Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

ग्वाल-बालों के रक्षार्थ श्रीकृष्ण उनके संग ही व्याल-राक्षस के उदर में प्रविष्ट हुएः अघासुर का उदर ही शमशान है; अनेकानेक प्राणियों के उद्धार-हेतु ही भगवान शंकर अघासुर के उदररूप श्मशान में भी आविर्भूत होते हैं। जैसे बन्दियों के शिक्षार्थ शिक्षक को भी बन्दी-ग्रृह में ही प्रवेश करना पड़ता है वैसे ही प्राणियों के कल्याणार्थ ही अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड-नायक, सर्वेश्वर, प्रभु संसार में अवतरित होते हैं।
गोलोकधाम, साकेतधाम, वैकुण्ठधाम से भगवान का संसार में अवतरण हुआ। सगुण परब्रह्म का लोक ही ब्रह्मलोक है; ब्रह्मलोक ही उपनिषद एवं ब्रह्मसूत्र की दृष्टि से चतुर्मुख ब्रह्मा का लोक, विष्णुपुराण के अनुसार महाविष्णु के उपासक के लिए वैकुण्ठधाम, रामायण के अनुसार भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र के उपासक के लिए साकेतधाम, ब्रह्मवैवर्त एवं श्रीमद्भागवत के अनुसार कृष्ण के उपासक के लिए गोलोकधाम है तथा परात्पर परब्रह्म के उपासक के लिए ब्रह्मलोक है। पुराणों के मतानुसार कार्य-कारणातीत ब्रह्म का धाम ही साकेतधाम है जो ब्रह्मलोक से भी परे है। साकेतधाम के भी अनेक भेद मान्य हैं। अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड से परे अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड नायक, सर्वेश्वर एवं उनके धाम की स्थिति को मान लेने पर उपर्युक्त पौराणिक कल्पना संगत हो सकती है। यद्यपि परम स्नेहमयी, कल्याणमयी, अम्बा भी कूप में गिरे हुए अपने प्राणप्रिय पुत्र के रक्षार्थ चीत्कार तो करती है तथापि स्वयं उस कूप में कूद नहीं पड़ती परन्तु सर्व-सखा, सर्व-हितकारी एवं सर्व-रक्षक सर्वान्तर्यामी प्रभु जीव के उद्धार-हेतु उसके संग ही अधरूप अजगर के नरकरूप उदर में भी प्रविष्ट हो जाते हैं।

‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’
विज्ञान ही जिसका कलेवर है, जो विज्ञान में ही स्थित है फिर भी विज्ञान जिसको नहीं जान पाता वह अन्तर्यामी तत्त्व ही परमात्मा है जो सदा, सर्वदा सर्वत्र ही जीवात्मा के साथ असंग, अलिप्त एवं द्रष्टारूप से रहता है। अस्तु, सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी जीवात्मा के उद्धार-हेतु उसके संग ही अघासुर के उदरूप नरक में प्रविष्ट हो जाते हैं।
महर्षि वाल्मीकि की कथा प्रसिद्ध ही है। महर्षि होने के पूर्व वे एक घोर डकैत थे; खून-खराबी एवं लूटमार करके अपने कुटुम्ब का भरण-पोषण करते थे। अकस्मात् भगवदनुग्रहवशात् कुछ महात्मा लोग घूमते हुए उसी वन-प्रान्तर में पधारे; डाके की ताक में लगे डकैत ने अभ्यासवश डाका डाला; महात्माओं ने उसको समझाया कि अपने कर्म-फल का भोक्ता प्राणी स्वयं ही होता है; जिस कुटुम्ब के पालन हेतु व्यक्ति शुभाशुभ सम्पूर्ण कर्मों को करता है उनके फल का भागी एकमात्र वही होता है। डाकू ने महात्माओं की सीख को चालाकी ही समझा; परानुग्रहरत महात्माओं ने डाकू को सुझाव दिया, “तुम हम लोगों को अपने रस्से से एक पेड़ में बाँध दो और स्वयं अपने परिवार से पूछ आओ।” डाकू को यह सलाह उचित प्रतीत हुई; तुरन्त ही उसने उन महात्माओं को एक पेड़ से बाँध दिया और स्वयं अपने परिवार में जाकर प्रत्येक सदस्य से पूछने लगा कि “मैं लूटमार, खून-खराबी कर तुम लोगों का पालन करता हूँ। क्या तुम लोग मेरे पाप में भी भागीदार बनोगे?” परिवार के प्रत्येक व्यक्ति ने उसके कठोर कर्म-फल में हिस्सा बँटाने से एकदम अस्वीकार कर दिया; डाकू को ज्ञान हो गया; वह महात्माओं की शरण में लौट आया; वह डाकू ही ‘मरा-मरा’ जप कर महर्षि हो गया। यहाँ तक कि भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र ने भी लोक-व्यवहारतः महर्षि बाल्मीकि के चरणों में नमन किया। तात्पर्य कि एकमात्र सर्व-सखा, सर्व-हितकारी, सर्वान्तर्यामी परमात्मा ही सदा-सर्वदा-सर्वत्र, गर्भवास में भी, नरक में भी जीवात्मा के संग-संग रहता हुआ भी जल में कमल-पत्र इव असंग एवं निर्लेप रहता है। सर्वेश्वर भगवान ही एकमात्र अकारण-करुण, करुणा-वरुणालय एवं अशरण-शरण हैं।

