Wednesday, 2 January 2019

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20-
गोपी गीत

स्वभावतः ही जीवमात्र परमात्मा का परमांतरंग, परम घनिष्ठ है तथापि भगवत्-प्रपत्ति, भगवत् शरणागति अनिवार्यतः अपेक्षित है। मधुसूदन सरस्वती ने शरणागति के तीन प्रकार कहे हैं ‘तस्यैवाहं ममैवासौ, सोऽहम् इत्येव।’ अर्थात् मैं उसका हूँ, वह मेरा है अथवा मैं ही वह हूँ ये तीनों ही भाव भगवत्-प्रपत्ति, भगवत्-शरणागति के अन्तर्गत आते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं, ‘मैं सेवक रघुपति पति मोरे, अस अभिमान जाहि जनि भोरे।’ इन्हीं भावों से प्रेरित गोपांगनाएँ भी भगवान श्रीकृष्ण परमात्मा को कभी मेरे प्राण वल्लभ, मेरे प्राणनाथ, मेरे प्रियतम आदि सम्बोधनों से पुकारती हैं तो कभी अपने को ही उनकी प्रेयसी, प्रियतमा, सखी आदि कहने लगती हैं। ‘गीत-गोविन्द’ में वर्णन है ‘मधुरिपुरहमिति भावन शीला’ भाव-विभोर राधारानी कह उठती हैं, ‘देखो सखी, मैं ही तो कृष्ण हूँ।” भृंगी कीटन्यायतः ऐसे कथत सर्वतः तथ्य ही हैं। जैसे भृंगी कीट का ध्यान करते-करते कीट ही हो जाती है वैसे ही राधारानी भी श्रीकृष्णचन्द्र का निरन्तर चिन्तन करते-करते श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप ही हो जाती हैं, उनसे अभिन्न एवं तादात्म्य भाव को प्राप्त हो जाती हैं। गोस्वामी जी कहते हैं-

“आनन्द सिन्धु मध्य तव बासा, बिनु जाने कत मरत पियासा।”
“बरफ पूतरी सिन्धु बिच, बदति पियास पियास।”

जैसे बरफ की पुत्तलिका, स्वयं ही उसी जल से निर्मित होते हुए भी पानी में निरन्तर निवास करते हुए भी अज्ञानवशात् प्यास से व्याकुल रहती है वैसे ही आनन्द सिन्धु परमात्मा से अभिन्न, अभेद्य एवं तादात्म्य होते हुए भी अज्ञ जीवात्मा परमात्मा से वियोग का अनुभव करते हुए दुःखी रहता है। परमात्मा में अपने सर्वस्व का पूर्ण रूप से अर्पण कर देने पर कोई भिन्न सत्ता ही नहीं रह जाती। अतः सहज ही चिन्दा का आधार एवं विषय दोनों ही समाप्त हो जाते हैं। यह उत्कृष्टाति-उत्कृष्ट भावना सर्वकल्याणकारिणी है। ऐसी सर्वोत्कृष्ट भावनाएँ सहसा ही नहीं बन जातीं अतः सर्वप्रथम बौद्धिक प्रयास द्वारा चिन्तन एवं मनन अनिवार्य है। निरन्तर विचार करते रहो कि हे प्रभो! हम आपके हैं, हमारा-आपका कोई नाता जुड़ जाय। ‘मोहि तोहि नाते अनेक, मानिये जो भावै।’ अथवा ‘गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।’

अर्थात प्रभु ही गति, भर्ता, स्वामी, सुहृद्, साक्षी एवं आधार हैं। जीवात्मा और परमात्मा में विविध सम्बन्ध हैं। सूरदास कहते हैं-

“जीव हौं तू ब्रह्म; दीन हौं तू दयालू।
तू दानी हौं भिखारी, हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी।”

जीवात्मा एवं परमात्मा के बीच अनेकानेक सम्बन्धों में जो कोई भी मान्य हों अन्ततोगत्वा सबका लक्ष्य ‘तवाऽस्मि’ की सुदृढ़ अनुभूति ही हैं। नागोजी भट्ट कहते हैं ‘अभयं सर्वभूतेभ्यः तात्कालिकं च आत्यन्तिकं ‘ अर्थात् एक बार भगवत् शरणागति, भगवत्-प्रपत्ति का भाव सुदृढ़ हो जाने पर भगवदीयत्वाभिमान जागरूक हो जाने पर सम्पूर्ण भयों से तात्कालिक एवं आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है। जनन-मरणाविच्छेद-लक्षणा संसृति से निर्भीक हो जाना ही आत्यन्तिक निवृत्ति है।

गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे दयति! त्वदीयत्वाभिमान ही सर्वश्रेष्ठ, सर्वकल्याणकारी एवं सर्व प्रकार के भयों से तात्कालिक तथा आत्यन्तिक निवृत्ति का एकमात्र कारण है। तथापि हम आपकी परमानुरागिणी, परम प्रेयसी, त्वदीयत्वाभिमानिनी, ‘तावकाः’ व्रजवनिताएँ आपके विप्रयोगजन्य तीव्रताप से सन्तप्त हो इतस्ततः भटक रही हैं। ‘निषेव्य सरितां पत्युस्तटीं पक्षिगणश्चरन्। यत् पिबेत् सरसस्तोयं तद्धि लज्जा महोदधेः।’ अर्थात् महोदधि के तीर पर रहने वाले पक्षीगण को भी जल पीने के लिये किसी सरोवर के तीर पर ही जाना पड़ता है। अहो! समुद्र के लिये यह कैसी लज्जा की बात है? हे प्रभो! हम व्रजांगनाएँ भी आप अनन्त-ब्रह्माण्डनायक परात्पर, परब्रह्म, प्रभु की प्रेयसी सखियाँ होते हुए भी आपके मुखारविन्द के दर्शन से वंचित रहें, आपके पादारविन्द को नखमणि चन्द्रिका का दर्शन भी हमारे लिये अत्यन्त दुर्लभ हो जाय, आपके दामिनी-द्युति-विनिन्दक पीताम्बर का दर्शन भी सम्भव न हो, आपके सौन्दर्य-माधुर्य-सौरस्य सौगन्ध्य सुधा जल निधि स्वरूप के रसास्वादन से वंचित रहें यह कहाँ तक न्यायोचित है?
(‘गोपी गीत- करपात्री जी महाराज’)

क्रमश:

21

21-
गोपी गीत

हे दयित! महोदधि के तीर पर रहने वाले पक्षीगण की तरह ही हम भी दिशा-विदिशाओं में आप ही को खोजती हुई इस अन्धकारमयी रात्रि में गहवनों में भटकती हुई गम्भीर विपज्जाल में फँस गयी हैं। हे प्रभो! क्या यह आपके लिये अशोभनीय नहीं है? ‘विषवृक्षोऽपि संवद्धर्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्।’ विष-वृक्ष अरोपण करने पर उसका भी छेदन कोई नहीं करता। हे सखे! आपसे मिलन की हमारी इस आशा-कल्पलता को तो सवयं आप ही ने कात्यायनी-अर्चन के अनन्तर वरदान देकर सम्बलित किया। ‘इमाः क्षपा मया रंस्यथ’ इन क्षपाओं में, इन दिव्य ब्रह्म रात्रियों में तुम्हें हमारा संगम प्राप्त होगा, तुम ब्रह्म-संस्पर्श को प्राप्त करोगी, तुम्हें ब्राह्म-तादात्म्यप्राप्ति होगी; तुम्हें ब्रह्म-रति, परमात्म-रति, आत्मरतिपूर्ण रूप से प्राप्त होगी। इस प्रकार से वरदान देकर आपने ही हमारे हृदय की आशा-कल्पलता का अभिसिंचन एवं अभिवर्द्धन किया परन्तु अब अपने दर्शनों से भी वंचित कर आप स्वयं ही उस कल्पलता का छेदन कर रहे हैं। क्या यह न्यायसंगत अथवा उचित है? हे प्रभो! केवल आपके दर्शन की लालसा से ही हम अपने प्राणों को भी धारण कर पा रही हैं।

गोपांगनाजनों का सम्पूर्ण जीवन ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के प्रति तत्सुखसुखित्व-भाव प्रधान है। अपने प्रियतम्, प्राणधन, श्यामसुन्दर का सुख ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। उनके सम्पूर्ण असन, वसन एवं भूषण भी श्रीश्यामसुन्दर के ही मनोरंजनार्थ हैं। शेषावतार का भी यही सिद्धान्त है। भगवान् शेषों हैं, जीवमात्र शेष हैं; भगवान् सर्वांगी हैं, प्राणी-मात्र उनके अंग हैं, उपकर हैं। भगवान् को शेषी और अपने-आपको शेष जानते हुए भगवत्चरणों में पूर्ण समर्पित हो जाना ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

