Friday, 31 March 2023

tc 23

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
23-

वे कहते थे कि पानी की कोई जाति नहीं होती, जो रंग मिलाओ वह उसी रंग का हो जाता है। बाबा नरहरिदास यद्यपि ब्रह्मभोज में सम्मिलित होने के लिए राजमहल में न गए पर रानी साहिबा ने उनके लिए ढेर सारी भोजन-सामग्री भिजवा दी। रानी का विश्वास था कि नरहरि बाबा के आशीर्वाद से ही उन्हें ऊँची उमर में पुत्र का मुख देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। बाबा ने रामबोला और अपने बन्दरों को छक-छक कर खिलाया, फिर स्वयं सारी भोजन-सामग्री को एक में मींज कर तथा उसे पानी में सानकर आप खा गए।रामबोला को उनकी भोजन-पद्धति देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। बाबा जब खा-पीकर चैन से बैठे तो रामबोला ने उनसे पूछा-“बाबा, एक बात बताओगे?”
“पूछौ बेटा।”
“यह इतने बढ़िया-बढ़िया मोतीचूर के लड्डू, पूरी, खस्ता-कचौरी, रायता सब एक में मिला के गाय-बैल की सानी की तरह आप खा गए तो इसका स्वाद क्या मिला?”
नरहरि जी मुस्कराए, कहने लगे-"भोजन से पेट भरता है कि स्वाद?”
“दोनों भरते हैं”
“अच्छा तो स्वाद भर दिया जाय किन्तु पेट न भरा जाय तो क्‍या तुमको तृप्ति हो जायगी, रामबोला?”
रामबोला इस प्रश्न से चक्कर से पड़ गया, फिर सिर हिलाकर बोला-“नहीं”
“बस, तो फिर यही बात है। पेट को कोई स्वाद न चाहिए। यह तो बीच की दलाल जिभ्या ही है जो स्वाद की दलाली लेती है।”
रामबोला चक्कर में पड़ गया, उसने कहा-“पेट तो बाबा हमारा भी रोज भर रहा था परन्तु ऐसा स्वाद हमनें कभी नहीं पाया। हमारा तो जी होता है कि हम रोज-रोज ऐसा ही सुन्दर भोजन करें।”
“रोज-रोज यह षटरस भोजन तुम्हें कहाँ से मिलेगा? क्‍या चोरी करोगे रामबोला।”
“नाहीं”
बाबा बोले-“राम जी जब तुम्हें दे तो खाओ, न दें तो न खाओ। स्वाद के पीछे न जाओ, पेट की चिन्ता करो।”
“अच्छा, बाबा”

रामबोला बाबा नरहरिदास के साथ ही रहने लगा। वह हनुमान जी का चबूतरा बुहारता, बाबा की कुटिया और आगे की छोटी-सी फुलवारी वाला भाग स्वच्छ करता और दिन में विश्राम के समय वह अपने नन्हें-नन्हें हाथों से बाबा के पैर दबाता था। नित्यप्रति मण्डी के एक अनाज के व्यापारी के घर से बाबा के लिए सीधा आने लगा था। नरहरि बाबा बच्चे को रोटियाँ बनाना और पोना सिखलाते थे। रामबोला धीरे-घीरे अच्छा भोजन बनाने लगा। उसे खिला कर तथा बन्दरों के आगे टुकड़े डालकर शेष सामग्री नित्य वे सानी बनाकर खाते थे।
एक दिन रानी साहिबा अपने राजकुँवर को लेकर बाबा के दर्शन करने आईं। बाबा के बन्दरों के लिए और घाघरा-सरयू के सगंम-तट पर बसने वाले कंगलो के लिए वे लड्डू-कचौड़ियाँ बनवाकर लाई थीं। नरहरि बाबा को वे एक गाय भी पुन्य करके दे गईं। गाय पाकर रामबोला को ऐसा उत्साह आया कि वह उसे तथा उसके बछड़े को देखते नहीं अघाता था।नरहरि बाबा से बोला “हम औरों के यहाँ गाय देखें तो दूध और छाछ पीने को हमारा भी जी करे।अब बाबा हम रोज-रोज दूध दुहेंगे और फिर मजे से हम तुम दोनों छक के पिया करेंगे। वाह रे, हनुमान स्वामी, तुमने हमारी खूब सुनी।”
नरहरि बाबा बच्चे की भोली बातें सुनकर हँस पड़े, फिर पूछा- “हनुमान स्वामी कहाँ हैं रे?”
“वह चबूतरे पर खड़े है गदा पहाड़ ले के।अच्छा बाबा एक बात बताएँगे आप?”
“पूछो” 
“यह तो संजीवनी बूटी का पर्वत है...है न?”
“तुमको कैसे मालूम, रामबोला? ”
“हमारी पार्वती अम्मा ने एक बार हमको बताया रहा।ठीक बात है न बाबा ?”
“हाँ , ठीक बात है।”
“पर संजीवनी बूटी से लछिमन जी तो पहले ही ठीक हो गए,अब ये क्यों पर्वत लिए खड़े हैं?”
बच्चे के इस प्रश्न पर नरहरि बाबा हँस पड़े, बोले-“इसलिए खड़े हैं कि और किसी को जरूरत पड़े तो उनसे संजीवनी बूटी ले ले। तुमको चाहिए।”
“संजीवनी बूटी? हमको शक्ति थोड़े लगी है बाबा, हम मरे थोड़े....”
“जिसके हृदय में राम जी नहीं रहते वही मरे के समान होता है, बेटा। तुम तो साक्षात्‌ रामबोला हो।”
“नाम से क्या होगा बाबा, हम जरूर मरे हुए हैं, बाबा।”
“काहे ?”
“अरे हम नान्हें से लड़के, हमारे पास न ओढ़ने को है और न बिछाने को। हमारे हिरद में सियाराम जी काहे निवास करेगें? और फिर राम जी तो बाबा बहुत बड़े हैं और हमारा हिरदे तो अबहीं नन्हा सा है।”
“तो राम जी भी नन्हें से बनकर निवास करते हैं।”
रामबोला सुनकर स्तब्ध हो गया।आँखें फाड़कर बाबा को देखने लगा। फिर बोला-“पर हमने तो बाबा उनको कभी देखा नहीं। क्या राम जी छोटे भी होते हैं”
“हाँ हाँ , वे छोटे से छोटे हो सकते हैं, इतने छोटे कि किसी को न दिखाई पड़ें और इतने बड़े भी हो जाते हैं कि कोई उनको पूरा देख नहीं सकता है।”
“राम जी कैसे हैं बाबा? आप देखे हो?”

