Saturday, 29 July 2023

141

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
141-

इन चकल्लसियों को पहुँचते देर न लगेगी, फिर तो जैसा अस्सी घाट वैसी ही कपिलधारा।”
“हम कहते हैं कि तुम मेघा भाई के साथ क्यों नही रहतें ? भदैनी में जयराम साहू की बगीची में रहो और निश्चिन्त होकर अपना महाकाव्य रचो। वहाँ तुम्हें कोई सता नहीं सकेगा।”
कुछ देर तक विचार करने के बाद तुलसी ने कहा- “तुम्हारे इस प्रस्ताव में दम हैं। मेरा लेखन कार्य वहाँ शांतिपूर्वक हो सकेगा। तब फिर तुम एक बार भदैनी चले जाओ कैलास, मेघा भाई से सही स्थिति बतलाना और कहना कि कल ब्रह्मबेला में मैं भदैनी पहुँच जाऊँगा। कोई यह जान भी न पाएगा कि तुलसी कहाँ गया।”
तुलसी के भदैनी आ जाने से मेघा भगत बड़े ही प्रसन्न हुए।ऐसा लगता था कि उनके आगमन की प्रतीक्षा में वे रात भर नींद भी नही सो पाए थे। देखते ही बड़े उन्मत्त उल्लास से भगत जी ने उन्हें आालिंगनबद्ध कर लिया, फिर एकाएक फूट फूटकर रो पड़े। उस रूदन में तुलसी को भगत जी के अन्तर्मन की शांति और आनन्द का अनुभव ही अधिक हुआ। उन्हें लगा जैसे लूँ भरे मैदान में कोसों चलकर वे ऐसी घनी अमराई में आ गए हों जहाँ आम के बौरों की गंध से लदी शीतल बयार डोल रही है। आलिंगन में बँधे  बँधे ही वे बोले- “राम जी ने इस बार कठिन परीक्षा ली मेघा भाई, परन्तु उन्हीं की कृपा से उबर भी गया।”
घीरे धीरे आलिंगन मुक्त हो कर अपने आपको संयत करते करते मेघा भाई फिर रो पड़े, कहा - “अरे अभी तेरी परीक्षाओं का अंत कहाँ आया है भैया, यही सोच सोचकर तो दु.खी हो रहा हूँ।” 
तुलसी हँसे, बोले- “आपके इस दु.ख में भी सुख ही झलक रहा है भाई।”
सुनकर रोते रोते ही मेघा हँस पडें, कहा- “एक जगह पर अब मुझे दुःख सुख में अंतर ही नही दिखलाई पड़ता। वासना, बिंब ध्वनि और उसका बहिर्प्रसार बहिर्चेतना है, जितना गहन उतना ही विस्तृत और उतना ही उच्च। कहाँ भेद, करूँ। पहले तीनों अलग अलग समझ पड़ते हैं।अब सब एकाकार हैं।”
तुलसी गंभीर हो गए, कुछ क्षणों तक चुप रह कर कहा- “एक राम, एक कवि, एक रामबोला, तुलसीदास, परन्तु राम तुलसी तक आते आते अनेक रूपरूपाय हो जाते हैं। मेरे जप तप सारे साधन अभी तक आपके समान एकाकार नहीं हो सके। क्या करूँ?” तुलसी के स्वर में उदासी छा गई।
“माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय।” कहकर मेघा भगत भीतर की ओर बढ़ चले।चौखट पर रुककर तुलसी के कंधे पर हाथ रखकर कहा- “घास के फूल जल्दी विकसित हो जाते हैं, चंपक देर से खिलता है। इतिहास मेघा को कहाँ देख पाएगा रे? मेरा तुलसी तो राम बनकर घट घट में रमेगा।ना ना, संकोच न करो भैया।अपने यथार्थ को पहचानो। तुम्हारे अहँकार की बहिर्चेतना और तुम्हारा अंत: कवि दोनों ही राममय बनने की उत्कंठ लालसा में एक सिरे पर तप रहे हैं और दूसरे सिरे पर तुम्हें अपनाने के हेतु स्वयं राम हैं। तुम्हारे महाकाव्य की रचना के लिए यही अंतर्द्धन्द्व कदाचित आवश्यक है।तपे जाओ मेरे भैया, यही तो दु.ख में सुख है।”
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एक राम, एक कवि और एक रामबोला। वेनीमाधव जी अपने भीतर इस गुरू वाक्य को घुनते रहे। असल में उनके राम और काम में ही इन्द्र है। उनका कवि और वेनीमाधब दोनों ही चाहते राम को हैँ, वही तो महिमा की वस्तु है लेकिन कामेच्छा राह में रोड़े डाल देती है। क्यों? तृप्ति पाई तो है फिर अतृप्ति क्यों? गुरू जी को भी ब्रह्मचर्य धारण करने के बाद वर्षो तक काम से संघर्ष करना पड़ा है। तब मैं क्यो डरता हूँ? गुरू जी ने अपने भक्त और कवि के अन्तर्द्वद्व का भी सुन्दर निरूपण उस दिन मेरे सामने किया था। अयोध्याकाण्ड की रचना करते समय वे अपनी काव्यात्मक निपुणता के प्रति जितने निष्ठावान रहे उतने राम भक्ति में लीन न रहे। उन्होंने अयोध्या में अपनी रचना के पाए जाने वाले प्रसँग से यों यथार्थ बोध ग्रहण किया था। अपने काशी के अनुभवों में भी उनके लिए नियति से तीखी टकराहटें ही मिलीं। फिर भी वे अपने महाकाव्य  की रचना में लगन के साथ लगे रहे। वह निष्ठा जो इनके मन को व्यर्थ संघर्ष रत बनाकर रचनात्मक कार्य में जुटाए रखती है, मुझे क्यों नहीं मिलती? कैसे पाऊँ? वेनीमाधव का सरल बाल सम मन चंद्रखिलौना पाने के लिए मचल रहा था। गुरुजी की बात पूरी हो जाने के बाद वे अपने ही गुंताड़े में लीन गए। 

बाबा बोले- “अच्छा जाओ, बाहर देख आओ, स्नानादि का समय हुआ कि नहीं। कल फिर तुम्हें आगे की कथा सुनाऊँगा। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।” 
दूसरे दिन फिर वें अपनी कथा सुनाने लगे- “मैंने एक को ले लिया और उस एक के पीछे ही दीवाना बन गया।धन वैभव सत्ता आदि लोक में लुभाने वाला सब कुछ मेरे राम के पास था और इतना था जितना कि मनुष्य की कल्पना में आने वाले कोटि कोटि ब्रह्माण्डों में किसी भी जीव के पास नहीं था।मैं उसे ठेठ भाषा में कहूँ वेनीमाधव कि अपने आदर्श की ऊंचाई के आगे मुझे ये बादशाह, सिपहसालार, राजे-महाराजे, सेठ-साहुकार मिट्टी के खिलौनों के समान लगते थे।मेरे सृजनशील अहं को जो शक्तियाँ हीनता का बोध करा सकतीं थीं वे तुच्छ बन गईं। ऐसे ही कामादि वृत्ति रूपी असुर भी मेरे सृजन शील अहं को तुच्छ नहीं बना सकता था। मेरे कवि का साहब परम न्यायी और करुणानिधान है,फिर मैं भला लोक की रावणी व्यवस्था से क्‍यों घबराता? मुझे परस्पर विरोधों के बीच से चलकर अपना राममार्ग प्रशस्त बनाना था।इसके बिना मैं अपनी सृजनशीलता को जिस धरातल पर ढालना चाहता था वह ढल न पाती। मेरा कवि अपने साहब के प्रति निष्ठावान था और मेरा साहब घट-घट में रमा हुआ है इसलिए मैं मानव मन के दर्शन करने का योग ही जीवन भर साधता रहा।” 
बेनीमाधव बोले - “आपने क्‍या राम के प्रत्यक्ष दर्शन पाए गुरू जी?”
बाबा हँसे, कहा- “जानते हो, रामचरित मानस लिखते समय मुझे बराबर यही विश्वास होता था कि जिस महाकाव्य को स्वप्न में जगदम्वा जानकी, कपीश्वर और कवीश्वर की आज्ञा पाकर रच रहा हूँ उसके पूरा होते ही राम जी मुझे अवश्य ही प्रत्यक्ष दर्शन देगें।
क्रमशः

