महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी
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मंथरा के रूप में मेरे बचपन की भिखारी बस्ती में कुबड़ी भैंसिया की बहू बरबस अपनी चाल ढाल के साथ उभर कर मेरी लेखनी पर आ जाती थी।कौशल्या के रूप में कहीं न कहीं सूकर खेत की बड़ी रानी का चरित्र मन में आ जाता था।बेचारी बड़ी दयालु और दानी थी।उनको और राजा साहब की रखैल को एक ही दिन और प्रायः एक ही समय के आस पास बालक हुये।रानी का लड़का पहले हुआ परंतु दरबार में रखैल की चतुराई से उसके बेटे की खबर पहले पहुँची।राजा ने रखैल के बेटे को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।रानी बेचारी जीवन भर तपस्या ही करती रही।इसी प्रकार जीवन में देखे सुने अनेक दृश्य और चरित्र राम चरित रचना में घुलमिल जातें हैं।”
“भरत के चरित्र में गुरूजी आप स्वयं हैं।”
बाबा हँसे, कहने लगे- “अरे भईया जहाँ राम पद वंदन का छोटा सा भी अवसर मिलता था, मैं वहीं अपने आपको रमा देता था।भरत में, लक्ष्मण और हनुमान में, अत्री जटायु शिव शबरी, प्रत्येक पात्र या पात्री के रामलीन क्षणों में तुलसी अवश्य है।श्रीराम के अयोध्या त्याग के चित्रों की पृष्ठभूमि में मेरे अपने गृह त्याग की पीड़ा भी कहीं पर समाई है।सीता के विरह में, राम की मनोदशा चित्रण में, कहीं न कहीं मैं अपनी रत्नावली के साथ समा ही गया हूँ।छोड़ो इसे, मेरे मन में इस समय मेघा भगत के अंतिम दिनों की स्मृति उभर रही है।उस समय मैं लंका कांड की रचना कर रहा था।”
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युद्ध क्षेत्र में लक्ष्मण मेघनाद लड़ रहे हैं।तुलसीदास अपनी कुटी में बैठे इस प्रसँग को लिख रहें हैं।तभी एक सेवक दौड़ा हुआ आता है और सूचना देता है कि मेघा भगत बगीचे में चबूतरे से लड़खड़ा कर नीचे गिर गये हैं।उनके सिर में घाव लगा है, खून बह रहा है, अचेत हैं।तुलसी दास लिखना छोड़ कर भागतें हैं।मेघा भगत को भीतर के कमरे में लाया गया।तुलसी पहुँचते ही उनका सिर अपनी गोद में रख कर घाव का धोवाधाई करने का काम नौकर से लेकर स्वयं करने लगते हैं।थोड़ी देर में जयराम साहू, कैलास, दो तीन वैद्य और भगतजी के कई भक्तों का जमाव जुड़ जाता है।औषधि उपचार होता है किंतु भगत जी की चेतना नहीं लौटती।उन्हें तीव्र ज्वर चढ़ आया है।वैद्य जी जौनपुर के किसी वैद्य का पता बतलाते हैं।जयराम साहू के खर्चे पर कैलासनाथ उन्हें बुलाने के लिए जौनपुर भेजे जाते हैं।यह दिन तुलसी दास के लिए अत्यंत विकलता भरे थे।उसी समय दुर्योग से उनकी बाईं बाँह में भी बादी का दर्द आरम्भ हो गया।बाँह में टीसे उठतीं थीं, पर वे मेघा भगत को छोड़कर स्वयं विश्राम नहीं करना चाहते थे।रात का समय था।वैद्य की प्रतीक्षा में व्याकुल तुलसी अचेत मेघा भगत के सिरहाँने बैठे हुये उनका बाँह अपनी गोद में रखे सहलाते हुये, आँखें मूँदे हुये युद्ध क्षेत्र में राम की गोद में अचेत पड़े लक्ष्मण को देख रहें हैं।उनकी व्याकुलता राम के मुखारबिंद से काव्य बन कर फूट पड़ी।
