Sunday, 9 July 2023

122

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
122-

“तुमने हमें पिता कहकर सम्बोधित किया रह।अब हमारी आज्ञा है कि यहीं बैठो और हमारी कोठरी में ही रहा भी करो। वह मूर्ख हमारी पैतृक कोठरी खरीदना चाहता है।अरे, जो इतने पैसे नित्य आवेंगे तो छः महीने के भीतर मैं अपनी इस सारी जमीन पर हाता घेरवाय लूँगा। मरते समय मुझे यह संतोष तो होगा कि मेरे स्थान पर एक राम भक्त ब्राह्मण राम कथा सुनाता है।”
तुलसी चुप रहे। अपने अंगौछे को फाड़कर शेष अनाज उसमें बाँधते रहे। पण्डित जी फिर बोले- “जो इतना अन्न हमारी चढ़त में नित्य चढ़ेगा तो हम तुम भी खाएँगे तथा दो चार और भूखों का पेट भी भर जाया करेगा। हमारी बात मान लो रामबोला।”
तुलसीदास बोले- “आपका यह आदेश मेरे लिए सब प्रकार से मंगलकारी है। आज के प्रवचन का जनता के ऊपर भी सुप्रभाव पड़ा है। अच्छा तो आज से जब तक अयोध्या जी में रहूँगा मैं आपके साथ ही रहूँगा।” 

दूसरे तीसरे चौथे दिन और इसी प्रकार हर दिन रामघाट पर तुलसीदास की राम कथा आरंभ हो गई। वे अपने रचे हुए राम संबंधी काव्य सुनाकर अयोध्या वासियों का मन मोहने लगे। अयोध्या में एक नया स्वर आया था जो पण्डितों में, अपढ़ गंवारो के लिए समान रूप से आकर्षक था। उसके शब्दों से अमृत बरसता था। तुलसी भगत की कथा वाचन शैली ने घाट पर बैठने वाले भिक्षुक, कथावाचकों की ही नहीं बल्कि अयोध्या के जाने माने रामायण पारायणों की साख भी गिरा दी। लोग बाग कहते कि ऐसी कथा और कोई नहीं बांचता। होली तक तुलसीदास की ऐसी धूम मच चुकी थी कि अयोध्या का बच्चा बच्चा उन्हें पहचान गया था।पंडितों में चर्चा छिड़ी। एक ने कहा- “कौन है ये तुलसी भगत? कहाँ से आ गया यह दुष्ट?”
“अरे रामानुजियों के अखाड़े में कोठारी था, वहाँ कुछ माल वाल मारा, सो निकाला गया।”
इस पर एक तीसरे पण्डित जी बीच में बोल उठे, कहा- “वैदेहीवल्लभ, यह बात सवा सोलह टके मिथ्या है। मैंने उस मठ के लोगों से सुना था कि छबीलो मालिन के आदेशों की अवहेलना करने पर ही महंत जी इससे बिगड़ गए, सो छोड़कर चला आया। आदमी चरित्रवान है।”
वैदेहीवल्लभचरणकमलरजधूलिदास जी त्योरियाँ चढ़ाकर बोले- “तो यहाँ ही कौन दुश्चरित्र बैठा है।अरे भैया, बात हमारी तुम्हारी नहीं, तुलसी की है। यदि उसकी ख्याति ऐसे ही बढ़ती चली तो एक दिन निश्चय ही वह सभी विलासिनी पैसेवालियों को अपनी चेली बनाकर मूड़ लेगा। हम सब टापते ही रह जाएगें।”
सुदर्शन बोले- “सबको अपने ही समान न समझो। मैंने तुलसी को अपनी आँखों से देखा है। उसके मुख पर तेज बरसता है तेज, उसे जानने वाले सभी लोग कहते हैं कि वह खरा राम-भक्‍त है।” 
रामदत्त यह सुनकर चिढ़ गए, कहा- “जब तुम भी ऐसे बढ़ बढ़कर उसकी प्रशँसा करोगे फिर तो छुट्टी हो गई हमारी। अरे कोई ऐसा पड़यंत्र रचो कि जिससे उसका मुख काला हो, यहाँ से जाय, नही तो किसी दिन यह अवश्य ही हमारी निन्‍दा का कारण बनेगा।”
वैदेहीवललभचरणकमलरजघूलिदास जी पड्यंत्रकारी के से दबे स्वर में बोले-“राम जी की किरपा से हमारे उर, अन्त:करण में अभी अभी एक विचार प्रगटाय मान भया है महाराज।” 
“क्या है?” 
“महंत रामलोचनशरणदास जी बिचारे उस बदनाम गेंदिया दाई के पँजे में फँस गए हैं। वह उनसे गर्भवती हो गई है और अब कहती है कि जाहिर जहान में हमे अपनी रखैल बनाकर रखो। बेचारे आजकल बड़े दु:खी हैं।”
“तो इससे हम तुलसी का क्‍या बिगाड़ सकते हैं?” सुदर्शन ने पूछा ।
“हम महंत जी से कहेगें कि गेंदा को कुछ पैसे देकर यह पट्टी पढावें कि तुलसी जब कथा कहता हो तभी वह जाकर कहे कि हमे गर्भवती बनाकर अब आप राम भक्ति का ढोंग रचा रहे हो।"- रामदत्त की आँखें चमक उठीं, बोले- "तुम्हारी योजना बड़ी अच्छी है। सुना है कि आजकल वह 'जानकी मगंल' नामक अपना भाषा में लिखा काव्य सुनाता है।इसी बीच में गेंदा यदि यह नाटक रचावे और उसे कंलकित कर दे तो हमारा सबका ही मंगल हो।”
सुदर्शन बोले-“ठीक है, रामलोचनशरण जी उसे जो द्रव्य देंगे वह तो उसका होगा ही, मैं भी उसके हाथ थोड़े बहुत पूज दूँगा। यह बैदेहीवल्लभ भी बड़े आसामी हैं, कुछ न कुछ यह भी उसकी नजर भेंट कर देंगे।”
“तो सुदर्शन, तुम आज ही गेंदिया को पटा लो।”
सुदर्शन पण्डित बोले- “जिस दिन आप लोगों के समान मुझे स्त्रियों के पटाने का ज्ञान सिद्ध हो जाएगा, उस दिन मैं भी आप लोगों के समान ही सम्पन्न बन जाऊँगा।”
वैदेहीवल्लभचरणकमलरजघूलिदास जी का मुँह फूल गया। झुझँलाकर बोले- “तुम बार बार हमारे चरित्रों पर उँगली क्यों उठाते हो जी? अरे यह तो हमारी जीविका कमाने की नीति है। इसका वास्तव में दुष्चरित्रता से तनिक
भी संबंध नही है।”
सुदर्शन ने कहा- “स्त्रियों से बात करते मुझे बड़ी लज्जा आती है। मैं तो अपनी घरवाली से भी खुलकर बात नहीं कर पाता।”
रामदत्त वोले- "अच्छा तो यह काम हमीं करवा देंगे। हो सका तो कल, नहीं तो परसो गेंदिया उसकी कथा में अपनी कथा जोड़ने को पहुँच जाएगी।”

