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गोपी गीत
हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप ऋषभ हैं अतः हमारी रक्षा-हेतु दीक्षित हैं तथापि हमारी रक्षा नहीं कर रहे हैं। हमारी रक्षा हेतु आपको कोई त्याग, कोई बलिदान भी नहीं करना पड़ रहा है; केवल आपके मुखचन्द्र का दर्शन ही पर्याप्त है। ‘वितर वीर नस्तेऽघरामृतम्’ हे वीर! अपने अधरामृत का वितरण करें। ‘इतररागविस्मारणं नृणां’ आपका अधरामृत सम्पूर्ण इतर रागों का विस्मारक है; वही वस्तु जो आपके लिए अत्यन्त सरल किंवा तुच्छ, नगण्य है हमारे लिए सर्वस्व है; तात्पर्य अधिकार से है। स्वयं लोभरूप आपका अधर ही इस विशुद्ध रस का वितरक है।
श्रीमद्भागवत के द्वाद्वश-स्कंध में भगवतस्वरूप का आध्यात्मिक विवेचन है। तदनुसार धर्म ही भगवान का वक्षःस्थल है, अधर्म पीठ एवं साक्षात लोभ अधर हैं। भगवान के मंगलमय मुखचन्द्र की सुमधुर अधर-सुधा ही सर्वोत्कृष्ट धन है। लोभ-तत्त्व की अधिष्ठात्री देवता स्वयं लोभ ही इस अमूल्य धन का वितरक है। महाभारत में एक रोचक प्रसंग है। पाण्डवों ने राजसूय यज्ञ किया, भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को ही कोषाध्यक्ष बना दिया; कौरवों से अपने मनोमालिन्य के कारण पाण्डवगण आशंका-ग्रस्त हो उठें; भगवान श्रीकृष्ण ने उनको आश्वासन दिया; भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि दुर्योधन के हाथ में ऐसी रेखाएँ पड़ी हैं जिनके प्रभाव से वह चाहे जितना खर्च करे उसका खजाना सदा भरा ही रहेगा; जितना वह खर्च करे उतना ही खजाना भर जाय। कोषाध्यक्ष नियुक्त होने पर दुर्योधन द्वेषवशात् खजाना लुटाने लगा परन्तु उसकी अपनी ही रेखाओं से प्रेरित पाण्डवों का कोष सदा भरभूप ही रहा। फलतः पाण्डवों की ही प्रसिद्धि हुई। तात्पर्य कि योग्य व्यक्ति को ही कोषाध्यक्ष बनाना कल्याणकारी होता है।
आचार्यमतानुसार, साधन में विधि-निषेध होता है; फल विधि-निषेधातीत है। वल्लभाचार्यजी ने भी फलाध्याय लिखा है; वस्तुतः सम्पूर्ण ‘वेणुगीत’ ही फलाध्याय है। भगवान सर्वापेक्षया फलस्वरूप हैं; उनके मुखचन्द्रेतर अन्य अवयवों में साध्य-साधन-भाव भी हैं, मुखारविन्द केवल मात्र साध्य-फलस्वरूप है।जिस समय भगवान के चरण, भुजाएँ एवं दृष्टि-दर्प-दलन-हेतु अग्रसर होती है उस समय तत्-तत् अवयव साधनस्वरूप हैं परन्तु जब उन्हीं चरणारविन्द एवं हस्तारविन्द-संस्पर्श से तथा मंगलमयी दृष्टि के प्रेम-वीक्षण से भक्तानुग्रह होता है तब वे साध्यस्वरूप हो जाते हैं परन्तु भगवान-मुखचन्द्र में केवल साध्यरूपता ही है। इस सर्वथा फलस्वरूप मुखचन्द्र की अधर-सुधा ही सम्पूर्ण फलों का सार विशुद्ध रस है।
अधिकार-भेद भगवदधरामृत के भी तीन प्रभेद हैं-देव-भोग्या, भगवत-भोग्या एवं सर्वा-भोग्या। स्वभावतः ही भगवान-मुखचन्द्र की मंगलमयी अधर-सुधा-विशुद्ध रसनिधि के यथायोग्य वितरण में कोई अत्यन्त कुशल कोषाध्यक्ष ही समर्थ हो सकता है; अस्तु, साक्षात लोभ ही इस रसनिधि का कोषाध्यक्ष है। अबाध-प्राप्ति ही अर्थी की कामना है; यथायोग्य वितरण कोषाध्यक्ष का कौशल है। तात्पर्य कि अकारण-करुण, करुणा-वरुणालय, अशरण-शरण, भक्तवत्सल भगवान भक्त की योग्यतानुसार ही उसको स्वसंस्पर्शजन्य आनन्दरूप फल प्रदान करते हैं तथापि भावातिरेक के कारण भक्त को भगवत-कार्पण्य की ही प्रतीति होती है; भगवदाश्लेष-सुख से भक्त सदा ही अतृप्त रह जाता है। विरहातुरा गोपांगनाएँ भी भाव-विभोर होकर ही भगवान श्रीकृष्ण में कार्पण्यदोष का आरोप करती हैं।
