महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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इसका भला बुरा परिणाम जो कुछ होगा, आगे आ ही जायेगा।”
तीनों सज्जनों के चेहरे आन्नद से खिल उठे।चतुर्मास आरम्भ होने से पहले ही एक शुभ तिथि पर महाकवि भक्त तुलसी भगत गोस्वामी तुलसीदास हो गये।दाढ़ी मूँछ और सिर के लहराते केश मुँड़ गये।
गोस्वामी जी लोलार्क कुंड में मठ में भगवान श्री कृष्ण की आरती करते हुये कृष्ण भक्ति का एक पद गा रहें हैं।मठ के आँगन में संभ्रांत भक्तों की भीड़ है।सभी उनके भजन पर मुग्ध हैं। आरती के बाद दर्शनार्थियों को गोस्वामी जी कृष्ण भक्ति का महत्व बतलाते हैं।सभी अवतारों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं।’जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी’ वाली अपनी चौपाई का भाव अपने प्रवचन में निरूपित करतें हैं।शिव का गुणगान करते हैं।लोगों को समझाते हैं कि जैसे चुटकी में डोर सधी होने पर पतंग को आकाश में चाहे कहीं भी विचरे, कोई बाधा नहीं पहुँचती, वैसे ही अपने इष्ट को साध कर भाव की डोर से मन पतंग को सारे आकाश में उड़ाओ, सब देवों के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करो तो तुम्हारा इष्ट भी सर्व व्यापी और सर्व सामर्थ्य वान के रूप में अपने आपको प्रकट करेगा।”
भक्त गये, एकांत हुआ।अपना प्रवचन आप ही खाने लगा- “ हे रामजी, मैनें सब कुछ किया और कर रहा हूँ।वेद पुराण शास्त्र और संतों की वाणी में आप को पाने के लिए जो जो साधन बतलायें हैं, वे सब मैं बड़ी ललक के साथ करता हूँ, फिर भी आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन क्यों नहीं देते। मेरे ध्यान में जैसे कभी कभी हनुमान जी प्रकट हो जातें हैं वैसे आप क्यों नहीं आते? मैं प्रीति तो बढ़ाता चलता हूँ पर प्रतीति क्यों नहीं होती?”
गोस्वामी तुलसीदास अपने आप में उदास थे।अपने दु:खमय जीवन के सारे क्षण संताप के झरने के में दृश्य धार बन कर तेजी से उतरते गये और उनके संताप को और गहरा कर दिया।
एक शिष्य पूछने आया कि आज भगवान के भोग के लिए भोजन में कौन कौन से व्यँजन बनें।इस प्रश्न ने गोस्वामी जी को और अधिक खिन्न कर दिया, कहा- “जो भगवान को रूचता हो वही बनवाओ।”
शिष्य बोला- “ गोलोक वासी गोस्वामी जी बड़े कुशल पाकशास्त्री थे।वे स्वयं अपने हाथ से नाना प्रकार के व्यँजन भगवान के लिए तैयार करते थे।”
“उन्होंने निश्चय ही अपनी स्वाद शक्ति प्रभु की स्वाद शक्ति बना ली होगी।मेरी स्वादरूपणी गऊ अभी भड़कती है।जाओ जो रूचे सो बनाओ।”
शिष्य खिन्न होकर चला गया।दालान में मंदिर की चौखट का टेका लगा कर वे राधा मुरलीधर की मूर्तियाँ निहारने लगे- “हे कृष्ण रूप रामजी मेरा मन अभी सधा भी नहीं था कि आपने मुझे इस वैभव की भट्टी में डाल कर और अधिक तपाना आरम्भ कर दिया है।हे हरि मुझ दीन दुर्बल की इतनी कठिन परीक्षा आप क्यों ले रहे हैं।एक ओर तो दुनिया मुझे महामुनि और दूसरी ओर कपटी कुचाली समझती है।केशव यह दोनों परस्पर विरोधी विशेषताएँ तो मुझमें कदापि नहीं हो सकतीं।फिर भी लगता है कि मैं अति अधम प्राणी हूँ तभी आप मुझे प्रतीति नहीं देते।मुझे एक बार भरोसा दिला दो रामजी।एक बार यह कक्ष तुम्हारे आश्वासन भरे स्वर से गूँज उठे, तुम कह दो कि तुलसी तू मेरा है तो बस फिर मुझे कुछ नहीं चाहिए।मुझे केवल आपका सानिध्य चाहिए।”- इस प्रतीक्षा में कि भगवान अब अवश्य बोलेंगे भोले भावुक गोस्वामी जी युगल मूर्ति की ओर टकटकी लगा कर भिखारी जैसी दीन मुद्रा में देखने लगे।