नरहरि बाबा बच्चे के प्रश्न पर एक क्षण के लिए चुप हो गए, फिर अदृश्य में आँखें टिकाकर कहा-“एक बार झलक भर देख पाया था उन्हें। तब से बराबर एक बार फिर देखने की ललक में हम पड़े हैं बचवा।”
“पर बाबा, आप तो बड़े हैं, आपका हिरदे भी बड़ा है।”
“काया बड़ी हो जाने से तो हृदय थोड़े बड़ा हो जाता हे रे। वह तो राम जी की दया से ही होता है।”
रामबोला चुप हो गया।बात उसकी समझ में ठीक तरह से न आई। फिर कुछ सोचकर पूछा-“अच्छा बाबा, राम जी कैसे हैं? बड़े सुन्दर होगें”
“हाँ , बहुत सुन्दर”
“जैसे अपनी फुलवारी में फूल सुन्दर लगते हैं, वैसे होगें?”
“इस जगत में जितने सुन्दर-सुन्दर फूल हैं उन सबको मिला दो तो उनसे भी अधिक सुन्दर है राम जी।”
सुनकर बच्चा हताश हो गया-“हम तो सब फूल भी नही देखा बाबा, हम कैसे जानें। (फिर एकाएक आखे सुख से चमक उठीं) राजा जी की फुलवारी में सब सुन्दर-सुन्दर फूल होगें। है न बाबा?”
“हमको नहीं मालूम बचवा। हम कभी राजा जी की फुलवारी में नही गए हैं। परन्तु जब इतनी बड़ी फुलवारी है तो वहाँ बहुत-से फूल भी होगें। अच्छा, अब तुम हनुमान जी के चबूतरे पर जाकर बेंठो और राम जी राम जी जपो। हम भी  अब जप करेगें”।
क्रमशः

Thursday, 30 March 2023

tc 22

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
22-

रामबोला फिर बोला- “हमे क्या देखते हो, आओ।हमारी बात की लाज रख लो भैया, नही तो ललकऊ, हम सच्ची कहते हैं कि हम आज ही तुम सबको छोड़कर यहाँ से चले जाएगें। आओ...  आओ,आओ न।” सरदार इस बार सचमुच चल पड़ा और उसके पीछे पीछे चालीस-पचास बानरों की टोली भी दौड़ने लगी। आगे- आगे रामबोला और ललकऊ, उनके पीछे तथा आसपास बन्दरों की टोली दौड़ती चली। हनुमान जी के चबूतरे पर घमासान मचा हुआ था। रामबोला के हुकाँरते ही बन्दर चबूतरे पर चढ़े हुये भिखारियों पर टूट पड़े। थोड़ी देर में ऐसी ले दे मची कि भिखारियों की टोली वहाँ से संत्रस्त होकर भागी। 
रामबोला बड़ा प्रसन्‍न हुआ। चबूतरे पर चढ़कर हनुमान स्वामी से बोला- “देख लियौ हनुमान स्वामी, अरे हमारे ललकऊ सरदार बड़े वीर हैं और तुम देख लेना, ललकऊ अब किसीको यहाँ पैर तक न रखने देगा। (मुड़कर अपनी जुयें बिनवाते हुए ललकऊ को देखकर) ललकऊ सुना, हनुमान स्वामी क्या कह रहे हैं।अब यहाँ कोई आने न पावे।परसों राजा के घर चलेगें, मजे से माल उड़ाना। हम? नहीं हम तो न जायगे भाई। हमें न्योता कहाँ मिला है फिर बिना बुलाए हम किसीके घर क्‍यों जायें।राजा होगें तो अपने घर के होगें। हमारे राजा रामचन्द्र जी से बड़े तो हैं नही।हमारे हनुमान स्वामी आज ही जाके राम जी से कहेंगें कि राम जी, राम जी, तुम्हारा रामबोलवा कल से भूखा है। उसे ऐसी कसके भूख लगी है कि तुम उसे खाने को न दोगे तो वह रो पड़ेगा।”