‘विषजलाप्ययाद् वर्षमारुताद् वयं रक्षिताः मुहुर्मुहः’ अनेक प्रकार के विषादि भयों से आपने बारम्बार हमारी रक्षा की तथापि अपने विप्रयोगजन्य तीव्र सतापस्वरूप विषम-विष-सम्पृक्त सिन्धु से हमारा उद्धार न करते हुए आप अब भी अन्तर्धान ही हैं। चान्द्रमसी ज्योत्स्ना से व्याप्त जगत भी आपके विप्रयोग के कारण भीषण विषमय ताप का जनक विषम-विष-संपृक्त सिंधु बन गया है। चान्द्रमसी ज्योत्स्ना सर्वदा-सर्वत्र अमृतवर्षिणी ही होती है तथापि भगवत-विरहजन्य संताप के कारण गोपांगनाओं को वैपरीत्य की ही भावना होती है।

व्रजांगनाएँ पुनः कह रही हैं, हे ऋषभ! करुणादिगुण-पूर्ण सर्वश्रेष्ठ व्रजेन्द्र-नन्दन! कालिय-कुल के व्यालों को तो आपने रमणक-द्वीप भेज दिया परन्तु हम व्रजांगना आपके रमणक-द्वीप के विहार-पुलिन में आपके भुजंग-भोगाभ भुजों से संपृष्ट होकर विरह-विष-ज्वाला से दग्ध हो रही हैं; हे व्रजेन्द्र कुमार, हमारे कण्ठ में अपनी भुजाओं की माला पहनाकर आप हमारा दुःख दूर करें। बकादि राक्षसों का संहार कर आपने उनसे हमारी रक्षा की परन्तु अब आपके अन्तर्धान हो जाने से आन्तर-मनोज-रूप राक्षस द्वारा हमारा वध हो रहा है। ‘द्वासुपर्णा सयुजा’ जैसी उक्ति के अनुसार आप यद्यपि सम्पूर्ण विश्व के ही सुहृद हैं तथापि अन्तर्धान होकर अपनी विरहानल-ज्वाला से विश्व-दाह का ही कारण बन रहे हैं; अस्तु, प्रतीत होता है कि आप विश्वमित्र नहीं, अपितु विश्वामित्र ही हैं। हे प्राणधन! तृणावर्त आदि राक्षसों से भी आपने हमारी रक्षा की; जिस समय तृणावर्त वात्यारूप से व्रजधाम का संहार करने के लए प्रस्तुत हुआ उस समय आप तृणावर्त के विनाश हेतु ही अन्तर्धान हुए थे, आपके वियोगजन्य असह्म ताप से संपूर्ण व्रजधाम ही दग्ध होने लगा; व्रजधाम की दशा का अनुभव कर आपने शीघ्र ही प्रकट होकर हम सबको जीवन-दान दिया। इन्द्रप्रेरित प्रलयंकारी मेघों के भीषण वर्षण के प्रसंग में ही वैद्युत, अनल, वज्रपात एवं उल्कापातादिकों से भी आपने हमारा रक्षण किया।