142

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
142-

मुझे प्रत्यक्ष दर्शन मिले किन्तु जन जन के रूप में। यो रामचरितमानस रचकर मेरे घट घट व्यापी राम मुझे निश्चय ही मिल गए। मैंने उन्हें निराकार साकार रूप में बहुत सीमा तक पहचान लिया। उनका पूर्ण रूप देखने की लालसा यों मुझमें अब भी शेष है। कदाचित अंतिम साँस के साथ ही पूरी हो कि न हो।नहीं नहीं, राम कृपा से होगी। इस कलिकाल में तुलसी जैसी लगन से प्रीति निभाने वाले अधिक नहीं हैं। मेरे साहब अब मुझे नवाजेंगे।”
बाबा का अडिग अगाध आत्मविश्वास भरा गौर मुख वेनीमाधव के मन में उत्साह का संचार करने लगा। कैसा साहसी है यह रणबाँकुरा। भाव से भावपूर्ण होकर प्रश्न कर बैठे-“अरण्य काण्ड तो आपने अस्सीघाट पर ही रच डाला था न गुरू जी?”
बावा की स्मृति झनझना उठी,संघर्ष भरे, रचना की लीला भरे, वे पुराने दिन वेनीमाधव को दिखाने के लिए उनकी वाणी पर शब्द चित्र बनकर सँवरने लगे।
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अरण्यकाण्ड अति  संघर्ष के क्षणों में रचा गया। हनुमान फाटक और अस्सी
घाट पर विशेष रूप से ब्रह्महत्यारे को भोजन कराने के बाद उन्हें अत्यधिक त्रस्त होना पड़ा। तुलसी आठों पहर सतर्क रहकर अपनी वीतरागता को सिद्ध करते रहते थे और इसके लिए अरण्यवासी तापस श्रीराम का ध्यान उन्हें बल देता था। बल ही नहीं वे आंनद और एक अवर्णनीय तरावट सी पाते थे। उनके मान सरोवर में, बिम्ब शब्दों के कमल बनकर खिलने लगते थे ओर फ़िर वे लिखे बिना रह नही पाते थे किन्तु कितने विध्नों के झटके उन्हें लगते थे। लिखने का तार बार बार टूटता था। यहाँ भी तुलसी को अब तक अयोध्या से कुछ कम संघर्ष नहीं झेलना पड़ा था। अहंता पर चोटें सी पड़ी। यह सचमुच रामकृपा ही थी कि अपने आध्यात्मिक जीवन के प्रथम संघर्ष काल में उन्हें महाकाव्य रचने की प्रेरणा मिली। अयोध्याकाण्ड फिर भी निर्बाध गति से लिखा, यद्यपि भक्ति से अधिक वे काव्यनिष्ठा से बँधे। काशी में काव्य और भक्ति दोनों के प्रति वे अपनी निष्ठा को वैराग्य से संतुलित रखने में सतत‌ जागरूक रहे, यह महाकाव्य तुलसी का होकर भी उसका नहीं था, स्वयं हनुमान जी उससे लिखा रहे हैं। वह जितने सुघड़ ढंग से काम करेगा, जितनी सच्ची लगन से करेगा उतने ही उसके मालिक संतुष्ट होगें। जाति प्रपत्र, निन्दात्मक प्रचार आदि विरोधी पक्ष के तीखे से तीखे प्रहार तुलसी ऊपर से तो सफलतापूर्वक झेल जाते थे पर भीतर कहीं कचोट लगती थी। सद्चिन्ता विहीन शुद्ध दम्भयुक्त सत्ता या धन से मंडित दुश्चरित्र लोग मुझे नीचा कहें और मुझे सुनना पड़े।पीतल सोने को मुंह चिढ़ाए और सोना चुप रह जाय।यह विडम्बना न्याययुक्त मानकर कैसे सही जाय? पर सहनी ही पड़ेगी। रामबोला, राम तेरी परीक्षा ले रहे हैं। इधर से वीतराग वन। महाकाव्य पूरा करते ही राम तुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। अपने को अभागा न समझ। ऊपरी मान अपमान के चोंचले छोड़कर रामकथा रस में डूब -गहरे से गहरा डूब।

