Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप ही हमारे प्राणनाथ, प्रियतम, प्राणाधार हैं। ‘गवां रक्षकः ऋषभः’ जैसे गो-समूह का रक्षक गवेन्द्र, ऋषभ ही होता है, वैसे ही आप ‘ऋषभः पुरुषर्षभः पुरुषेषु श्रेष्ठः’ पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम हम गोपांगनाओं के रक्षक हैं।
हे व्रजेन्द्रनन्दन! हमारी रक्षा हेतु तो आपको कोई त्याग किंवा बलिदान भी नहीं करना पड़ रहा है; केवल अपनी कृपणतावशात् ही आप हमारे हनन का हेतु बन रहे हैं। आपके मंगलमय मुखचन्द्र के दर्शनमात्र से हमारे प्राणों का रक्षण हो जायगा, परन्तु आप अपने कार्पण्यवश हमें उससे भी वियुक्त ही किए हुए हैं। आपकी दृष्टि तो सर्वघात की है; ‘आयुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्छत्’ महाभारत-संग्राम-काल में आपने राजाओं के तेज, मन एवं आयु का अपने दृष्टिमात्र से अपहरण कर लिया; आपकी दृष्टि सर्वहारा है परन्तु आपका स्वरूप ‘आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि’ है; अस्तु, आपके इस आनन्दमय स्वरूप के दर्शन से ही हमारा जीवन सुरक्षित रह सकता है।

हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप हम व्रज-वनिताओं के, सम्पूर्ण व्रज-वासियों के ही ऋषभ हैं; स्वाश्रितजनों के लिए आवश्यकतानुसार अपने सर्वश्रेष्ठ का त्याग किंवा बलिदान कर देने वाला ही ऋषभ होता है अतः उचित तो यह था कि आप हमारा रक्षण करें परन्तु इसके विपरीत आप अपने कार्पण्य के कारण हमारा हनन ही कर रहे हैं। मधुसूदन सरस्वती कह रहे हैं, ‘यः स्वल्पामप्यात्मनो वित्तक्षतिं न क्षमते स कृपणः’ जो समर्थ होने पर भी अपने धन का किंचिन्मात्र भी व्यय नहीं करता वह कृपण है। बुद्धिमान् व्यक्ति अर्जन करते हुए कौड़ी-कौड़ी जोड़ता है परन्तु उपयुक्त अवसर आने पर उसी तत्परता से व्यय भी करता है। ‘अजराऽमरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च चिन्तयेत्’ प्राज्ञ अपने को अजर-अमर मानकर ही विद्या एवं धन का अर्जन करे। ‘गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्।’ धर्माचरण का अवसर उपस्थित होने पर विज्ञ यत्नपूर्वक संग्रहीत विद्या एवं धन का व्यय ऐसी तत्परता से करता है मानो मृत्यु हाथ में तलवार लेकर उसके केशों को पकड़े हुए गला काटने के लिये उद्यत हो रही है।” कहते हैं -

‘काल करे से आज कर आज करे सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करोगे कब।।’

महर्षि याज्ञवल्क्य कृपण का लक्षण बताते हुए गार्गी से कहते हैं-'यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात् प्रैति स कृपणः।’ हे गार्गि! वह कृपण है जो ब्रह्म को जाने बिना ही इस जगत् से चला गया। ब्रह्म-ज्ञान-प्राप्ति-हेतु ही मानव का निर्माण हुआ। भागवत का कथन है-

‘सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्या वृक्षान्सरीसृपपशून्खगदंशमत्स्यान्।।’

भगवान् ने अपनी मंगलमयी शक्ति द्वारा विभिन्न प्रकार के सुन्दरातिसुन्दर पुरों का निर्माण किया तथापि सन्तुष्ट न हुए।

‘तैस्तैरतुष्टहृदयः पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देवः’[2]

‘पूर्षु शेते इति पुरुषः’ जो सब पुरों में शयन करता है वह पुरुष है। देव-दानव-मानव, कीट-पतंग, पशु-पक्षी आदि विभिन्न दहों किंवा पुरों में निवास करने वाला परमात्मा ही पुरुष है। इसलिये मनुष्य को बनाकर परमात्मा ने प्रसन्नता का अनुभव किया क्योंकि ‘ब्रह्मावलोकधिषणं’ उसकी बुद्धि परमात्मा को समझने में समर्थ है।

