Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

ग्वाल-बालों के रक्षार्थ श्रीकृष्ण उनके संग ही व्याल-राक्षस के उदर में प्रविष्ट हुएः अघासुर का उदर ही शमशान है; अनेकानेक प्राणियों के उद्धार-हेतु ही भगवान शंकर अघासुर के उदररूप श्मशान में भी आविर्भूत होते हैं। जैसे बन्दियों के शिक्षार्थ शिक्षक को भी बन्दी-ग्रृह में ही प्रवेश करना पड़ता है वैसे ही प्राणियों के कल्याणार्थ ही अनन्तकोटि-ब्रह्माण्ड-नायक, सर्वेश्वर, प्रभु संसार में अवतरित होते हैं।
गोलोकधाम, साकेतधाम, वैकुण्ठधाम से भगवान का संसार में अवतरण हुआ। सगुण परब्रह्म का लोक ही ब्रह्मलोक है; ब्रह्मलोक ही उपनिषद एवं ब्रह्मसूत्र की दृष्टि से चतुर्मुख ब्रह्मा का लोक, विष्णुपुराण के अनुसार महाविष्णु के उपासक के लिए वैकुण्ठधाम, रामायण के अनुसार भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र के उपासक के लिए साकेतधाम, ब्रह्मवैवर्त एवं श्रीमद्भागवत के अनुसार कृष्ण के उपासक के लिए गोलोकधाम है तथा परात्पर परब्रह्म के उपासक के लिए ब्रह्मलोक है। पुराणों के मतानुसार कार्य-कारणातीत ब्रह्म का धाम ही साकेतधाम है जो ब्रह्मलोक से भी परे है। साकेतधाम के भी अनेक भेद मान्य हैं। अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड से परे अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड नायक, सर्वेश्वर एवं उनके धाम की स्थिति को मान लेने पर उपर्युक्त पौराणिक कल्पना संगत हो सकती है। यद्यपि परम स्नेहमयी, कल्याणमयी, अम्बा भी कूप में गिरे हुए अपने प्राणप्रिय पुत्र के रक्षार्थ चीत्कार तो करती है तथापि स्वयं उस कूप में कूद नहीं पड़ती परन्तु सर्व-सखा, सर्व-हितकारी एवं सर्व-रक्षक सर्वान्तर्यामी प्रभु जीव के उद्धार-हेतु उसके संग ही अधरूप अजगर के नरकरूप उदर में भी प्रविष्ट हो जाते हैं।

‘यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’
विज्ञान ही जिसका कलेवर है, जो विज्ञान में ही स्थित है फिर भी विज्ञान जिसको नहीं जान पाता वह अन्तर्यामी तत्त्व ही परमात्मा है जो सदा, सर्वदा सर्वत्र ही जीवात्मा के साथ असंग, अलिप्त एवं द्रष्टारूप से रहता है। अस्तु, सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी जीवात्मा के उद्धार-हेतु उसके संग ही अघासुर के उदरूप नरक में प्रविष्ट हो जाते हैं।
महर्षि वाल्मीकि की कथा प्रसिद्ध ही है। महर्षि होने के पूर्व वे एक घोर डकैत थे; खून-खराबी एवं लूटमार करके अपने कुटुम्ब का भरण-पोषण करते थे। अकस्मात् भगवदनुग्रहवशात् कुछ महात्मा लोग घूमते हुए उसी वन-प्रान्तर में पधारे; डाके की ताक में लगे डकैत ने अभ्यासवश डाका डाला; महात्माओं ने उसको समझाया कि अपने कर्म-फल का भोक्ता प्राणी स्वयं ही होता है; जिस कुटुम्ब के पालन हेतु व्यक्ति शुभाशुभ सम्पूर्ण कर्मों को करता है उनके फल का भागी एकमात्र वही होता है। डाकू ने महात्माओं की सीख को चालाकी ही समझा; परानुग्रहरत महात्माओं ने डाकू को सुझाव दिया, “तुम हम लोगों को अपने रस्से से एक पेड़ में बाँध दो और स्वयं अपने परिवार से पूछ आओ।” डाकू को यह सलाह उचित प्रतीत हुई; तुरन्त ही उसने उन महात्माओं को एक पेड़ से बाँध दिया और स्वयं अपने परिवार में जाकर प्रत्येक सदस्य से पूछने लगा कि “मैं लूटमार, खून-खराबी कर तुम लोगों का पालन करता हूँ। क्या तुम लोग मेरे पाप में भी भागीदार बनोगे?” परिवार के प्रत्येक व्यक्ति ने उसके कठोर कर्म-फल में हिस्सा बँटाने से एकदम अस्वीकार कर दिया; डाकू को ज्ञान हो गया; वह महात्माओं की शरण में लौट आया; वह डाकू ही ‘मरा-मरा’ जप कर महर्षि हो गया। यहाँ तक कि भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र ने भी लोक-व्यवहारतः महर्षि बाल्मीकि के चरणों में नमन किया। तात्पर्य कि एकमात्र सर्व-सखा, सर्व-हितकारी, सर्वान्तर्यामी परमात्मा ही सदा-सर्वदा-सर्वत्र, गर्भवास में भी, नरक में भी जीवात्मा के संग-संग रहता हुआ भी जल में कमल-पत्र इव असंग एवं निर्लेप रहता है। सर्वेश्वर भगवान ही एकमात्र अकारण-करुण, करुणा-वरुणालय एवं अशरण-शरण हैं।