भदैनी मे घायल गृद्धराज जटायु से राम की भेंट होने का प्रसँग उठाया। गृद्धराज के बहाने राम वन्दना की और फिर बह चले। किष्किन्धाकाण्ड में, रामकथा में हनुमान के प्रवेश करते ही तुलसी का कार्यभार मानों मन से हल्का हो गया। काव्य रचना में उनकी तन्मयता और गति स्फूर्तिवत्‌ हो उठी। सारा सुन्दरकाण्ड एकरस होकर लिखा।हनुमान जी इस काण्ड के नायक थे। काण्ड रचते समय जब स्वयं राम-सीता अथवा राम के भाइयों के प्रसंग आ जाते हैं, तब तो उन्हें समुद्री तैराक की तरह अधिक सचेत रहना पड़ता है परन्तु हनुमान तो निरे बचपन से ही उनके लिए गंगा के समान हैं। वे उनके बड़े भाई है, सखा हैं, आड़े समय के सहारे हैं इसलिए उनका शौर्य, और उनकी द्रुत कर्म कुशलता का बखान करते हुए उनका काव्य चातुर्य लगन भरे चाकर की तरह उनकी हनुमद्भकिर्ति की सेवा में ऐसा लीन रहा कि जैसा पहले कभी इतनें दिनों तक नही हुआ था। यों घड़ी दो घड़ी, अधिक से अधिक एकाघ दिन तक ऐसी तल्लीन तरंगो के बहाव में तो प्रायः ही बहते रहे थे। सुन्दर काण्ड की रचना करते हुए उन्हें अपने प्रति नया विश्वास सिद्ध हुआ। यों भी मेघा भगत से वे अपने लिए हनुमतवत्‌ संकेत पाया ही करते थे। मेधा भगत ने उन्हें स्वच्छंद जीवन बिताने के लिए व्यवस्था भी बहुत अच्छी कर रखी थी।केवल साँयकाल को छोड़कर कोई उनसे मिलता न था।टोडर और कैलाश नित्य, गंगाराम कभी कभी और जयरामसाहू तीसरे चौथे दिन चक्कर लगा जाया करते थे।सबेरे स्नान पूजा से छुट्टी पाकर तुलसी दास एक बार मेघा भगत से मिलने अवश्य जाते थे।
अशोक बाटिका में हनुमान और जगदम्बा की भेंट का चित्रण करते हुये उन्हें एक गुपचुप आनन्द यह रहा कि वे हनुमानजी की कृपा से जानकी मैया को देख रहें हैं।उनके मुख से राम जी की बातें सुन रहे हैं।जैसे जैसे इस कथा प्रसँग का शब्द चित्र उभरता जाता था, वैसे वैसे उनका आत्म विश्वास अपनी सरल भोली निष्ठा में प्रबल और प्रौढ़ होता जा रहा था।भक्ति के क्षेत्र में उन्होंने पहली बार अपने आपको वयस्क अनुभव किया।पहली बार रत्नावली के प्रति अपनी अनन्य चाह वे राम जी के बहाने सीताजी को अर्पित करके अपने भीतर की अतिरंजित झिझक तोड़ कर मन के नातों में सहज हुये।
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वेनीमाधव ने पूछा- “किसी जीवन चरित्र को रचते समय प्रत्येक पात्र या पात्री की कल्पना आप कैसे करते थे गुरू जी? मैं पहले अपना उदाहरण दूँ, मैं जिस जीवन चरित की रचना कर रहा हूँ, उसमें केवल आप ही नायक के रूप में मेरे जाने पहचानें हैं, किंतु रामकथा रचते समय तो आपके पास एक भी ऐसा पात्र नहीं था जिसे आपने मेरे समान प्रत्यक्ष देखा और भोगा हो,फिर उनके भाव चित्रों की….।”
“क्या बचपने का प्रश्न करते हो वेनी माधव, मैनें अपने राम को तुम्हारे तुलसी दास से अधिक प्रत्यक्ष देखा है।मानस रचते समय मैं जिस ललक के साथ अपने जीवन मूल्यों के पूर्ण समुच्चय स्वरूप श्रीराम कल्पना के साथ आठों पहर तल्लीन रहता था, तुम अपने तुलसी दास में क्या रह पाते हो।सभी पात्रों में जीवन के देखे हुये अनेक चरित्र अपनी व्यक्तिगत छाप मेरे आग्रह से अवश्य ही छोड़ते थे।
क्रमशः

Wednesday, 26 July 2023

140

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
140-

वेनीमाधव कहने लगे- “भोजन और कामसुख यह दो अनुभव ऐसे है कि जिन्हें मनुष्य क्या प्राणिमात्र बार बार अनुभव करके भी जनम भर नहीं अघाता।जब वह इतना व्यापक सत्य है तब इसे नकारना क्‍या उचित है?” अपने बेझिझकपन से वेनीमाधव स्वयं ही कुछ कुछ भय स्तंभित होकर भी बड़ा हल्कापन अनुभव कर रहे थे। जो बात गुरू जी के सामने उनके मुख से कभी निकल ही न पाती थी वह आज अकस्मात्‌ फूट पड़ी।
