Thursday, 3 August 2023

147

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
147-

रत्नावली पालकी से उतर कर ऊपर चली गईं।नाथू नाई गोस्वामी जी की सेवा में पहुँचा, उनके चरणों में ढोका लगाया।एक भृत्य ने आकर गोसाईं जी को पंडित गंगाराम के घर से माताजी के लौट आने का समाचार दिया।तुलसीदास ने उससे कहा- “उनसे बराबर पूछते रहना, उनकी सेवा में किसी प्रकार की कोई कमी न आए।”
भृत्य के द्वारा जो आज्ञा कह कर जाते ही, पानी की कटोरी लेकर गोस्वामीजी के पास आते हुये नाथू नाई बोला- “माताजी आ गईं सरकार, यह बड़ा सुभ भया।”
तुलसीदास चुप रहे।गोसाईं जी की ठोड़ी को पानी से तर करके मींजते हुये नाथू ने अपना राग अलापा- “ये दुनिया वाले बड़े कमाने होते हैं महाराज।कलयुग में सबका मन काला हो गया है।” तुलसीदास आँखें मींचे बैठे रहे।नाथू ने बात को फिर आगे बढाया- “जब से माताजी आईं हैं तब से लोग बाग रोज हमसे पूछतें हैं कि माताजी क्या अब यहीं रहेंगीं।अब हम क्या कहें सरकार।अरे माताजी का मन जहाँ चाहे रहें? भला उनका क्या जाता है? बड़ी हवेली वाले गोसाईं महाराज भी तो गिरहस्त हैं, उनको कोई कुछ नहीं कहेगा।आपके लिए सारी रोक टोक? कहते हैं चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी पाख है।अब ये तपस्या छोड़ कर भोग विलास…….।”
तुलसीदास के मन का संतोष और शांति बालू की दीवार की भाँति ढह गया।वे उत्तेजित हो गये, बोले- “इस प्रसँग को अब यहीं और इसी समय समाप्त कर दो।”
नाथू नाई तुलसीदास का रूख देख कर, सहम कर चुपचाप अपने काम में लग गया।तुलसीदास के मनोलोक में अंधड़ उठने लगे।कभी अपने ऊपर, कभी दुनिया पर, कभी रत्नावली पर और कभी राजा भगत पर क्रोध आता कि ये लोग उनकी शांति भंग करने यहाँ क्यों आये।हजामत बनती रही, सिर और गालों पर उस्तरा चलता रहा।तुलसीदास  जी का मन इन सारी बाहरी क्रियाओं से अलिप्त होकर अपनी करूणा से आप विगलित होने लगा।जब अपनी विकलता को सह न पाया तो रामजी के चरणों में शांति पाने के लिए दौड़ पड़ा- “हे दीनबन्धु सुखसिंधु कृपा कर, कारूणीक रघुराई।सुनिए नाथ, मेरा मन त्रिविध ताप से जल रहा है।वह बौरा गया है।कभी योगाभ्यास करता है तो कभी वह शठ भोग विलास में फँस जाता है।कभी कठोर और कभी दयावान बन जाता है। कभी दीन, कभी मूर्ख कंगाल और कभी घमंडी राजा बन जाता है।वह कभी पाखंडी बनता है तो कभी ज्ञानी।हे देव मेरे मन को यह संसार विविध प्रकार से सता रहा है।कभी धन का लालच सताता है, कभी शत्रु भय सताता है।मैं अपने मन से बहुत दु:खी हूँ रघुनाथ।संयम तप जप नियम धर्म व्रत आदि सारा औषधियाँ करके हार गया किंतु मेरा मन मेरे काबू में नहीं।कृपा इसे निरोगी बनाइए।अपने चरणों की अटल भक्ति देकर इसे शांत कीजिए नाथ।मैं अब बहुत तप चुकाँ हूँ।”- बंद आँखों से आँसू टपकने लगे।
नाथू ने जो यह देखा तो अपना उस्तरा रोक दिया।उसके उस्तरे और हाथ का स्पर्श हटते ही तुलसीदास बाहरी होश में आ गये।भरी हुईं आँखें खोल कर एक बार देखा, फिर पास रखे अगौछें से आँखें पोंछ कर बोले- “तुम अपना काम करो नत्थू, मेरा मन तो राम बावला है कभी हँसता है कभी रोता है।”
