामना एक बार भी न हुआ।रत्नावली ने सतर्कता पूर्वक अपने आपको उनकी दृष्टि से बचाया।
क्रमश

144

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
144-

तुलसी के कान बावले हो उठे।झुरमुट के पीछे से एक मनुष्याकार आता हुआ दिखाई दिया।आँखों की चमक देखते ही मंद पड़ गई। मुँह से हल्की निराशा के साथ आप ही आप निकल पड़ा- “अरे यह तो टोडर है।” 
पीछे और भी लोग थे।जयराम साहू पंडित गंगाराम टोडर के साथ साथ आये थे।नमस्कार प्रणाम आशिर्वाद आदि क्रिया सम्पन्न हो जाने पर टोडर बोले- “हम एक प्रस्ताव लेकर आपकी सेवा में आये हैं।”
“क्या प्रस्ताव है।”
इस बार गंगाराम बोले- “तुमने राम चरित मानस जैसा महकाव्य लिखनें में अथक परिश्रम किया है और राम जी की कृपा से रस सिद्ध हुये हो।अब हमारा यह  विचार है कि तुम्हें कुछ विश्राम भी मिलना चाहिए।”
“इन बीते चार वर्षों में मानस रचना के क्षण ही मेरे लिए खरे विश्राम के क्षण हैं।मेरा मन इससमय हरा भरा है गंगाराम।”
जयराम बोले- “फिर तो विश्राम आपको अवश्य ही करना चाहिए महाराज।आपने हमसे कई दिनों से सेवा नहीं ली, केवल फलाहार और आँखें दुग्ध पान ही करते रहे।मैं समझता हूँ कि अब तो आपको अन्न ग्रहण करना चाहिए।थोड़ी सेवा भी स्वीकार कीजिए।”
“अरे तब तो मैं मोटा हो जाऊँगा। मेरा तप ही मेरा आनन्द है भाई, उसे मुझसे क्यों छीनते हो? न न यह सब बातें छोड़िये। अब चतुर्मास लगने वाला है। मैं सदग्रहस्थों के बीच में कहीं मानस कथा सुनाना चाहता हूँ, उसी में आनन्द आयेगा।”
टोडर बोले- “मैं जो प्रस्ताव लेकर आया हूँ, उसके पीछे आपकी रामायण कथा वाली बात मूल रूप से मेरे मन में है महात्मा जी।”
“तुम्हारा प्रस्ताव क्या है।”
“टोडर सावधान होकर बोले- बात यह है कि (पंडित गंगाराम की ओर देख कर) आप ही बतायें ज्योतिषी जी।”
तुलसीदास बोले- “ऐसी क्या बात है भाई? कहने में इतना संकोच क्यों?”
गंगाराम बोले- “संकोच इसलिए है कि तुम कदाचित प्रस्ताव सुन कर बिगड़ न जाओ।पर हम लोगों ने जब बात को हर तरह से मथ लिया है तभी कहने आये हैं।बात ये है कि लोलार्क कुंड पर एक वैष्णव मठ है, मठ क्या है हमारे टोडर की एक नातेदार बुढ़िया थी। वह एक गोंसाईं जी को अपना घर पुण्य कर गई। गोंसाईं जी बड़े भक्त और विद्वान पुरूष थे।उन्होंने चार पाँच शिष्यों को भी रख छोड़ा था।अब वे गोलोक वासी हो गये हैं।मठ के गोस्वामी पद के लिए झगड़ा है।वहाँ जो कुछ पैसा आता है वह प्रायः टोडर की बिरादरी वालों से आता है।वे गोसाईं जी के शिष्यों में किसी को उस पद के योग्य नहीं समझते।अब या तो मठ बंद कर दिया जाये या फिर किसी योग्य को उस पद पर बिठाया जाये।”
“तो तुम लोगों ने मुझे चुना।मैं राम कृपा से गोस्वामी बन तो रहा हूँ किंतु अभी इस पद को सिद्ध नहीं कर पाया।अत: तुम्हारा प्रस्ताव मुझे अमान्य है।”
जयराम बोले- “देखिये महाराज अपने मन से आप चाहे वहाँ तक पहुँचे हों या न पहुँचे हों, पर काशी के लोग आपको पुराने जमाने के बड़े बड़े ऋषि मुनियों के समान ही मानते हैं।टोडरजी ने तो औंचक ही आपका नाम बिरादरी वालों के सामनें ले दिया, अब सब के सब तो इनके पीछे पड़ गये।लोलार्क कुंड मोहल्ले में यह खबर फैल चुकी है कि आप आ रहें हैं।क्या छोटा और क्या बड़ा  महाराज सबके मनों में इस समाचार से बड़ी खुशी छा गई है।”
“यह सब ठीक है किंतु मैं इस प्रपँच में नहीं पड़ूँगा।मठ में मंदिर भी होगा?”
