महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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तुलसी के कान बावले हो उठे।झुरमुट के पीछे से एक मनुष्याकार आता हुआ दिखाई दिया।आँखों की चमक देखते ही मंद पड़ गई। मुँह से हल्की निराशा के साथ आप ही आप निकल पड़ा- “अरे यह तो टोडर है।”
पीछे और भी लोग थे।जयराम साहू पंडित गंगाराम टोडर के साथ साथ आये थे।नमस्कार प्रणाम आशिर्वाद आदि क्रिया सम्पन्न हो जाने पर टोडर बोले- “हम एक प्रस्ताव लेकर आपकी सेवा में आये हैं।”
“क्या प्रस्ताव है।”
इस बार गंगाराम बोले- “तुमने राम चरित मानस जैसा महकाव्य लिखनें में अथक परिश्रम किया है और राम जी की कृपा से रस सिद्ध हुये हो।अब हमारा यह विचार है कि तुम्हें कुछ विश्राम भी मिलना चाहिए।”
“इन बीते चार वर्षों में मानस रचना के क्षण ही मेरे लिए खरे विश्राम के क्षण हैं।मेरा मन इससमय हरा भरा है गंगाराम।”
जयराम बोले- “फिर तो विश्राम आपको अवश्य ही करना चाहिए महाराज।आपने हमसे कई दिनों से सेवा नहीं ली, केवल फलाहार और आँखें दुग्ध पान ही करते रहे।मैं समझता हूँ कि अब तो आपको अन्न ग्रहण करना चाहिए।थोड़ी सेवा भी स्वीकार कीजिए।”
“अरे तब तो मैं मोटा हो जाऊँगा। मेरा तप ही मेरा आनन्द है भाई, उसे मुझसे क्यों छीनते हो? न न यह सब बातें छोड़िये। अब चतुर्मास लगने वाला है। मैं सदग्रहस्थों के बीच में कहीं मानस कथा सुनाना चाहता हूँ, उसी में आनन्द आयेगा।”
टोडर बोले- “मैं जो प्रस्ताव लेकर आया हूँ, उसके पीछे आपकी रामायण कथा वाली बात मूल रूप से मेरे मन में है महात्मा जी।”
“तुम्हारा प्रस्ताव क्या है।”
“टोडर सावधान होकर बोले- बात यह है कि (पंडित गंगाराम की ओर देख कर) आप ही बतायें ज्योतिषी जी।”
तुलसीदास बोले- “ऐसी क्या बात है भाई? कहने में इतना संकोच क्यों?”
गंगाराम बोले- “संकोच इसलिए है कि तुम कदाचित प्रस्ताव सुन कर बिगड़ न जाओ।पर हम लोगों ने जब बात को हर तरह से मथ लिया है तभी कहने आये हैं।बात ये है कि लोलार्क कुंड पर एक वैष्णव मठ है, मठ क्या है हमारे टोडर की एक नातेदार बुढ़िया थी। वह एक गोंसाईं जी को अपना घर पुण्य कर गई। गोंसाईं जी बड़े भक्त और विद्वान पुरूष थे।उन्होंने चार पाँच शिष्यों को भी रख छोड़ा था।अब वे गोलोक वासी हो गये हैं।मठ के गोस्वामी पद के लिए झगड़ा है।वहाँ जो कुछ पैसा आता है वह प्रायः टोडर की बिरादरी वालों से आता है।वे गोसाईं जी के शिष्यों में किसी को उस पद के योग्य नहीं समझते।अब या तो मठ बंद कर दिया जाये या फिर किसी योग्य को उस पद पर बिठाया जाये।”
“तो तुम लोगों ने मुझे चुना।मैं राम कृपा से गोस्वामी बन तो रहा हूँ किंतु अभी इस पद को सिद्ध नहीं कर पाया।अत: तुम्हारा प्रस्ताव मुझे अमान्य है।”
जयराम बोले- “देखिये महाराज अपने मन से आप चाहे वहाँ तक पहुँचे हों या न पहुँचे हों, पर काशी के लोग आपको पुराने जमाने के बड़े बड़े ऋषि मुनियों के समान ही मानते हैं।टोडरजी ने तो औंचक ही आपका नाम बिरादरी वालों के सामनें ले दिया, अब सब के सब तो इनके पीछे पड़ गये।लोलार्क कुंड मोहल्ले में यह खबर फैल चुकी है कि आप आ रहें हैं।क्या छोटा और क्या बड़ा महाराज सबके मनों में इस समाचार से बड़ी खुशी छा गई है।”
“यह सब ठीक है किंतु मैं इस प्रपँच में नहीं पड़ूँगा।मठ में मंदिर भी होगा?”