इसी तरह आपने वृषभासुर एवं मयात्मज व्योमासुर जैसे भयंकर राक्षसों से भी हम व्रजवासियों का रक्षण किया। उपर्युक्त सभी प्रकार के भय एवं रक्षण की परम्परा से हम व्रजवनिताओं को कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं था; संपूर्ण व्रजधाम एवं व्रजनिवासियों के अन्तर्गत ही हमारी भी रक्षा स्वतः हो गई; परन्तु अब जबकि हम गोपांगनाओं से ही प्रत्यक्ष सम्बन्ध है, केवल हमें सन्तप्त करने के लिए ही आप अन्तर्धान हो रहे हैं; अपने प्राकट्य से हमारी रक्षा न करते हुए हमारी मृत्यु का ही कारण बन रहे हैं।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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गोपी गीत

हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप ऋषभ हैं अतः हमारी रक्षा-हेतु दीक्षित हैं तथापि हमारी रक्षा नहीं कर रहे हैं। हमारी रक्षा हेतु आपको कोई त्याग, कोई बलिदान भी नहीं करना पड़ रहा है; केवल आपके मुखचन्द्र का दर्शन ही पर्याप्त है। ‘वितर वीर नस्तेऽघरामृतम्’ हे वीर! अपने अधरामृत का वितरण करें। ‘इतररागविस्मारणं नृणां’ आपका अधरामृत सम्पूर्ण इतर रागों का विस्मारक है; वही वस्तु जो आपके लिए अत्यन्त सरल किंवा तुच्छ, नगण्य है हमारे लिए सर्वस्व है; तात्पर्य अधिकार से है। स्वयं लोभरूप आपका अधर ही इस विशुद्ध रस का वितरक है।

श्रीमद्भागवत के द्वाद्वश-स्कंध में भगवतस्वरूप का आध्यात्मिक विवेचन है। तदनुसार धर्म ही भगवान का वक्षःस्थल है, अधर्म पीठ एवं साक्षात लोभ अधर हैं। भगवान के मंगलमय मुखचन्द्र की सुमधुर अधर-सुधा ही सर्वोत्कृष्ट धन है। लोभ-तत्त्व की अधिष्ठात्री देवता स्वयं लोभ ही इस अमूल्य धन का वितरक है। महाभारत में एक रोचक प्रसंग है। पाण्डवों ने राजसूय यज्ञ किया, भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को ही कोषाध्यक्ष बना दिया; कौरवों से अपने मनोमालिन्य के कारण पाण्डवगण आशंका-ग्रस्त हो उठें; भगवान श्रीकृष्ण ने उनको आश्वासन दिया; भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि दुर्योधन के हाथ में ऐसी रेखाएँ पड़ी हैं जिनके प्रभाव से वह चाहे जितना खर्च करे उसका खजाना सदा भरा ही रहेगा; जितना वह खर्च करे उतना ही खजाना भर जाय। कोषाध्यक्ष नियुक्त होने पर दुर्योधन द्वेषवशात् खजाना लुटाने लगा परन्तु उसकी अपनी ही रेखाओं से प्रेरित पाण्डवों का कोष सदा भरभूप ही रहा। फलतः पाण्डवों की ही प्रसिद्धि हुई। तात्पर्य कि योग्य व्यक्ति को ही कोषाध्यक्ष बनाना कल्याणकारी होता है।

आचार्यमतानुसार, साधन में विधि-निषेध होता है; फल विधि-निषेधातीत है। वल्लभाचार्यजी ने भी फलाध्याय लिखा है; वस्तुतः सम्पूर्ण ‘वेणुगीत’ ही फलाध्याय है। भगवान सर्वापेक्षया फलस्वरूप हैं; उनके मुखचन्द्रेतर अन्य अवयवों में साध्य-साधन-भाव भी हैं, मुखारविन्द केवल मात्र साध्य-फलस्वरूप है।जिस समय भगवान के चरण, भुजाएँ एवं दृष्टि-दर्प-दलन-हेतु अग्रसर होती है उस समय तत्-तत् अवयव साधनस्वरूप हैं परन्तु जब उन्हीं चरणारविन्द एवं हस्तारविन्द-संस्पर्श से तथा मंगलमयी दृष्टि के प्रेम-वीक्षण से भक्तानुग्रह होता है तब वे साध्यस्वरूप हो जाते हैं परन्तु भगवान-मुखचन्द्र में केवल साध्यरूपता ही है। इस सर्वथा फलस्वरूप मुखचन्द्र की अधर-सुधा ही सम्पूर्ण फलों का सार विशुद्ध रस है।