रामबोला ने देखा नहीं था, उसके पीछे एक वयोवृद्ध सौम्य साधु आकर खड़े हो गए थे। वे हनुमान जी तथा ललकऊ सरदार से होनेवाली उसकी बातें सुन-सुनकर आनंदमग्न हो रहे थे। रामबोला की बात समाप्त होने पर वे सहसा बोले -“बेटा, राम जी ने तुम्हारे लिए यह पेड़े भेजे हैं। लो खाओ।” इतने ही मे कुछ दूर पर एक पेड़ के नीचे जुएँ बिनवाते हुए ललकेऊ ने साधु को देखा। वह आन्नद से चिचियाते हुए छलाँग मारकर उनके पास जा पहुँचा और उनकी टाँग पकडकर खूब उमंग से चिचियाने लगा। सरदार को यह करते देखकर कई बन्दर साधु के आसपास पहुच गए। साधु अपनी दाढ़ी मूँछों में मुस्कान बिखेरकर बोले-“हाँ हाँ , जान गए, तुम सबको आनन्द हुआ है। ठहरो ठहरो, तुम सबको भी मिलेगा।पहले इस बाल संत को देने दो। तुम सब तो हनुमान जी के बन्दर हो, पर यह बालक तो साक्षात्‌ राम जी का बन्दर है।” कहते हुए अपने झोले से अगौछा निकालकर उसके एक छोर पर बंधे लगभग पाव डेढ़ पाव पेड़ों में से बाबा ने कुछ तो बन्दरों के आगे डाल दिए और एक मुट्ठी रामबोला के हाथों में देकर बोले-"लो खाओ, खत्म करो तो और दें।” रामबोला कृतज्ञ दृष्टि से साधु को देखने लगा। भूख बड़ी जोर से लगी
थी, उसने जल्दी जल्दी तीन चार पेड़े मुँह में भर लिए, फिर एकाएक उसे ध्यान आया, उसने साधु के पैर नही छुए। हड़बड़ा कर उठा और साधु के सामने धरती पर अपना मस्तक टेककर उसने भरे मुँह से कहा-“बाबा-बाबा, पाव लागी।” पेड़ों भरे मुँह से शब्दों का अशुद्ध उच्चारण सुनकर तथा बच्चे का भाव देखकर साधु हँस पड़े। पेड़ों से पेट भरा, फिर नदी से पानी पिया और जब लौटकर आया तो उसने देखा कि चबूतरा खाली था और मन्दिर के पासवाली बन्द कुटी के द्वार खुले हुए थे। बच्चे को लगा कि हो न हो कृपालु साधु इसी कुटी के अन्दर हैं । वह भीतर चला गया। साधु अपनी कुटी बुहार रहें थे। रामबोला आगे बढ़कर उनके हाथ की झाड़ू पकड़कर बोला-“आप बैठों बाबा जी, हम सब साफ किए डालते हैं।”
“रहने दे, रहने दे, तुझसे नही होगा।अभी नन्‍हा सा ही तो है।”
“अरे, हम रोज हनुमान जी स्वामी का चबूतरा बुहारते हैं। आप किसी से पूछ लें। आप खुद ही देख लेना कि हम कैसा बुहारते हैं।”
बच्चे के आग्रह को देखकर साधु ने उसे झाड़ू दे दी। रामबोला बड़े उत्साह से अपने काम मे जुट गया। बच्चा झाड़ू लगाते हुए एकाएक बोला-“हम रोज-रोज अपने मन में सोचे कि कुटिया बन्द क्‍यों पड़ी है। यहाँ कौन रहता है। एकाघ जने से पूछा तो उन्होने कहा कि नरहरि बाबा रहते हैं। तो क्या आप ही नरहरि बाबा हैं?” 
“हाँ, तू कहाँ से आया है रे ? ”
“हम बहुत दूर रहते रहे बाबा,फिर हमारी पार्वती अम्मा मर गई और उसके बाद पुत्तन महाराज ने हमें बहुत मारा-पीटा। हमारी झोपड़ी गिरा दी और खूब जोर-जोर से आँखे निकालकर कहा कि अब जो तू कल से हमारे गाँव में दिखाई पड़ा तो हम ऐसे ही तेरी हड्डी-पसली भी तोड़ डालेंगे।”
बच्चे ने पुत्तन महराज के क्रोध और अकड़ का ऐसे अभिनय किया कि नरहरि  बाबा दुखी होने पर भी हँस पड़े कहा-“तुमसे कुछ अपराध अवश्य हुआ होगा, नहीं तो वे तुम्हें क्यों मारते।”
“अपराध हमारा नही, उनके अपने लड़के का रहा। ससुर अपना ही खेले और दूसरे को दांव न देवे। तो हमने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि दांव देव, तो वह हमको मारे-पीट लगा। तब हमें भी गुस्सा आ गया। हमसे वह बड़ा रहा बाबा, लेकिन हमने उसको उठा कर पटक दिया और खूब मारा। जो अन्याय करे उसे तो दण्ड देना चाहिए, है न बाबा? राम जी ने रावण को इसीलिए तो मारा था, है न बाबा?“
नरहरि बाबा हँस पड़े,कहा-“अरे, तू बड़ा विद्वान है रे, तू तो खास राम जी का बन्दर है।”
कोने में सिमटा हुआ कूड़ा अपनी नन्‍हीं हथेलियों में समेटते हुए थम कर बच्चे ने साधु की ओर देखा। चार आँखें दो दिलों के अन्दर बैठ गई। रामबोला खिलखिला कर हँस पड़ा। पार्वती अम्मा के मरने के बाद रामबोला को ऐसी मुक्त हँसी कभी नहीं आई थी।

बावा नरहरिदास का उस क्षेत्र में बड़ा मान था। वे कथा बाँचा करते थे, और एकतारे पर ऐसे तन्मय होकर भजन गाते थे कि सुननेवाले आत्मविभोर हो उठते थे। उनकी जाँति-पाँति का किसीको पता न था। उनके भक्त उन्हें ब्राह्मण कहते थे और विरोधी उन्हें हनुमानवंशी डोम बतलाया करते थे। बाबा नरहरि दासजी ने पूछने पर भी कभी अपनी जाति नहीं बतलाई।
क्रमशः

Wednesday, 29 March 2023

tc 21

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
21-

अरे तुम्हरी ये खीसें न तोड़ डाली तो हमार नाम रामबोला नहीं। खौखियात हैं ससुर? हम तुमसे जोर से खौखिया सकते हैं।” बन्दरों की तरह ही खो-खो करता हुआ बालक रामबोला दोनों हाथों में संटिया लेकर उनपर झपटता है। बन्दर जब दूर जाते हैं तो एक हाथ की संटी रखकर अपने अगौछे में भुने हुए गेहूँ आदि रखता जाता है, बन्दरों को भी देखता जाता है, फिर हनुमान जी की दीवाल का सहारा लेकर बैठ जाता है और ठाठ से चने चबाता है। 
एक दिन रामबोला मुँह अँधेरे ही चबूतरे पर झाड़ू लगाता हुआ बड़बड़ा रहा था-“हे हनुमान स्वामी, देखो अब तुम्हारा चबूतरा कितना साफ सुथरा रहता है। हम बड़े मन से सेवा करते हैं।बजरंगबली अब तो तुम राम जी के दरबार में हमारी अरदास पहुँचा दो। हम भी और दूसरे लड़को की तरह अ-आ-इ-ई पढ़ें और हमको दुइ रोटी का सहारा होइ जाय। ये चने गुड़धानी चाब चाब के कब तक पेट भरें ? रोटी खाए बहुत दिन हो गए। देखो कल तुम्हारे होठकटवा बन्दर ने हमको कैसा पंजा मारा है।खून कलभलाय उठा। हमारी बाँह ऐसी पिराय रही है कि तुमसे क्या कहें। तब भी हम तुम्हारी सेवा कर रहे हैं। अब तो तुम हमारी जरूर सुन लो नाथ। पार्वती अम्मा कहतीं रहीं कि दीन-दुर्बलों की गुहार तुम्हीं सुनते हो। सुन लो बजरंगबली हनुमान स्वामी। हम तुम्हारी हा-हा खाते है, चिरोरी करते हैं। सुन लो नाथ, अरे सुन लो।”
रामबोला अव कहीं भिक्षा माँगने के लिए नही जाता। वह सबेरे उठकर हनुमान जी के स्थान को बुहारता है और नहा-धोकर चबूतरे पर बैठे-बैठे भजन गाया करता है। बच्चे के सरल कंठ स्वर और हनुमान जी के प्रति उसकी सेवा निष्ठा ने दर्शनार्थियों के मन में उसके प्रति थोड़ा बहुत प्रेमभाव जगा दिया है। कुछ भगत-भगतिनियाँ बन्दरों के साथ-साथ रामबोला को भी चने भौर गुड़धानी दे दिया करतें हैं। बन्दरों से रामबोला की दोस्ती भी हो गई है। ललकवा सरदार अब कभी कभी रामबोला के पास चबूतरे पर आकर बैठ भी जाता है। बन्दरों के बच्चे स्वच्छन्दता पूर्वक उसके साथ खेलने लगे हैं। इससे रामबोला का मन अब आठों पहर सुखी रहता है।जब कभी एकाध फल मिल जाता है तो रामबोला उसी में से आधा भाग सदा ललकऊ सरदार को देता है। यदि कोई उसके माता-पिता के सम्बन्ध में पूछता हे तो उत्तर में वह उसे सीता और राम के नाम बतलाता है। बच्चे की इस हाजिर जबाबी से लोग प्रसन्न होते हैं।यदि कोइ यह पूछता है कि दाल भात रोटी खाने को तुम्हारा जी नहीं करता, तो उसे चट से यह उत्तर मिलता है कि बजरंगबली हमें जो कुछ खाने को देगें वही तो खाऊँगा।