“ हाँ महात्मन”
“स्वाभाविक रूप से कृष्ण मंदिर होगा।”
“हाँ टोडर के मन में भी संकोच आया था और इन्होंने मेरे सामने यह प्रश्न उठाया भी था, पर मैनें कहा कि तुम्हारे मन में राम कृष्ण का भेद नहीं है।तुम कृष्ण पूजन करके भी राम भक्त बने रह सकते हो।”
“तुमने ठीक कहा गंगाराम, परंतु…..।”
“देखो तुलसी दीन दु:खी जन समाज में तुम्हारा महत्व अवश्य बढ़ गया है, पर यहाँ का प्रतिष्ठित नागरिक यहाँ के दुष्टों के प्रचार के कारण अभी तुम्हारे सम्पर्क में आने में संकोच करता है।देखो बुरा मत मानना तुलसी, भद्र वर्गीय दृष्टि से अभी तुम प्रतिष्ठित नहीं हो।”
सुनकर तुलसी उखड़े, कुछ तीखे स्वर में कहा- “तो, भला मुझे उसकी क्या चिंता है? राम करे तुम सब लोग, यहाँ का सारा भद्र समाज धन और पदों का ऐश्वर्य भोगता हुआ चिर प्रतिष्ठित रहे, पर तुलसी भी क्या किसी से कम है-‘तीन गाँठ कौपीन में बिन भाजी बिन नौन, तुलसी मन संतोष करे जो इन्द्र बापुरौ कौन?’
तुलसी के चेहरे की चमक देख कर टोडर हाथ जोड़कर बोले- “देखिए महात्मा जी प्रश्न आपका नहीं, आपके यहाँ रचे इस महाकाव्य का है।दुष्टों के प्रचार से इसकी प्रतिष्ठा पर आँच नहीं आनी चाहिए।”
“तो क्या चाहते हो तुम लोग? मैं गोसाईं बन जाँऊ?”
“हाँ महाराज”- जयराम बोले- “शंकराचार्य महाराज ने भी सुना है मठ स्थापित किए थे।उनकी परंपरा के शंकराचार्य संन्यासी होकर भी सोने के सिहाँसन पर विराजते हैं और सोने के खड़ाऊँ पहनते हैं।इससे लोक पर उचित प्रभाव पड़ता है।”
गंगाराम बोले- “हमारा कहना मान लो तुलसी, तुम इस मठ के गुसाँई बन जाओ।गोसाईं तुलसी की रामायण का प्रभाव संत तुलसीदास की रामायण से अधिक अच्छा पड़गा।”
तुलसीदास सिर झुकाकर चुप हो गये, मन बोला- “भाग तुलसी भाग, यहाँ से भाग।”
गंगाराम बोले- “सामाजिक प्रतिष्ठा नितांत आवश्यक है तुलसीदास। किसी लोकधर्मी व्यक्ति को उसकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए।नीति यही कहती है।”
तुलसी चुप।
टोडर बोले- “साल में लगभग छ: सात हजार रूपये की चढ़त वहाँ हो ही जाती है।आपके पहुँचने पर निश्चय ही उस स्थान की महिमा बढ़ेगी।आप मठ के धन का कोई सुंदर उपयोग कर सकेंगे।”
जयराम बोले- “अरे मैं और मेरे कई रिश्तेदार नियमित रूप से आपकी वहाँ सेवा करेगें।काशी में और भी लोग राजी हो जायेंगें।हम सबकी ही अरदास है महाराज कि आप यह पद स्वीकार कर लें।”- कुछ रूक कर जयराम ने फिर कहा- “इससे पाखंडियों के विरूद्ध मोर्चा लेने में भी हमको बड़ी मदद मिलेगी।काशी से अब यह पाप लीला समाप्त होनी चाहिए।”
गम्भीर स्वर में तुलसीदास बोले- “भाई मैं तो अपने मन से स्पष्ट नहीं हो पा रहा हूँ कि मुझे यह पद स्वीकार करना चाहिए या नहीं।एक मन कहता है कि हाँ और दूसरा न।ऊपर से आग्रह ऐसे लोग कर रहें हैं जो मेरे श्रेष्ठतम शुभचिंतक हैं।राम करै सो होय।मैं तुम्हारा प्रस्ताव स्वीकार करता हूँ।
क्रमशः
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