अधिकार-भेद भगवदधरामृत के भी तीन प्रभेद हैं-देव-भोग्या, भगवत-भोग्या एवं सर्वा-भोग्या। स्वभावतः ही भगवान-मुखचन्द्र की मंगलमयी अधर-सुधा-विशुद्ध रसनिधि के यथायोग्य वितरण में कोई अत्यन्त कुशल कोषाध्यक्ष ही समर्थ हो सकता है; अस्तु, साक्षात लोभ ही इस रसनिधि का कोषाध्यक्ष है। अबाध-प्राप्ति ही अर्थी की कामना है; यथायोग्य वितरण कोषाध्यक्ष का कौशल है। तात्पर्य कि अकारण-करुण, करुणा-वरुणालय, अशरण-शरण, भक्तवत्सल भगवान भक्त की योग्यतानुसार ही उसको स्वसंस्पर्शजन्य आनन्दरूप फल प्रदान करते हैं तथापि भावातिरेक के कारण भक्त को भगवत-कार्पण्य की ही प्रतीति होती है; भगवदाश्लेष-सुख से भक्त सदा ही अतृप्त रह जाता है। विरहातुरा गोपांगनाएँ भी भाव-विभोर होकर ही भगवान श्रीकृष्ण में कार्पण्यदोष का आरोप करती हैं।

गोपांगनाएँ कल्पना करती हैं कि उनके प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हे व्रजसीमन्तिनी जनो! हमने तो अत्यन्त भयंकर सन्तापों से आपकी बारम्बार रक्षा की है। स्वयं आपके ही वचन इसके प्रमाण हैं। इतने पर भी आप लोग कह रही हैं कि हम आपका वध कर रहे हैं। आपका यह कथन विरोधाभास एवं अप्रामाण्य-दोष से युक्त है। प्रति-उत्तर में व्रजांगनाएँ कहती हैं, ‘हे ऋषभ! स्वयं ही हनन करने की लालसा से ही आपने अनेकानेक आपदाओं से हमारी रक्षा की है। ‘ऋषभ ते वयं रक्षिता मुहु:’।’ यहाँ ‘ऋषभ’ शब्द भर्तार्थ में प्रयुक्त हुआ है। व्रजांगनाएँ व्यंग्य कर रही हैं ‘हे भर्ता! भर्ता होने के कारण आपको हमारा भरण करना ही उचित है तथापि आपने हमारा दृशावध ही किया; इतने पर भी अब अपने अदर्शन से हमारे प्राणों का अपहरण कर रहे हैं अतः यही प्रतीत होता है कि स्वतः वध करने की लालसा से ही आपने इस विपत्ति-परम्परा से हमारा रक्षण किया है।

इस गीत में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा विष-संपृक्त यमुना-जल, व्याल राक्षस, अघासुर, वर्ष, मारुत एवं अशनिपात आदि विभिन्न भयों से सम्पूर्ण व्रजधाम के अन्तर्गत ही अपने भी रक्षण की चर्चा करती हैं। वस्तुतः उपर्युक्त सब भय श्रीकृष्ण पर ही थे तथापि कृष्ण-मंगल में ही अपने मंगल का अनुभव करने के कारण व्रजांगनाएँ उन उपद्रवों को अपना भय मानती हैं। इसी प्रसंग में गोपांगनाओं द्वारा वृषासुर-व्योमासुर आदिकों के वध का भी उल्लेख हुआ है; ये लीलाएँ रासलीला के बाद ही हुईं। भगवद्रूपा व्रजसीमन्तिनीजनों मे प्रेमोद्रेक के कारण सहस सर्वज्ञता है। विशेषतः विरहजन्य आर्ति से प्रेम का विशेष उच्छलित होना व्यक्त है। एतावता भविष्य की स्फूर्ति स्वभावतः ही हो जाती है। श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ भी त्रिकालज्ञा हैं अतः अपने प्रातिभ-ज्ञान से भविष्य-वर्णन करने में समर्थ हैं। किसी विशेष प्रमाण के अभाव में अकस्मात् स्फुरित होने वाला ज्ञान ही प्रातिभ-ज्ञान है।