एक दिन रानी साहब ने ब्रह्म भोज दिया। उसकी धूम कई दिनों पहले से ही मच गई थी। गोण्डा और अयोध्या के हलवाइयों की एक पूरी सेना बुलाई गई है। बड़ा शोर है कि राजमहलों में मिठाइयाँ पर मिठाइयाँ बन रहीं हैं। आस-पास के गाँव के हर ब्राह्मण परिवार को न्योता मिला है। भिखमंगों में उत्साह की लहर दौड़ गई है। चींटियों की तरह से रेंगते हुए जाने कहाँ -कहाँ से झुण्ड के झुण्ड भिखारी अभी से ही आने लगे हैं। बहुतों ने हनुमान जी के चबूतरे के आस- पास भी डेरा डाल दिया है। उनके कारण बन्दरों और रामबोला को अपना दैनिक भोजन भी नहीं मिल पाता। एक मुड़चढ़ा भिखारी कल से बराबर इसी घात में रहता है कि कोई भगत हनुमान जी की खोंची डालें और वह उसे हड़प जाय। रामबोला ने जब आपत्ति की तो मार खाई। कल सारा दिन रामबोला और बन्दर भूख ही रहे। दूसरे दिन से ही बन्दर तो वहाँ से हट गए पर सबरे जब दर्शनार्थी आए तो रामबोला ने गुहार लगाई- "देखो, ये लोग हमें मारते हैं। कल से न हमने ही कुछ खाया है और न हमारे बन्दरों को कुछ मिला है। यह सब लोग मिलके हनुमान जी का स्थान भ्रष्ट करतें हैं। उनको आप सब यहाँ से हटा दें।”
अपनी शिकायत सुनकर भिखारी और भिखारिनें रामबोला को चें चें करके कोसने लगे।हनुमान जी के सारे चबूतरे पर गंदगी फैलाने लगे।भिखारी दल किसी भी दर्शंनाथियों के बस का नहीं था और हनुमान जी के नाम पर निकाले जाने वाले चने गुड़ को भी चबूतरे पर से उठा कर खा जाता था। हनुमान जी की खोंची डाली गई और मिखमंगों ने उसे लूट लिया। यह देखकर रामबोला को बड़ा ताव आ गया। उसने बजरंगबली से शिकायत की, “हनुमान स्वामी तुम साखी हो, हम कल से इनके कारन बड़े दुखियाय रहे हैं। तुम्हारे बन्दरों को भी खाने को नहीं मिलता और ऊपर से ये हमको मारत हैं। अच्छा अब हम भी बदला लेंगे।” लेकिन बदला लेने का कोई उपाय न सूझा। सारे दिन भिखारी- भिखारिनों से लड़त झगड़त और खाखियाते ही बीत गया। नींद भी न आई।सबेरे चबूतरे पर भाड़ लगाने लगा तो भिखारी बच्चों ने उसे चिढ़ाने के लिए गंदगी का अभियान चलाया। रामबोला तप गया-“बदला लेगें, जरूर लेगें।कैसे लेंगे, बताएँ? अच्छा तो ठहरो, हम तुम्हे दिखाते हैं। अब या तो ये दुष्ट राक्षस लोग ही यहाँ रहेगें या फिर हम और हमारे बंदर।”
बड़े ताव से रामबोला चबूतरे से उतरकर अनाज मण्डी की ओर चल पड़ा। परसों से बन्दर वहीं डेरा डाले पड़े हैं। मन्डीवाले अनाज की फटकन और थोड़े बहुत चने भी उनके आगे डाल देतें हैं।रामबोला बन्दरों के ललकऊ सरदार को खोजता हुआ वहाँ पहुँचा। पीपल के पेड़ के नीचे बानर परिवार को बैठा देखकर वह बड़े ताव से ललकऊ से बोला- “वाह, अच्छे साथी हो, हम वहाँ मार खायें और तुम हियाँ बैठे-बैठे माल खाइवो .... वाह वाह वाह।” ललकऊ सरदार ऐसे चुप होकर बैठ गया कि मानों उसे रामबोला की शिकायत सुनकर लाज लगी हो। वह अपनी कनपटी खुजलाने लगा, फिर जल्दी-जल्दी दोनों हाथों से आसपास के पड़े दाने बीन-बीनकर रामबोला के आगे रखने लगा। वह बोला- “ये नही, तुम सब जने हमारे साथ चलो और राक्षसों को वहाँ से भगाओ। देखो ललकऊ हम हनुमान स्वामी से बद कर आए हैं। हमारी नाक नीची न होय,आओ चलो।” भारी भरकम शरीर वाला ललकऊ रामबोला का मुँह देखने लगा।
क्रमशः