गोपांगनाएँ कह रही हैं, ‘दिक्षु तावकाः त्वयि धृतासवः त्वां विचिन्वते’ हे दयित! भीषण कान्तार में आपको खोजती हुई, भटकने के कारण परिश्रान्तक्लान्त तथा आपके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से संत्रस्त, त्वदीयाभिमानिनी और तुमसे स्वीकृता ‘तावकाः’ हम व्रज वनिताएँ अत्यन्त दुःखित हो रही हैं। हे श्यामसुन्दर! आप प्रत्यक्ष होकर हमारी इस दारुण स्थिति का अनुभव करें। आपके प्राकट्य से ही हमारे दुःखों का अन्त हो जायगा। हे दयित! यदि आपको स्तावकत्व ही तुष्टिकर हो तो हम ‘तावकाः’ तुम्हारी होते हुए भी ‘स्तावकाः’ स्तुति करने वाली भी हो रही हैं। आपको स्तुति प्रिय है अतः हम आपकी प्रेयसीजन आपकी स्तुति करती हुई वन-वन में आपको खोजती हुई भटक रही हैं। भगवान जिसको एक बार स्वीकार कर लेते हैं उसकी उपेक्षा कदापि नहीं करते। एक कथा है-एक बार किसी गोपांगना ने कहा, ‘हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे नूपुर बजते हैं जिसके कारण हमारे घर के लोग सास नन्द आदि सतर्क हो जाती हैं अतः तुम इन नूपुरों को उतार दो।’
भगवान ने कहा, ‘हे सखी! तुम स्वयं ही खोल दो इन नूपुरों को।’ वह सखी ज्यों ही नूपुर खोलने को उद्यत हुई वैसे ही एक अन्य सखी वहाँ आ पहुँची और कहने लगी, ‘हे सखी! यह क्या अनर्थ कर रही हो? जिस किसी को भी एक बार भगवत्-चरणारविन्दों का आश्रय प्राप्त हो जाता है वह कदापि उनके विलग नहीं हो सकता। यदि तुम इन नूपुरों को हटा दोगी तो फिर यही परम्परा चल पड़ेगी। अतः हे सखी! इन नूपुरों को कदापि न खोलना।’ तात्पर्य कि एक बार भगवान् द्वारा स्वीकृत हो जाना ही भक्त का परम सौभाग्य है।

गोस्वामी कहते हैं, ‘एक बार कहहुँ नाथ तुलसिदास मेरो।’ गोपांगनाएँ भी कह रही हैं-‘श्यामसुन्दर! ‘तावकास्त्वयि’ हम तो तुम्हारी ही हैं, साथ ही तुम्हारे द्वारा स्वीकृता भी हैं। ‘त्वदीयत्वाभिमानवत्यः वयं गोपीजनाः’ हमें अभिमान है कि हम आपकी हैं।” गोस्वामी तुलसीदस कहते हैं, ‘मैं सेवक, रघुपति पति मोरे, अस अभिमान जाय जनि भोरें।’ मैं भगवान् का हूँ यह भाव ही भगवदीयत्वाभिमान, त्वदीयत्वाभिमान है। एक सन्त थे; उनका कहना था कि लौकिक चक्रवर्ती नरेन्द्र का पुत्र होकर व्यक्ति गौरव का अनुभव करता है परन्तु अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-नायक सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् के पुत्र होने का गौरव भुला देता है; वेदवाक्य है ‘अमृतस्य पुत्राः’ अमृत अर्थात् अनन्त-ब्रह्माण्ड-नायक, परमात्मा, सवेश्वर, सर्वशक्तिमान्; 'अमृतस्य पुत्र, अर्थात भगवान का पुत्र। वस्तुतः गौरव तो प्रभु का पुत्र होने में ही है।

श्रीमद्भागवत में ही ‘वेणुगीत’ के प्रसंग में कहा गया है,

“गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुर्दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम्।
भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो हृष्यत्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्याः।”