बाबा बोले- “मेरा यथार्थ तुम्हारे यथार्थ से भिन्‍न है। तुम गली में खड़े होकर जहाँ तक देख पा रहे हो, मैं छत पर खड़े होकर उससे कहीं अधिक दूर तक देख रहा हूँ। यह कहो कि तुम या तो कायर हो अथवा आलसी।”
बेनीमाधव, का माथा फिर झुक गया, बोले- “मैं दोनों हूँ । मैने एक मिथ्या सम्मान की चादर में अपना मुँह लपेटकर अपने आपको को अंधा भी बना लिया हैं।गुरू जी, मैं महामूर्ख हूँ।”
बाबा ने स्नेहपूर्वंक कहा- “यदि यह चेतना तुम्हारे भीतर व्यापक रूप से प्रकट हुई है तो तुमनें कुछ नही गँवाया। मैं जानता हूँ कि तुम आजकल अपने से हार रहे हो, पर मैं नही चाहता कि तुम हारो। अपने को उठाओ,  तनिक अपने विराट स्वरूप को देखों तो सही।वह अपने आप में ही एक ऐसा अनुभव है जिसे पाकर मनुप्य को और कुछ पाने की चाह नही रह जाती।” कुछ क्षण चुप रहकर वे फिर कहने लगे- “मैं जिन दिनों मानस रचना कर रहा था उन दिनों बराबर इसी उत्साह में रहा करता था कि यदि मैं निष्ठापूर्वक इस महाकाव्य को लिख गया तो राम जी मुझे निश्चय ही प्रत्यक्ष दर्शन देंगे। काशी में जब मेरी जाँति पाँति को लेकर मिथ्या प्रचार बड़े जोर से चला तो मुझे यह लगता था कि अपने आपको सत्ता, कुल अथवा धन के मद में नशा किए हुए जो लोग आज मेरी निन्दा मे व्यस्त है वे यहीं के यहीं रह जाएँगें और मैं राम सानिध्य पा जाऊँगा। इस विचार ने मुझे कभी भी हीन बोध का अनुभव नहीं होने दिया। हीन दीन जो कुछ था वह केवल अपने राम के सम्मुख था और किसी के आगे नहीं।”
गुरु जी की बातों से वेनीमाधव फिर अपनी पकड़ में आ गए।भोला मन अब फिर से सधने लगा था। बोले- “उस ब्रह्म हत्यारे को भोजन कराने के कारण आपको बहुत निन्‍दा सहनी पड़ी। पहले जब मैं यहाँ रहता था तब कइयों से सुना था कि आप यह अस्सी घाट का स्थान छोड़ कर कहीं गुप्तवास करने लगे थे?” तुलसी बोले- “यहाँ से उठकर भदैनी चला गया था।”
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तुलसी के लिए अस्सी घाट पर रहना दूभर हो गया था। उनके विरोधियों के द्वारा भेजे जानेवाले भाड़े के निंदक दिन रात उनकी कोठरी के आसपास मडँराया ही करते थे। निंदक ऐसे मँजे हुए लोग थे कि टोडर के पहलवान और हनुमान अखाड़े के नौजवान ऐसा मौका खोजते ही रहे गए जब वे लोग कोई उत्पात या गालीगलौज करें और यह लोग उनकी ठुकम्मस कर पाएँ किन्तु निंदा बडे़ भक्ति भाव के आडम्बर के साथ की जाती थी। ब्रह्महत्यारे के चरण पखार कर उसे भोजन कराने की बात ने इतना तूल पकड़ लिया था कि बहुत से भक्त भी तुलसीदास के ब्राह्मण होने मे थोड़ा बहुत सन्देह करने लगे थे।
तुलसीदास ने बडे़ धैर्य और संयम से काम लिया, पर वे कहाँ तक एक ही बात को चलाते रहते। उनकी मानस रचना के काम में व्याघात पड़ता था। अरण्यकाण्ड की रचना लगभग पूरी हो चुकी थी। सीताहरण की योजना में रावण कपट मृग का जाल फैला चुका था, किन्तु यहीं आकर तुलसीदास की लेखनी स्तम्भित हो गई थी। न लिखने का अवकाश मिलता है, न सोचने का। एक दिन वे दु:खी हो गए। बड़ी शांति बरतते हुए भी मन की खीझ आखिर उभर ही पड़ी। उन्होंने अपने छद्म निन्दकों और प्रशंसकों की भीड़ से कहा- “भाई, अब इस प्रश्न को समाप्त कीजिए।समझ लीजिए कि न तो कोई मेरी जाँति पाँति है और न मैं किसी की जाँति पाँति से कोई प्रयोजन ही रखना चाहता हूँ। न मैं किसी के काम का हूँ और न कोई मेरे काम का है। मेरा लोक-परलोक सब कुछ रघुनाथ जी के हाथ है।उन्हीं के नाम का भारी भरोसा है।”
बात चल ही रही थी कि एक शहद लिपटी हुई छुरी सा प्रश्न फिर उनके कलेजे के आर पार हुआ। एक व्यक्ति ने हाथ जोड़कर सविनय कहा- “अरे महाराज, आपकी अटल राम भक्ति पर भला कौन सन्देह कर सकता है और मैं समझता हूँ कि यहाँ बैठे हुए किसी भी जन के मन में आपके ब्राह्मण होने में भी सन्देह नही है। ब्राह्मण आप अवश्य हैं, बाकी रहा कुल गोत्र वगैरा सो…….”