Tuesday, 28 March 2023

tc 20

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
20-

“आज हम साले की हड़डी-पसली तोड़कर रख देंगे। फूँकों इसकी झोंपड़ी।निकल साले बाहर।”
रामबोला घबराकर बाहर निकल आया। उसने स्वर से पहचान लिया था कि दूसरा आदमी उस लड़के का पिता पुत्तन महाराज ही है। झोंपड़ी से बाहर निकलते ही लड़के के पिता ने उसे ऐसा करारा झापड़ मारा कि आखों के आगे तारे चमकने लगे। रामबोला धरती पर गिर पड़ा। उस पर लातें पड़ने लगीं। बेचारा बच्चा 'राम रे’ करके चीख उठा।
“साले, भिखारी की औलाद, भले घर के लड़कों पर हाथ उठाता है।अरे हम तुम्हारा हाथ तोड़ डालेंगे”
रामबोला की बाहँ पकडकर उस व्यक्ति ने उसे फिर उठाया और उसकी बाँह मरोड़ते हुए धम्म से पटक दिया। बच्चे में रोने की शक्ति भी बाकी न रही। उस व्यक्ति ने बच्चे की उस टूटी शरणस्थली झोंपड़ी को भी तहस-नहस कर दिया और कहा- “यह साला हमें गाँव में अब जो कहीं दिखाई पड़ा तो हम इसकी हड्डी-पसली तोड़ के फेंक देंगे।”
गिरे हुए छप्पर ने चूल्हे की आग पकड़ ली। सूखी फूँस मिनटों में लपटें उठाने लगी।उस आग से अपनी झोंपड़ियाँ बचाने के लिए आसपास के भिखारी भिखारिन निकल आए।जलते छप्पर के दूसरे सिरे का बाँस निकालकर एक भिखारिन आग को अपनी झोपड़ी की ओर से बचाने के लिए जलते हुए छप्पर को आगे ढकेलने लगी। फूँस ने पूरे छप्पर के फूँस -पत्तों में भी लपटें उठा दीं। तनिक सी झोंपड़ी कुछ पलों में ही जल भुनकर अपना अस्तित्व खो बैठी। झोंपड़ी के अन्दर गठरी-मोठरी जो कुछ था, जलकर स्वाहा हो गया। रामबोला धरती से चिपका मुर्दे की तरह पड़ा रहा। पुत्तन महाराज चलते समय उसे एक करारी ठोकर और लगा गए।बस्ती की अन्य भिखारिनें और भिखारी जो तमाशा देखने के लिए और अपने घरों को बचाने के लिए आ गए थे, चे-चें-मे- में करने लगे। दो एक स्त्रियों ने सहानुभूति भी प्रकट की। अधिकतर लोग रामबोला  को ही दोष दे रहे थे कि भिखारी के बच्चों की भले घर के बच्चों के साथ खेलने की आखिर जरूरत ही क्या थी। एक लड़के ने कहा भी कि हम अपने मन से उन लोगों के साथ नहीं खेलते पर जब वह लोग हमें खेलने के लिए कहते हैं तो हम क्या करें? लेकिन जबरे का न्याय दीनों और दुर्बलों का पक्ष पाती नहीं होता।
मार से पीड़ित रामबोला धरती से चिपका पड़ा रहा। उसमें उठनें की ताब भी न थी। भैसियाँ ने कहा- “अब इसको बस्ती में नहीं रहने देंगे, इसके कारण किसी दिन हम पंचों पर भी विपदा आ सकती है।
एक भिखारिन ने दया दिखाते हुये कहा- “तो ये कहाँ जाएगा बिचारा? अभी नन्हा सा तो है।”
“भिखमंगो के बच्चों की कौन चिंता, कहीं भी जाके मर जाएगा।"
भीड़ अपनें-अपनें घरों में चली गई। बच्चा वहीं पड़ा रहा।

जब सन्नाटा हो गया तो रामबोला आकाश की ओर देखकर बोला- “बजरंग स्वामी, राम जी क्‍या अपने दरबार में कुण्डी चढ़ा के बैठे हैं? हमारी तरफ से बोलने वाला क्या कोई भी नही है? तुम भी नहीं बोलोगे? अब हम कहाँ रहें बजरंगी?”
बदली से चाँद निकल आया। दूर पर गाँव के पेड़ राक्षसों की तरह से दिखाई दे रहे हैं। अपनी झोंपड़ी राख में सनी बिखरी पड़ी है। कुत्ते कहीं पास ही में जूझते हुए शोर मचा रहे हैं। बच्चा उठता है। अपनी जली पड़ी हुई झोंपड़ी को कुरेद कर सामान निकालना चाहता है। पर उसमें बचा ही क्या है।हताश बच्चे के मुँह से गर्म गर्म साँस निकलती है, जी चाहता है कि उससे ऐसी गति आ जाए कि वह भी उसी तरह इन गाँव वालों के घरों में आग लगा दे जैसे कि बजरंगबली ने लंका फूँकी थीं। वह नन्हा-सा है, नहीं फूँक सकता तो हनुमान स्वामी ही आ के उसका बदला तो लें।आओ, आओ इन दुष्टों से हमारा बदला लो.... आओ भगवान .... ।पार्वती अम्मा ने हनुमान के द्वारा लंका फूँके जाने की कहानी कभी बच्चे को सुनाई थी, लेकिन इस समय बार बार, गिड़गिड़ा -गिड़गिड़ा कर गुहारने के बावजूद हनुमान जी ने इस गाँव की लंका न फूँकी। वह उत्तर की ओर गाँव से लपटे उठने की बाट देखता ही रह गया पर कुछ न हुआ। हताश होकर रामबोला उठा और गाँव की सीमा की ओर चल पड़ा।