गोपांगनाओं को यह जानकर कि दामोदर की अधर-सुधा पर हमारा ही अधिकार है विशेष दर्प हो गया; इस अभिमान के कारण ही भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गए; इस परित्याग के कारण उनके दर्प का उदमन हो गया। अतः अब वे कह रही हैं, हे दयित! ‘तावकाः वयं’ हम आपकी हैं, त्वदीयत्वाभिमानिनी हैं, एतावता स्वभावतः ही आपके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से संत्रस्त हैं। ‘दयित’ जैसे सम्बोधन द्वारा वे अपने प्रति भगवान् के हृदय में भास्वती भगवती अनुकम्पा शक्ति के आविर्भाव की स्पृहा प्रदर्शित करती हैं। वे अनुभव करती हैं कि मानो भगवान श्रीकृष्ण उनको उपालम्भ दे रहे हैं।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

गोपी गीत 22

22-
गोपी गीत

कहते हैं संसार में कैतवरहित प्रेम संभव नहीं होता; यदि कदाचित् सम्भव भी हो जाय तो उसमें विप्रलम्भ नहीं होता-यदि कदाचित् विप्रलम्भ भी हो जाय तो कौन जीवन-धारण कर सकता है? इसका उत्तर देती हुई वे कह रही हैं, ‘त्वयि धृतासवः’ हे श्यामसुन्दर! हमारे प्राण आपमें ही निहित हैं अतः प्रयाण भी नहीं कर सकते अन्यथा अवश्य ही स्थिर न रह पाते। आपमें निहित होने के कारण अपने प्राणों पर भी हमारा अधिकार नहीं रह गया है।

“यत्ते सुजात चरणाम्बुरुहं स्तनेषु
भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित्
कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः।”

उक्त श्लोक प्रसंग में भी गोपांगनाओं की उक्ति है, ‘भवदायुषाम-भवानेव-आयुर्यासां ता भवदायुषस्तासां भवदायुषां।’ विधाता ने प्राण तो हमें दिए परन्तु हमारी आयु आपके हाथों में दे दी। अतः अत्यन्त सन्त्रस्त होते हुए भी प्राण हमारे शरीर से निकल नहीं पाते; अथवा ‘त्वयि धृतासवः’ आपके मंगलमय मुखचंद्र के दर्शन की आकांक्षा एवं आपके लोकोत्तर सौगन्ध्य, सौरस्य, सौन्दर्य, माधुर्य-सुधा-जलनिधि स्वरूप का रसास्वादन करने की अभिलाषा के कारण ही हमारे प्राण हमारे शरीरों में स्थिर रह पा रहे हैं अन्यथा अवश्य ही प्रयाण कर जाते।

रुढ, अधिरूढ, मोहनाख्य, मदनाख्य एवं महाभाव आदि प्रेम की अत्यन्त उत्कृष्ट अवस्थाएँ हैं। रासेश्वरी, नित्य-निकुन्जेश्वरी राधारानी तो स्वयं ही माहाभावावतार-स्वरूपा हैं। कहते हैं, कहाँ ये व्यभिचार-दोष-दुष्टा वनचरी गोपालीगण। ऐसे वर्णन प्रातिभासिक हैं; भगवत्-महिमा का वर्णन ही इनका लक्ष्य है। ऐसे वर्णन इस बात का प्रमाण हैं कि अत्यन्त निकृष्ट कोटि की इन वनचरी वनिताओं द्वारा भी प्रेमपूर्वक भजे जाने पर अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्डनायक अनन्त-अचिन्त्य-गुण-गणों के एकमात्र आस्पद, अघटित-घटना-पटीयान्, स्वप्रकाश, परात्पर परब्रह्म, परमेश्वर प्रभु भक्तों के अपकर्ष एवं अपने उत्कर्ष को विस्मृत कर भक्त-भावानुसार ही उनका अनुवर्तन करते हैं। गीता-वाक्य है, ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तास्तथैव भजाम्यहम्।वस्तुतः भगवदीयत्वाभिमानिनी ये वनचरी व्रजवनिताएं भगवान् शुक एवं उद्धव द्वारा भी वन्दनीय हैं।उद्धव कहते हैं-

“आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्य्यपथं च हित्वा
भेजुर्कुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्।”