निन्दा की नई चाल के इस जहर को तुलसी नीलकंठ की तरह पचाने का प्रयत्न करते करते भी बिफर ही पड़े, बोले- “अरे आप बड़े नासमझ हैं। इत्ती सी बात भी नही जानते कि गुलाम का गोत्र भी वही होता है जो उसके साहब का गोत्र होता है। पर अब दया करके मेरी भी एक विनय सुन लें, मैं साधु होऊँ या असाधु, भला आदमी होऊँ या बुरा आदमी, आपको इसकी चिंता क्यों सताती है? क्‍या मैं किसीके द्वार पर जाके पड़ा हूँ, जो यह आप लोग बे बात की बात फैलाते ही चले जाते है। अरे मैं जैसा भी हूँ अपने राम का हूँ।“ 
उसी दिन शाम को संयोग से कैलासनाथ आ गए। टोडर भी बैठे हुए थे। तुलसी बोले- “कैलासनाथ, अब हम यहाँ से चले जाएँगें।”
“कहाँ”
“दो ही जगह मन में आ रहीं हैं, या तो अयोध्या जाऊँगा या फिर चित्रकूट। समझ में नहीं आता कहाँ जाऊँ।”
“परन्तु तुम यहाँ से जाना ही क्यों चाहते हो?  क्या नगर के कुत्तों की भौं भौं से डर गए?”
“डरा तो नहीं पर दु:खी अवश्य हो गया हूँ। इन निदंकों और प्रश्न कर्ताओं की की चकल्लस में मेरा जप तप ध्यान लेखन कार्य, सब कुछ चौपट हो रहा है। मन को चैन ही नही मिलता तो स्फूर्ति कैसे आए?”
“महात्मा जी, आप कहें तो कपिलधारा पर आपके रहने का प्रबन्ध करा दूँ।” टोडर ने कहा।
“वहाँ जाने में भी मुझे कोई लाभ न होगा। आसपास के गाँवों की भीड़ आ जाएगी।
क्रमशः

139

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
139-

संयोग से अधिक समय न बीत पाया था और जयराम साहु तथा काशी के दो चार बड़े बड़े धनी धोरियों के साथ महान्‌ पण्डित नारायण भट्ट और उनके महामहिम शिष्य राजा गोवर्धनधारी दास टण्डन बारहदरी में पधारे। सभा में बड़ी रौनक भर गई। 
भोजनोपरान्त सभा फिर जुड़ी | कुछ कवियों ने अपनी संस्कृत भाषा की कविताएँ सुनाईं। मेघा भगत ने किसी दूसरे कवि का नाम लिए जाने से पूर्व ही नारायण भट्ट जी को सम्बोधित करते हुए कहा- “आचार्य प्रवर, हमारे अनुज सम प्रिय रामभक्त तुलसीदास की कविता अब सुनने की कृपा करें। आज हमारी रामलीला का प्रथम प्रदर्शन भी श्रीराम जन्म प्रसँग को लेकर ही आरम्भ हो रहा है। तुलसीदास कृपा करके सभा को अपनी कोई रम्य रचता सुनाएँ ।”
नारायण भट्ट जैसे उद्भट और परम प्रतिष्ठित विद्वान के लिए काशी के कवि समाज में एक नया चेहरा कोई विशेष आकर्पण नहीं रखता था किन्तु तुलसी के स्वर और काव्य प्रतिभा ने उन्हे क्रमशः अपनी ओर खींच लिया। तुलसी दास सभा में तन्मय होकर गा रहे थे-
“श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्‌॥”
भजन के समाप्त होने पर सभा कुछ क्षणों तक तुलसी के जादू से बँधी हुईं
मौन बैठी रह गई। सामने मंच से उसी समय जवनिका हटा दी गई श्रीर राम- लीला का प्रदर्शन आरंभ हो गया। लीला प्रदर्शन के बाद लौटते समय दुष्ट युवक मण्डली में से एक बोला- “भई, कुछ भी कहो, सब मिलाकर यह तुलसीदास नाम का प्राणी है चमत्कारी और दमदार भी है।इसीलिए इसे इसी समय उखाड़ फेंकना चाहिए।”
“उसकी एक चाभी तो आज हम लोगों को मिल ही गई है, जातँ पातँ पूछने से चिढ़ता है। घर चलो, बैठकर इसके
मुण्डन संस्कार पर विचार किया जाएगा।”
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गुरु कथा धीरे घीरे बेनीमाधव जी के लिए एक ऐसी प्रेरणा भरी चुनौती बनती जा रही थी, जिसका सामना करने में उनका दिल दहलता था। उन्हें अपने लौकिक जीवन में अपने गुरु के समान विकट संघर्ष कभी नहीं झेलना पड़ा था। वे अभी तक काम को ही राम नही बना पाए और गुरू जी काम क्रोध लोभ मोहादि की शक्तियों को खींचकर कितने मनोयोग से अपनी रामनिष्ठा को प्रबल बना चके हैं और अधिकाधिक बनाते रहे हैं। यह उनके लिए आश्चर्यं जनक तो था ही, साथ ही उनका रहा सहा हौसला भी दिनों दिन पस्त होता चला जा रहा था।वेनीमाधव अपने भीतर बरावर लघुता अनुभव करते जा रहे थे।जब पहले जब वे इसी काशी में गुरु आश्रम के अंतेवासी थे तब भी गुरू जी के व्यक्तित्व के आगे उन्हें अपनी हीनता ने बेहद सताया था। तब गुरू जी ने ही उन्हें सूकर खेत जाकर अपना मुक्त विकास करने की सलाह दी थी। इन दिनों भी उनका एक मन फिर से भाग जाने को होता था। परन्तु दूसरे मन से वे अपनी इस इच्छा को बरजकर पीछे हटते थे। एक दिन जेठ की लूँ भरी दोपहरी में अपनी कोठरी मे बेनीमाधव जी उदास बैठे थे। आकाश उनके मन के आकाश के समान ही दूर-दूर तक सूना था । कोठरी उनके अंतर की तरह ही तप रही थी। माला जपने में मन नहीं लग रहा था, वे अपने आप से उबरना चाहते थे। गर्म हवा के तेज थपेड़ों से कोठरी का पुराना पर्दा फट गया था, हवा आ आकर आग की लपटों सी काया को छू जाती थी। पर्दे के निचले बाँस का दाहिना कोना सुतली टूट जाने से दीवाल मे जड़े कुण्डे से मुक्त होकर बार बार उड़कर दीवार से फदाफट लगता था। वह ध्वनि सीधे उनके मस्तिष्क की शिराओं पर ही वार करती थी। बेनी माधव बाहर भीतर से झुझँलाकर उठे, अपनी छोटी सी कोठरी मे दो चार बार तेज चहलकदमी की और फिर लूँ के झोंके की तरह ही कोठरी से बाहर निकल आए। बगलवाली कोठरी से पर्दे की झिरी से झाँककर देखा, राजा भगत सीधे तने बैठे गोमुखी में हाथ डाले माला जप रहे थे।उनकी आँखें मुँदी हुई थीं। किसी साधक को यह तल्लीनता इस समय वेनीमाधव के लिए शांति दायक न होकर लघुता, चिढ़ और झुँझलाहट उपजाने वाली थी। वे वहाँ से हट आए। नीचे उतरे, कुएँ वाले दालान में रामू दो विद्यार्थियों को पढ़ा रहा था। रामू से वे अब ईर्ष्या नहीं करना चाहते, किन्तु क्या करें, हो ही जाती है। राजा भगत तो खैर गुरू जी के सखा है, ऊँचे साधक हैं, किन्तु रामू आयु में उनके पुत्र समान होते हुए भी आत्मसंयम की दृष्टि से उनसे कहीं अधिक कसा हुआ है। वह छोटी सी आयु में ही ऐसा सध गया है और वे अब भी मानसिक झकोलों से नही उबरे। हीनतावश एक ठण्डी साँस उनके कलेजे से फूटकर निकल गई। भवन के बाहर निकल आए। एक बार जी चाहा कि घाट की ओर निकल जायें और किसी सीढ़ी पर गंगा में गले गले डूबकर बैठ जायें, फिर गुरू जी की कोठरी की ओर देखा। टोडर ने कोठरी के आगे छप्पर छवा दिया था, जो चारों और से एक प्रवेश द्वार को छोड़कर बन्द था, इसलिए लू की तपन बाबा की कोठरी में सीधे नहीं पहुँच पाती थी।बेनीमाघव उसी ओर चले गए।छप्पर में प्रवेश करने पर देखा कि कोठरी के दोनों द्वार खुले हुए थे और अँधेरे में उनके गुरू जी चौकी पर बैठे अपने घुटने पर थाप देते हुए आँखें मींचें कुछ गुनगुनाते हुए झूम रहे थे। वह सुदर्शन गौरवर्ण की तेजस्वी काया कोठरी के अँधेरे को प्रकाशवान कर रही थी। वेनीमाधव बाहर ही खड़े खड़े अपने गुरू जी को देखते रहे। उनके मन के नाचते बवण्डर बाबा को देखते हुए मानों थम गए थे। मरुस्थल में चलते चलते मानों वे हरियाली के सामने आ गए थे।
बाबा ने सहसा आँखें खोली, वेनीमाधव को देखा, बोले- “आओ वत्स, बड़े समय से आए।अभी कुछ देर पहले मुझे तुम्हारी याद भी आई थी।तुम आज अपने से बहुत उखड़े हुए हो, है न?”
वेनीमाधव जी के मन में एक क्षण के लिए भी झिझक न आई, वे वोले- “हाँ गुरू जी, लगता हैं कि एक यथार्थ को झुठलाया नही जा सकता।”- कहकर बेनीमाधव रुके। उन्होंने सोचा कि शायद गुरु जी प्रश्न करें, किन्तु वे मौन बैठे रहें।वेनीमाधव ने आप ही आप फिर बात को आगे बढ़ाया।
क्रमशः