गोस्वामी तुलसीदास जी के चेहरे पर भूतकाल मानों वर्तमान बनकर अपनी छाया छोड़ रहा था। वे कह रहे थे-“पार्वती अम्मा सच ही कहती थी कि जिससे राम जी तपस्या कराते हैं उसे ही दुरूह दुर्भाग्य के अथाह समुद्र में भयंकर क्रूर तिमि-तिमिंलगों के बीच में छोड देते हैं। उनसे अपनी रक्षा करना ही अभागे की तपस्या कहलाती है। अब सोचता हूँ कि राम जी ने मुझ पर अत्यन्त कृपा करके ही यह सारे दु:ख डाले थे। इन्हीं दु:खों की रस्सी का फंदा डालकर राम नाम की ऊँची अटारी पर आज तक चढ़ता चला आया हूँ। दु:ख का भी एक अपना सुख होता है।”
वेनीमाधव जी बोले- “इसी घटना के बाद आप सूकर खेत पहुँचे थे।” 
“हाँ, किन्तु इधर-उधर भटकते, भीख माँगते, बिलखाते-बिलखाते हुए ही उस पावन भूमि तक पहुँच पाया था।घाघरा और सरयू के पावन स्थल पर महावीर जी का जो मन्दिर है न, मैं अन्त में वहीं का बन्दर वन गया। भक्त लोग बन्दरों के आगे चने और गुड़धानी फेंका करते थे। जाति-कुजाति, सजाति के घरों से माँगें हुए टुकड़े खाते और अपमान सहते मैं उस जीवन से इतना चिढ़ उठा था कि अन्त में किसी से भी भिक्षा न माँगने का निश्चय किया।”
रामबोला हनुमान जी के आगे नमित होकर बार बार कह रहा है- “अब हम तुम्हीं से माँगेंगे हनुमान स्वामी, अब किसी के पास नही जाएँगें। तुम हमारा पेट भर दिया करो। हम तुम्हारा स्थान खूब साफ कर दिया करेंगे।”
बच्चा वहीं रहने लगता हैँ। रोज सबेरे उठकर हनुमान जी का चबूतरा बुहारता है फिर नहाने जाता है। लौटकर चबूतरे पर ही बैठ जाता है और भजन गाता है। बन्दरों के लिए फेंके जानवाले चनों को बीनता है।उन दानों के लिए उसे बन्दरों से संघर्ष भी करना पड़ता है। दोनों हाथों में संटियाँ लेकर वह बन्दरों से जूझता है। “आय जावो जरा। आओ तो सही।
क्रमशः

Monday, 27 March 2023

tc 19

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
19-

“तो क्या सारे पाप हमनें ही किए थे अम्मा और ये सुखचेनसिह ठाकुर, पुत्तन महाराज, जो हम गरीबों को मारते-पीटते है, वो क्या पाप नही कर रहें हैं अम्मा?”
बच्चे का तेहा देखकर अम्मा बोली-“ब्राम्हन के पूत हो ना।अच्छा, एक कहानी सुनोगे रामबोला?”
“इसी बात पर?”
“हाँ “
“सुनाओ”
“एक आदमी रहा और एक कुत्ता रहा,तो कुत्ता किनारे पर सोता रहा। आदमी अपने रास्ते जा रहा था। तो ठलुहाई में उस आदमी ने पत्थर उठाके कुत्ते को मार दिया | कुत्ता सीधा राम जी के पास गया और कहा कि राम जी हमारा न्याय करो। राम जी ने पूछा- हम तुम्हारा क्या न्याय करें? कुत्ता बोला कि राम जी इस आदमी को खूब दण्डो। कैसे दण्डें कुतवा- राम जी ने पूछा। तो कुत्ता बोला कि इसे किसी बड़े मठ का महंत बनाय देव राम जी। राम जी बोले, अरे, तू तो इसे बड़ा सुख देने को कह रहा है रे।कुत्ता बोला, नाहीं राम जी, पिछले जनम में हम भी महंत थे तो खूब खा-खा के मोटाए और दीन-दु्बेलों को दबाने लगे । हमने सबके ऊपर अत्याचार किया, उसी का दण्ड भोग रहा हूँ । तो राम जी बोले कि अरे कुतवा, इसे दण्ड न कह, यह तेरी तपस्या है। इससे तुम्हें ज्ञान मिलेगा।”
तुलसी बाबा बतला रहे थे- “मेरी आदि गुरु परम तपस्विनी पार्वती अम्मा ही थीं, मानों शंकर भगवान ने मुझे जिलाए रखने के लिए ही जगदम्बा पार्वती को भिखारिन बनाकर भेज दिया था। दरिद्रता में इतना वैभव, दुर्बलता में इतनी शक्ति और कुरूपता में इतनी सुन्दरता मैंने पार्वती अम्मा के अतिरिक्त औरों में प्राय: कम ही देखी।”
“तो क्या यही पार्वती जी तुम्हें पढ़ाइन-लिखाइन भैया?” राजा भगत ने पूछा।
“पार्वती अम्मा तो बेचारी मुझे इतना ही पढ़ा गई कि जब-जब पीर पड़े तब-तब बजरंगबली को टेरो। कहो कि हे हनुमान स्वामी, तुम हमें राम जी के दरबार में पहुँचा दो जिससे कि हम अपनी भली-बुरी उनसे निवेदन कर लें। वर्षा से भीगनें के बाद मेरी पालनहार बहुत खींच खाँच कर भी कदाचित्‌ पाँच- छ: महीने से अधिक नही जी पाई थी। एक दिन जब भिक्षाटन से लौटकर आया तो बच्चा रामबोला भीख भरी झोली लिए अपनी कुटिया में प्रवेश करता है तो देखता है कि पार्वती अम्मा ठण्डी पड़ी है। उनके मुख पर मक्खियाँ आ-जा रही हैं और वह बुलाए से भी नही बोलती है। बालक रामबोला घबराया हुआ पड़ोस की झोंपड़ी में जाता है, वहाँ जाकर आवाज देता है- “फेंकुआ की अजिया, मेरी अम्मा को क्या हो गया? बोलती ही नही है।आँख भी नहीं खोल रही है।”
फेंकुआ की आजी रामबोला के साथ उसकी झोंपड़ी में आती है। पार्वती अम्मा की देह टटोलती है फिर मुँदी आँखें खोलकर निहारती है और कहती है- "गई तोरी पार्वती अम्मा, अब का धरा है।”
“कहाँ”
“राम जी के घर और कहाँ।जाओ बस्ती से सबको बुला लाओ।”