अर्थात, मैं इन गोपांगनाओं के पाद-पंकज-रस का संस्पर्श करने वाले, वृन्दावनधाम के तृण, गुल्मलता, दूर्वादिकों में से कुछ भी बन जाऊँ। जीव-मात्र पंच-भूतात्मक पंच-कंचुकों से आवेष्टित हैं। मायाभिभूत प्राणी स्वभावतः ही अपने दुष्कर्म को बाह्य जगत से प्रावरित रखने का अटूट प्रयास तो करता ही है, साथ ही, स्वयं अपने भी अन्तस्तल से अपरिचित रहना चाहता है। व्यामोहजन्य इस आवरण के कारण ही प्राणी अपने को सर्वाधिष्ठान, सर्वव्याप्त, सर्वज्ञ के समक्ष भी पर्यवेष्टित रखने का निष्फल प्रयास करता हैं सिद्धान्त है कि यमपुरी में जीव द्वारा किए गये पुण्य-पाप का निर्णय पंचभूतों के अधिष्ठाता देवगणों को साक्षी पर आधारित रहता है क्योंकि प्राणी का कोई भी कर्म इन देवगणों से प्रावरित नहीं रह पाता; एतावता प्राणीमात्र का आत्यन्तिक कल्याण इसी में है कि वह अपने को सर्वान्तर्यामी के सम्मुख पूर्णतः निरावृत कर दे। स्वयं अपने-आपको पूर्णतः निरावृत कर देना ही भगवदीयत्वाभिमान किंवा प्रपत्ति, शरणागतति है।

जब प्राणी अपने को भगवान् के सम्मुख निरावृत कर देता है, जब उसमें भगवदीयत्वाभिमान उद्भुत होता है तब सर्वाधिष्ठान, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ स्वप्रकाश प्रभु भी उसके पंच-कंचकरूप आवरण का छेदन कर उसको अपने विशुद्ध स्वरूप का दर्शन करा देते हैं। सर्वान्तर्यामी के सम्मुख निरावृत जीवोपस्थिति ही भगवान श्रीकृष्णचन्द्र द्वारा गोपियों के चीर-हरण किए जाने का रहस्य है। बाह्य एवं अन्तः सम्पूर्ण कल्मषों को हटा देने पर ही परात्पर प्रभु से तादात्म्य अभिन्न सम्बन्ध स्थापित हो सकता है।
(गोपी गीत- करपात्री जी महाराज)

क्रमश:

Tuesday, 18 December 2018

गंगाबाई जमुनाबाई

*जय जय श्री हित हरिवंश ।।*

गंगा-जमुनाबाई~~~~~~~

ये दोनों उपासिका ब्रज के कामबन नामक गाँव की रहने वाली थी।बादशाह अकबर के शासनकाल में यह डाकुओ का केंद्र था, एक दिन भरतपुर के दरोगा ने चढ़ाई कर डाकुओ को नष्ट कर दिया, उस समय यह बहने 8-9 वर्ष की थी। ये सैनिको से बच कर जंगल में की दिन भूखी प्यासी रही।

संयोगवश एक दिन यह मनोहर दास नामक व्रद्ध को मिली , वह इन्हें मथुरा ले आया। वह संगीत का ज्ञाता था उसने इन्हें नृत्य और संगीत की शिक्षा दी, इनके बड़े होने पर आगरा में इनका सौदा दो हजार में राजा मानसिंह से तय कर मथुरा लौट आया। मथुरा में तीव्र ज्वर के कारण मरणासन अवस्था में कन्याओं को गड़ा हुआ अपना 30 हजार रु. का धन बता चल बसा।