पण्डितों की यह बातें होने के तीसरे ही दिन गेंदा तुलसीदास की प्रवचन सभा में पहुँच गई। राम-जानकी के विवाह का वर्णन सुनते हुए सभा तन्मय हो रही थी। एकाएक गेंदिया आगे की पंक्ति में घुसकर हाथ बढ़ाकर बोली- “अरे वाह रे मुरदुए, हमे (अपने बढ़े हुए पेट की ओर संकेत करके) इस झमेले में डालकर यहाँ बैठे भगतबाजी कर रहे हो? वाह रे ढोंगी, वाह।”
कथा मे विध्न पड़ने से कुछ व्यक्ति नाराज हो गए, बोले- “निकालो इस दुष्टा को। ये कौन आ गई यहाँ? ”
पीछे से कोई बोला- “अरे यह तो गेंदिया है, गेंदिया।अयोध्याजी के मंहतों के हाथों मे सचमुच गेंद की तरह उछलती है। इस दुष्टा को जरूर ही किसी ने हमारे भगत जी को कलंकित करने के लिए भेजा है।”
गेंदा आँखें मटकाकर और हाथ बढ़ाकर बोली- “मुझे कोई क्यों भेजने लगा।अरे आप ही मेरे पास घुस घुसकर यह आता था, झूठ-मूठ कहा कि रोटी देंगे, कपड़ा देगें और अब यहाँ दूसरी चेलियों को फँसाने के लिए ढोंग की दुकान लगाए बैठा है, नीच कहीं का।”
कथा में विध्न पड़ गया। तुलसीदास शांत स्वर से सबको चुप कराया।
क्रमशः

Friday, 7 July 2023

120

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
120-

प्रेम का आदर्श बहुत ऊँचा है। तुम्हारे जैसे माला फिराऊ व्यक्ति प्रेम की महिमा का पार नही पा सकते,समझे?”
तुलसीदास सिर झुकाकाए चुप खड़े रहे।महंत जी ने कहा- “यह न समझना कि अपनी भक्‍ती से तुम लोक दृष्टि में भी हम लोगों से ऊँचे उठ गए हो।”
“मैं इस प्रकार की बातें स्वप्न में भी नहीं सोचता महाराज और न परकीया प्रेम के महात्म्य पर ही विचार करता हूँ। मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम सरकार तो एक पत्नी व्रती हैं। यदि यह आपकी पत्नी होती तो कदाचित्‌ उनकी आज्ञा मैं शिरोधार्य कर लेता।”
लगाया हुआ पान का बीड़ा उठकर महंत जी को देते समय छवीलो ने आँखें तरेरकर तुलसीदास को देखा और तीखे स्वर में कहा- “मुझें नीचा दिखाय के कोई इस मठ में रह नहीं सकेगा। बड़े महाराज, इससे कह देव।”
महंत जी भी साथ ही साथ गरजे-“हाँ, मैं यह सहन नहीं करूँगा जो है सो।”
तुलसीदास ने हाथ जोड़कर कहा- “तब महाराज तालियों का गुच्छा लाकर मैं सौंपे देता हूँ। आप एक बार भण्डार घर सँभालने की कृपा करें। मुझसे आपकी सेवा न हो सकेगी।”
सुनकर महंत जी की आँखें लाल हो गईं, बोले-“मैं तुम्हारा अयोध्या जी में टिकना असंभव कर दूँगा जो है सो।”
“वह आपके हाथ में नही है महाराज, जब तक अयोध्यापति की दृष्टि मुझ अकिंचन पर सीधी रहेगी तब तक कोई लम्पट, कुचाली, व्यभिचारी, चाहे वह  कितना ही बड़ा सत्तावान हो, तुलसीदास को यहाँ से नहीं निकाल सकता। जै सियाराम।” 
शांत भाव से बात उठाकर भी तुलसी दास अपना सात्विक आक्रोश रोक न पाए। पुण्यात्मा का स्वाभिमान पापियों के दम्भ के आगे झुक न पाया। वह तेजी से द्वार के बाहर निकल गए, फिर पलटकर कहा- “ताली, कूंजी सँभाल लो, मैं अब यहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरूँगा।”

हमारे मन मे उस समय बड़ा क्रोध उपजा। एक बात और कहूँ , व्यभिचारिणी स्त्रियों के लिए मेरे मन मे ऐसी घृणा बैठ गईं कि पूछो मत। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि मैं प्रतिक्रियावश स्त्री जाति से ही घृणा करने लगा हूँ , पर वस्तुतः ऐसा नही था। रत्नावली अब भी मेरे मन पर अनेक प्रकार के सुन्दर संस्कारों का प्रतिबिम्ब  बनकर छाई हुई थी। उसके गुणों के प्रति अनुराग रख कर भी मन से अलिप्त रहूँ इसलिए जगज्जननी का ध्यान करता था।”
“मठ को छोड़कर फिर आप कहाँ गए गुरू जी?”
“अयोध्या में ही रहा और कहाँ जाता। माँग के खाना और रात में मस्जिद के बाहर फ़क़ीरों के बीच में सोना, यही मेरा क्रम बन गया।” कहते हुए बाबा की आँखें भीनी होकर किसी अलक्ष्य केन्द्रबिन्दु पर ठिक गईं। 
कुछ रुककर फिर कहने लगे-“उन दिनो अयोध्या से लेकर काशी तक भीषण अकाल फैला हुआ था।प्रायः हर समय बस्ती में भूखे ग्रामीणों के झुण्ड के झुण्ड आते हुए दिखलाई दिया करते थे।”
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वहाँ के फटे हाल, काल की कठोर मार से पिटे हुए चेहरों वालों की सैकड़ों करुण आँखें इधर उधर हर गली-कूचें में हर द्वार पर आशा की एक बुझी सी चमक लिए हुए हर समय दिखलाई पड़ा करती हैं। 
“देओ अम्मा महाराज ! देई माई बाप ! दया हुई जाये, बहुत भूखे हैं।” 
बड़ी-बड़ी हवेलियों के दरवान भीड़ को डण्डों से धमकाकर पीछे हटाते हुए नजर आ रहे हैं। भूखे जन रोटी के बजाय मार और गालियाँ खा रहे हैं। कहीं कहीं अन्न भी बँट रहा है। दो मुट्ठी लैया, चना या मोटा नाज पाने के लिए भूखी भीड़ इस उतावली से आगे बढ़ती है कि आपस में धक्का मुक्की हो जाती है। जगह जगह गाली गलौज, मार पीट। बच्चें कुचल जाते हैं। कमजोर बूढे़ बूढ़िया उतावले जवानों के धक्‍कों से चुटीले हो जाते हैं। कभी कभी पीछे रह जानेवाले जवान स्त्री पुरुष गिरे हुए बूढ़ों के ऊपर से फलाँगते हुए ऐसे अन्धाधुन्ध भागते है कि उनकी ठोकरों से गिरे हुए दुर्बलों की चीत्कारें वातावरण को और भी करुण बना देतीं हैं।
तुलसीदास दर्द से छलकती आँखों से यत्र तत्र यह सारे दृश्य देख रहें हैं।
एक जनेऊधारी फटेहाल ब्राह्मण ने अपनी रोटी खा लेने के बाद अपने सामने की पगंत में बैठे हुए एक‌ डोम की अधखाई रोटी को लालच भरी दृष्टि से ताका और सयाने कौवे की तरह घात लगाकर वह उसकी रोटी उसके हाथ से छीनकर ले भागा।एक देहाती खाते खाते गरजा- “ए दूबे, अरे ई का करये? अरे नीच कौम की जूठी ले भागा?”
उतावली से जूठी रोटी का टुकड़ा अपने मुँह की ओर बढ़ाते हुए वह बोला- “पेट की जात एक है।” और रोटी का टुकड़ा जल्दी से अपने मुँह में ठूस लिया।वह व्यक्ति, जिसकी रोटी छीनी गई थी खूनी आँखे लिए बावला बनकर झपटता हुआ आया। उसने खाते हुए ब्राह्मण को धक्का मारकर गिरा दिया और उसकी छाती पर पर रखकर उसका गला दबाने लगा। ब्राह्मण के मुँह से कौर छूट गया। डोम ने उसे उठाने के लिए ब्राह्मण का गला छोड़कर हाथ बढ़ाया ही था कि तीसरा भूखा उस उगले कौर को उठा ले भागा।तुलसीदास 'हे राम ” कहकर रो पड़े।
दो तगड़े लठैत मुच्छाडिये जवान दस-पंद्रह फटेहाल, जर्जर किन्तु सलोने नाक-नक्शोवाली जवान लड़कियों को लिए हुए पीपल के तले बैठे हैं। एक सफेदपोश अधेड़ उन लड़कियों का निरीक्षण कर रहा है। वह एक लठैत से कहता है- “झब्बूलाल, माल बहुत उम्दा नहीं लाए। ये सबकी सब बस चौका बासन और झाड़ू बुहारू करने लायक ही हैं। इन्हें कोई नहीं खरीदेगा।आठ रुपये में हम सौदा करेंगे। देस में इतने अकाल पड़ रहें हैं, ससुरी चीटियों की तरह गली-गली में औरतें रेंगती दिखलाई पड़ रहीं हैं।”