138

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
138-

तुलसीदास बोले -“देश काल के अनुरूप ही धर्म बोध ढलता है। कबीर साहब ने जिस समय निर्गुण राम का प्रचार किया उस समय कैसा घोर अत्याचार हो रहा था। सारी मूर्तियाँ और मन्दिर ध्वस्त कर दिए गए थे। भद्र समाज कायर बनकर विजेताओं के तलवे चाटने लगा था और निर्धन दीन दुर्बल जन समाज बेचारा हाहाकार कर उठा था। अनास्था के ऐसे गहन अंधकार भरे भारत रूपी महल के खण्डहर में कबीरदास यदि निर्गुनिया राम का दिया न जलाते तो आज उसमें भूत ही भूत समा चुके होते।”
“तब आप गली गली में उनका तीव्र विरोध और सगुण का अन्ध प्रचार क्यों करते हैं।”- एक बुद्धिवन्त और सौम्य लगने वाले युवक ने पूरी शिष्टता में अपना तीखापन मिलाकर पूछा।
“मैं निर्गुण का विरोध कभी नहीं करता। सगुण निर्गुण दोनों एक ही ब्रह्म के स्वरूप हैं। वे श्रकथ, अगाघ, अनादि और अनूप हैं। मैं तो केवल उन लोगों का विरोध करता हूँ जो कबीर साहब के बचनों की आड़ लेकर समाज की धार्मिक आास्थाओं के निकम्मे आलोचक हैं। कबीर साहब को राम नाम लाभ हुए सौ डेढ़ सौ वर्ष बीत गए किन्तु तब से लेकर अब तक वे और उनके पथगामी तीखे प्रहार करके भी जन जन के हृदयमन्दिर से रावण हंता रामभद्र की मूर्ति भंजित नहीं कर पाए। चुस्त जन मानस के अडिग आधार सी उस सगुण भक्ति पर निकम्मे प्रहार करके बेचारी जनता को सताते हैं, मरे हुओं को मारते हैं। ऐसे निकम्मे आलोचक लोक देश समाज के शत्रु होते हैं। में इसका विरोध करता हूँ।”
“आप कृष्ण जी के भी तो विरोधी हैं?”
“मैंने कृष्ण प्रेम में गीत गाए हैं। राम श्याम में भेद नही है। पर इस समय मुझे इनका मुरलीधर गोपीरमण रूप नहीं लुभाता। मैं उन्हे धर्नुधारी, असुर संहारक और रामराज्य प्रतिष्ठापक के रूप मे निहारना चाहता हूँ।”
एक युवक ने बात का रंग बदलते हुए पूछा- “हमने सुना है महाराज कि विद्यार्थी काल में पण्डित बटेश्वर जी मिश्र से आपका कोई झगड़ा हुआ था?”
“हमसे उनका कोई झगड़ा कभी नहीं हुआ। हमारे हनुमान जी से उनके भूत अवश्य डरकर भाग खड़े हुए थे।” तुलसीदास के कहने के विनोदी ढंग से कुछ और लोग भी हँस पड़े।
युवक ने फिर कहा- “वह आपके ऊपर कोई मारण प्रयोग कर सकते हैं। महान तांत्रिक है।”
“मारने और जिलाने वाले तो राम है,फिर यह सब बाते निरर्थक हैं।”
फिर उसी युवक ने प्रशन किया-“अच्छा इसे छोड़िए, हमने सुना है कि इन्हीं मेघा भगत के दरबार में आपकी और यहाँ की किसी वेश्या की गायन कला में होड़ लगी थी? ”
तुलसीदास का चेहरा लज्जा और क्रोध से लाल हो गया, परन्तु अपने को संयत रखकर वे मुस्कराते हुए बोले- “हाँ, मेरे भीतर कला प्रदर्शन की होड़ जागी थी।”
हुलासराय ने तुरन्त टोका- “आप लोगों को एक महात्मा से ऐसे भद्दे सवाल नहीं करने चाहिए।”
एक युवक बोला- “इसमें भद्दा कुछ नहीं है। हमारी सहज जिज्ञासा है। महात्मा जी, क्या बतला सकते है कि वह मोहिनी बाई अब कहाँ रहती है? “ तुलसी के मन में  वह छवि अब अपमान की आशंकाएँ उभारने वाली बन गई थी। फिर भी तुलसीदास ने अपने मन को संयत रखा। क्रोध को दबाकर स्थिर स्वर में कहा-“नही ” 
“मिलेंगे उससे? मैं मिला सकता हूँ।” इस प्रश्न के साथ हर युवक के चेहरे पर हिंसात्मक आनन्द की चमक भर गई। तुलसीदास ने चतुर कनखियों से हर चेहरा भाष लिया। चट से मुस्कराकर प्रश्न का उत्तर बड़ी दीनतापूर्वक दिया-“मिला सके तो मुझे राम से मिला दें।” “राम से तो वह राम का प्यारा ब्रह्म पातकी चमार ही मिला सकता है। सुना है आपने उस ब्रह्महत्यारे के पैर भी धुलाए थे?”
“हाँ, दीन दुर्बल और रोगी की सेवा करना मैं राम की सेवा करना ही मानता हूँ।” 
“सुना है, आप जाति पाँति नही मानते?” “मानता हूँ और नहीं भी मानता।” 
“वह कैसे?”
“वर्णाश्रम धर्म को मानता हूँ परन्तु प्रेम धर्म को वर्णाश्रम से भी ऊपर मानता हूँ।” 
युवक मण्डली तुलसी की हाजिर जवाबी से अब चिढ़ उठी थी।उनमें से एक तीखा पड़ा, बोला- “आाप क्‍या अवधूत हैं?”
दूसरा बोला- “अजी अवधूत-वौघूत कुछ भी नहीं। विशुद्ध पाखण्डी हैं ये। जो एक नीच हत्यारे के पैर घोए, उसे भोजन कराए, वह ब्राह्मण भी कदापि नही हो सकता।” 
“तो इनको ब्राह्मण कहता ही कौन है। यह किसी ब्राह्मणी कुलटा के गर्भ से उत्पन्न राजपूत हैं।”
तुलसी भीतर ही भीतर उबलने लगे किन्तु चुप रहे। राम शब्द उनका सहारा था। दूसरे युवक ने तीसरे युवक की ओर कुटिलता से देख कर कहा -“भई, यह राजपूत वाजपूत की तो हम नहीं जानते, पर सुना है कि ये कबीरदास की कौम के हैं।” 
तुलसीदास उठ खड़े हुए।मन हाथ से छूट चला।उनका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा, वे बोले- “धूत, अवधूत, रजपूत, जुलाहा जो जिसके मन में आए जी भरके कहें। मुझे न किसी की बेटी से अपना बेटा ब्याहना है और न किसी की जात ही बिगाड़नी है। तुलसी अपने राम का सरनाम गुलाम है, बाकी और जो जिसके मन में आए कहता फिरे। फकीर आदमी, माँग के खाना मस्जिद में सोना। न लेना एक न देना दो। फिर आप लोगों के फेर मे क्‍यों पड़ू?” कहकर वे उठ खड़े हुए।
एक युवक तुरंत उठा और उनकी राह रोक हाथ जोड़कर बोला- “हममें से कुछ लोगों ने नि: संदेह आपको अपमानित करने के लिए ही यहाँ बुलाया था, मैं जानता हूँ। आपके मत से मेरा विरोध भले ही हो पर मैं आपका सम्मान करता हूँ। हमारी मूर्खतापूर्ण और विद्रूप भरी बातों का बुरा न मानें।”
तुलसी शान्त स्वर में बोले- भैया, बुरा मानकर मेरा कुछ लाभ तो होने से रहा जो मानूँ।आप लोगों ने मेरे बहाने अपना थोड़ा सा मनोरंजन कर लिया, इसलिए अपने आपको धन्य मानता हूँ।” 

तुलसीदास तेजी से चले आए और भगत जी के पास आकर शांतिपूर्वक बैठ गए। सभ्रांतों की भीड़ अब पहले से अधिक जुड़ चुकी थी। तुलसीदास के उत्तेजित हो जाने से सभा में एक प्रकार का सन्नाटा सा छा गया था और संभ्रात समाज को बहुत रुचिकर नहीं लग रहा था। दोषी युवकों को ही बतलाया गया। 
क्रमशः