“ हाँ महात्मन”
“स्वाभाविक रूप से कृष्ण मंदिर होगा।”
“हाँ टोडर के मन में भी संकोच आया था और इन्होंने मेरे सामने यह प्रश्न उठाया भी था, पर मैनें कहा कि तुम्हारे मन में राम कृष्ण का भेद नहीं है।तुम कृष्ण पूजन करके भी राम भक्त बने रह सकते हो।”
“तुमने ठीक कहा गंगाराम, परंतु…..।”
“देखो तुलसी दीन दु:खी जन समाज में तुम्हारा महत्व अवश्य बढ़ गया है, पर यहाँ का प्रतिष्ठित नागरिक यहाँ के दुष्टों के प्रचार के कारण अभी तुम्हारे सम्पर्क में आने में संकोच करता है।देखो बुरा मत मानना तुलसी, भद्र वर्गीय दृष्टि से अभी तुम प्रतिष्ठित नहीं हो।”
सुनकर तुलसी उखड़े, कुछ तीखे स्वर में कहा- “तो, भला मुझे उसकी क्या चिंता है? राम करे तुम सब लोग, यहाँ का सारा भद्र समाज धन और पदों का ऐश्वर्य भोगता हुआ चिर प्रतिष्ठित रहे, पर तुलसी भी क्या किसी से कम है-‘तीन गाँठ कौपीन में बिन भाजी बिन नौन, तुलसी मन संतोष करे जो इन्द्र बापुरौ कौन?’
तुलसी के चेहरे की चमक देख कर टोडर हाथ जोड़कर बोले- “देखिए महात्मा जी प्रश्न आपका नहीं, आपके यहाँ रचे इस  महाकाव्य का है।दुष्टों के प्रचार से इसकी प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आनी चाहिए।”
“तो क्या चाहते हो तुम लोग? मैं गोसाईं बन जाँऊ?”
“हाँ महाराज”- जयराम बोले- “शंकराचार्य महाराज ने भी सुना है मठ स्थापित किए थे।उनकी परंपरा के शंकराचार्य संन्यासी होकर भी सोने के सिहाँसन पर विराजते हैं और सोने के खड़ाऊँ पहनते हैं।इससे लोक पर उचित प्रभाव पड़ता है।”
गंगाराम बोले- “हमारा कहना मान लो तुलसी, तुम इस मठ के गुसाँई बन जाओ।गोसाईं तुलसी की रामायण का प्रभाव संत तुलसीदास की रामायण से अधिक अच्छा पड़गा।”
तुलसीदास सिर झुकाकर चुप हो गये, मन बोला- “भाग तुलसी भाग, यहाँ से भाग।”
गंगाराम बोले- “सामाजिक प्रतिष्ठा नितांत आवश्यक है तुलसीदास। किसी लोकधर्मी व्यक्ति को उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।नीति यही कहती है।”
तुलसी चुप।
टोडर बोले- “साल में लगभग छ: सात हजार रूपये की चढ़त वहाँ हो ही जाती है।आपके पहुँचने पर निश्चय ही उस स्थान की महिमा बढ़ेगी।आप मठ के धन का कोई सुंदर उपयोग कर सकेंगे।”
जयराम बोले- “अरे मैं और मेरे कई रिश्तेदार नियमित रूप से आपकी वहाँ सेवा करेगें।काशी में और भी लोग राजी हो जायेंगें।हम सबकी ही अरदास है महाराज कि आप यह पद स्वीकार कर लें।”- कुछ रूक कर जयराम ने फिर कहा- “इससे पाखंडियों के विरूद्ध मोर्चा लेने में भी हमको बड़ी मदद मिलेगी।काशी से अब यह पाप लीला समाप्त होनी चाहिए।”
गम्भीर स्वर में तुलसीदास बोले- “भाई मैं तो अपने मन से स्पष्ट नहीं हो पा रहा हूँ कि मुझे यह पद स्वीकार करना चाहिए या नहीं।एक मन कहता है कि हाँ और दूसरा न।ऊपर से आग्रह ऐसे लोग कर रहें हैं जो मेरे श्रेष्ठतम शुभचिंतक हैं।राम करै सो होय।मैं तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार करता हूँ।
क्रमशः

143