तुलसीदास देख रहे हैं। उनका मुख गंभीर, विचारमग्न हैं।रामघाट पर कगंलों की भीड़ रात मे सो रही है। कुत्ते भौंक रहे हैं। तुलसी दास को नींद नही आ रही, टहलते हुए वहाँ से चले आए हैं। एक घाटवाले के सूने तखत पर बैठ जाते हैं। वे दुःखाभिभूत हैं। तखत से कुछ दूर पर ही गुड़मुड़ी मारकर लेटे हुए एक कगंले ने सिर उठाकर तुलसीदास की ओर देखा, पूछा- “क्यों आये?”
सांत्वना भरे स्वर में आगे बढ़कर उससे कहा- “घबराओ मत रामभगत, तुम लोगो को कोई हानि पहुँचाने के लिए नहीं आया हूँ। राम जी की लीला देख रहा हूँ।”
क्रमशः

121

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
121-

तुम्हारी उल्टी मति है पण्डित जी, तभी दु:ख भोगते हो।”
लाला और उसके साथी चले गए।पण्डित जी अपने आप ही तेहे में बड़बड़ाने लगे- “रुपये का मोह दिखाय रहा है। अरे कभी मेरे स्वर में भी शक्ति थी । ऐसी कथा बाँचता था कि पैसों और अनाज का ढेर लगा रहता था मेरे आगे। हमें पैसों का मोह दिखाय रहा है। भूखा मर जाऊँगा पर तेरे ऐसे दुष्टों का पैसा नहीं खाऊँगा, जो असुरों से दूसरों की लूटी गई जमीनों का सौदा करता है।” दुबले-पतले पण्डित जी ने क्रोध में अपने मसूढ़े भींचे। उनके मन पर फिर दूसरा ताव चढ़ा तो फूलों के ऊपर रखा हुआ लाला का टका क्रोध भरे काँपते हाथ से उठाकर बालू पर फेंक दिया-“नहीं रखूँगा इसका पैसा, चाहे आज मुझे भूखा ही रहना पड़े।

तुलसी भगत जी पास ही में बैठे हुए यह तमाशा देख रहे थे। एकाएक सहानुभूति से भरकर खिसक आए और कहा-“पण्डित जी, आप पिता मैं पुत्र, इस भाव से एक प्रस्ताव करूँ, सुनिएगा?”
पण्डित जी उन्हें ध्यान से देखने लगे, बोले- “तुम्हें हम देखते तो नित्य हैं कितु पहचानते नहीं।” 
“मैं भी अब राम शरण में आ गया हूँ महाराज, यहीं अहिरौने में सरजू ग्वाले के चबूतरे पर रोटी बनाता हूँ और मस्जिद में सोता हूँ। आप मुझे अपने स्थान पर प्रवचन करने दें, जो चढ़त चढे़ सो आपकी। ब्राह्मण हैं, आपके लिए खिचड़ी बना दूगाँ, मेरा भी पेट भर जाएगा।”
पण्डित जी कुछ अकड़ भरे स्वर में बोले-“भक्ती कर लेना और बात है किन्तु कथा बाचँना और प्रवचन करना हर एक के बस की बात नही होती। यह भी एक कला है।”
तुलसी मुस्कराए, कहा- “आपको मेरा प्रस्ताव यदि बुरा लगा हो तो जाने दें। मैंने तो आपके सात्विक तपोभाव का सम्मान करने के कारण ही यह प्रस्ताव किया था।”
पण्डित जी तुलसी भगत की मीठीं बातों से प्रभावित हुए, बोले- “कभी कथा बाँचीं है?”
“हाँ महाराज, गृहस्थाश्रम में इसी कर्म से मेरी जीविका चलती थी।”
“अच्छा तो आओ, हमारे आसन पर बैठो और अपना हुनर हमें दिखलाओ”-  कहकर पण्डित जी काँपते हुए अपने आसन से उठने लगे। तुलसी भगत ने चट से आगे बढ़कर उन्हें सहारा दिया और कंधे से अपना अंगौछा उतार उनके बैठने के लिए बिछा दिया, फिर कहा-“आपको हृदय में राम और श्रोता मानकर मैं अपना हुनर दिखलाऊँगा।आज्ञा है?”
“हाँ, हाँ, बैठो बैठो।जै सिद्धिदाता गणेंश। जै कौशलपति रामचन्द्र ” कह कर पण्डित जी अपने होंठों ही होठों में कुछ बुदबुदाने लगे। तुलसी भगत ने उनके पैर छुए और पण्डित जी के टूटे कुशासन के टुकड़े पर पाल्थी मारकर बैठ गए। दस पाँच पल अपने दष्टदेव का ध्यान किया और फिर अपने मधुर सुरीले कण्ठ से कवित्त पढ़ना आरम्भ किया-

“खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,
बलि, बनिक को बनिज, चाकर को चाकरी। 
जीविका विहीन लोग सीध मान सोच बस, 
कहूँ एक एकन सो कहा जाई का करी। वेदहूँ पुरान कही लोकहें विलोकियत,
साँकरे सर्व पै, राम रावरे कृपा करी। दारिद दसानन दवाई दुनी दीनबंधु
दुरिन दिनन देखि तुलसी हाहा करी।”