‘विषजलाप्ययाद् वर्षमारुताद् वयं रक्षिताः मुहुर्मुहः’ अनेक प्रकार के विषादि भयों से आपने बारम्बार हमारी रक्षा की तथापि अपने विप्रयोगजन्य तीव्र सतापस्वरूप विषम-विष-सम्पृक्त सिन्धु से हमारा उद्धार न करते हुए आप अब भी अन्तर्धान ही हैं। चान्द्रमसी ज्योत्स्ना से व्याप्त जगत भी आपके विप्रयोग के कारण भीषण विषमय ताप का जनक विषम-विष-संपृक्त सिंधु बन गया है। चान्द्रमसी ज्योत्स्ना सर्वदा-सर्वत्र अमृतवर्षिणी ही होती है तथापि भगवत-विरहजन्य संताप के कारण गोपांगनाओं को वैपरीत्य की ही भावना होती है।

व्रजांगनाएँ पुनः कह रही हैं, हे ऋषभ! करुणादिगुण-पूर्ण सर्वश्रेष्ठ व्रजेन्द्र-नन्दन! कालिय-कुल के व्यालों को तो आपने रमणक-द्वीप भेज दिया परन्तु हम व्रजांगना आपके रमणक-द्वीप के विहार-पुलिन में आपके भुजंग-भोगाभ भुजों से संपृष्ट होकर विरह-विष-ज्वाला से दग्ध हो रही हैं; हे व्रजेन्द्र कुमार, हमारे कण्ठ में अपनी भुजाओं की माला पहनाकर आप हमारा दुःख दूर करें। बकादि राक्षसों का संहार कर आपने उनसे हमारी रक्षा की परन्तु अब आपके अन्तर्धान हो जाने से आन्तर-मनोज-रूप राक्षस द्वारा हमारा वध हो रहा है। ‘द्वासुपर्णा सयुजा’ जैसी उक्ति के अनुसार आप यद्यपि सम्पूर्ण विश्व के ही सुहृद हैं तथापि अन्तर्धान होकर अपनी विरहानल-ज्वाला से विश्व-दाह का ही कारण बन रहे हैं; अस्तु, प्रतीत होता है कि आप विश्वमित्र नहीं, अपितु विश्वामित्र ही हैं। हे प्राणधन! तृणावर्त आदि राक्षसों से भी आपने हमारी रक्षा की; जिस समय तृणावर्त वात्यारूप से व्रजधाम का संहार करने के लए प्रस्तुत हुआ उस समय आप तृणावर्त के विनाश हेतु ही अन्तर्धान हुए थे, आपके वियोगजन्य असह्म ताप से संपूर्ण व्रजधाम ही दग्ध होने लगा; व्रजधाम की दशा का अनुभव कर आपने शीघ्र ही प्रकट होकर हम सबको जीवन-दान दिया। इन्द्रप्रेरित प्रलयंकारी मेघों के भीषण वर्षण के प्रसंग में ही वैद्युत, अनल, वज्रपात एवं उल्कापातादिकों से भी आपने हमारा रक्षण किया।

इसी तरह आपने वृषभासुर एवं मयात्मज व्योमासुर जैसे भयंकर राक्षसों से भी हम व्रजवासियों का रक्षण किया। उपर्युक्त सभी प्रकार के भय एवं रक्षण की परम्परा से हम व्रजवनिताओं को कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं था; संपूर्ण व्रजधाम एवं व्रजनिवासियों के अन्तर्गत ही हमारी भी रक्षा स्वतः हो गई; परन्तु अब जबकि हम गोपांगनाओं से ही प्रत्यक्ष सम्बन्ध है, केवल हमें सन्तप्त करने के लिए ही आप अन्तर्धान हो रहे हैं; अपने प्राकट्य से हमारी रक्षा न करते हुए हमारी मृत्यु का ही कारण बन रहे हैं।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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