Friday, 4 August 2023

148

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
148-

तुलसी बोले- “आदि कवि के परम पावन ग्रन्थ से उसकी तुलना न करो देवी। वैसे यह जानकर मैं संतुष्ट हुआ कि तुमने वह ग्रन्थ पढ़ लिया।”
“राम चरित मानस की एक प्रति…….।”
“शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँच जायेगी।टोडर प्रतिलिपियाँ कराने की व्यवस्था कर रहे हैं।”
“एक बात और पूछना चाहती हूँ, आज्ञा है।”
“पूछो देवी”
“महर्षि ने उत्तर कांड में धोबी द्वारा निंदा सुन कर श्री रामजी के द्वारा सीताजी का त्याग कराया है।आपने मानस में वह प्रसँग क्यों नहीं उठाया।”
तुलसीदास सुन कर चुप।चुप्पी लम्बी रही।
“यदि मेरा प्रश्न अनुचित हो तो क्षमा करें।”
“नहीं, तुम्हारा प्रश्न जितना सहज है मेरे लिए उत्तर देना उतना सरल नहीं है।”
“कोई बात नहीं, जातीं हूँ।”
“उत्तर सुन जाओ देवी, मैं तुमसे कुछ न छिपाऊँगा।जो अन्याय मैं तुम्हारे प्रति कर सका, वह मेरे रामचंद्र जगदम्बा के प्रति नहीं कर सकते थे।”
रत्नावली की आँखें बरस पड़ीं।कुछ देर रुककर तुलसी गोसाईं ने पूछा- “गईं”
रुदन कंपित स्वर में रत्ना बोली- “जा रही हूँ”
“रो रही हो रत्ना ?”
“संतोष के आँसू हैं”
“अब न बहाओ, देवी नहीं तो मेरे मन का धैर्य और संतोष बंट जायगा। सेवक का धर्म कठिन होता है।” कहकर गोसाईं जी ने एक गहरी ठंडी साँस ली। 
“जाती हूँ, एक भिक्षा और माँग लूँ?”
“माँगो”
“मेरी मृत्यु से पहले एक बार मुझे अपना श्रीमुख दिखलाने की कृपा करें।”
“वचन देता हूँ, आऊँगा।” 
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“रत्नावली चली गई। उसका जाना मुझसे शत्रुता रखनेवाले लोगों की रोषवृद्धि का एक और प्रबल कारण बन गया” 
“क्यों गुरू जी?” बेनीमाधव ने पूछा।  “गृहस्थ गोस्वासियों को लगा कि ऐसा करके मैंने उनकी मान प्रतिष्ठा को गिराया है।”
“उनके लिए यह सब सोचना कदाचित्‌ स्वाभाविक ही था। पापी लोग पुण्य- शील महात्माओं के नैसर्गिक शत्रु होते ही हैं। तो उन्होने किस प्रकार से आपका विरोध किया गुरू जी?” 
“पहला विरोध मठ की अर्थव्यवस्था को भंग करने की चेष्टा के रूप में हुआ।”
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मठ के द्वार पर दो सण्ड-मुसण्ड वैरागी चौखट के दोनों ओर बैठे थे। उनमें से एक प्रात.काल दर्शन करने और प्रवचन सुनने के लिए आये हुये नर-नारियों की छोटी सी भीड़ को बड़े रोष के साथ सम्बोधित कर रहा था- “यहाँ कोई मत आओ। यह धर्म का नहीं वरन‌ अधर्म का मठ है। नये गोस्वामी के आगमन से यहाँ पापाचार बहुत अधिक बढ़ गया है।”
एक संभ्रांत भक्त सविनय हाथ जोड़कर सतेज स्वर में बोला- “यहाँ तो मैंने एक दिन भी पापाचार नहीं देखा गुसाँई जी। महात्मा तुलसीदास जी पर आप जैसे पूज्य पुरुषों का मिथ्या दोप लगाना अच्छी बात नहीं है।”
कई अधेड बूढ़ी स्त्रियाँ प्रायः एक साथ ही चेंचा-मेचीं कर उठीं-“अरे इत्ती अच्छी कथा सुनाते हैं। ऐसा भजन भाव करते हैं। उनके मुँह पर ऐसा तेज टपकता है कि बनारस भर मे किसी साधु महात्मा के मुँह पर वैसा तेज देखने को नहीं मिलता।”