स्वर के जादू ने भीड़ को बाँध लिया।इस कवित्त में काल का ऐसा यथार्थ और करुण चित्रण था कि लोग वाह वाह कर उठे। तुलसी ने श्लोक भी तन्मय होकर पूरे दरवारी ढंग से अनादि अनंत परम ब्रह्म राजाराम की वन्दना करते हुए गाया।बूढ़े पंडित ने उन्हें उम्रदराज होने का आशीर्वाद दिया। 
प्रवचन आरम्भ हुआ- इतना दु:ख दैन्य अत्याचार पृथ्वी पर है, यह माना, किन्तु राम करुणा के सागर हैं। राम सर्व समर्थ हैं। दशरथनन्दन राम अपने जन की विपदा हरने के लिए इस धरती पर फिर आएगें। वे दीनों का दु:ख हरण करेगें। पापियों को डण्ड देंगे और पुण्य आत्माओं का सब प्रकार से मंगल करेंगे। यह अयोध्या बड़ी पावन नगरी है। यहाँ स्वयं भगवान ने नर देह धारण करके ससार भर के पापियों का संहार किया था। इसी अयोध्या में महाराज दथरथ के महलों में अवध के जन जन का प्राण मोहने वाले चार राजकुमार आँगन में खेल रहे हैं। 
तुलसी भगत वर्तमान के दुःखों से भरी अयोध्या से भूतकाल की वैभवशालिनी अयोध्या में अपने श्रोंताओं का मन खींच ले गए। थोड़ी ही देर में उनके आगे खासी भीड जुड़कर श्रोता रूप में बैठ गई।
दूसरे कथावाचको, विशेष रूप से उस बेसुरे किन्तु मस्त बैरागी को जलन हुई कि यह नया कथावाचक कौन आ गया। तुलसीदास पुराणों की कथाएँ और राम जी के बखान सुनाते हुए अपने दोहे-कविता सुनाते, बीच बीच में वाल्मीकीय रामायण के श्लोक भी गाते चलते थे। उनका प्रवचन ऐसा जमा कि जो नहाकर लौटता वही उनकी श्रोतामण्डली में जुड़ जाता था। जब प्रवचन समाप्त हुआ तो बूढ़े पण्डित जी के छोटे से अगौछें पर इतना अनाज और पैसे पड़ चुके थे कि वे उनके फटे अगौछें की छोटी सी सीमा लाँघकर बालू तक पर फैल गए थे।भक्त मण्डली बहुत प्रसन्‍न थी। कइयों ने कहा कि महाराज कल फिर कथा सुनाइएगा।

दोपहर के समय पैसे और अनाज बटोरते हुए बूढ़े पण्डित जी के हाथों में जवानी आ गई थी। गदगद भाव से बोले- “बेटा तुम तो बड़े मँजे हुए, बड़े ही सिद्ध कथावाचक हो ! वाह, वाह, आनंद आ गया। कैसी मधुर वाणी है कि वाह ! सुन्दर शुद्ध उच्चारण और भाव तो ऐसे हैं कि बस क्या कहैं। ये भाषा के कवित्त क्‍या तुम्हारे रचे हुए हैं या किसी और के?”
बालू मे बिखरे अन्त के दानों को बटोरते हुए तुलसीदास ने विनीत किन्तु उल्लसित स्वर में कहा- “हमारे हैं और किसके हो सकते हैं।”
“धन्य हो, धन्य हो, तुम भैया नित्य हमारे आसन पर बैठ के कथा सुनाओ।”
“नहीं महाराज, फिर तो वही दैनिक जीविका का प्रपँच गले मढ़ जाएगा
जो छोड़ के आया हूँ।” 
पैसे बटोरते बटोरते पण्डित जी के हाथ रुक गए। कुछ तीखेपन से झिड़कते हुए कहा- “अरे पेट तो चाहे साधु वैरागी का हो या घर-गृहस्थी वाला, सभी को भरना पड़ता है। पेट की माया से भला कौन मुक्त भया है।आखिर माँग के ही खाते हो न।”
गंभीर होकर तुलसी बोले- “हाँ महाराज, सरयू‌ ग्वाला हमें नित्य साँयकाल को आधा सेर दूध पिला देता है। राम उसका भला करें।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“तुलसी, लोग मुझे रामबोला कहकर भी पुकारते हैं।”
क्रमशः

Wednesday, 5 July 2023

119

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
119-

ईर्ष्यालु साधुओं की खोटी निन्‍दा और झिड़कियाँ भी मिलतीं। वे इससे दुःखी होकर और भी अधिक क्रोध में राम-रट लगाते।परन्तु इसका प्रभाव भी अच्छा न हुआ।जिस दिन बहुत आग्रह बढ़ता उस दिन उनके ध्यान में रत्नावली बार बार झलक उठती थी।गली सड़क में स्त्रियों को देखना उनके लिए भारी पड़ जाता था।तुलसी एकान्त में भूमि पर मत्था रगड़ रगड़ कर गुहारतें हैं- “हे राम, मेरी यह परीक्षा न लो प्रभु, मुझे इस धुँधले प्रकाश से तीव्र आलोक के लोक मे ले चलो। अब कामांध कार के पाताल में न ढकेलो नाथ, दया करो।”
काम और राम के बीच में चुनाव के क्षण आने पर निश्चय ही मेरी चेतना उठकर मुझे काम प्रलोंभनों से बचा लेती थी। दर्शन साहित्य और कला के संस्कारों से जिस सौंदर्य की चाह राम रूप लेकर मेरे मन में जागी थी, उससे लुभावने से लुभावना नारी सौंदर्य भी मेरे मन की कसौटी पर चढ़ कर फीका पड़ जाता था।कुछ भक्तिनों ने मुझे अपने प्रलोभन में फांसना चाहा किन्तु राम ने बचा लिया। मेरी भक्ति-निष्ठा दूसरे साधुओं के मन में ईर्ष्या जगाने लगी।