बस्ती के लोग आते हैं, फिर कहीं से बाँसों की भीख माँगकर लाई जाती है। लकडि़यों का दान माँगा जाता है। बुढ़िया फुँकती है और बालक रामबोला पत्थर होकर सब कुछ देखता है। बड़े लोग जो कहते है वही करता है। अपनी पालनहारी को ठिकाने लगाकर अपनी कुटी में आकर अकेला बैठ जाता है-“अब हमारा क्‍या होगा बजंरगी स्वामी? राम जी के दरबार में हमारी गोहार लगा दो। हे राम जी, अम्मा बिना अब हम क्‍या करें?” 
बच्चा फूट-फूटकर रोने लगता है, धरती से चिपट-चिपटकर रोता है मानों धरती ही उसकी अब पार्वती अम्मा है। फिर वही रोज का भीख माँगने का क्रम-राम जपाकर, राम जपाकर, राम जपाकर भाई रे.....
“ए रामबोला, हियाँ आओ।”
“नहीं हमें काम है।”
“अब क्या काम है।तेरी झोली में इतनी तो भीख भरी है। आओ, हमारे साथ खेलो। हम तुम्हें अम्मा से कहके दो रोटी ला देंगे।”
“हम अब तुम्हारें यहाँ से भिक्षा नहीं लेते। तुम्हारे बप्पा ने हमको डाँटा था।”
“अरे हमने तो नहीं डाँटा था। आओ खेले।”
“नहीं, तुम्हारे बप्पा ने मना किया है, मारेंगे।”
“बप्पा है नहीं। दूर गए हैं। आओ खेलें, आओ, आओ न।”
रामबोला झोली कन्धे से उतारकर पीपल के चबूतरे पर रखता है और लड़के से डण्डा लेने के लिए हाथ बढ़ाता है। वह गढ्ढे पर पुल्‍ली रखकर रामबोला से कहता है-“पहला दांव मेरा होगा।”
रामबोला कहता है-“नहीं भाई, तुम अपना दांव लेकर भाग जाते हो, मैं नहीं खेलूँगा, जाता हूँ।”
“अरे नहीं, हम तुम्हें दांव जरूर देंगे।”
“न तो खाओ सौंह।”
“धरी सौंह खाता हूँ।” 
“ऐसी सौंह तुम क्या मानोंगे, राम जी की सौंह खाओ तब हम मानें।”
“राम जी की सौंह, हम तुम्हे जरूर दांव देंगे।”
खेल होने लगा। एक बार हारकर भी उस लड़के ने अपनी हार न मानी।रामबोला मान गया, फिर खिलाने लगा। लड़का दुबारा हारा। उसने फिर हार न मानी और अपना गुल्ली-डण्डा उठाकर जानें लगा। रामबोला को ताव आ गया। उसकी शिकायत थी कि लड़के ने राम जी की शपथ खाकर भी धोखा दिया, यह क्‍या भले घर के लोगों का काम है।रामबोला ने छीना-झपटी में गुल्ली और डण्डा दोनों ही उससे छीन लिये। लड़का क्रोध में बावला होकर उसे मारने झपटा। सामने से जाते हुए दो हलवाहों ने मना भी किया किन्तु वह और भी उलझ पड़ा। रामबोला ने उसकी बाँह पकड़ ली और मरोड़ने लगा। लड़के ने अपने बचाव के लिए रामबोला की बाँहों पर अपने दाँत चुभो दिए। रामबोला पीड़ा से कराह उठा और साथ ही उसे ऐसा क्रोध आया कि बायें हाथ से काटनेवाले लड़के के जबड़े पर ही मुक्का मारा।हाथ मुक्त हो गया।अपनी बाँह से बहते हुए लहू को देखकर रामबोला की आँखो में खून उतर आया। लड़के को पटककर उसने उसकी अच्छी तरह से गत बनानी आरम्भ की। पस्त होकर अपने बचाव के लिए जब वह जोर जोर से डकराने लगा तभी उसे छोड़ा  और चबूतरे से अपनी झोली उठाकर चल दिया।

उस दिन छुटपुटी शाम के समय रामबोला अपनी झोपड़ी में चूल्हे पर तवा चढ़ाकर कच्ची पक्की रोटियाँ सेंक रहा था। तभी उसे झोपड़ी के बाहर दो-तीन आवाजे सुनाई पड़ी। उसी बस्ती में रहनेवाला भिखारी युवक भैसियाँ किसी से कह रहा था- “अरे, यह रामबोला बड़ा चोर और बेइमान है। गाँव भर के लड़कों से झगड़ा करता है।”
क्रमशः

Sunday, 26 March 2023

tc 18

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
18-

इतना हमको याद है कि रामबोला नाम धारण करके कंधे पर छोटी- सी गाँठ बँधी झोली लटकाए हाथ में एक लाठी लिए हुए हम ऐसे ठाठ के साथ भीख माँगने के लिए पार्वती अम्मा के साथ जाया करते थे कि मानों त्रैलोक्य विजय के लिए जा रहे हों।
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स्मृतिलोक की झाँकी लेने के लिए आँखें फिर मुँद गईं।एक गाँव के एक घर के द्वार पर रामबोला और पार्वती अम्मा सुर में सुर मिलाकर कह रहे है “राम के नाम पै कुछ मिल जाय-ए माई......”
शिशु रामबोला अपने तोतले किन्तु मीठे स्वर में भजन गाता है-
“राम कहत चले राम
कहत चले राम, कहत चले भाई रे।”
 घर के भीतर से एक छोटी आयु की कुलवधू कटोरी भर आटा लेकर आती है। रामबोला गाना बन्द करके उसके सामने अपनी झोली फैला देता है। युवती मुस्कराकर कहती है- “गाना काहे बंद किया रामबोला? ” बच्चा झोली फैलाए चुपचाप खड़ा रहा, पार्वती अम्मा ने अपना हाथ रामबोला के सिर पर प्यार से फेरते हुए युवती से कहा- “अभी इसे याद नही बहुरिया। अभी नन्‍हा-सा ही तो है।”
“पर बड़ा मीठा गाता है। तुम्हारा पोता है न, पार्वती।”
"हाँ जब पाला है तो जो चाहे समझों।बाकी ब्राह्मन पण्डित का पूत है। इसके जनमते ही इसकी महतारी मर गई। बाप बड़े जोतसी रहे तो पत्रा विचार के बोले कि इसे घर से निकालो, यहाँ रहेगा तो सबका बुरा करेगा। हमारी पतोहू उनके हियाँ टहल करती रही तो वह हमें दे गई। हम कहा कि हमें मरे जिए की चिन्ता नहीं, अभागी वैसे ही है, पाल देगें। बुढ़ापा काटने का एक बहाना मिल गया।”
अतीत में लीन होकर बाबा कह रहे थे- “पार्वती अम्मा हमें भजन याद कराती थी। महात्मा सूरदास, कबीरदास और देवी मीराबाई आदि संतों के भजन उस समय बड़े प्रचलित थे। मुझे सब याद हो गए। यद्यपि भिक्षा देनेवालों के आग्रह पर गाना मुझें प्राय: अच्छा नही लगता था। मेरे ब्राह्मण संतान होने और मेरे दुर्भाग्य की बातें सुना-सुनाकर वे मेरे प्रति सहानुभूति जगाया करती थी। यह बात आरम्भ ही से मेरे स्वाभिमान को धक्के मारती थी। बड़ी कठिन तपस्या थी यह। जब मैं अकेला जाने लगा तो यह अनुभव और भी अधिक हुआ।”