युवक गोसाई उत्तेजनावश उठकर खड़ा हो गया, चिल्ला चिल्लाकर कहने लगा- “उसके मुह पर तेज देखती हो? तेल फुलेल से अपना मुँह चमका के ढोंग  रचाने वाला पापी जिसे तेजवान महात्मा दिखाई पड़े वह मूर्ख है। जो ढोंगी हमारे इष्टदेव नन्दनन्दन गोपीवल्लभ राधा रमण श्री कृष्ण परमात्मा को गौण बताकर अपने इष्टदेव को ऊँचा बताए, उससे बड़ा ढोंगी और पापाचारी भला और कौन होगा? भागवत‌ जैसे परम पवित्र ग्रन्थ को छोड़कर वह यहाँ अपनी रची हुई रामायण सुनाएगा।कहाँ तो महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवत्‌, जो अठारह पुराणों से भी श्रेष्ठ है और कहाँ एक ढोंगी तुक्कड़ की भ्रष्ट कविता।न उसे मात्राओं का ज्ञान है व छन्द का। हम यहाँ अनशन पाटी लेकर पड़ेंगे। हम अपने जीते जी ऐसा पापाचार कदापि नहीं होने देंगे।”
उनके धरना देने से गोस्वामी तुलसीदास जी की क्रोध रूपी गौ भड़क उठी। उन्हें लगता था कि जैसे लंका पर चढ़ाई करने के लिए राम जी सेना सहित समुद्र के तट पर खड़े थे और समुद्र उन्हें जाने की राह नहीं दे रहा था वैसे ही यह दुष्ट उनके राम कथा प्रसार मे बाधक बने हैं। वे टोडर तक को मन्दिर के भीतर नहीं आने देते थे।
एक दिन क्रोध को अपने वश में न रख सकने के कारण तुलसी बाहर निकल आए। टोडर से कहा- “कथा मैं अवश्य सुनाऊँगा।तुम डुग्गी पिटवा दो कि कथा अब अस्सी घाट पर होगी।”
एक गोसाईं युवक उत्तेजित हो गया, बोला- “कथा तुम्हारे बाप दादे भी नहीं सुना सकते। हमारे जीते जी काशी में यह अनाचार नहीं होगा।अपनी रामायण को गंगा जी में डुबा दो।”
“मेरी रामायण, जन-जन की हृदय गंगा में प्रिय बनकर तैरेंगी।राम कृपा से यह कथा अवश्य होगी। शंकर भोलानाथ स्वयं मेरी कथा सुनेंगे।”
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“डुग्गी पिटी। वैष्णवो और शैवों में कुटिल प्राणियों का प्रबल संगठन मेरे विरुद्ध बन गया। कहाँ तो वे लोग आपस में एक दूसरे को गालियाँ देते फिरा करते थे और कहाँ अब दोनों मिलकर मेरे विरुद्ध प्रचार करने लगे। मेरे पुराने विरोधी बटेश्वर मिश्र कुछ पण्डितों की ओर से यह निर्णय ले आए कि गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमातस एक अत्यन्त निकृष्ट काव्य है। इसमें धर्म, दर्शन तथा भक्ति का गलत निरूपण हुआ है। काव्य की दृष्टि से यह एकदम हीन और अशुद्ध है। इसे सुनने वाले को घोर रौरव नरक भोगना पड़ेगा। यमदूत उसके कानों में खौलता हुआ तेल डालकर उसे दण्डित करेंगे।
मेरे लिए वे दिन बड़े ही दुखदाई सिद्ध हुए, किंतु गंगाराम तथा टोडर की दौड़ धूप से काशी के पण्डितों का एक और निर्णय भी गली गली में प्रचारित होते लगा। इन पण्डितों ने पहले, प्रचारित किए निर्णय को भ्रामक बतलाया। कुछ पण्डितगण, जिन्होंने कि रामायण के थोड़े बहुत अंश सुन रखे थे, यह कहने लगें कि यह तुलसी के प्रति मिथ्या प्रचार है। नगर का जनमत भी पहले वाले निर्णय के विरुद्ध था। स्वयं पण्डितों में ही विकट द्वंद्व मचने लगा। उन दिनों काशी में मेरा बाहर निकलना दूभर हो गया था। जिघर जाओ उधर ही निन्‍दक भी मिलते और प्रशंसक भी। मैंने सोचा कि रामकथा को लेकर ऐसा राग द्वेष बढ़ाना उचित नहीं। स्वामी मधुसूदन जी सरस्वती काशी के सभी पण्डितों को मान्य थे। मैंने उससे जाकर निवेदन किया कि महाराज, आप रामचरित मानस सुनें, यदि आपकी दृष्टि में वह ग्रन्थ हीन सिद्ध हुआ तो मैं उसे तुरन्त जाकर गंगा जी में प्रवाहित कर दूँगा।
क्रमशः

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