मठ के महंत जी की चहेती छबीली मालिन एक दिन फूलों की डलिया लिए मठ मे प्रवेश करती है।मठ के लोगों को महंत जी से जो काम करवाना होता है, छबीली मालिन की सिफारिश से ही होता है क्योंकि महंत जी न तो उसकी बात गिराते हैं और न ही किसी के द्वारा किया गया उसका अपमान सहन कर सकतें हैं। आँगन में बाबा मुकतानन्द  छवीली को देखते ही खिल गये उठे, बोले - “जे सियाराम छबीलो।”
मुक्तानन्द उसके पीछे-पीछे दौड़े। पास पहुँच कर कहा-"छवीलो महारानी, महन्त जी से आज हमें दस टके दिलवाय देव। तुम्हारा बड़ा उपकार होगा। उसमे से दो तुम ले लेना।”
बड़ी अदा से अपनी मुट्ठी बँधा बाँया हाथ कमर पर देककर खड़ी होते हुए छबीली 
बोली- “आओ हम कोठारी जी से तुम्हें पैसे दिलवा दें। तुम्हे ताँबे के टके ही तो चाहिए न?”
“मुझे सोने, चाँदी, जवाहरात का मोह नही है छबीलो भक्तिन।”
भीतर के छोटे आँगन मे प्रवेश करते हुए छवीली ने धीमे स्वर मे मुक्तानद से पूछा- “बाबा, ये कोठारी जी का भेद अभी तक नही खुला। इसके पास कौन है? ”
मुक्तानंद वोले- “अरे छवीलो, वो खरा भगत है।”
“हटों भी, कलयुग मे कोई खरा भगत नहीं होता । ये दिन में कहीं जाता-आता
तो जरूर है। बाबा-बैरागियों में कोठारी तुलसी जी जैसा सुन्दर कोई नहीं है।”
“रामजाने छबीलो, बाकी हमने तो जिस तिस से यही सुना है कि जनमभूमि वाली महजिद के पास एकांत में बैठा-बैठा माला जपा करता है। इसका जोग किसी तरह से भ्रष्ट हो तो हमारे मन को चैंन पड़े। हम सब पुराने-पुराने पहुँचे हुए सिद्धा बैरागी लोग और महंत जी जैसे महात्मा बिना दर्शन के रह जाएँ और यह ससुरा माला जप-जप के राम जी के दर्शन पा जाए, ई तो बडा अन्याय होगा छबीली।देखो साला बही-खाता छोड़ के आँखें मूदें माला जप रहा है।”
सामने कोठरी में तुलसीदास ध्यानमग्न होकर गोमुखी मे हाथ डाले माला जप रहे थे। उनके समाने बही, कलम-दावात और कुछ छुट्टे लिखे हुए कागज रखे थे।कोठरी में आर पार दो द्वार थे | महंत जी के कक्ष मे जाने का रास्ती भी उधर ही से था छबीली ने इठलाते हुए कोठारी जी कोठरी में प्रवेश किया और कहा-“जे सियाराम कोठारी जी।”
जपते जपते तुलसीदास ने अपनी आँखें खोली, आँखों ही आँखों में उसके सियराम का प्रति उत्तर दिया।
“कोठारी जी, इन्हें तांवे के दस टके दे देव। इन्हें जरूरी काम है।”
अपनी ओर देखती छवीली की प्यासी आँखों और कामुक मुद्राओं से दृष्टि हटाकर मुक्तानंददास की ओर देखते हुए तुलसीदास ने कहा- “महंत्त जी की आज्ञा के बिता मैं आपको धन नहीं दे सकगा।”
तुलसी के द्वारा अपने को नजरंदाज किए जाने से छबीलो चिढ़ गई, बोली- “हम कह रहे हैं। इन्हें दस टके देव।”
छवीलो की ओर बिना देखे ही तुलसी दास ने कहा- ”बिना महंत जी की आज्ञा के मैं ऐसा नही करूँगा | क्षमा चाहता हूँ।”
छबीलो का मिजाज घमण्ड की अटारी पर चढ़ गया, बोली- “मेरी बात काटते हो? अपने को बड़ा सुन्दर, बड़ा भगत मानते हो? मैं बड़े-बड़े राजे महराजों की अकड़ भी नही सह सकती, तुम कौन चीज हो! ”
तुलसी ने शान्त स्वर में आँखें नीची करके कहा- “महंत जी की आाज्ञा के बिना मैं मठ का एक तिनका भी किसी को नहीं दे सकता। मुझे क्षमा करो।”

छबीलो गुस्से में भरी धमधम पैर पटकती हुई भीतर चली गई। मुक्तानन्द वहीं खड़े रहे, कहा-“कोठारी जी, ये बड़ी दृष्टा है, अभी जाके महंत जी के उल्टे-सीधे कान भरेगी।”
तुलसी बोले- “मुझे सच की परवाह है झूठ की नही। आपको पैसों की आवश्यकता क्यों पड़ी?”
मुक्तानद जी झेंप गए, कहा--“आप सन्त है, आपसे भूठ बोलने को जी नहीं चाहता, पर कहने मे भी संकोच लगता है।” 
“तो महंत जी से कह देते।धन के लिए एक कुलटा स्त्री का सहारा लेना आप जैसों को शोभा नही देता।”
तभी भीतर से एक गर्जन-भरी पुकार आई- “तुलसीदास ! ”
“आया महाराज” तुलसीदास गोमुखी वहीं रखकर झटपट भीतर गए। छोटा-सा दालान पार करके उन्होने महंत जी के कमरे में प्रवेश किया।सजा बजा गुलाबी कक्ष था। चादर-तकिया, यहाँ तक कि कमरे की दीवारें भी, बसंती रंग से पुती हुई थीं। उन्होंने द्वार के पास ही खड़े होकर महंत जी से पुछा-“आज्ञा महाराज! ”
“तुमने हमारी छबीलो भक्तिन का अपमान क्यों किया? ”
“मैं जाने अनजाने किसी का अपमान नहीं करता महाराज।” 
“तुमने उसकी बात क्‍यों नही मानी?”
“किस अधिकार से मानता?”
“जब इस भक्तिन की बात मैं मानता हूँ , तो तू कानी कौड़ी का मनई भला कैसे नहीं मानेगा?” महंत जी कड़क कर बोले।
“देवार्पित सम्पत्ति की एक कानी-कौड़ी भी व्यर्थ खर्च करने का अधिकार न्यायत: स्वयं आपको भी नहीं है, पर आपकी फिर भी सुन लेता हूँ। इसकी आज्ञा नहीं मानूँगा।”
“मेरे सामने कहते हो कि नहीं मानोगे? कृष्ण भगवान रुक्मिणी आदि सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियों का अपमान सह सकते थे जो है सो परन्तु अपनी प्रिया राधा का अपमान उन्हे एक क्षण के लिए भी सहन नहीं हो सकता था जो है।
क्रमशः

116

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
116-

कई महीनों के बाद गुरुमुख से अपने प्रति सराहना का यह वाक्य सुनकर बेनीमाधव के हृदय को अपार हर्ष हुआ।उनके चरणों में मस्तक नवा कर वे बोले- “मैं अब, राम श्याम शंकर बजरंग गुरु पिता माता सब कुछ आपको ही मानता हूँ। आपके जीवन-चरित्र को ही निरन्तर अपने ध्यान में रखता हूँ।आपका ध्यान ही मुझे सद्गति प्रदान करता है और करेगा।”
“हाँ, अब तो मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है। वत्स, आत्मकथा सुनाकर मैं तुम्हारी सेवा करूँगा। कल से नियमित रूप से दिन में तुम्हें मैं अपने जीवन-प्रसँग सुनाऊँगा। मेरा आात्मालोचन होगा और तुम्हें आत्मालोचन के लिए स्फूर्ति प्राप्त होगी।”

दूसरे दिन लगभग पचास वर्ष पूर्व के अपने अनुभव सुनाते हुए बाबा बोले- “मिथिला से हम सचमुच खूब भरे पूरे होकर लौटे थे। काशी और प्रयाग के बीच में एक स्थान सीतामढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ वाल्मीकि जी का आश्रम बताया जाता है। राम जी की आज्ञा से लखनलाल जगदम्बा को वहीं छोड़ गए थे। लव-कुश कुमारों ने वहीं जन्म पाया। वहाँ एक सीतावट है,वेनीमाधव। तपस्विनी जानकी प्राय: उसी वट वृक्ष के नीचे बैठकर राम जी का ध्यान किया करतीं थीं।”
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गंगा के समीप वृक्षराज सीतावट के नीचे जगदम्बा के चरण कमलों का ध्यान करके तुलसीदास आनंदविभोर हो गए। प्रणाम करने के बाद कुछ देर तक टकटकी बाँधकर तुलसीदास उस वृक्ष के तने की ओर देखते रहे। कल्पना सजीव हो उठी। वट के नीचे तापस वेश धारिणी जगज्जननी रामवल्लभा हथेली पर ठोड़ी टेके हुए बालक लव कुश का धनुप चलाना देख रहीं हैं। महर्षि वाल्मीकि उन्हें लक्ष्य बतला रहें हैं।
कल्पना का दृश्य ओझल हो जाता है। वृक्ष की परिक्रमा और प्रणाम करके तुलसीदास गंगा तट की ओर चलते हुए एकाएक पलटकर फिर वटवृक्ष को देखने लगे। लटकती हुई वरगद की जटाओं ने उनकी कल्पना को फिर स्फूर्त किया। वटवक्ष जटाजूट धारी शिव जी के रूप मे दिखाई दिया। तुलसीदास मुग्ध होकर काव्यतरंग में चढ़ गए- 