गो. हित हरिवंश जी के शिष्य परमानन्द दास जी कभी-कभी मनोहर दास के यहां जाकर कन्याओ का कीर्तन सुनते थे। मनोहर दास के देहांत के उपरांत कन्याए वैराग्य में जा चुकी थी, वह उन्हें वृन्दावन ले आये जहाँ उन पर कृपा कर श्री हित हरिवंश जी ने निज मन्त्र दिया और वे कन्याए श्री राधावल्लभ जी की उपासना में लग गयी।
एक दिन उन्हें पालक पिता मनोहर दास स्वप्न में आये और बताया वह मथुरा में अमुक स्थान पर प्रेतयोनी में है , तब उन कन्याओ ने उस स्थान पर साधू सेवा कर उनका चरणामृत छिड़का तो वह मुक्त हो गया परन्तु इसके साथ ही गंगाबाई-जमुनाबाई के जीवन की सबसे बड़ी चुनोती उनके सामने आ गई।
उस समय मुगल-शासन की ओर से अजीजबेग नाम का एक व्यक्ति मथुरा का हाकिम था। वह बड़ा ही स्त्री -लंपट था। पालक पिता के व्रहद आयोजन की सुचना के साथ उनके रूप-सौंदर्य की प्रशंसा भी उस तक पहुंची।
उस दुष्ट ने उन्हें बुलवाकर एकांत स्थान में बन्द  कर दिया, वे दोनों अपने इष्ट श्री राधावल्लभ लाल का निज मन्त्र जाप करने लगी, रात्रि में उस स्थान पर जब वह दुष्ट पहुँचा तो वहाँ एक विशालकाय सिँह पहरा दे रहा था , सिँह की गर्जना सुन वह वहां से भाग गया तथा अगले दिन उन्हें मुक्त कर चरणों में गिर गया। उसने श्री राधावल्लभ जी का बड़ा उत्सव किया तथा दोनों बहनो से पश्चाताप किया और माँ कह कर ताउम्र सम्बोधित किया।

गंगा जमुना बाई के सम्बन्ध में जानकारी "रसिक-अनन्य -परिचवली " में भी मिलती है।

गंगा-यमुना तियन में परम् भागवत जान। तिनकी वाणी सुनत ही बढ़े भक्ति उर आन।।

*जय जय श्री हित हरिवंश।।*

राधश्यामसुन्दर

.                       "राधा श्याम सुन्दर"

          श्री श्यामानंद प्रभु का जन्म सन् 1535ई. को चैत्र पूर्णिमा के दिन पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के अंतर्गत धारेंदाबहादुरपुर ग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम दुखी था। मात्र 18 वर्ष की आयु में ही श्रीकृष्ण-प्राप्ति की तीव्र इच्छा उत्पन्न होने के कारण इन्होंने घर त्याग दिया। सन् 1554ई. में श्री हृदय चैतन्य अधिकारी ठाकुर से दीक्षा लेने के उपरांत इनका नाम कृष्णदास हो गया। आठ वर्ष तक संपूर्ण भारतवर्ष के तीर्थ करने के बाद दुखी कृष्णदास श्री श्यामसुंदर की वशीभूतता में खिंचकर श्री जीव गोस्वामी की कृपा से वृन्दावन आकर प्रेमपूर्वक रहने लगे।

