Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

जहाँ अनधिगत-गन्तृत्व न होने पर ज्ञात-ज्ञापकता होती है वहाँ अनुवादकत्व लक्षण अप्रामाण्य होता है। अष्ट-दोष से दूषित विकल्प जिस पक्ष में होता है वहाँ अननुष्ठापकत्व लक्षण अप्रामाण्य होता है क्योंकि वह स्वार्थ का अनुष्ठान नहीं करा सकता। निष्कर्ष यह है कि वेद-वचनों द्वारा परब्रह्म का प्रतिपादन होने पर भी जब तक परब्रह्म स्वरूप का साक्षात्कार, बोध, प्रबोध तथा अविद्या एवं तत् कार्यात्मक प्रपन्च का अपनोदन न हो तो वेदान्त में भी अप्रामाण्यापत्ति हो जाती है। तात्पर्य यह कि बोधकशास्त्र द्वारा बोध न होने पर यह अप्रमाण हो जाता है। श्रुतियों का प्रामाण्य स्थापित होना ही उनका रक्षण है। भगवत्-साक्षात्कार से ही श्रुतियों का रक्षण होता है। भागवत-शास्त्र के आधार पर भगवत्-साक्षात्कार होने पर ही उनकी प्रामाणिकता मान्य हो सकती है। इसी तरह भगवान् राघवेन्द्र रामचन्द्र के अपरोक्ष-ज्ञान होने से रामायण की प्रामाणिकता भी मान्य हो सकती है। तात्पर्य कि बोधक-शास्त्रों का अप्रामाण्य ही उनका हनन किंवा वध है; सच्चिदानन्दघन परात्पर परब्रह्म प्रभु के साक्षात्कार से ही मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद राशि का, सम्पूर्ण श्रुतियों का प्रामाण्य सुस्थापित हो जाता है। एतावता श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ भगवान श्रीकृष्ण से आविर्भूत होकर रक्षण करने हेतु प्रार्थना कर रही हैं।

काम-क्रोध-मदादि दोषों के कारण भगवत्-दर्शन असम्भव हो जाता है। गोपांगनाएँ अनुभव करती हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हे गोपांगनाओ! तुम लोगों में अहंकार का उदय हुआ कि अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अखिलेश्वर प्रभु हमारे वशीभूत हो दारु-यन्त्रवत् क्रीड़ा कर रहे हैं अतः मैं अन्तर्धान हो गया। गोपांगनाएँ प्रार्थना कर रही हैं-“है नाथ! ‘नैवाश्रितेषु महतां गुणदोषशंका’ आश्रितों के गुण-दोष विचारणीय नहीं होते।

‘दोषाकरोऽपि, कुटिलोऽपि कलंकितोऽपि
मित्रावसानसमये विहितोदयोऽपि।
चन्द्रस्तथापि हरवल्लभतामुपैति
नैवाश्रितेषु गुणदोषविचारणा स्यात्।।”

अर्थात, मित्र (सूर्य) के अवसान के समय उदित होने वाले कुटिल एवं कलंकित स्वाश्रित चन्द्रमा का भी त्याग न कर भगवान् शंकर ने उसको अपने शीश पर ग्रहण किया। अतः हे नाथ! हम स्वाश्रितों के दोष का विचार न करते हुए हमें भी आप शरण दें।” भक्त कहता है -

जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।

जो प्रभु मेरे कार्य का, मेरे गुण-दोष का विचार करें तो शतकोटि कल्प तक भी मेरा उद्धार सम्भव नहीं हो सकता। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-“हे नाथ! जैसे नहरनी से सुमेरु पर्वत का उन्मूलन सम्भव नहीं वैसे ही मेरे सुकृत रूप नहरनी द्वारा दुष्कृत रूप सुमेरु का उन्मूलन भी कदापि सम्भव नहीं। अतः हे नाथ! अशरण-शरण, करुणा-वरुणालय आप हो स्वानुग्रहवश मुझ दीन का भी कल्याण करें। आपका साक्षात्कार ही अशेषतः कल्याणकारी है अतः निजानुग्रहवश आप साक्षात् आविर्भूत हों।
अहंकार ही पतन का मूल है। अतः कहा जाता है -

‘पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भवः।
त्राहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव।।’

मानव ही प्रत्यक चैतन्याभिन्नतया ब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार कर सकता है। यदा-कदा बाह्यतः साधुवेश अपनाने पर भी अन्तःकरण दम्भ एवं काम से मलिन रहता है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- ‘बंचक भगत कहाइ राम के, किंकर कंचन कोह काम के।’ बाह्य कर्माडम्बरजन्य दर्पयुक्त चित्त से भगवत्-स्वरूप सदा ही अग्राह्य है।अहंकार का नाश ही भगवद्-दर्शन का, श्रीकृष्ण-प्राकट्य का आधार है। अपनी अपूर्णता, अज्ञता एवं अशक्तता का ज्ञान ही अहंकार-नाश का हेतु है। एतावता उत्तमातिउत्तम भक्त स्वभावतः ही अपनी अपूर्णता का, अपने दोषों का अधिकाधिक बोध करने लगता है।
‘द्वा सुपर्णा, सयुजा, सखाया’ आप ही समपूर्ण जीवों के सखा, सर्व-हितैषी, सर्व-स्वामी हैं। श्रुति-कथन है-‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।’ अर्थात्, उत्पत्ति काल में प्राणी मात्र भगवान् से ही आविर्भूत होते हैं यद्यपि लौकिक माता-पिता भी निमित्तभूत होते हैं। लौकिक माता-पिता में भी भगवान् ही अभिव्यक्त हैं। एतावता मूलतः प्राणीमात्र के आविर्भाव का मूल एकमात्र परात्पर सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही है।

‘विष्णुपुराण’ के मतानुसार भगवान् का उत्पादक, पालक एवं संहारक तीनों ही रूप चतुर्धा है। उत्पादक रूप में भगवान् सर्वान्तर्यामी चतुर्मुख ब्रह्मा प्रजापति एवं लौकिक माता-पिता स्वरूप हैं; पालक रूप में अन्तर्यामी, सर्वपाल, विष्णुस्वरूप, मन्वादि एवं तात्कालिक राजा स्वरूप हैं; मनु कहते हैं, ‘महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति’ अर्थात्, राजा महती देवता ईश्वर ही नर रूप में प्रकट है। संहारक रूप में सर्व-संहारक रुद्र, यमराज एवं आधि-व्याधि हैं।

गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप सर्वदा, सर्वथा, सर्वपालक, सर्वसखा, सर्वहितकारी, सर्वस्वामी हैं तथापि हम व्रज-बालाओं से आपका विशेष सम्बन्ध है। जैसे भगवान् विष्णु सबके पालक हैं तथापि विशेषतः लक्ष्मी पति हैं वैसे ही आप विशेषतः गोपिका-वल्लभ हैं।
हे ऋषभ! आप ही हमारे रक्षक हैं। ‘ऋषभः निरतिशयेन श्रेष्ठः’ आप सम्पूर्ण तत्त्वों में परम श्रेष्ठ हैं; आप ही अनन्तानन्त ब्रह्माण्डाधिष्ठान, स्वप्रकाश परमेश्वर हैं; सर्व-सृष्टि-पालक एवं रक्षक हैं।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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