“मरकत वबरन परन, फल मानिक से,
ले जटाजूट जनु रूख वेश हरु है। 
सुषमा को ढेर कंघौ, सुकृत-सुमेरु कंधों,
संपदा सकल मुद मगल को घर है। 
देत अभिमत जो समेत प्रीति सेइये,
प्रतीति मानि तुलसी, विचारि काको थरु है।
सुरसरि निकट सुटावनी अवनि सोहै
रामरमनी को बटु कलि कामतरु है।”

रात में तुलसीदास गंगातट पर एक तख्त पर सो रहे थे। उन्हें स्वप्न में बटवृक्ष के नीचे जानकी मैया विराजमान दिखाई दीं।स्वप्न में तुलसी उनके चरणों में झुके हुए कह रहे हैं- “मेरा मार्ग मुझे दिखाओ अब। अब मैं भी तुम्हारे ही समान राम-दर्शन की, चाह लिए बैठा हूँ। स्वप्न में सीता जी तुलसीदास से कहतीं हैं- “अयोध्या जाओ, तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी।” कहकर वे अदृश्य हो गईं। 
फिर उन्हें गंगातट के पास खड़े हनुमान जी दिखलाई दिए। आकाश से लेकर धरती तक उनका विराट रूप स्वप्न में देखकर सोते हुए तुलसी सहसा चौंक गए। चरणों में प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर आनंद मुद्रा में अपने परम सहायक और आराध्य बजरंगबली को निहारने लगे। मूर्ति क्रमशः छोटी होती जाती है। हनुमान जी मनुष्य के आकार में आ जातें हैं, वाल्मीकि बन जाते हैं। तुलसीदास कपीश्वर के स्थान पर कवीश्वर को देखकर गदगद हो उठते हैं। हाथ जोड़कर कहतें हैं- "हे कविता-शाखा पर विराजमान मधुर-मधुर अक्षंरो में राम-राम की कुहुक भरने वाले कोकिल, तुम्हें प्रणाम हैं।”

वाल्मीकि कहतें हैं- "इस कलिकाल के निराश अंधकार में मेरा काम, क्या तू कर सकेगा, तुलसी?” 
“आज्ञा करें आदिकवि।”
“सरल भाषा में रामायण की रचना कर। इससे तेरा और लोक का कल्याण होगा।” कवीश्वर फिर कपीश्वर के रूप मे दिखलाई देतें हैं। गगन में स्वर गूँजता है- “अयोध्या जा, रामायण की रचना कर।”
स्वर आलोप हो जाता है। तुलसीदास की आँखें खुल जातीं हैं। ब्रह्मबेला आ चुकी थी। विचारमग्न होकर दूर घुंधले में फलाँगते हुए सीतावट और वाल्मीकि आश्रम को प्रणाम करके तुलसीदास बोले- “जगदम्बे, क्या यह सचमुच ही तुम्हारी आज्ञा थी या मेरे भावुक मन का छलावा भर है? मैं क्या सचमुच वह काम कर सकता हूँ जो महर्षि वाल्मीकि कर गए?”
प्रश्न उठकर रह गया किन्तु उत्तर न मिला। तुलसीदास गम्भीर सोच और असमंजस में पड़ गए।अपने ब्राह्मकर्मों से मुक्त होने पर तुलसीदास एक बार फिर सीतावट के पास गए। वहाँ उन्हें एक हट्टे-कट्टे पहलवान जैसे बलशाली और तेजस्वी साधु मिले। जगदम्बा के चरण चिह्नों के सामने बैठे तुलसीदास की आत्मनिवेदन छवि देखकर वे खड़े हो गए और एकटक होकर उन्हें देखने लगे। आत्मनिवेदन करके थोड़ी देर में  तुलसीदास जब उठे तो उन्होंने आगे बढ़कर पूछा- “महात्मन्‌, आप किस सम्प्रदाय के है?”
तुलसीदास ने झुककर साधु को प्रणाम किया और कहा - “मैं किसी संप्रदाय में दीक्षित नही हुआ, स्वामी जी। राम जी का चेरा हूँ, उन्हीं का नाम जानता हूँ। नाम भी रामबोला ही है।”
साधु जी उनका कंधा थपथपाते हुए बोले- “यों तो विरक्तों का कोई सगा संबंधी नहीं होता पर तुम तो मेरे किसी जन्म के भाई समान लगते हो। मैं अयोध्या जा रहा हूँ। क्या तुम मेरे साथ चलोगे? ”
तुलसीदास स्तब्ध और आाश्चर्य चकित होकर उस साधु को देखने लगे। मन में प्रश्न उठा, क्या यह संयोगमात्र है अथवा जगदम्बा का आदेश?
तुलसी को मौन देखकर साधु ने मीठे स्वर में कहा- “यदि इच्छा न हो तो मेरा कोई विशेष आग्रह नही है।तुम्हारी भावुक भक्ति से प्रभावित होकर मैंने सहज भाव से यह प्रस्ताव कर दिया, और कोई बात न थी।”
“आपकी यह सहज बात मेरे लिए साक्षात्‌ हनुमान जी का आदेश बन गई है।यह प्रस्ताव करने के लिए मैं आपका बड़ा कृतज्ञ हूँ।”

प्रयाग तक तो हमारा उनका साथ रहा और फिर एक दिन हम जो सबेरे उठे तो साधु जी का कहीं पता ही नहीं था।अस्तु, हम तो निश्चय कर ही चुके थे। अयोध्या की ओर प्रयाण किया, जिस मार्ग से तापस वेशधारी श्रीराम, जानकी और लखनलाल सुमन्‍त के साथ  अयोध्या से प्रयाग आए थे उसी पर चले। सारा मार्ग मेरी कल्पना के लिए हरा-भरा रहा और जब मैंने अयोध्या में प्रवेश किया तब तक तो मैं राम-विह्नल हो चुका था।” 
कहते-कहते बाबा का चेहरा एक अलौकिक तेज से दमकने लगा था। वेनीमाधव चकित होकर उन्हें देखने लगे।
क्रमशः

