Thursday, 3 August 2023

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महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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हाँ भोजन के समय उन्हें अपनी थाली में हर व्यँजन में रत्नावली के हाथ का स्पर्श मालूम पड़ता था।वे थाली के सामने बैठ कर बार बार रत्नावली का छवि के साथ बँध जाते थे।
पंडित गंगाराम के यहाँ सूचना पहुँची तो रत्नावली को लिवा जाने के लिए तुरंत उनके यहाँ से पालकी आ गई।रत्नावली प्रह्लाद घाट गई तो भोजन का वह स्वाद भी चला गया।रात के समय वे और राजा भगत बैठे हुये धर्म चर्चा कर रहे थे।रसोइया दो गिलासों में दूध ले आया।तुलसीदास बोले- “अरे भाई गोसाईं क्या बना हूँ कि आठों पहर तर माल चबाते चबाते दु:खी हो गया हूँ।” एक घूँट पिया,मलाई चबाते हुये मुँह बनाया, फिर मुस्कराए- “वाह रे रामजी, कहाँ तो एक वह दिन था कि कटोरी भर छाछ पाने के लिये मैं ललचाता था और अब कहाँ इस सौंधे दूध की मलाई खाने में भी खुन्नस लगती है।”
राजा बोले- “काहे खुनसाते हो भैया। तुम्हारी जिभ्या से भगवान जी स्वाद लेते हैं।गोसाईंयों में हमें यही बात तो अच्छी लगती है कि गोसाईं लोग दुनिया का हर भोग राजी होकर ग्रहण करते हैं, पर अपने स्वाद और सुख को वे भगवान का ही मान कर चलते हैं।”
गोस्वामी जी महाराज चुप रहे।दूध पीते रहे।बात में उन्हें राजा के मन का हल्का सा संकेत मिल गया था।उन्होंने तुरंत ही राजा भगत की मनोधारा का मुहाना बंद करने का निश्चय किया, कहा- “है तो ऊँची बात, पर खरा गोस्वामी ही इस पानी पर बिना पैर भिगोये चल सकता है।पूर्ण गोस्वामीत्व पाने के लिए मैं अभी तक रामजी की ड्योढ़ी का भिखारी हूँ।”
राजा तुलसी का पैंतरा समझ गये।उन्होंने भी अपने पक्ष को दृढ़ता से प्रस्तुत करने की ठानी, कहने लगे- “दो तापसी जब मिल जातें हैं तब दोनों को एक दूसरे  से आगे बढ़ने का हौसला मिलता है।तुम्हारी तपस्या तो भैया सारा जग देख रहा है पर हम तो भौजी का तप देख देख कर अपने मन को ठिकाने पर ला पाये हैं।इस कलि काल में ऐसा कठिन जोग साधने वाली जोगिनि मैनें नहीं देखी।”