गोपांगनाएँ कल्पना करती हैं कि उनके प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि हे व्रजसीमन्तिनी जनो! हमने तो अत्यन्त भयंकर सन्तापों से आपकी बारम्बार रक्षा की है। स्वयं आपके ही वचन इसके प्रमाण हैं। इतने पर भी आप लोग कह रही हैं कि हम आपका वध कर रहे हैं। आपका यह कथन विरोधाभास एवं अप्रामाण्य-दोष से युक्त है। प्रति-उत्तर में व्रजांगनाएँ कहती हैं, ‘हे ऋषभ! स्वयं ही हनन करने की लालसा से ही आपने अनेकानेक आपदाओं से हमारी रक्षा की है। ‘ऋषभ ते वयं रक्षिता मुहु:’।’ यहाँ ‘ऋषभ’ शब्द भर्तार्थ में प्रयुक्त हुआ है। व्रजांगनाएँ व्यंग्य कर रही हैं ‘हे भर्ता! भर्ता होने के कारण आपको हमारा भरण करना ही उचित है तथापि आपने हमारा दृशावध ही किया; इतने पर भी अब अपने अदर्शन से हमारे प्राणों का अपहरण कर रहे हैं अतः यही प्रतीत होता है कि स्वतः वध करने की लालसा से ही आपने इस विपत्ति-परम्परा से हमारा रक्षण किया है।
इस गीत में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा विष-संपृक्त यमुना-जल, व्याल राक्षस, अघासुर, वर्ष, मारुत एवं अशनिपात आदि विभिन्न भयों से सम्पूर्ण व्रजधाम के अन्तर्गत ही अपने भी रक्षण की चर्चा करती हैं। वस्तुतः उपर्युक्त सब भय श्रीकृष्ण पर ही थे तथापि कृष्ण-मंगल में ही अपने मंगल का अनुभव करने के कारण व्रजांगनाएँ उन उपद्रवों को अपना भय मानती हैं। इसी प्रसंग में गोपांगनाओं द्वारा वृषासुर-व्योमासुर आदिकों के वध का भी उल्लेख हुआ है; ये लीलाएँ रासलीला के बाद ही हुईं। भगवद्रूपा व्रजसीमन्तिनीजनों मे प्रेमोद्रेक के कारण सहस सर्वज्ञता है। विशेषतः विरहजन्य आर्ति से प्रेम का विशेष उच्छलित होना व्यक्त है। एतावता भविष्य की स्फूर्ति स्वभावतः ही हो जाती है। श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ भी त्रिकालज्ञा हैं अतः अपने प्रातिभ-ज्ञान से भविष्य-वर्णन करने में समर्थ हैं। किसी विशेष प्रमाण के अभाव में अकस्मात् स्फुरित होने वाला ज्ञान ही प्रातिभ-ज्ञान है।
निवृत्तिपक्षीय अर्थाभिव्यक्ति के अनुसार ‘क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते। उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।।’[1] अर्थात् सम्पूर्ण कार्यभूत क्षर है; कूटस्थ ही अक्षर है; ‘परमात्मा क्षराक्षराभ्यां विलक्षणः’ परमात्मा ही क्षराक्षरातीत, कार्यकारणातीत है; ‘कूटो वन्चनाछद्मता तथा तिष्ठति इति कूटस्थः’ अव्याकृत माया-विशिष्ट चैतन्य ही माया के द्वारा अनेकधा व्यक्त होता है, वही परमात्मा है। श्रुति-कथन है-‘स उत्तमः पुरुषः’[2] ‘हरिर्यथैकः पुरुषोत्तमः स्मृतो महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः’ हरि भगवान् ही पुरुषोत्तम हैं, त्र्यंबक महेश्वर हैं।
‘व्यालराक्षसात् वृषमयात्मजात् वयं रक्षिताः’ श्रुतियाँ कह रही हैं, हे प्रभो! आपके द्वारा ही हमारा रक्षण होता है। वेदों में अननुष्ठापकत्व लक्षण भी अप्रा-माण्य होता है; जो वेद में अपने अर्थ का अनुष्ठान नहीं करा पाता उसमें अननुष्ठापकत्व लक्षण अप्रामाण्य हो जाता है। कहीं ज्ञात अर्थ का ज्ञापक होने से अनुवादकत्व लक्षण अप्रामाण्य होता है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:
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