Tuesday, 4 July 2023

85

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
85

पाठक जी सुनकर प्रसन्न हुए, बोले-“रत्ना इन्हें अपने प्राणों से भी अधिक सहेज कर रखती है।” फिर दबी जवान से बात को आगे बढ़ाते हुए कहा-“घर की संपत्ति का बहुत कुछ अंश तो मुझे अपने भतीजे को ही देना है। पर अपना यह ग्रंथ भण्डार उसे मैं देना नहीं चाहता। उसे अध्ययन में रुचि नहीं है। वह केवल कामचलाऊ पण्डित ही है। कभी-कभी अपने ग्रंथागार का भविष्य विचार कर रो पड़ता हूँ।”
तुलसी अपने सहज भोलेपन में बोल उठे- “इन्हे किसी सत्पात्र को सौंप दीजिए।”
“सुपात्र तो मिल गया है बेटा, बस अब यही मनाता हूँ कि उसे अपना सब-कुछ सौंपकर निश्चिन्त होने का क्षण भी पा जाऊँ।” 
तुलसी सचेत हो गए। वे भांप गए कि पाठक जी के सुपात्र और कोई नहीं वे स्वयं ही हैं। उनका मन फिर हलचल से भर गया किन्तु यह हलचल पानी जैसी रंगहीन थी, न पक्ष न विपक्ष। शब्दहीन भावों की तरगें तेजी से चल रही थीं। तुलसी अपने-आप को समझ नही पा रहे थे । वे केवल सकपकाए हुए थे। उन्हें अपने भावी जीवन के सम्बन्ध में चिन्ता भरी घबराहट थी। अगला दिन कथा का अन्तिम दिन था। तुलसीदास आज सवेरे ही से प्रायः गुमसुम थे। यद्यपि उनकी ऊपरी चेतना मे प्रायः सन्नाटा ही छाया हुआ था तथापि अपनी भीतरी तहों में चलनेवाली हलचल उनके लिए एकदम अनबूझी न थी। ब्रह्ममुहुर्त में जब उन्होंने नित्य नियमानुसार ध्यान में लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान-सेवित श्रीसीताराम का बिम्ब साधा तो आकार विशेष स्पष्ट नही हुए। अपनी इस सफलता से तुलसीदास को लगा कि मानों वे एक अति उन्नत शिखर पर चढते-चढ़ते अचानक कोसों नीचे खड्ड में गिर गए हो। उन्हे अपने ऊपर बहुत खिसियानपन छूटा। मोहिनी प्रसँग के बाद तुलसीदास ने हठपूर्वक अपने इष्ट बिम्ब को साथा था। ध्यान अब न तो बिखरता था और न घूमिल ही होता था।इच्छित विम्ब की सजीवता ही तुलसी की सफलता और उत्फुल्लता का कारण बनती थी। आज तुलसी को ध्यान में न तो सफलता ही मिली और न उत्फुल्लता।सच तो यह था कि वे कुंठित और हतप्रभ से हो गए थे।स्‍नान ध्यान आदि नित्यकर्मों से निबटकर तुलसीदास जी जब पाठक जी के घर लौटे तो पता चला कि वे अपने साले के साथ किसी काम से पास के गाँव में गए हुए हैं। तुलसीदास अपने चौवारे मे अकेले ही बैठ गए। उन्हें कुछ समझ नहीं पड़ रहा था। पछतावा, खिसियानपन, झुझलाहट, नामस्मरण, प्रार्थना और संन्यास को साधने का हठ उनके मन को तरह-तरह से रमा रहा था किन्तु वे रम नही पा रहे थे।दासी आई, कोठरी के एक कोने में गोबराये हुए फर्श पर पानी छिड़का, फिर पीढ़ा लाई, पीढ़े पर रेशमी गद्दी बिछाई चौकी सामने रखी। एक दासी चांदी के लोटे-गिलास में पानी रख गई। फिर रत्नावली कलेवे के लिए थाली सजाकर लाईं। अति संयत और गम्भीर भाव से तुलसी की ओर बिना देखे ही रत्नावली खाने की चौकी की ओर बढ़ गई। थाली रखी और सिर भुकाए हुए, कहा-“बप्पा और मामा एक आवश्यक काम से गए हैं। मेरी मामी ज्वरग्रस्त है इसलिए मुझे ही सब-कुछ तैयार करना पड़ा है हो सकता है आपकी रुचि के अनुकूल न बना हो।”
रत्नावली को देखते ही तुलसीदास का गुमसुम पना हवा हो गया था। वे किसी हद तक रत्नावली के रौब में आ गए। रत्ना का स्वर तुलसीदास के कानों में बड़ी मिठास घोल रहा था। पीढ़े पर बैठते ही रत्ना लोटा उठाकर उनके हाथ घुलाने के लिए उद्यत हो गई। तुलसीदास बोले-“आपकी मामी तो नित्य परोसते समय हम लोगों को यही बतलातीं थीं कि अमुक वस्तु आपने बनाई है और वह वस्तु निश्चय ही स्वादिष्ट सिद्ध होती थी। मुझे विश्वास है कि आज भी मेरी रसना को निराश न होना पड़ेगा।”
रत्नावली चुप रही।तुलसीदास ने खानाआरम्भ किया। रत्नावली दीवाल से लगी नीची नजर किए खड़ी रही। तुलसीदास को रत्नावली की उपस्थिति मन ही मन सुहा रही थी, यद्यपि उन्होंने फिर सिर उठाकर उसे देखने तक का प्रयत्व न किया।
एक दासी कोठरी के द्वार पर खडी हुई थी। रत्नावली और कुछ लाने के लिए पूछा, तुलसीदास बोले-“साधु यदि पेटू हो जाय तो फिर उसका निभाव भला क्योंकर हो सकता है।”
रत्नावली तुरन्त ही बोल उठी-“कुण्डली के अनुसार तो साधु बनने से पहले आप लक्ष्मीवान बनेंगे।”
यह सुनकर तुलसीदास की आँखें रत्ना वली के मुख को देखे बिना रह न सकीं। कंचन-सा वर्ण, चेहरे पर आत्मतेज और वाणी में आत्मविश्वास की ऐसी दीप्ति थी कि तुलसीदास की आँखें शिष्टाचार भूलकर कुछ क्षणों के लिए रत्नावली के मुख को एकटक निहारने लगीं। रत्नावली की आँखें भी एक बार घोखे से ऊपर उठ गईं। आँखों से आँखें मिलीं, दोनों ओर पुतलियों से आज्ञा नन्द के ज्योति फूल चमके। दोनों के होंठों पर बरबस मुस्कान की रेखाएँ भी खिंच गईं और फिर दोनों को तुरन्त ही होश भी आ गया । रत्ना की आँखें फिर रूक गईं। चेहरे पर गम्भीरता लाने का प्रयत्न विफल हुआ। आप नन्द जड़ होकर उसके चेहरे पर चिपक गया था। तुलसी दास के मन की सारी हलचलें भी रत्नावली के उस आनन्द में ही थिर हो गई थीं।उन्होंने मृदु स्वर में कहा-“देखता हूँ , मेरी जन्मपत्रिका पर आपने गहरा विचार किया है।”
रत्ना चुप रही। तुलसीदास ने फिर कहा-“साधु होने के लिए केवल वेश ही तो आवश्यक नही होता।” कहने को तो यह कहा पर उन्हे स्पष्ट रूप से यह भासित हो चला था कि वे रत्नावली के प्रभावपाश में आबद्ध हैं।तुलसीदास के अन्तिम दिन के कथावाचन में सहज रस कम और नाटकीयता अधिक थी। आज वे स्त्रियों की मण्डली में बैठी हुई रत्नावली को ही अधिक सुना रहे थे और इस सुनाने का कार्य रत्ना के मन में राम-बोध से अधिक तुलसी बोध कराना ही था।आरती में अच्छा धन चढ़ा। सोने की कुछ मोहरें, चांदी के बहुत से रुपये और तांवे के ढेरों टके भी चढ़े, गेहूँ और चावल भी इतना चढ़ा कि चलते समय उनके साथ अनाज के पाँच बोरे हो गए थे। एक दुशाला और रेशम के दो थान भी अर्पित किए गए थे। तुलसीदास पाठक जी से बोले-“यह सब वस्तुएँ ले जाकर मै क्या करूँगा।
क्रमशः