“विक्रमपुर से राजा भगत पधारे हैं।”
नाम सुनते ही तुलसीदास का उदास भाव तिरोहित हो गया, प्रसन्न और उत्साहित होकर बोले- “कहाँ है राजा?” कह कर वे मंदिर वाले दालान से बाहर आये और आँगन पार करते हुये तेजी से फाटक की ओर बढ़े।चौखट पर पैर रखते ही उत्साह ठिठक गया।राजा तो सामने थे ही, रत्नावली भी थी।उनका तपोमुख पहले से अधिक दिव्य लग रहा था।रत्नावली ने एक बार पति की आँखों से आँखें मिलाईं।राजा भगत दाढ़ी केश विहीन तुलसी के नये रूप को देख कर चकित दृष्टि से देखते हुये हाथ फैला कर आगे बढ़े- “अरे भैया तुम तो एकदम बदल गये।”
परंतु तुलसीदास का उत्साह अब ठंडा पड़ चुका था।औपचारिक आलिंगन करके तुरंत अपने को मुक्त किया।किंचित रूखे स्वर में पूछा- “इन्हें क्यों लाये?”
रत्नावली तब तक तेजी से आगे बढ़ कर उनके पैरों में गिर चुकी थी।तुलसीदास ने अपने पैरों पर रत्नावली की उँगलियों का स्पर्श अनुभव किया।राजा भगत से बोले- “भीतर चलो, विश्राम करो, फिर बातें होंगी।”
फिर शिष्य की ओर देख कर बोले- “प्रभु दत्त”
“आज्ञा सरकार”
“अपनी माताजी को ऊपर के कक्ष में पहुँचा दो।भगत जी के रहने की व्यवस्था मेरी बगल वाली कोठरी में कर दो।माताजी यदि गंगा स्नान के लिए जाना चाहें तो किसी को उनके साथ भेज दो।”
रत्नावली के चेहरे पर पति के इन शब्दों ने संतोष की आभा प्रदान कर दी।नहा धोकर रत्नावली मठ में लौट आईं।राजा भगत गंगा जी से ही अपने एक काशी स्थित नातेदार से मिलने चले गये।मठके सारे शिष्यों और सेवकों को मालूम हो गया कि गोस्वामी जी की पत्नी आईं हैं।सभी उनके प्रति आदर प्रकट कर रहे थे।एक बार तुलसीदास ने किसी भृत्य से माताजी के सम्बन्ध में पूछा तो पता चला कि वे रसोई घर में रसोईये को सहायता दे रहीं हैं।तुलसीदास निर्लिप्त से भागवत बाँचते रहे।भोजन के समय रसोई में वर्षों पूर्व का नित्य मिलने वाला स्वाद आज फिर मिला।संतोष हुआ।राजा से उन्होंने गाँव जवार में सबकी खैर खबर पूछी।अपने राम चरित मानस रचने, अयोध्या मिथिला और सीतामढ़ी आदि यात्राओं की चर्चा भी उनसे की, पर रत्नावली के विषय में एक शब्द भी न पूछा।दूसरे दिन टोडर आये।तुलसीदास ने उनसे राजा भगत का परिचय कराया और पत्नी के आने की भी सूचना दी।तुलसीदास बोले- “गंगाराम को इसकी सूचना दे देना।हम चाहेंगें कि रत्नावली हमारे बाल मित्र की धर्मपत्नी के प्रति आदर प्रकट करने जायें।”
टोडर उल्लसित स्वर में बोले- “हाँ हाँ वहाँ जायेगीं और मेरे यहाँ भी पधारेंगी।जिस दिन गठजोड़े से महात्मा जी की जूठन गिरने का सौभाग्य मेरे घर को मिलेगा, उस दिन मेरा जन्म सार्थक हो जायेगा।”
दो चार दिन बीत गये।इस बीच में तुलसी और रत्नावली का सामना एक बार भी न हुआ।रत्नावली ने सतर्कता पूर्वक अपने आपको उनकी दृष्टि से बचाया।
क्रमश
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