137

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
137-

मेघा भगत बोले- “आज के बाद भी काशी में तुलसीदास तथा आप लोग रहेगें। जब चाहें तब मिल सकते है।आज भरत को राम के पास ही रहने दीजिए।” 
एक तगड़े से पण्डित युवक ने, जिसकी समपन्नता का परिचय उसके गले में पड़ी सोने की सतलड़ी जंजीर, बाँहों का बंद और हाथ की नगीने जड़ी अँगूठियाँ करा रहीं थीं, बोला- "तो इसका तात्पर्य यह भैया कि आप अपने को राम का अवतार मानते हैं? मेघा भगत शांत रहे, मुस्कराकर कहा- “मैंने उपमा दी थी। वैसे राम तो मुझे आप में भी दिखलाई देते हैं।” 
वह युवक फिर बोला- “हमे आपके भरत जी से उस ब्रह्महत्यारे की चकल्लस नहीं करनी है। हमे तो ऐसे ही थोड़ा बहुत परिचय बढ़ाना है। सुना है, प्रात: स्मरणीय आचार्यपाद शेष सनातन जी महाराज के शिष्य है और अब महात्मा के रूप में निवास करने के लिए यहाँ आए हैं, तो अलाप सलाप कर के अपना परिचय बढ़ाना चाहते हैं।”
मेघा भगत की ओर देखकर तुलसी ने कुछ कहना चाहा किन्तु भगत जी पहले ही बोल पड़े-"आज के दिन वाद विवाद नही होगा। अभी थोड़ी देर में भट्ट जी राजा टोडरमल के साथ आएंगे।”
“वह टोडरमल नही टोडरमल जी के पुत्र हैं महात्मा जी।”
“पुत्र ही सही, उनके आने पर यहा सरस काव्य सुनिए,सुनाइएगा, फिर रामलीला देखिएगा।”
युवा पंडित मंडली निराश हुई। वे लोग अपनी जगह पर लौट गए, पर मन नहीं मान रहा था। मेघा के पास बैठे तुलसी को वे उसी तरह ललचाई दृष्टि से देख रहे थे जैसे बिल्‍ली कबूतर को ताकती है। तुलसी को देखकर उनके मन में पिछले बहुत दिनों से काफी रोष और उपेक्षा का भाव भरा था।कुछ ही दिनों में यह अनजाना व्यक्ति आकर काशी की जनता के हिये का हार बन गया है।अच्छे अच्छे संस्कृतज्ञों में भी कई लोग उसे श्रेष्ठ कवि मानतें हैं। सम्पन्न घरों के युवा कवि पंडित इस नये नामवर कवि से दो दो चोचें लड़ाने के लिए मचल रहे थे। एक ने कहा- “अरे अब तो रहा नही जाता। उसको मेघा भगत के पास से हटाकर यहाँ लाना ही चाहिए। कुछ मजा लेना चाहिए।फिर तो बड़े लोग जहाँ आए तहाँ मजा गया सारा।”
एक दुबला पतला चालाक सा युवक बोला- “अच्छा ठहरो। मैं ले के आता हूँ।”
वह युवक फर्ती से उठकर फिर मेघा भगत के पास गया और हाथ जोड़कर बोला- “महात्माजी, हमारी महात्मा तुलसीदास से वार्तालाप करने की तीव्र इच्छा है, यदि आप हमारी इस इच्छा को फलीभूत न होने देंगे दो हम लोग फिर भोजन नहीं करेंगे महाप्रभु।”
मेधा ने तुलसी को देखा, तुलसी मुस्करा कर बोले- “आज्ञा प्रदान करें। ब्राह्मणों को भूखे रखना उचित नहीं।”
“जैसी तुम्हारी इच्छा, शांति रखना।”मेघा भगत से स्वीकृति पाते ही तुलसी दास उठकर वहाँ आ गए जहाँ युवक मण्डली बैठी थी। इन्हें इधर आया देखकर बैठे हुए प्रौढ़ वृद्ध भद्रजन भी आस पास खिसक आए।
एक ने कहा-“महाराज इन दिनों आपका बड़ा यश फैला हुआ है।नाम तो नित्य ही सुनते थे, आज दर्शन का सौभाग्य भी मिल गया।”
तुलसी सविनय बोले- “भाई, यश राम जी का है, मैं तो उनका एक अकिंचन सेवक मात्र हूँ।”
युवकों मे से एक ने चहकाने वाला अंदाज साधकर दबे विनोद और ऊपरी गम्भीरता के स्वर में कहा- “सेवक तो आप अवश्य हैं।हमने सुना है कि आपने किसी अलखनिरंजन वादी साधु को उसकी राम के प्रति अवज्ञा के कारण लट्ठू मारा था।”
तुलसी हँसे, कहा- “मेरे पास राम नाम की लाठी है, उसी से मारा होगा।”
“हाँ हाँ, जब जड़ चेतन सभी में राम हैं तब लट्ठ में भी हैं।”
“आपके इस व्यंग्य में भी राम ही बोल रहे हैं।”
“कैसे ?” 
“मूढ़ में जैसे चेतना बोलती है और मूढ़ उसे सुनकर भी नहीं सुन पाता।” तुलसी दास का मीठा व्यंग्य भरा प्रत्युत्तर सुन कर वह युवक चुप हो गया किन्तु एक और व्यक्ति तुरन्त ही बोल पड़ा- “हाँ महाराज, आप की बात खरी है। युग का प्रभाव देखिए, लोग मुर्दों की सड़ी गली हड्डियों को पूजने लगे हैं, पर आपकी दृष्टि से देखा जाए तो वह भी राम ही का एक रूप है।”
“राम तो रावण में भी कहीं उसकी अन्तर्चेतना बनकर विराजमान थे। मूढ़ ने उसे तो न सुना और अपनी हाड़ माँस की काया का रव ही सुनता रहा इसीलिए वैसा अंत पाया।”
एक छोटे मोदे हाकिम, एक प्रौढ़ व्यक्ति आगे बढ़कर त्यौरियों पर बल डालते हुए बोले- “तब तो महाराज इन रूपों के झगड़े से वो अपने कबीरदास जी का सिद्धान्त ही क्‍या बुरा है? साकार के इतने भेद हैं कि हम लोगों के लिए भूल भुलैया सी बन गई है। किस रूप में राम है किस रूप में नहीं हैं, किस रूप में कहाँ राम छिपे हैं, भला बतलाइए, इन सब बातों को सोचते रहें तो अपनी रोजी रोटी किस समय कमाएँ? ” 
एक उदंड ब्राह्मण युवक ठठाकर हँस पड़ा, बोला- “हुलासराय जी, ये इनसें न पूछिए, बेपढ़ी लिखी गँवार भीड़ ही इनके जैसों को अपनी ठगहरी विद्या का चमत्कार दिखलाने के लिए मिलती है। ये कबीरदास को मान लेंगे तो इनका धन्धा कैसे चलेगा, ह ह ह ।” उसके साथ ही साथ सारी युवक मण्डली हँस पड़ी।
तुलसीदास अन्दर से तपे तो अवश्य किन्तु क्षणमात्र में अपने को अनुशासित कर लिया। लोक व्यवहार में इधर इधर खो जाने वाला राम शब्द उनकी छाती में बीचो बीच ऐसे आकर जड़ गया जैसे अँगूठी में नगीना। वे भी युवकों के साथ ही खुल कर हँस पड़े, कहा- “ये आपने धन्धे वाली बात अच्छी कही। आजकल धर्म के पास राज तो है नहीं, इसलिए बेचारा छोटे मोटे धन्धे करके ही जी पा रहा है। आप लोग सभी धर्म के धन्धेदार हैं।मुझसे बढ़ कर रहस्य जानते हैं। हम और कबीरदास जी महाराज तो राम जी की दुकान के चाकर हैं। पहले जमाने में आस्था से नंगी अपनी प्रजा को कपड़े पहनाने के लिए श्रीराम ने कबीरदास जी को भेजा। अब कपड़ो के साथ जेवर गहने पहनने के दिन भी आ गए हैं, तो राम जी की दुकान में हमारे मेघा भगत जैसी विभूतियाँ भी चाकरी बजा रही हैं।” 
हाकिम हुलासराय जी बोले-“ये आपकी वस्त्र और गहनें वाली बात हमारे समझ में नहीं आई। महाराज, तनिक फिर से समझाने की कृपा करें।”
क्रमशः