                                     प्रसंग

          श्री जीव गोस्वामी ने दुखी कृष्णदास को भक्ति शास्त्र का ज्ञान दिया इसीलिए श्री जीव गोस्वामीजी दुखी कृष्णदास प्रभु के शिक्षा गुरु थे एवं उन्होंने ही इन्हें प्रिया-प्रियतम की नित्य रासलीला के क्षेत्र निधिवन में झाड़ू लगाने की सेवा प्रदान की। दुखी कृष्णदास सदा श्रीराधा-कृष्ण की निकुंज-लीला के स्मरण में निमग्न रहते थे और प्रतिदिन कुंज की सोहिनी और खुरपे से सेवा करते थे। 12 साल तक दुखी कृष्ण दास इस तरहां ठाकुरजी की सेवा करते रहे और उनकी भक्ति में दिनों दिन डूबते रहे।
          एक दिन जब कृष्णदास अपनी सोहिनी और खुरपा लेकर कुंज में आए तो उन्हें झाड़ू लगाते समय पहले तो रास लीला के निशान मिलते हैं और फिर अनार के पेड के नीचे वह दुर्लभ अलौकिक नूपुर दिखाई पडा, जिसे देखकर वे विस्मित हो गए उस अति सुन्दर अद्वितीय नुपुर कि चकाचौध से निधिवन प्रकाशमान हो रहा था, वे सोचने लगे यह अलौकिक नुपुर किसका है ? उन्होंने खुशी-खुशी उसे सिर माथे से लगाया, और उसे उठाकर उन्होंने अपने उत्तरीय में रख लिया और फिर वे रासस्थली की सफाई में लग गए।
          जब ठाकुर जी के साथ राधा रानी रास लीला में नाच गा रहें थे, उसी दौरान राधारानी जब श्रीकृष्ण को अधिक आनंद प्रदान करने के लिए तीव्र गति से नृत्य कर रही थीं। उस समय रासेश्वरी के बाएं चरण से इन्द्रनील मणियों से जडित उनका मंजुघोष नामक नूपुर रासस्थली में गिर गया, किंतु रासलीला में मग्न होने के कारण उन्हें इस बात का पता न चला। नृत्य की समाप्ति पर राधा कृष्ण कुंजों में सजाई हुई शैय्या पर शयन करने चले जाते हैं, और अगली सुबह उठकर वे सब अपने घर चले जाते हैं। इधर प्रात: जब राधा रानी को यह मालूम हुआ कि उनके बाये चरण का मंजुघोषा नाम का नुपुर निधिवन में गिर गया है। थोडी देर पश्चात राधारानी उस खोए हुए नूपुर को ढूंढते हुए अपनी सखियों ललिता, विशाखा आदि के साथ जब वहां पधारीं तो वे लताओं की ओट में खडी हो गयीं, और ललिता जी को ब्रह्माणी के वेश में कृष्ण दास के पास भेजा, तब श्री ललिता सखी दुखी कृष्ण दास के पास पहुँची और उनसे कहा,- बाबा क्या तुम्हें यहाँ पर कोई नूपुर मिला है ? मुझे दे दो, किशोरी जी का है।
          मंजरी भाव में दुखी कृष्णदास ने डूबे हुए उत्तर दिया, हम अपने हाथों से प्रियाजी को पहनाएँगी। इस पर राधारानी के आदेश से ललिताजी ने कृष्णदास को राधाजी का मंत्र प्रदान करके उन्हें राधाकुंड में स्नान करवाया, इससे कृष्णदास दिव्य मंजरी के स्वरूप को प्राप्त हो गए सखियों ने उन्हें राधारानीजी के समक्ष प्रस्तुत किया।  अपनी स्वामिनी का दर्शन करके कृष्णदास कृतार्थ हो गए। उन्होंने वह नूपुर राधाजी को लौटा दिया। राधारानी ने प्रसन्न होकर नूपुर धारण करा उसके पहले ललिताजी ने उस नूपुर का उनके ललाट से स्पर्श कराया तो उनका तिलक राधारानीजी के चरण की आकृति वाले नूपुर तिलक में परिवर्तित हो गया।  राधारानी ने स्वयं अपने करकमलों द्वारा उस तिलक के मध्य में एक उज्ज्वल बिंदु लगा दिया। इस तिलक को ललिता सखी ने 'श्याम मोहन तिलक' का नाम दिया। कहीँ काली बिंदी लगाते हैं। विशाखा सखी ने बताया की दुखीकृष्ण दास जी कनक मंजरी के अवतार हैं।
          राधारानी ने श्री दुखीकृष्ण दास जी को मृत्युलोक में आयु पूर्ण होने तक रहने का जब आदेश दिया तो वे स्वामिनी जी से विरह की कल्पना करते ही रोने लगे। तब राधारानी ने उनका ढांढस बंधाने के लिए अपने हृदयकमल से अपने प्राण-धन श्रीश्यामसुंदर के दिव्य विग्रह को प्रकट करके ललिता सखी के माध्यम से श्यामानंद को प्रदान किया। यह घटना सन् 1578 ई. की वसंत पंचमी वाले दिन की है। श्यामानंदप्रभु श्यामसुंदरदेव के उस श्रीविग्रह को अपनी भजन कुटीर में विराजमान करके उनकी सेवा-अर्चना में जुट गए। सम्पूर्ण विश्व में श्री श्याम सुन्दर जी ही एक मात्र ऐसे श्री विग्रह हैं जो श्री राधा रानी जी के हृदय से प्रकट हुए हैं।
          दुखी कृष्ण दास ने जब यह वृतांत श्री जीव गोस्वामी को सुनाया तो किशोरीजी की ऐसी विलक्षण कृपा के बारे में सुनकर जीव गोस्वामी जी कृष्ण भक्ति में पागल हो गये और खुश होकर नृत्य करने लगे। कृष्ण प्रेम में रोते हुए जीव गोस्वामी ने दुखी कृष्ण दास से कहा कि -"तुम इकलौते ऐसे व्यक्ति हो इस संसार में जिसपर श्री राधारानी की ऐसी कृपा हुई है, और तुम्हारा स्पर्श पाकर में भी उस कृपा को प्राप्त कर रहा हूँ। आज से वैष्णव भक्त तुम्हें 'श्यामानंद" नाम से जानेंगे, और तुम्हारे तिलक को "श्यामानन्दी" तिलक और श्री राधा रानी ने जो तुम्हें श्री विग्रह प्रदान किया है वो श्यामसुंदर नाम से प्रसिद्ध होंगे और अपने दर्शनों से अपने भक्तों पर कृपा करेंगे।
          मन्दिर के पथ के उस पार एक गृह में श्री श्यामानंद प्रभु का समाधि स्थल है। राधाश्यामसुन्दर जी का मन्दिर वृन्दावन का पहला मन्दिर है जिसने मंगला आरती की शुरुआत की, और जो आज तक सुचारू रूप से हो रही है। कार्तिक मास में इस मन्दिर में प्रतिदिन भव्य झाँकियों के दर्शन होते हैं और अक्षय तृतीया पर दुर्लभ चन्दन श्रृंगार किया जाता हैं।