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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मंथरा के रूप में मेरे बचपन की भिखारी बस्ती में कुबड़ी भैंसिया की बहू बरबस अपनी चाल ढाल के साथ उभर कर मेरी लेखनी पर आ जाती थी।कौशल्या के रूप में कहीं न कहीं सूकर खेत की बड़ी रानी का चरित्र मन में आ जाता था।बेचारी बड़ी दयालु और दानी थी।उनको और राजा साहब की रखैल को एक ही दिन और प्रायः एक ही समय के आस पास बालक हुये।रानी का लड़का पहले हुआ परंतु दरबार में रखैल की चतुराई से उसके बेटे की खबर पहले पहुँची।राजा ने रखैल के बेटे को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।रानी बेचारी जीवन भर तपस्या ही करती रही।इसी प्रकार जीवन में देखे सुने अनेक दृश्य और चरित्र राम चरित रचना में घुलमिल जातें हैं।”
“भरत के चरित्र में गुरूजी आप स्वयं हैं।”
बाबा हँसे, कहने लगे- “अरे भईया जहाँ राम पद वंदन का छोटा सा भी अवसर मिलता था, मैं वहीं अपने आपको रमा देता था।भरत में, लक्ष्मण और हनुमान में, अत्री जटायु शिव शबरी, प्रत्येक पात्र या पात्री के रामलीन क्षणों में तुलसी अवश्य है।श्रीराम के अयोध्या त्याग के चित्रों की पृष्ठभूमि में मेरे अपने गृह त्याग की पीड़ा भी कहीं पर समाई है।सीता के विरह में, राम की मनोदशा चित्रण में, कहीं न कहीं मैं अपनी रत्नावली के साथ समा ही गया हूँ।छोड़ो इसे, मेरे मन में इस समय मेघा भगत के अंतिम दिनों की स्मृति उभर रही है।उस समय मैं लंका कांड की रचना कर रहा था।”
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युद्ध क्षेत्र में लक्ष्मण मेघनाद लड़ रहे हैं।तुलसीदास अपनी कुटी में बैठे इस प्रसँग को लिख रहें हैं।तभी एक सेवक दौड़ा हुआ आता है और सूचना देता है कि मेघा भगत बगीचे में चबूतरे से लड़खड़ा कर नीचे गिर गये हैं।उनके सिर में घाव लगा है, खून बह रहा है, अचेत हैं।तुलसी दास लिखना छोड़ कर भागतें हैं।मेघा भगत को भीतर के कमरे में लाया गया।तुलसी पहुँचते ही उनका सिर अपनी गोद में रख कर घाव का धोवाधाई करने का काम नौकर से लेकर स्वयं करने लगते हैं।थोड़ी देर में जयराम साहू, कैलास, दो तीन वैद्य और भगतजी के कई भक्तों का जमाव जुड़ जाता है।औषधि उपचार होता है किंतु भगत जी की चेतना नहीं लौटती।उन्हें तीव्र ज्वर चढ़ आया है।वैद्य जी जौनपुर के किसी वैद्य का पता बतलाते हैं।जयराम साहू के खर्चे पर कैलासनाथ उन्हें बुलाने के लिए जौनपुर भेजे जाते हैं।यह दिन तुलसी दास के लिए अत्यंत विकलता भरे थे।उसी समय दुर्योग से उनकी बाईं बाँह में भी बादी का दर्द आरम्भ हो गया।बाँह में टीसे उठतीं थीं, पर वे मेघा भगत को छोड़कर स्वयं विश्राम नहीं करना चाहते थे।रात का समय था।वैद्य की प्रतीक्षा में व्याकुल तुलसी अचेत मेघा भगत के सिरहाँने बैठे हुये उनका बाँह अपनी गोद में रखे सहलाते हुये, आँखें मूँदे हुये युद्ध क्षेत्र में राम की गोद में अचेत पड़े लक्ष्मण को देख रहें हैं।उनकी व्याकुलता  राम के मुखारबिंद से काव्य बन कर फूट पड़ी।
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“लक्ष्मण के प्रति विलाप करते समय राम के वे भाव मेरे विकल क्षणों से ही उमंगे था।श्री लक्ष्मण के वैद्य को आना था, हनुमान जी की संजीवनी बूटी का प्रभाव उन पर होना था क्योंकि वह तो अवतारी पुरूषों की कथा थी, परंतु मेरे मेघा भाई न बच सके।उसी अचेतावस्था में वे दो दिन बाद रामलीन हो गये।मेरा राम चरित मानस उनके सामने पूरा न हो सका, इसका मुझे दु:ख है।
संवत 1635 में जेठ की तीज को राम चरित मानस का लेखन कार्य पूरा हुआ।उस दिन हमारे मन में अपार संतोष था।तुमसे सत्य कहता हूँ वेनीमाधव, जब अंतिम दोहा रचते समय मैनें प्रार्थना की कि-
“कामहिं नारि पियारी जिमि, लोभहिं प्रिय जिमि दास।