नाथू नाई जब काम करके जाने लगा तो तुलसीदास बोले- “अब जो तुमसे कोई पूछे तो कह देना कि माताजी अपने मोहवश चार दिन के लिए आईं हैं, शीघ्र ही चली जायेंगीं।”
“काहे महाराज,रहैं न। दो ही दिनों में मठ के सारे लोग उनकी बढ़ाई करने लगे हैं।गोसाईं लोग तो घर गिरहस्ती वाले होते हैं।”
“मैं दूसरे गोसाईयों की तरह अनीति की चाल कदापि नहीं चल सकता।मैंनें ग्रहस्थाश्रम का त्याग किया सो किया।”- उनके चेहरे पर हठभरी अहंता दमक उठी।थोड़ी देर बाद ही उन्होंने नौकर को बुलाकर रत्नावली को कहलवाया कि वे शीघ्र ही राजापुर लौट जायें।रत्नावली ने उसी दास से कहलवाया कि वे उनसे मिलना चाहतीं हैं।एक बार तुलसीदास का मन हुआ कि वे मना कर दें, फिर कहते कहते रूक गये और कहा- “भेज दो।कोठरी का पर्दा गिरा दो और उनके बैठने के लिए बाहर आसन भी बिछा दो।”
रत्नावली आईं।अपने और पतिदेव के बीच में टँगे परदे को देखा और सिर झुका कर खड़ी हो गईं, पल भर बाद धीरे से खँखारा और कहा- “जै सियाराम”
“जै सियाराम, बाहर आसन बिछा होगा विराजो।”
“मैं आपके दर्शन नहीं कर सकती।”
तुलसी एकाएक उतर नहीं दे सके, कुछ रूक कर शांत स्वर में कहा- “लोक धर्म बड़ा कठिन होता है देवी।व्यर्थ निंदा से बचने के लिए रामजी को जगदम्बा का त्याग करना पड़ा।तुम घर कब लौट रही हो।”
“मैं अब काशी में ही रहना चाहती हूँ।”
“नहीं”
“मैं मठ में नहीं रहूँगी।पंडित गंगाराम जी की गृहिणी ने मुझे…..।”
“पंडित गंगाराम या टोडर के यहाँ तुम्हारा रहना उचित नहीं है।”
“मैं स्वयं यह उचित नहीं समझती।अलग घर लेकर रहूँगी।”
“नहीं”
रत्नावली का टूटता मन उनके चेहरे पर दिखाई देने लगा, गिड़गिड़ा कर बोलीं- “मैं यहाँ आपको कष्ट देने के लिए कभी नहीं आऊँगी।कभी आपके सामने नहीं पड़ूँगीं।आपके तप में कोई बाधा नहीं डालूँगी।”
“नहीं, तब भी नहीं”
“आप रामजी का सानिध्य चाहते हैं,यदि वे इसी प्रकार आपसे न कह दें तो।”
सुन कर तुलसी एक बार तो निरूत्तर ही हो गये।मन लड़खड़ाया, परंतु तुरंत ही उसे कस कर कहा- “श्री राम और इस अधम तुलसी में अंतर है देवी।लोक का चरित्र गिराहुआ है।उसे उठाने की कामना रखने वाले को कठिन त्याग करना होगा।लोक कल्याण के लिए तुम भी तपो देवी।अब इस जन्म में हमारा तुम्हारा साथ नहीं हो सकता।”
पर्दे को दोनों ओर कुछ देर चुप्पी रही, फिर रत्नावली ने रूँधे हुये गले से कहा- “जो आज्ञा, मैं कल ही चली जाँऊगी।”
पर्दे के उस पार फिर चुप्पी छा गई।कुछ पलों बाद रत्नावली ने कहा- “जाने से पहले एक बार चरण स्पर्श करने की……।”
“मेरा मन अभी दुर्बल है देवी, तुम्हारे स्पर्श से मेरी तपस्या पर आँच आ जायेगी।”
“जो आज्ञा”- गला रूँध गया।पर्दे के आगे झुक कर धरती पर मस्तक टेक दिया।आँसू उमड़ पड़े।भीतर से तुलसी दास ने पूछा- “गईं?”
“जा रही हूँ…. एक भीख माँगतीं हूँ।”
“बोलो”
“पंडित गंगाराम जी के घर मैनें आपके द्वारा रचित राम चरित मानस का पारायण किया था।मैंने उसे वाल्मीकि जी की कृति से श्रेष्ठ भक्ति प्रदायक ग्रन्थ पाया।”
सुनकर तुलसी को संतोष हुआ।
क्रमशः

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