                            "जय जय श्री राधे"

Sunday, 10 December 2017

रासलीला रहस्य 1

रासलीला-रहस्य
भाग- 1

“भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः,
वीक्ष्य रन्तुं मनश्च के योगमायामुपाश्रितः”

श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में 29 से 33 वें अध्याय तक भगवान की रासलीला का प्रसंग है। इसी को रास पंचाध्यायी कहते हैं। इस रास पंचाध्यायी में श्रीमद्भागवत वर्णित तत्त्वों के सारभूत परम तत्त्व का परमाज्ज्वल प्रकाश है। ये पाँच अध्याय वस्तुतः श्रीमद्भागवत के पंचप्राण-स्वरूप हैं। भगवान की दिव्य लीला का भाव न समझकर केवल बाह्य दृष्टि से देखने पर यह सारी कथा श्रृंगार-रसपूर्ण दिखायी दे सकती है और इससे मनुष्य भ्रम ग्रस्त हो सकता है। इसी से सम्भवतः श्रीशुकदेवजी ने उपर्युक्त प्रथम श्लोक में प्रथम शब्द ‘भगवान’ दिया है, जिससे पढ़ने वाला व्यक्ति इसे भगवान की लीला समझकर ही पढ़े। वस्तुतः यह लौकिक काम-प्रसंग कदापि नहीं है।

इसके श्रोता हैं विवेक वैराग्य सम्पन्न, मुमुक्षु, धर्मज्ञानपूर्ण, मरण की प्रतीक्षा करने वाले महाराज परीक्षित और वक्ता हैं ब्रह्माविद्वरिष्ठ परम योगी जीवन्मुक्त सर्वऋषिमुनिमान्य श्रीशुकदेवजी। ऐसे वक्ता श्रोता लौकिक श्रृंगार की बातें कहें सुनें, यह सोचना ही भूल है।

वस्तुतः इन पाँच अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण की परम दिव्य अन्तरंग लीला का, निजस्वरूपभूता, महाभावरूपा ह्लादिनीशक्ति श्रीराधाजी तथा उन्हीं का कायव्यूहरूपा दिव्य कृष्णप्रेममयी गोपांगनाओं के साथ होने वाली भगवान की रसमयी लीला का वर्णन है। ‘रास’ शब्द का मूल ‘रस’ है और ‘रस’ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही हैं।

‘रसो वै सः’
जिस दिव्य क्रीडा में एक ही रस अनेक रसों के रूप में होकर अनन्त-अनन्त रस का समास्वादन करे, एक रस ही रस-समूह के रूप में प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद-आस्वादक, लीला, धाम और विभिन्न आलम्बन एंव उद्दीपन के रूप में क्रीडा करे-उसका नाम ‘रास’ है। अतएव यह रासलीला भी लीलामय भगवान का ही स्वरूप है। भगवान की यह दिव्य लीला भगवान के दिव्य धाम में दिव्यरूप से निरन्तर हुआ करती है।
(साभार श्री राधामाधव चिंतन से)

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