निवृत्तिपक्षीय अर्थाभिव्यक्ति के अनुसार ‘क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते। उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।।’[1] अर्थात् सम्पूर्ण कार्यभूत क्षर है; कूटस्थ ही अक्षर है; ‘परमात्मा क्षराक्षराभ्यां विलक्षणः’ परमात्मा ही क्षराक्षरातीत, कार्यकारणातीत है; ‘कूटो वन्चनाछद्मता तथा तिष्ठति इति कूटस्थः’ अव्याकृत माया-विशिष्ट चैतन्य ही माया के द्वारा अनेकधा व्यक्त होता है, वही परमात्मा है। श्रुति-कथन है-‘स उत्तमः पुरुषः’[2] ‘हरिर्यथैकः पुरुषोत्तमः स्मृतो महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः’ हरि भगवान् ही पुरुषोत्तम हैं, त्र्यंबक महेश्वर हैं।
‘व्यालराक्षसात् वृषमयात्मजात् वयं रक्षिताः’ श्रुतियाँ कह रही हैं, हे प्रभो! आपके द्वारा ही हमारा रक्षण होता है। वेदों में अननुष्ठापकत्व लक्षण भी अप्रा-माण्य होता है; जो वेद में अपने अर्थ का अनुष्ठान नहीं करा पाता उसमें अननुष्ठापकत्व लक्षण अप्रामाण्य हो जाता है। कहीं ज्ञात अर्थ का ज्ञापक होने से अनुवादकत्व लक्षण अप्रामाण्य होता है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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गोपी गीत

जहाँ अनधिगत-गन्तृत्व न होने पर ज्ञात-ज्ञापकता होती है वहाँ अनुवादकत्व लक्षण अप्रामाण्य होता है। अष्ट-दोष से दूषित विकल्प जिस पक्ष में होता है वहाँ अननुष्ठापकत्व लक्षण अप्रामाण्य होता है क्योंकि वह स्वार्थ का अनुष्ठान नहीं करा सकता। निष्कर्ष यह है कि वेद-वचनों द्वारा परब्रह्म का प्रतिपादन होने पर भी जब तक परब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार, बोध, प्रबोध तथा अविद्या एवं तत् कार्यात्मक प्रपन्च का अपनोदन न हो तो वेदान्त में भी अप्रामाण्यापत्ति हो जाती है। तात्पर्य यह कि बोधकशास्त्र द्वारा बोध न होने पर यह अप्रमाण हो जाता है। श्रुतियों का प्रामाण्य स्थापित होना ही उनका रक्षण है। भगवत्-साक्षात्कार से ही श्रुतियों का रक्षण होता है। भागवत-शास्त्र के आधार पर भगवत्-साक्षात्कार होने पर ही उनकी प्रामाणिकता मान्य हो सकती है। इसी तरह भगवान् राघवेन्द्र रामचन्द्र के अपरोक्ष-ज्ञान होने से रामायण की प्रामाणिकता भी मान्य हो सकती है। तात्पर्य कि बोधक-शास्त्रों का अप्रामाण्य ही उनका हनन किंवा वध है; सच्चिदानन्दघन परात्पर परब्रह्म प्रभु के साक्षात्कार से ही मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद राशि का, सम्पूर्ण श्रुतियों का प्रामाण्य सुस्थापित हो जाता है। एतावता श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ भगवान श्रीकृष्ण से आविर्भूत होकर रक्षण करने हेतु प्रार्थना कर रही हैं।

काम-क्रोध-मदादि दोषों के कारण भगवत्-दर्शन असम्भव हो जाता है। गोपांगनाएँ अनुभव करती हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हे गोपांगनाओ! तुम लोगों में अहंकार का उदय हुआ कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अखिलेश्वर प्रभु हमारे वशीभूत हो दारु-यन्त्रवत् क्रीड़ा कर रहे हैं अतः मैं अन्तर्धान हो गया। गोपांगनाएँ प्रार्थना कर रही हैं-“है नाथ! ‘नैवाश्रितेषु महतां गुणदोषशंका’ आश्रितों के गुण-दोष विचारणीय नहीं होते।

‘दोषाकरोऽपि, कुटिलोऽपि कलंकितोऽपि
मित्रावसानसमये विहितोदयोऽपि।
चन्द्रस्तथापि हरवल्लभतामुपैति
नैवाश्रितेषु गुणदोषविचारणा स्यात्।।”