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“लक्ष्मण के प्रति विलाप करते समय राम के वे भाव मेरे विकल क्षणों से ही उमंगे था।श्री लक्ष्मण के वैद्य को आना था, हनुमान जी की संजीवनी बूटी का प्रभाव उन पर होना था क्योंकि वह तो अवतारी पुरूषों की कथा थी, परंतु मेरे मेघा भाई न बच सके।उसी अचेतावस्था में वे दो दिन बाद रामलीन हो गये।मेरा राम चरित मानस उनके सामने पूरा न हो सका, इसका मुझे दु:ख है।
संवत 1635 में जेठ की तीज को राम चरित मानस का लेखन कार्य पूरा हुआ।उस दिन हमारे मन में अपार संतोष था।तुमसे सत्य कहता हूँ वेनीमाधव, जब अंतिम दोहा रचते समय मैनें प्रार्थना की कि-
“कामहिं नारि पियारी जिमि, लोभहिं प्रिय जिमि दास।
ऐसे ही रघुवंश महिं, प्रिय लागहुँ मोहि राम।”
उस समय मुझे ऐसा लगा कि राम मेरे आगे ऐसे खड़े हैं जैसे प्रत्यक्ष आ गये हों।मैं भावाभिभूत होकर लेखनी पोथी छोड़ कर उनके चरणों में नत हुआ और ऐसा करते ही मेरे राम अंतर्धान हो गये।काशी के भदैनी क्षेत्र में वह कुटिया, जहाँ बैठ कर मैनें मानस पूरी की थी, ऐसी दिव्य भीनी सुगंध से भर गई कि आज वर्षों बाद भी स्मरण मात्र से वह मेरेमनमें महक उठती है।पर उस स्वरूप दर्शन की चाह जो एक बार देखा था, अभी तक शेष बनी है।मेरे मरते समय तक राम एक बार अपना मुख दिखला दें।हे राम आपके स्वभाव गुण शील महिमा और प्रभाव को शिव हनुमान भरत और लखनलाल ने ही भली भाँति पहचाना था, आज मैनें भी पहचान लिया।तुम्हारे नाम के प्रताप से तुलसी जैसा दीन अभागा भी रामायण रचना का कार्य पूरा कर सका।अब एक बार और उद्धार हो जाये।मरते मरते आँखों में आपकी दिव्य छवि भर कर जी छक कर जाऊँ, अपने लिए आपसे केवल यही माँग करता हूँ।”
बाबा इतने भावाभिभूत हो गये कि वेनी माधव देखते ही रह गये।उन्हें स्पष्ट लग रहा था कि गुरू जी इस समय अपनी काया में नहीं हैं।उनका ध्यान सब ओर से निकल कर एक में ही केन्द्रित है।बंद आँखों सेपहले तो आँसू निकलते रहे फिर शांति छा गई।वेनी माधव को लगता था कि सामने कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक दिव्य प्रकाश पुँज बैठा है।उस समय फिर कोई बात नहीं हो सकी।
रात में बाबा के पैर दबाते समय संत वेनी माधव ने उनसे प्रश्न किया- “गुरूजी एक बात पूँछू।”
“पूछो”
“रत्ना मैया फिर आपसे मिलीं थीं।”
तुलसीदास पल भर चुप रहे, फिर कहा- “हूँ।”
“यहीं काशी में”
“हाँ”
“क्या उस प्रसँग के विषय में कुछ बताने की कृपा करेंगें।”
बाबा चुप रहे।उनके मौन को तोड़ने का साहस संतजी में नहीं था।इसलिए मन मार कर गुरू सेवा में तल्लीन हो गये।थोड़ी देर बाद अनायास ही बाबा बोले-“आज भी सोचता हूँ कि मैनें जीवन में एक महत् अपराध किया है, किंतु उस समय मैं ऐसा करने के लिये विवश था।”
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तुलसी अपनी कोठरी के आगे फुलवारी में गम्भीर किंतु संतोष भरी मुद्रा में टहल रहें हैं।रह रह कर उनका सिर कुछ उठकर देखने लगता है।वे कभी कभी विकल होकर आकाश की ओर देख कर गिड़गिड़ाते हैं, मुखमुद्रा दीन बन जाती है।उनका चेहरा देख कर लगता है कि मन में कुछ तरंगें मचल मचल कर आपस में मिल कर कोई भँवर सा बना रहीं है।सहसा झाड़ी के पीछे किसी की पदचाप सुनाई दी।
क्रमशः
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