प्रेरक, प्रवर्त्तक, साक्षी एवं अधिष्ठानरूप से ब्रह्म-दर्शन की बुद्धि केवल मनुष्य-योनि में ही सम्भव है। मानवेतर योनियों में जाम्बवान्, काकभुशुण्डि आदि भगवदनुग्रह प्राप्त जन विशिष्ट उदाहरण हैं; इन पर भी भगवदनुग्रह मनुष्य रूप में किए गए तप के कारण ही हुआ। तातपर्य कि ब्रह्मज्ञान से रहित मृत्यु को प्राप्त होने वाला प्राणी ही कृपण है। केनोपनिषद् का कथन है -

‘केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति।’

अर्थात्, किसकी इच्छा से प्रेरित होकर मन तत् विषयों में विचरण करता है? किसके द्वारा वाक्-शक्ति, वागोश्वरी, परा-पश्यती-मध्यमा, कण्ठताल्वादिक अष्टस्थानानुषक्त-आग्नेय-वागिन्द्रिय के द्वारा अभिव्यक्त तत्-तत् वर्ण-स्फीट द्वारा तत्-तत् अभिव्यक्ति प्रेरित होती है? किस देव की प्रेरणा से चक्षु-श्रोत्रादि इन्द्रियों की अपने-अपने विषय में विनियुक्ति होती है? तात्पर्य कि एकमात्र सर्वाधिष्ठान भगवान् ही सम्पूर्ण क्रिया कलापों के प्रेरक हैं।श्रीमद्भगवद्-वाक्य है, ‘बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते’ ज्ञानी भी बहुत जन्मों के अन्त में मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। कथा है कि भक्त ध्रुव को छः महीनों के अल्पकाल में ही भगवत्साक्षात्कार हो गया। भक्त भगवान् से पूछ रहा है, “हे भगवन्! हमने तो सुना है कि आपके दर्शन बड़े दुर्लभ हैं, आप अत्यन्त दुराराध्य हैं, फिर मुझे इतने शीघ्र कैसे प्राप्त हुए?” उत्तर में भगवान् ने भक्त को दिव्य-दृष्टि दी; भक्त ध्रुव ने दखा कि उसके अनेक जन्मों में प्राप्त विभिन्न देह तपस्या करते हुए ही व्यतीत हो गये हैं। तात्पर्य कि अनेकानेक जन्म-जन्मान्तरों की कठिन तपस्या के अनन्तर ही बालक ध्रुव को सद्यः भगवत्-साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ‘महाभारत’ में भी द्वित-त्रित महर्षि की एक कथा है। भगवत्-साक्षात्कार करा देने की महर्षि ने प्रतिज्ञा की; तदर्थ सांगोपांग यज्ञ, मन्त्र, जपादि किया परन्तु असफल ही रहे। लज्जित हो महर्षि स्वयं ही ब्रह्म-साक्षात्कार का संकल्प कर श्वेत-द्वीप चले गए; कठिन तपस्या के अनन्तर वहाँ उनको कुछ शब्द सुनाई पड़ा, ‘जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।’ इसके बाद आदेश हुआ कि रामावतार में कपि-शरीर धारण करने पर तुम्हें भगवत्-साक्षात्कर प्राप्त होगा।

गोपांगनाएँ प्रार्थना कर रही हैं कि हे व्रजेन्द्रनन्दन! आपने बारम्बार भयंकर आपदाओं से हमारी रक्षा की, किन्तु अब आप किंचिन्मात्र वस्तु के दान में उदासीन हो रहे हैं; क्या यह उचित है? क्या यह आपका अनौदार्य नहीं है?
निवृत्तिपक्षीय अर्थ है;
‘व्यालराक्षसात्’, अज्ञ, अल्पश्रुत, जड़ प्राणीरूप व्याल तथा बहुश्रुत खलरूप ‘व्याल’ का विध्वंस करने में जो ब्रह्म-ज्ञान राक्षसवत् है उसके द्वारा हमारी रक्षा करें। अन्तक, अन्त करने वाला ही राक्षस है।
‘वर्षमारुताद्’ संसार में सतत दुःख की ही वृष्टि होती रहती है; इस दुःखवृष्टि के लिय ज्ञान मारुत तुल्य है। जैसे वायु के चलने पर वर्षा बाधित हो जाती है वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार से दुःख-वर्धण का भी बाधन हो जाता है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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