ऐसे ही रघुवंश महिं, प्रिय लागहुँ मोहि राम।”

उस समय मुझे ऐसा लगा कि राम मेरे आगे ऐसे खड़े हैं जैसे प्रत्यक्ष आ गये हों।मैं भावाभिभूत होकर लेखनी पोथी छोड़ कर उनके चरणों में नत हुआ और ऐसा करते ही मेरे राम अंतर्धान हो गये।काशी के भदैनी क्षेत्र में वह कुटिया, जहाँ बैठ कर मैनें मानस पूरी की थी, ऐसी दिव्य भीनी सुगंध से भर गई कि आज वर्षों बाद भी स्मरण मात्र से वह मेरेमनमें महक उठती है।पर उस स्वरूप दर्शन की चाह जो एक बार देखा था, अभी तक शेष बनी है।मेरे मरते समय तक राम एक बार अपना मुख दिखला दें।हे राम आपके स्वभाव गुण शील महिमा और प्रभाव को शिव हनुमान भरत और लखनलाल ने ही भली भाँति पहचाना था, आज मैनें भी पहचान लिया।तुम्हारे नाम के प्रताप से तुलसी जैसा दीन अभागा भी रामायण रचना का कार्य पूरा कर सका।अब एक बार और उद्धार हो जाये।मरते मरते आँखों में आपकी दिव्य  छवि भर कर जी छक कर जाऊँ, अपने लिए आपसे केवल यही माँग करता हूँ।”
बाबा इतने भावाभिभूत हो गये कि वेनी माधव देखते ही रह गये।उन्हें स्पष्ट लग रहा था कि गुरू जी इस समय अपनी काया में नहीं हैं।उनका ध्यान सब ओर से निकल कर एक में ही केन्द्रित है।बंद आँखों सेपहले तो आँसू निकलते रहे फिर शांति छा गई।वेनी माधव को लगता था कि सामने कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक दिव्य प्रकाश पुँज बैठा है।उस समय फिर कोई बात नहीं हो सकी।
रात में बाबा के पैर दबाते समय संत वेनी  माधव ने उनसे प्रश्न किया- “गुरूजी एक बात पूँछू।”
“पूछो” 
“रत्ना मैया फिर आपसे मिलीं थीं।”
तुलसीदास पल भर चुप रहे, फिर कहा- “हूँ।”
“यहीं काशी में”
“हाँ”
“क्या उस प्रसँग के विषय में कुछ बताने की कृपा करेंगें।”
बाबा चुप रहे।उनके मौन को तोड़ने का साहस संतजी में नहीं था।इसलिए मन मार कर गुरू सेवा में तल्लीन हो गये।थोड़ी देर बाद अनायास ही बाबा बोले-“आज भी सोचता हूँ कि मैनें जीवन में एक महत् अपराध किया है, किंतु उस समय मैं ऐसा करने के लिये विवश था।”
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तुलसी अपनी कोठरी के आगे फुलवारी में गम्भीर किंतु संतोष भरी मुद्रा में टहल रहें हैं।रह रह कर उनका सिर कुछ उठकर देखने लगता है।वे कभी कभी विकल होकर आकाश की ओर देख कर  गिड़गिड़ाते हैं, मुखमुद्रा दीन बन जाती है।उनका चेहरा देख कर लगता है कि मन में कुछ तरंगें मचल मचल कर आपस में मिल कर कोई भँवर सा बना रहीं है।सहसा झाड़ी के पीछे किसी की पदचाप सुनाई दी।
क्रमशः

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
142-

मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिले किन्तु जन जन के रूप में। यो रामचरितमानस रचकर मेरे घट घट व्यापी राम मुझे निश्चय ही मिल गए। मैंने उन्हें निराकार साकार रूप में बहुत सीमा तक पहचान लिया। उनका पूर्ण रूप देखने की लालसा यों मुझमें अब भी शेष है। कदाचित अंतिम साँस के साथ ही पूरी हो कि न हो।नहीं नहीं, राम कृपा से होगी। इस कलिकाल में तुलसी जैसी लगन से प्रीति निभाने वाले अधिक नहीं हैं। मेरे साहब अब मुझे नवाजेंगे।”
बाबा का अडिग अगाध आत्मविश्वास भरा गौर मुख वेनीमाधव के मन में उत्साह का संचार करने लगा। कैसा साहसी है यह रणबाँकुरा। भाव से भावपूर्ण होकर प्रश्न कर बैठे-“अरण्य काण्ड तो आपने अस्सीघाट पर ही रच डाला था न गुरू जी?”
