महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
158-
फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को।
कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले हो। वाह-वाह-वाह।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू - अब तो दो होकर भी दो नहीं रहा कैलास।”
कहते कहते फिर एकाएक टीस उठी। आगे कुछ और कहने जा रहे थे कि एकाएक कराह कर राम राम पुकार उठे और फिर अचेत हो गए। आँखों में आँसू भरकर राजा भगत ने गंगा राम से कहा-“हमे लगता है कि अब तो भैया का दर्शन मेला ही रह गया हैं।”
गंगाराम ने कुछ न कहकर एक गहरी नि:स्वास दी। राजा बोले- “भौजी गईं, इनके बेटे को भी अपने हाथों से ही मसान में ले गया था और अब ये भी जा रहें हैं।” कहकर वे रोने लगे।गंगाराम ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा- “अपने हृदय में मेरा भी हृदय देखो राजा। क्या किया जाय। कल सन्ध्या तक इनका मारकेश और है।वह समय बीत जाय तो फिर सब मंगल होगा।
राजा टूटे हुए स्वर में बोले- “हाँ, वैसे तो जब तक साँस तब तक आस। बाकी क्या कहें?”
रात में प्रायः सन्नाटा हो चुका था।सावन का महीना था,बादल गरज रहे थे।राजा, कैलास, बेनीमाधव और गंगाराम चुपचाप दीवार से टेका लगाए थके हारे बैठे थे। रामू अपने प्रभु जी की चौकी के पास बैठा टकटकी लगाकर उन्हें देख रहा था।
तुलसीदास स्वप्न देख रहे थे। हाथ में अरजी का लम्बा कागज लिए तुलसी दास राम जी के महलों की ओर जा रहें हैं। पहले गणेश जी मिलते हैं, उन्हें प्रणाम करते हैं फिर क्रमशः सूर्य, शिव-पार्वती, गंगा-यमुना, काशी, चित्रकूट आदि की झलकियाँ एक के बाद एक खुलती ही चली जाती हैं। भीतर की ड्यौढी पर खास दरवार के आगे हनुमान जी खड़े हैं। तुलसी उन्हें देखकर प्रसन्न होते हैं और अपनी अर्जी का कागज उनकी ओर बढ़ाते हुए कहते है- “इसे राम जी तक पहुँचा दीजिए।हनुमान जी मुस्कराकर लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न की ओर इशारा करके कहते हैं- “इनकी स्तुति करो। जगदम्बा को प्रणाम करो। उन्हीं की चिरौरी करने से तुम्हारी विनयपत्रिका साहब की सेवा मे पहुँच सकती हैं।”
तुलसी तीनों भाइयों की वन्दना करते हैं। माँ के चरणों मे नत होते हैं। सीता जी प्रसन्न होकर मुस्कराती हैं। हनुमान का मन और भरत का रुख देख कर लक्ष्मण तुलसीदास के हाथ से विनयपत्रिका ले लेते है और राम जी के सम्मुख उसे सविनय बढ़ा कर कहते हैं- “हे नाथ, इस कलिकाल से भी आपके एक अकिंचन सेवक ने आपके नाम के प्रति, अपनी प्रीति और प्रतीति को निबाहा है। कृपानिधान, अब इस पर कृपा करें।” भगवान रामचन्द्र विनीत भाव से हाथ बाँधे खड़े हुए तुलसीदास को बड़े स्नेह से देखकर कहते है- “हाँ , मेरे भी ध्यान में यह बात आई है।”
यह कहकर राम जी हाथ बढ़ाते हैं। लक्ष्मण जी उन्हें कलम दवात देते हैं, राम जी अपने हाथ से कलम लेकर तुलसीदास की “विनयपत्रिका' पर सही कर देते हैं।
उसी समय आकाश में बादल गड़गडा उठते हैं, मानों रामकिंकर तुलसीदास का जयघोष कर रहे हों। बिजली बार बार कड़क उठती है मानों राम की भक्ति माया के अन्धकार को मिटा रही हो। पानी ऐसे बरसता है कि जैसे भक्त के मन में अविरल राम रस धारा बहती है।
राम के पत्रिका पर सही करते ही स्वप्न भंग हो गया। बादलों की गड़गड़ाहट से तुलसीदास की आँखें खुल गई- “रामू”
“हाँ प्रभु जी”
“आज कौन तिथि है?”
गंगाराम मित्र को बातें करते देखकर तुरन्त बोल उठे- “श्रावण कृष्ण तीज, अब तो ब्रह्म बेला आ गई।”
तुलसीदास एक क्षण चुप रहे, फिर कहा- “पिछले वर्ष रत्नावली आज ही के दिन गई थी।”
राजा पास आ गए। उनके हाथ पर पोले से अपना हाथ रखकर कहा- “अब कैसा जी है भइया?”
“निर्मल गंगा जल जैसा। गाने को जी चाहता है, रामू।”
“जी, प्रभु जी ”
“आज स्वप्न में मैंने 'विनयपत्रिका' के अन्तिम छन्द को दृश्य रूप मे देखा है। मेरी काव्य स्फूर्ति अन्तिम बार उसे अंकित करने को ललक रही है। एक बार मुझे सब जने सहारा देकर बैठा तो दो।” झटपट सहारा दिया गया।रामू तत्पर बैठ गया।
बाबा धीरे धीरे गाने लगे--
“मारुति-मन, रुचि भरत की लखि लखन कही है।
कलिकालहु नाथ, नाम सो प्रतीति- प्रीति।
एक किंकर की निबहीं हैं॥१॥
सकल सभा सुनि लै उठी, जानी रीति रही है।
कृपा गरीब निवाज की, देखत
गरीब को साहब बाँह गही है॥२॥
विहँसि राम कह्यो, सत्य है, सुधि मैं हूँ लही है।
मुदित माथ नावत, बनी तुलसी अनाथ की,
परी रघनाथ हाथ सही है॥३॥
अंतिम पंक्ति उन्होंने स्वर खींचकर गाई, उसके पूरी होते ही गर्दन टेढ़ी हो गई। रामू उनके सिर को सहारा देने के लिए लपका।बेनीमाधव तलवे सहलाने लगे। कैलास ने नाड़ी पर हाथ रखा। बोले-“इन्हें लो भगत जी, जल्दी करो। मेरा यार चला।” कहते हुए उनक़ा गला भर आया, उसी भाव मे फिर कहा--
“राम नाम जस बरनि के, भयो चहत अब मौन।
तुलसी के मुख दीजिए, अबहीं तुलसी सोन।”
रामू ने जल्दी जल्दी धरती पर कोने में पहले ही से रखा हुआ गोबर लाकर लीपा।गोस्वामी जी धरती पर ले लिए गए। तुलसी दल, गंगा जल उनके घरघराते कण्ठ में डाला गया।सब लोग मौन होकर उनकी ओर दृष्टि लगाए बैठे थे। गले की घरघराहट में भी मानों राम शब्द गूँज रहा था। आँखें एकाएक खुल गईं, सबके चेहरों को देखा, दीवार पर हनुमान और सियाराम के चित्रों की ओर देखा। देखते ही रहे…. देखते रहे, देखते ही देखते चले गये।बाहर ऐसी बिजली चमकी कि उसकी कौंध भीतर तक आ पहुँची जोर से बरस रहा था।सबकी आँखें भी वैसी ही बरस रहीं थीं।
(जय जय सीताराम)
(समाप्त)