86

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
86

मेरी समझ में नही आ रहा है।”
पाठक जी के साले यह सुनकर हँस पड़े , बोले-“उसकी चिन्ता आप क्यों करते है। मेरी भाँजी आपके यहाँ पहुँचकर स्वयं ही उसका प्रबन्ध कर लेगी।”
अपने साले की यह बात सुनकर पाठक जी हँस पड़े। तुलसीदास का मन प्रतिवाद न कर सका, मौन रहा। तुलसीदास जी को नाव पर बैठाने के लिए गाँव से बहुत-से लोग आए थे । पाठक जी के भतीजे गंगेश्वर तुलसी दास को उनके गाँव तक छोड़ने के लिए नाव पर सवार हो चुके थे। सबसे मिल-भेंट कर तुलसीदास पाठक जी के चरण छूने के लिए झुके। उन्होंने तुरन्त ही उन्हें अपनी बाँहों में भरकर कलेजे से चिपका लिया और धीरे से कान में कहा-“मंगलवार को गंगेश्वर फलदान लेकर पहुँच रहा है। राजा से कहिएगा कि वे कल मुझसे झाकर मिल जाये।”
“जो आज्ञा।” तुलसीदास ने आँखें झुकाकर दबे स्वर में उत्तर दिया। सुन- कर पाठक जी गदुगद हो गए। उन्होंने तुलसीदास जी को फिर कलेजे से लगाया।
पहले से सूचना पाने के कारण राजा भगत नौका-घाट पर ही मिल गए। उन्होंने तुलसीदास का घर बनवाना आरम्भ कर दिया था। इसलिए वे उन्हें अपने घर लिवा ले गए।मार्ग मे रत्नावली के चचेरे भाई ने उन्हें मंगल को फलदान लेकर आने की सूचना दी। राजा तुलसी को देखकर मुस्कराए और कहा- “तुम अनोखे कथा वाचक हो भैया, कथा की चढ़त मे इनकी बहन को भी ले आए।”
तुलसी की आँखों में पहले झेंप और फिर विनोद लहराया, बोले-“दलालों की माया तो राम जी ही समझ सकते है, बाकी हमे क्या, भिक्षुक ब्राह्मण ठहरे
जो दक्षिणा में मिला वही स्वीकार कर लिया।”
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राजा भगत से बाबा की कही यह पुरानी बात सुनकर बेनीमाधव ही नही, प्राय: गम्भीर रहनेवाला रामू भी हँस पड़ा। गदग़द स्वर में बोला- “हमारे प्रभु जी की हँसी भी अनोखी होती है। अरे वह जानकीजी से भी विनोद करने में न चूके-
“कोटि मनोज लजावनि हारे।सुमुखि कहहु को श्राहि तुम्हारे। 
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुं मुसुकानी।” 
सुनकर सभी आनन्दित हुए।

बाबा की गिल्टियाँ कुछ और बढ़ गईं थीं। अन्दर से टीसे मारती थीं। पीड़ा के कारण नीद उचट-उचट जाती थी। इधर दो दिनों से बाबा को कुछ ऐसी तरंग आ रही है कि रात के समय वे रामू को भी अपनी कोठरी में नहीं सोने देते। अपनी बढ़ी हुई वेदना को उन्होंने अब तक बाहरी तौर से व्यक्त नही होनें दिया। केवल उनके चेहरे का कसाव अधिक बढ़ गया है और वे कम बोलते है। रामू ने जब कारण पूछा तो वे बोले-“तेरा कोई दोष नही है रे। दिन में एकांत मिल नहीं पाता इसलिए रात में अपने भीतर वाले हंस को अकेला ही अनुभव कराना चाहता हूँ।”
बाबा के चेहरे पर हठ की दृढ़ता देखकर रामू सकुच गया। वह अब कोठरी के बाहर सोता है। कोठरी की देहली ही उसका तकिया है और उसके कान सदा भीतर की ओर ही लगे रहते हैं।बाबा को नींद कम आती है, आती भी है तो बीच-बीच में किसी गिल्टी से ऐसी टीस उठती है कि उचट जाती है। तब पीड़ा को भुलाने के लिए प्रायः लेटे ही लेटे जपमग्न हो जाते हैं। आज रात भी ऐसा ही हुआ बाँईं कलाई पर नई गिल्टी निकल रही है। हड्डी के ऊपर की गाँठ बड़ी दुखदाई है। पूरी बाँह में तनाव है। उस तनाव के कारण बगल में एक और गिल्टी उभर आई। नींद में करवट ले ली तो वह दब जाने से खुर्राटे भरते-भरते सहसा 'हे राम ' कहके कराह उठे। बड़ी देर तक दाहिने हाथ के पंजे से अपनी बाँईं बाँह दाबे हुए सीधे पड़े रहे। उनका चेहरा बड़े कठिन संयम से अपनी पीड़ा को दबा पा रहा था। मन की माला राम-राम जप रही थी।
थोड़ी देर के बाद बाबा ने अपनी आँखें खोली। दीवट पर रखे दीप के उजाले में दीवार पर रंगे देवचित्र की ओर ध्यान गया। हल्के उजाले मे महावीर जी अपने मध्यम उभार के साथ ऐसे चमक रहे थे जैसे लोभी की लालसा चमकती है। बजरंगबली के चित्र पर दृष्टि जाते ही तुलसीदास के मन में एक ताजगी आ गई। पीड़ा को पराजित करने के लिए भी आत्मबल जागा। मुस्कराकर चित्र से कहने लगे-"हे पवनतनय, तुम भले ही पीड़ा से मुक्ति न दो परन्तु यह तो बता दो कि किस पाप-शाप के कारण यह दु:ख पा रहा हूँ? हे राम, अब तो निर्विघ्न अपनी राम-रट में मुझे इतना रमा दो कि तन की पीड़ा को भूल जाऊँ।”
कानों में राम गूँज है पर गिल्टियों की टीसों के कारण बीच-बीच में राम-रट छूट जाती है। मन कराह-कराह उठता है। एक वार वे वेदना न सह पाने के कारण उठकर बैठ जाते है और कराहते हुए हनुमान जी के चित्र की ओर कातर दृष्टि से देखतें हैं। वेदना और प्रार्थना-भरे मन के ताने-बाने से काव्य-स्फूति जागती है-
नर जानत जहान हनुमान को निवज्यों जन,
मन अनुमानि, वलि बोल न बिसारिये। सेवा जोग तुलसी कवहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये। अपराधी जान कीज सासति सहस भांति,
मोदक मरे जो ताहि माहुर न मारिये। साहसी समीर के दुलारे रघुवीरजू के, वाह पीर महावीर बेगि ही निवारिये।

वे देर तक अपनी बाँई बाँह सहलाते रहे, फिर आँखें मूँद लीं और सोने का जतन करने लगे। फिर मन में कुछ ऐसा समा बँधा कि लगा मानों कोई उनकी पीड़ित बाँह को सहला रहा है। कल्पना की आँखें देखने लगी कि जैसे रत्नावली उनके वामाँग से प्रकट होकर उनकी कलाई सहला रही है। उन्हें लगा कि पीड़ा नहीं रही। उन्हें अब अच्छा लग रहा है। उन्हें लगा कि रत्ना नेह-पगी दृष्टि से उन्हें देख रही है। आप भी मुस्करा उठे, कहा-“मुझे अब भी नही छोड़ती? अन्त काल में तो अपनी ओर यों न खींचो।”
“मैं कब खींचती हूँ? आप स्वयं ही मेरी ओर खिंचे चले आते हैं।”
तुलसीदास कुछ न बोले। उन्हें लगा कि रत्ना अपनी गोद में उनकी बाहँ रखे सहला रही है और उन्हें यह अच्छा भी लग रहा है।
क्रमशः

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...