बावा की स्मृति झनझना उठी,संघर्ष भरे, रचना की लीला भरे, वे पुराने दिन वेनीमाधव को दिखाने के लिए उनकी वाणी पर शब्द चित्र बनकर सँवरने लगे।
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अरण्यकाण्ड अति  संघर्ष के क्षणों में रचा गया। हनुमान फाटक और अस्सी
घाट पर विशेष रूप से ब्रह्महत्यारे को भोजन कराने के बाद उन्हें अत्यधिक त्रस्त होना पड़ा। तुलसी आठों पहर सतर्क रहकर अपनी वीतरागता को सिद्ध करते रहते थे और इसके लिए अरण्यवासी तापस श्रीराम का ध्यान उन्हें बल देता था। बल ही नहीं वे आंनद और एक अवर्णनीय तरावट सी पाते थे। उनके मान सरोवर में, बिम्ब शब्दों के कमल बनकर खिलने लगते थे ओर फ़िर वे लिखे बिना रह नही पाते थे किन्तु कितने विध्नों के झटके उन्हें लगते थे। लिखने का तार बार बार टूटता था। यहाँ भी तुलसी को अब तक अयोध्या से कुछ कम संघर्ष नहीं झेलना पड़ा था। अहंता पर चोटें सी पड़ी। यह सचमुच रामकृपा ही थी कि अपने आध्यात्मिक जीवन के प्रथम संघर्ष काल में उन्हें महाकाव्य रचने की प्रेरणा मिली। अयोध्याकाण्ड फिर भी निर्बाध गति से लिखा, यद्यपि भक्ति से अधिक वे काव्यनिष्ठा से बँधे। काशी में काव्य और भक्ति दोनों के प्रति वे अपनी निष्ठा को वैराग्य से संतुलित रखने में सतत‌ जागरूक रहे, यह महाकाव्य तुलसी का होकर भी उसका नहीं था, स्वयं हनुमान जी उससे लिखा रहे हैं। वह जितने सुघड़ ढंग से काम करेगा, जितनी सच्ची लगन से करेगा उतने ही उसके मालिक संतुष्ट होगें। जाति प्रपत्र, निन्दात्मक प्रचार आदि विरोधी पक्ष के तीखे से तीखे प्रहार तुलसी ऊपर से तो सफलतापूर्वक झेल जाते थे पर भीतर कहीं कचोट लगती थी। सद्चिन्ता विहीन शुद्ध दम्भयुक्त सत्ता या धन से मंडित दुश्चरित्र लोग मुझे नीचा कहें और मुझे सुनना पड़े।पीतल सोने को मुंह चिढ़ाए और सोना चुप रह जाय।यह विडम्बना न्याययुक्त मानकर कैसे सही जाय? पर सहनी ही पड़ेगी। रामबोला, राम तेरी परीक्षा ले रहे हैं। इधर से वीतराग वन। महाकाव्य पूरा करते ही राम तुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। अपने को अभागा न समझ। ऊपरी मान अपमान के चोंचले छोड़कर रामकथा रस में डूब -गहरे से गहरा डूब।

भदैनी मे घायल गृद्धराज जटायु से राम की भेंट होने का प्रसँग उठाया। गृद्धराज के बहाने राम वन्दना की और फिर बह चले। किष्किन्धाकाण्ड में, रामकथा में हनुमान के प्रवेश करते ही तुलसी का कार्यभार मानों मन से हल्का हो गया। काव्य रचना में उनकी तन्मयता और गति स्फूर्तिवत्‌ हो उठी। सारा सुन्दरकाण्ड एकरस होकर लिखा।