अर्थात, मित्र (सूर्य) के अवसान के समय उदित होने वाले कुटिल एवं कलंकित स्वाश्रित चन्द्रमा का भी त्याग न कर भगवान् शंकर ने उसको अपने शीश पर ग्रहण किया। अतः हे नाथ! हम स्वाश्रितों के दोष का विचार न करते हुए हमें भी आप शरण दें।” भक्त कहता है -

जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।

जो प्रभु मेरे कार्य का, मेरे गुण-दोष का विचार करें तो शतकोटि कल्प तक भी मेरा उद्धार सम्भव नहीं हो सकता। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-“हे नाथ! जैसे नहरनी से सुमेरु पर्वत का उन्मूलन सम्भव नहीं वैसे ही मेरे सुकृत रूप नहरनी द्वारा दुष्कृत रूप सुमेरु का उन्मूलन भी कदापि सम्भव नहीं। अतः हे नाथ! अशरण-शरण, करुणा-वरुणालय आप हो स्वानुग्रहवश मुझ दीन का भी कल्याण करें। आपका साक्षात्कार ही अशेषतः कल्याणकारी है अतः निजानुग्रहवश आप साक्षात् आविर्भूत हों।
अहंकार ही पतन का मूल है। अतः कहा जाता है -

‘पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भवः।
त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव।।’

मानव ही प्रत्यक चैतन्याभिन्नतया ब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार कर सकता है। यदा-कदा बाह्यतः साधुवेश अपनाने पर भी अन्तःकरण दम्भ एवं काम से मलिन रहता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- ‘बंचक भगत कहाइ राम के, किंकर कंचन कोह काम के।’ बाह्य कर्माडम्बरजन्य दर्पयुक्त चित्त से भगवत्-स्वरूप सदा ही अग्राह्य है।अहंकार का नाश ही भगवद्-दर्शन का, श्रीकृष्ण-प्राकट्य का आधार है। अपनी अपूर्णता, अज्ञता एवं अशक्तता का ज्ञान ही अहंकार-नाश का हेतु है। एतावता उत्तमातिउत्तम भक्त स्वभावतः ही अपनी अपूर्णता का, अपने दोषों का अधिकाधिक बोध करने लगता है।
‘द्वा सुपर्णा, सयुजा, सखाया’ आप ही समपूर्ण जीवों के सखा, सर्व-हितैषी, सर्व-स्वामी हैं। श्रुति-कथन है-‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।’ अर्थात्, उत्पत्ति काल में प्राणी मात्र भगवान् से ही आविर्भूत होते हैं यद्यपि लौकिक माता-पिता भी निमित्तभूत होते हैं। लौकिक माता-पिता में भी भगवान् ही अभिव्यक्त हैं। एतावता मूलतः प्राणीमात्र के आविर्भाव का मूल एकमात्र परात्पर सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही है।

‘विष्णुपुराण’ के मतानुसार भगवान् का उत्पादक, पालक एवं संहारक तीनों ही रूप चतुर्धा है। उत्पादक रूप में भगवान् सर्वान्तर्यामी चतुर्मुख ब्रह्मा प्रजापति एवं लौकिक माता-पिता स्वरूप हैं; पालक रूप में अन्तर्यामी, सर्वपाल, विष्णुस्वरूप, मन्वादि एवं तात्कालिक राजा स्वरूप हैं; मनु कहते हैं, ‘महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति’ अर्थात्, राजा महती देवता ईश्वर ही नर रूप में प्रकट है। संहारक रूप में सर्व-संहारक रुद्र, यमराज एवं आधि-व्याधि हैं।

गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप सर्वदा, सर्वथा, सर्वपालक, सर्वसखा, सर्वहितकारी, सर्वस्वामी हैं तथापि हम व्रज-बालाओं से आपका विशेष सम्बन्ध है। जैसे भगवान् विष्णु सबके पालक हैं तथापि विशेषतः लक्ष्मी पति हैं वैसे ही आप विशेषतः गोपिका-वल्लभ हैं।
हे ऋषभ! आप ही हमारे रक्षक हैं। ‘ऋषभः निरतिशयेन श्रेष्ठः’ आप सम्पूर्ण तत्त्वों में परम श्रेष्ठ हैं; आप ही अनन्तानन्त ब्रह्माण्डाधिष्ठान, स्वप्रकाश परमेश्वर हैं; सर्व-सृष्टि-पालक एवं रक्षक हैं।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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गोपी गीत

हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप ही हमारे प्राणनाथ, प्रियतम, प्राणाधार हैं। ‘गवां रक्षकः ऋषभः’ जैसे गो-समूह का रक्षक गवेन्द्र, ऋषभ ही होता है, वैसे ही आप ‘ऋषभः पुरुषर्षभः पुरुषेषु श्रेष्ठः’ पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम हम गोपांगनाओं के रक्षक हैं।
हे व्रजेन्द्रनन्दन! हमारी रक्षा हेतु तो आपको कोई त्याग किंवा बलिदान भी नहीं करना पड़ रहा है; केवल अपनी कृपणतावशात् ही आप हमारे हनन का हेतु बन रहे हैं। आपके मंगलमय मुखचन्द्र के दर्शनमात्र से हमारे प्राणों का रक्षण हो जायगा, परन्तु आप अपने कार्पण्यवश हमें उससे भी वियुक्त ही किए हुए हैं। आपकी दृष्टि तो सर्वघात की है; ‘आयुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्छत्’ महाभारत-संग्राम-काल में आपने राजाओं के तेज, मन एवं आयु का अपने दृष्टिमात्र से अपहरण कर लिया; आपकी दृष्टि सर्वहारा है परन्तु आपका स्वरूप ‘आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि’ है; अस्तु, आपके इस आनन्दमय स्वरूप के दर्शन से ही हमारा जीवन सुरक्षित रह सकता है।

हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप हम व्रज-वनिताओं के, सम्पूर्ण व्रज-वासियों के ही ऋषभ हैं; स्वाश्रितजनों के लिए आवश्यकतानुसार अपने सर्वश्रेष्ठ का त्याग किंवा बलिदान कर देने वाला ही ऋषभ होता है अतः उचित तो यह था कि आप हमारा रक्षण करें परन्तु इसके विपरीत आप अपने कार्पण्य के कारण हमारा हनन ही कर रहे हैं। मधुसूदन सरस्वती कह रहे हैं, ‘यः स्वल्पामप्यात्मनो वित्तक्षतिं न क्षमते स कृपणः’ जो समर्थ होने पर भी अपने धन का किंचिन्मात्र भी व्यय नहीं करता वह कृपण है। बुद्धिमान् व्यक्ति अर्जन करते हुए कौड़ी-कौड़ी जोड़ता है परन्तु उपयुक्त अवसर आने पर उसी तत्परता से व्यय भी करता है। ‘अजराऽमरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत्’ प्राज्ञ अपने को अजर-अमर मानकर ही विद्या एवं धन का अर्जन करे। ‘गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्।’ धर्माचरण का अवसर उपस्थित होने पर विज्ञ यत्नपूर्वक संग्रहीत विद्या एवं धन का व्यय ऐसी तत्परता से करता है मानो मृत्यु हाथ में तलवार लेकर उसके केशों को पकड़े हुए गला काटने के लिये उद्यत हो रही है।” कहते हैं -

‘काल करे से आज कर आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करोगे कब।।’

महर्षि याज्ञवल्क्य कृपण का लक्षण बताते हुए गार्गी से कहते हैं-'यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणः।’ हे गार्गि! वह कृपण है जो ब्रह्म को जाने बिना ही इस जगत् से चला गया। ब्रह्म-ज्ञान-प्राप्ति-हेतु ही मानव का निर्माण हुआ। भागवत का कथन है-

‘सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्या वृक्षान्सरीसृपपशून्खगदंशमत्स्यान्।।’

भगवान् ने अपनी मंगलमयी शक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार के सुन्दरातिसुन्दर पुरों का निर्माण किया तथापि सन्तुष्ट न हुए।

‘तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः’[2]

‘पूर्षु शेते इति पुरुषः’ जो सब पुरों में शयन करता है वह पुरुष है। देव-दानव-मानव, कीट-पतंग, पशु-पक्षी आदि विभिन्न दहों किंवा पुरों में निवास करने वाला परमात्मा ही पुरुष है। इसलिये मनुष्य को बनाकर परमात्मा ने प्रसन्नता का अनुभव किया क्योंकि ‘ब्रह्मावलोकधिषणं’ उसकी बुद्धि परमात्मा को समझने में समर्थ है।