136

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
136-

दो उत्तेजित व्यक्तियों के बीच में तुलसी दास अपने आपको संयत रखने के लिए अपने मन में गूँजता राम शब्द सुनते रहे। जब कैलास अपने जी का उबाल निकाल कर थमें तब उन्होंने दोनों को सम्बोधित करते हुए कहा- “आप दोनों ही मेरे मित्र और शुभचिन्तक हैं।आप दोनों ही कृपा करके ध्यान से सुने। बेचारे वटेशवर स्वयं  ही अपने अंत के निकट आ गए हैं। आप उसके विरुद्ध कार्य करके व्यर्थ में अपने आपको कलंकित न करे। आप दोनों ही मित्र मेरे हाथ पर हाथ रखकर यह वचन दें कि इस संबध में शांत रहेगें। कुछ न करेगें।” तुलसी ने अपने दाहिने हाथ का पंजा आगे बढ़ाया। टोडर को अपना मन अनुशासित करते देर न लगी, किन्तु कैलासनाथ के चेहरे पर अभी ताप चढ़ ही रहा था। तुलसी की स्नेह दुष्टि से आँखें मिलते ही उन्होंने आँखें झुका लीं और भुनभुनाते हुए कहा- “तुम्हारी यह भद्गता मुझे अच्छी नहीं लग रही है। पापी और दम्भी को दण्ड मिलना ही चाहिए।”
तुलसी बोले- “कल तुम जिस मानव-मर्म को सहज भाव से मेरे भीतर पहचान कर सराह सके थे उसी को आज बुरा बतला रहे हो ? कवि बड़ा लहरी होता है। अपनी ही समर्थित तंरग को काटते हुए भी उसे देर नही लगती।” कहकर तुलसीदास सिलखिलाकर हँस पड़े। उनकी बच्चों जैसी मुक्त हँसी ने गंभीर और क्षुब्ध वातावरण पर वैसा ही प्रभाव डाला जैसे जेठ की धूप से तपी हुई धरती पर आषाढ़ की बौछारों का पड़ता है।
टोडर सहज ही हँस पड़े। कैलास के क्रोध ने आँखों में एक बार फिर पलटा
लेना चाहा, पर तुलसी की स्नेह और विनोद भरी मुद्रा ने उन्हें हल्का कर दिया
था।स्वयं भी व्यंग्य विनोद साधकर बोले- “तुम भी तो कवि हो। तुम क्या कुछ कम लहरी हो ” 
“हाँ, किन्तु मेरी लहरें अब सभी समीरण से अधिक संचालित होती है, यद्यपि अब भी वे पूरी तरह से मेरे वश में नहीं आईं। अच्छा छोड़ो यह प्रसँग। यह बताओ कि मेरे इस पाप से मेरा रामलीला देखने का पुण्य तो क्षीण नही हो गया? ” 
कैलास थोड़ा अकड़कर बोले- "मेरा मेघा भगत और चाहे जो हो पर इस संबंध मे बड़ा शेर निकला। मैं कल तक जितना खिन्‍न था उतना ही आज उनसे संतुष्ट हूँ।” 
सुखी मन से तुलसी वोले- “मैं तुम्हारी आज की इस मन मुद्रा से बडा संतुष्ट हुआ किन्तु यह बतलाओं कि नारायण भट्ट और राजा गोवर्धनधारी जैसे बड़े बडे़ लोग आ रहे है या…..।”
“वह भी बतला रहा हूँ। आज जैसे ही उनके पास यह सूचना आई, वैसे ही उन्होंने मुझसे कहा, कैलास, नारायण भट्ट जी से तुम स्वयं जाकर पूछो। तुम स्वानुभव से उन्हें यह बतला सकोगे कि तुलसी कैसा व्यक्ति है,फिर आगे उनकी जो हां-ना हो सो मुझे बतलाना।”
टोडर ने उत्सुकतापूर्वक पूछा- “भट्ट जी महाराज क्या बोले?”
“उन्होने कहा कि संतो-विरक्तों पर कोई सामाजिक प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता।संन्यासी शिखा और सूत्र का त्याग करके भी शुद्र नहीं कहलाता।तुलसीदास आनंद से हमारे साथ ही साथ रामलीला देखें। हमें कोई आपत्ति नहीं है।”
सुनकर तुलसीदास के मुख पर आनंद और संतोष की आभा आ गईं। कैलासनाथ अपने उत्साह के शिखर पर चढ़ने लगे, बोले- “तभी तो मैं सीघा उस वैशाख नन्दन के घर सुनाने जा पहुँचा।“
तुलसी ने तुरन्त ही अपने मित्र के उत्साह की यह दिशा काटी, कहा-“अब बटेश्वर के पीछे पड़ गए हो। घूम फिरकर तुम्हारी झक वहीं की वहीं पहुँच रही है।”
कैलास हँसकर बोले- “मैंने आज उसे खूब-खूब तपाया। मैंने कहा, तू अपने आपको बटेश्वर समझता है।अरे तू तो इमली के चिये बराबर भी नहीं है। वह उठकर मुझे गालियाँ देने लगा। (हंसी) पर वाह रे मेरे मेघा भगत, जब हमने उनसे प्रश्न किया कि मान लीजिए नारायण भट्ट ने आना अस्वीकार किया तो  क्या आप रामलीला नही दिखाएंगे? वे बोले- “मैं और मेरा रामबोला देखेगा। तुम लोग तो साथ रहोगे ही।रामलीला के प्रेमियों की कमी नही रहेगी।”
तुलसी बोले- “कैलास, नारायण भट्ट जी का संदेश तुमने अभी तक मेघा भाई को पहुँचाया है अथवा कोरमकोर वरगदनाथ को इमली का चिया बना करके ही चले आए हो? ”
“अब जाऊँगा वहाँ, तुम्हारे यहाँ भी आए बिना मुझे चैन थोड़े ही पड़ सकता था।चलो साथ ही साथ चलें। जैराम साहू के रथ की बाट देखना बेकार है। बाहर हमारे टोडर जी का रथ तो खड़ा ही हुआ है।”
टोडर बोले- “हाँ, हाँ, हम महात्मा जी तथा आपको भदेनी छोड़ आएँगें।”
सब लोग उठ पड़े। कुटिया से बाहर निकलकर कैलास ने उत्साह से टोडर की बाँह पकड़कर प्रेम से दबाई और कहा- "देखो राम जी की लीला, जो देश के सम्राट है उनका दीवान भी टोडर है और जो हृदय के सम्राट है उनके दीवान का नाम भी टोडर ही है।” और खिलखिला कर हँस पड़े। कुटी का ट्ट्टर बन्द करते हुए तुलसीदास भी हँसी के इस वातावरण मे घुले बिना रह न पाए। 

दोपहर ढलते ही भदैनी स्थित जैराम साहू की बगीची के सामने रथों और पालकियों का आगमन आरभ हो गया।नगर के चुने हुए चालीस पचास सेठ महाजन, हाकिम अमले और सुकवि पण्डित समाज के लोग वहाँ पर आमंत्रित थे। नौकरों चाकरों की सेना आमंत्रित अतिथियों की सँख्या से लगभग ढाई गुनी अधिक थी। द्वार पर केले के खम्भों से बनाए गए कलात्मक तोरण और भीतर की सजावट आदि देखते ही बनती थी। चुनार के पत्थर की बनी हुई कलात्मक बारहदरी में मखमली तोशक तकिये गलीचे बिछे थे। सजावट और धूपगंध से महकते हुए इस स्थान में मेघा भगत का आसन सबसे अलग लगा था। तुलसी को उन्होंने अपने पास ही बिठला रखा था।नगर के सभ्रांत नागरिक आते,मेघा भगत को प्रणाम करते और फिर अपनी जगह पर बैठ जाते। कइयों ने मेघा भगत के साथ तुलसी भगत को भी प्रणाम किया,कई उन्हें बिना पहचाने ही निकल गए। अपनी अपनी जगहों पर बैठकर उनमें तुलसी के संबध की ताजा चर्चा ही स्वाभाविक रूप से चल पड़ी। कुछ लोग आपस में कुछ बात पका कर भेधा भगत के पास आए और बड़ी विनय से कहा-“भगत जी, हमारा यही भाग्य है कि आप दो दो महात्माओं के दर्शन एक साथ पा रहें हैं। हम तुलसीदास जी से कुछ बातें करना चाहते हैं।
क्रमशः

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...