हनुमान जी इस काण्ड के नायक थे। काण्ड रचते समय जब स्वयं राम-सीता अथवा राम के भाइयों के प्रसंग आ जाते हैं, तब तो उन्हें समुद्री तैराक की तरह अधिक सचेत रहना पड़ता है परन्तु हनुमान तो निरे बचपन से ही उनके लिए गंगा के समान हैं। वे उनके बड़े भाई है, सखा हैं, आड़े समय के सहारे हैं इसलिए उनका शौर्य, और उनकी द्रुत कर्म कुशलता का बखान करते हुए उनका काव्य चातुर्य लगन भरे चाकर की तरह उनकी हनुमद्भकिर्ति की सेवा में ऐसा लीन रहा कि जैसा पहले कभी इतनें दिनों तक नही हुआ था। यों घड़ी दो घड़ी, अधिक से अधिक एकाघ दिन तक ऐसी तल्लीन तरंगो के बहाव में तो प्रायः ही बहते रहे थे। सुन्दर काण्ड की रचना करते हुए उन्हें अपने प्रति नया विश्वास सिद्ध हुआ। यों भी मेघा भगत से वे अपने लिए हनुमतवत्‌ संकेत पाया ही करते थे। मेधा भगत ने उन्हें स्वच्छंद जीवन बिताने के लिए व्यवस्था भी बहुत अच्छी कर रखी थी।केवल साँयकाल को छोड़कर कोई उनसे मिलता न था।टोडर और कैलाश नित्य, गंगाराम कभी कभी और जयरामसाहू तीसरे चौथे दिन चक्कर लगा जाया करते थे।सबेरे स्नान पूजा से छुट्टी पाकर तुलसी दास एक बार मेघा भगत से मिलने अवश्य जाते थे।
अशोक बाटिका में हनुमान और जगदम्बा की भेंट का चित्रण करते हुये उन्हें एक गुपचुप आनन्द यह रहा कि वे हनुमानजी की कृपा से जानकी मैया को देख रहें हैं।उनके मुख से राम जी की बातें सुन रहे हैं।जैसे जैसे इस कथा प्रसँग का शब्द चित्र उभरता जाता था, वैसे वैसे उनका आत्म विश्वास अपनी सरल भोली निष्ठा में प्रबल और प्रौढ़ होता जा रहा था।भक्ति के क्षेत्र में उन्होंने पहली बार अपने आपको वयस्क अनुभव किया।पहली बार रत्नावली के प्रति अपनी अनन्य चाह वे राम जी के बहाने सीताजी को अर्पित करके अपने भीतर की अतिरंजित झिझक तोड़ कर मन के नातों में सहज हुये।
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वेनीमाधव ने पूछा- “किसी जीवन चरित्र को रचते समय प्रत्येक पात्र या पात्री की कल्पना आप कैसे करते थे गुरू जी? मैं पहले अपना उदाहरण दूँ, मैं जिस जीवन चरित की रचना कर रहा हूँ, उसमें केवल आप ही नायक के रूप में मेरे जाने पहचानें हैं, किंतु रामकथा रचते समय तो आपके पास एक भी ऐसा पात्र नहीं था जिसे आपने मेरे समान प्रत्यक्ष देखा और भोगा हो,फिर उनके भाव चित्रों की….।”
“क्या बचपने का प्रश्न करते हो वेनी माधव, मैनें अपने राम को तुम्हारे तुलसी दास से अधिक प्रत्यक्ष देखा है।मानस रचते समय मैं जिस ललक के साथ अपने जीवन मूल्यों के पूर्ण समुच्चय स्वरूप श्रीराम कल्पना के साथ आठों पहर तल्लीन रहता था, तुम अपने तुलसी दास में क्या रह पाते हो।सभी पात्रों में जीवन के देखे हुये अनेक चरित्र अपनी व्यक्तिगत छाप मेरे आग्रह से अवश्य ही छोड़ते थे।
क्रमशः

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...