प्रेरक, प्रवर्त्तक, साक्षी एवं अधिष्ठानरूप से ब्रह्म-दर्शन की बुद्धि केवल मनुष्य-योनि में ही सम्भव है। मानवेतर योनियों में जाम्बवान्, काकभुशुण्डि आदि भगवदनुग्रह प्राप्त जन विशिष्ट उदाहरण हैं; इन पर भी भगवदनुग्रह मनुष्य रूप में किए गए तप के कारण ही हुआ। तातपर्य कि ब्रह्मज्ञान से रहित मृत्यु को प्राप्त होने वाला प्राणी ही कृपण है। केनोपनिषद् का कथन है -

‘केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति।’

अर्थात्, किसकी इच्छा से प्रेरित होकर मन तत् विषयों में विचरण करता है? किसके द्वारा वाक्-शक्ति, वागोश्वरी, परा-पश्यती-मध्यमा, कण्ठताल्वादिक अष्टस्थानानुषक्त-आग्नेय-वागिन्द्रिय के द्वारा अभिव्यक्त तत्-तत् वर्ण-स्फीट द्वारा तत्-तत् अभिव्यक्ति प्रेरित होती है? किस देव की प्रेरणा से चक्षु-श्रोत्रादि इन्द्रियों की अपने-अपने विषय में विनियुक्ति होती है? तात्पर्य कि एकमात्र सर्वाधिष्ठान भगवान् ही सम्पूर्ण क्रिया कलापों के प्रेरक हैं।श्रीमद्भगवद्-वाक्य है, ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते’ ज्ञानी भी बहुत जन्मों के अन्त में मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। कथा है कि भक्त ध्रुव को छः महीनों के अल्पकाल में ही भगवत्साक्षात्कार हो गया। भक्त भगवान् से पूछ रहा है, “हे भगवन्! हमने तो सुना है कि आपके दर्शन बड़े दुर्लभ हैं, आप अत्यन्त दुराराध्य हैं, फिर मुझे इतने शीघ्र कैसे प्राप्त हुए?” उत्तर में भगवान् ने भक्त को दिव्य-दृष्टि दी; भक्त ध्रुव ने दखा कि उसके अनेक जन्मों में प्राप्त विभिन्न देह तपस्या करते हुए ही व्यतीत हो गये हैं। तात्पर्य कि अनेकानेक जन्म-जन्मान्तरों की कठिन तपस्या के अनन्तर ही बालक ध्रुव को सद्यः भगवत्-साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ‘महाभारत’ में भी द्वित-त्रित महर्षि की एक कथा है। भगवत्-साक्षात्कार करा देने की महर्षि ने प्रतिज्ञा की; तदर्थ सांगोपांग यज्ञ, मन्त्र, जपादि किया परन्तु असफल ही रहे। लज्जित हो महर्षि स्वयं ही ब्रह्म-साक्षात्कार का संकल्प कर श्वेत-द्वीप चले गए; कठिन तपस्या के अनन्तर वहाँ उनको कुछ शब्द सुनाई पड़ा, ‘जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।’ इसके बाद आदेश हुआ कि रामावतार में कपि-शरीर धारण करने पर तुम्हें भगवत्-साक्षात्कर प्राप्त होगा।

गोपांगनाएँ प्रार्थना कर रही हैं कि हे व्रजेन्द्रनन्दन! आपने बारम्बार भयंकर आपदाओं से हमारी रक्षा की, किन्तु अब आप किंचिन्मात्र वस्तु के दान में उदासीन हो रहे हैं; क्या यह उचित है? क्या यह आपका अनौदार्य नहीं है?
निवृत्तिपक्षीय अर्थ है;
‘व्यालराक्षसात्’, अज्ञ, अल्पश्रुत, जड़ प्राणीरूप व्याल तथा बहुश्रुत खलरूप ‘व्याल’ का विध्वंस करने में जो ब्रह्म-ज्ञान राक्षसवत् है उसके द्वारा हमारी रक्षा करें। अन्तक, अन्त करने वाला ही राक्षस है।
‘वर्षमारुताद्’ संसार में सतत दुःख की ही वृष्टि होती रहती है; इस दुःखवृष्टि के लिय ज्ञान मारुत तुल्य है। जैसे वायु के चलने पर वर्षा बाधित हो जाती है वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार से दुःख-वर्धण का भी बाधन हो जाता है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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