तुलसी चुप रहे, रत्नावली की कठिन साधना के प्रति अपने मित्र से ये उद्गार सुन कर उन्हें भला लगा।उन्हें वैसा ही संतोष हुआ जैसै कि अपने सम्बन्ध में सुन कर होता है, किंतु यह संतोष जिस तेजी से अपने चरम बिंदु पर पहुँचा, उतनी ही तेजी से मन का पर्दा फड़फड़ा कर पलट भी गया।कुछ क्षणों के लिए भूला राम नाम फिर से घटमें गुजरना आरम्भ हो गया।
राजा भगत कह रहे थे- “गाँव में तुम्हारी रूचि की रसोई बनाती रहीं और किसी भूखे कंगले को खिलाती रहीं।आप बिना चुपड़ी, बिना साग भाजी के दो रोटी खाकर दिन बिताती हैं।रोज तुम्हारी धोती धोकर, तुम्हारी पूजा की सामग्री लगाना, तुम्हारे बैठने के स्थान पर झाड़ू लगाना, तुम्हारी एक एक चीज को सहेज सम्हाँल कर रखना, कहाँ तक कहें भैया भौजी जैसी तापसी हमनें नहीं देखी।तुम घर से निकल गये पर उन्होंने अपनी भक्ति से तुम्हें अब तक बाँधरखा है।”
मन का राम शब्द राजा की बातों से उपजे संतोष से बीच बीच में बिखरने लगता और फिर बार बार राम शब्द प्रबल होता।वे दूध का गिलास रख कर कुल्ला करने के बहाने से उठ गये।वैरागी मन कह रहा था, चेत खबरदार सम्हँल।दूसरा मन रत्नावली की क्षणिक छवि भी निहारने के प्रयास में था।कुल्ला करके दोनों जब फिर अपनी अपनी चौकियों पर बैठे तो राजा ने कहा- “सीता के बिना रामजी भी कभी सुखी न रह पाये,तुमसे अधिक भला कौन समझ सकता है।तुमने तो सारी रामायण रच डाली।जब रावण उन्हें हर ले गया तो भी, धोबी की निंदा के कारण वाल्मीकि मुनी के आश्रम में भेज दिया, तब भी, रामजी सुखी न रह पाये।बाँया अंग जब कट जाये तब दाँया भला कैसे सुख पा सकता है।”
तुलसी को ये बातें अच्छी भी लग रहीं थी और कहीं वे इस ओर से उचटने का भी प्रयास कर रहे थे।तुलसी ने लेट कर चादर तानते हुये वाग्धारा को विराम देते हुये कहा- “अच्छा तो अब हम विश्राम करेंगें।” और लेट गये। करवट बदल ली।राम राम जपना आरम्भ कर दिया।मन में एक बार ध्यान आया ‘मैं राम के लिए तड़फता हूँ, वह मेरे लिए।क्या मैं रत्नावली से ज़्यादा निठुराई बरत रहा हूँ।’-झटके से तुलसी ने अपना मन उधर से हटाया और राम शब्द में लीन होने का प्रयत्न करने लगे।उन्हें रात में अच्छी नींद न आई।
सबेरे पंडित गंगाराम के यहाँ से न्यौता आया तो उन्होंने कहलवा दिया कि वे नहीं आयेगें।टोडर आये और उन्होंने अपना प्रस्ताव दोहराया, कहा-“ महात्मा जी आप दोनों एक दिन पहले मेरी कुटिया पर अवश्य पधारेंगे।”
तुलसी को लगा कि राम उनकी परीक्षा लेने के लिये ही यह प्रस्ताव टोडर के मुँह से कहलवा रहें हैं।वे बोले- “विरक्त अब फिर से राग के बंधनों में नहीं बँध सकता।”
“आप उन्हें यहीं रहनें दें महात्मा जी…”
बात पूरी भी न हो पाई थी कि गोस्वामी ने झटके से उसे काट दिया और उत्तेजित स्वर में बोले- “क्या तुम चाहते हो कि मैं अपने तथा अपनी पत्नी के सुख के लिए समाज की आस्था को अधर में लटका दूँ? यह असंभव है टोडर।”
“क्षमा करें महात्माजी, किंतु इससे लोगों की आस्था क्यों बिखरोगी? वल्लभ गोस्वामी की घर ग्रहस्थी उनके साथ रहती थी फिर भी उन्होंने मोक्ष लाभ किया।”
तुलसी ने मीठी झिड़की देते हुये कहा- “तुम समझते क्यों नहीं हो टोडर, आज का समय वल्लभाचार्य जी के दिनों जैसा नहीं है।कबीरदास वाला समय भी बीत गया।यह घोर कलि काल है।नैतिकता का इतना ह्रास हो गया है कि उसे यदि एक स्तर तक उठाये न रखा जायेगा तो फिर सारा संसार अनैतिकता की लपेट में आये बिना कदापि न रहेगा।” टोडर चुप हो गये।

राजा भगत ने इस बार तुलसी रत्नावली का मेल कराने के लिए पूरा षड़यन्त्र रचा था।उन्होंने पंडित गंगाराम, टोडर यहाँ तक की कैलास कवि को भी अपने पक्ष में कर लिया था।गंगाराम आये उन्होंने कहा, कैलास आये उन्होंने कहा, मठ में रहने वाले शिष्यों ने भी कहा- “माताजी परम विदुषी हैं, उनके यहाँ रहने से हमारे अध्ययन में बहुत सहायता मिलेगी।”
तुलसीदास ने सहमति नहीं जताई।एक दिन नाथू नाई उनकी हजामत बनाने आया, उसी समय मठ के द्वार पर रत्नावली जी की पालकी आई।
क्रमशः

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