शिशु भिक्षुक गा रहा है-
“हम भक्तन के भक्त हमारे 
सुन अर्जुन परतिग्या मेरी यह ब्रत टरत न ठारे।
टरत न टारे....टरत न ठारे रे रे।”

सिर में जोर से खुजली मची। “टारे' शब्द की रे-रे ध्वनि भी सिर के साथ ही हिलने लगी। “भकते काज सा.......” नाक पर मक्खी बैठ गई। उसे उड़ाने में गला बेसुरा हो गया और नाक भी खुजला उठी। कभी एक टाँग उठाकर उसे सुस्ताने का अवसर दिया और कभी दूसरी को। चेहरे पर ऊब भरी क्षोभ की मचलती परछाइयों में, 'हे माई, दया हुई जाय। बड़ी देर तें ठाढे हैं।'- रूलाई भी लग जाती। बीच-बीच से जुमुहाइयाँ भी आ जातीं।धरती आकाश पर सूनी दृष्टि घूमने लगती। फिर किसी मक्खी के उत्पात से “हम भक्तन के भक्‍त हमारे' भजन की पुनरावृत्ति हो जाती, फिर 'हे माई दया हुई जाय’ - इस उबा देनेवाली दीर्घकालीन तपस्या के बाद एक कर्कशा प्रौढ़ा कटोरी में चुट्की भर आटा लेकर भीतर से आती है। उसका देनेवाला हाथ वित्ता-भर ही आगे बढ़ता है मगर जबान गज भर की हो जाती है- “मुँह जला हमारी ही देहरी में टे- टें करत है जब देखौ तो........”
रामबोला का चेहरा ताप से भर उठा। झोली आगे बढ़ाने की इच्छा तो न हुई पर बढ़ानी ही पड़ी। यह रोज का क्रम है। इससे छुटकारा नही मिल सकता।

ब्राह्मणपांडें के नुक्कड़ पर पीपल के पेड़ के पास दो-तीन लड़कों के साथ रामबोला गुल्ली-डण्डा खेल रहा था। पीपल के चबूतरे पर उसकी झोली और लाठी रखी थी। रामबोला डण्डे से गुल्ली फेंक रहा था। तभी खेतों की ओर से विद्वान से अधिक पहलवान लगनेवाले पुत्तन महाराज पघारे। रामबोला को देखते ही वे अपने लड़कों पर बमके-“फिर ईके साथ खेले लगे, ऐ ससुर नीच भिखारी, जिसकी देह से बास आती है, उसके साथ ब्राह्मण के बेटे खेलतें हैं, जो है सो हजार बार मना किया ससुरों को।”
पुत्तन महाराज के आते ही रामबोला खेल छोड़कर चबूतरे से अपनी झोली और संटी उठाने लगा था, लड़के घर के भीतर भाग गए थे। पुत्तन महाराज की बात रामबोला को अच्छी न लगी, कंधे पर झोली टाँगते हुए उसने कहा--“हम रोज नहाते है महाराज। हम भी ब्राह्मण के बेटा .........”
“हाँ हाँ साले, तू तो बाजपेई है बाजपेई। हमसे जबान लड़ाता है, जो है सो, ऐ”-पु्त्तन महाराज रामबोला के पास आकर खड़े हुए उसे अपनी लाल लाल आँखें दिखला रहे थे। बच्चा उस क्रोध मुद्रा को देखकर सहम तो अवश्य ही गया पर मन के सत्य को दबा न सका, उसने फिर कहा- “हम झूठ नाहीं बोलते महाराज।”
“साले, सत्यवादी हरिश्चन्द्र का नाती बनता है (बच्चे के सिर और गालों पर दो-तीन करारे तमाचें पड़ गए। वह लड़खड़ा गया) भाग और फिर जो तोको हियाँ खेलते देखा तो मारते-मारते हड्डी-पसली की चटनी बनाय देंगे। खबरदार, जो अब हमारे धर पे भीख माँगने आया।”
रामबोला रोता हुआ सरपट भागा।वह सीधे अपनी झोपड़ी पर आकर ही रुका और एक पड़ोसिन लड़की के सिर की जुयें बीनती हुई पार्वती अम्मा से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा।
“अरे क्या भया बचवा?”
रामबोला बिलखकर बोला-“अम्मा अब हम कभी भीख माँगने नही जाएँगें“
“अरे, तो पेट कैसे भरेगा बचवा”
“हम‌ खेती करेंगे, जैसे और सब करते हैं।” 
बुढ़िया पार्वती सुनकर हँसने का निष्फल प्रयत्न करती हुई रुककर बोली “अरे बेटा, हम भिखारियों को जमीन कौन देगा ? खाने को तो मिलता नहीं है, हल- बल कहाँ से मिलेगा।”
“पर हमको भीख माँगना अच्छा नही लगता है, अम्मा। द्वारे-द्वारे रिरियाओ, गिड़गिड़ाओ , कोई सुने, कोई न सुने, गाली दे। यह रोज रोज का दु:ख हमसे सहा नही जाता है।”
“हूँ”- बच्चे के सिर और पीठ पर प्रेम से हाथ फेरकर बुढ़िया बोली- “यह दु:ख नही, तपस्या है बेटा। पिछले जनमों में जो पाप किए है वो इस जनम में हम तपस्या करके हम धो रहे है कि जिससे अगले जनम में हमें सुख मिले।”
क्रमशः

Saturday, 25 March 2023

tc 17

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
17-

छप्पर के नीचे अम्मा की लठिया झाँकती नजर आई। उसे लपककर खीच लिया और उसके सहारे से किसी प्रकार दूसरा सिरा भी ऊँचा उठा ही लिया। दो-एक क्षणों तक अपने श्रम की सफलता को विजय पुलक भरें संतोष से निहारता रहा, फिर पार्वती अम्मा के सिरहाने की तरफ बढा़।भीगते हुए भी अम्मा निर्विकार मुद्रा में काठ सी पड़ी थीं। उनके कान से मुँह सटाकर रामबोला ने जोर से कहा-“अम्मा, जरा सी सरक जाओ तो भींजोगी नहीं।”
“मोरि देह तो पाथर हुई गई है रे।कैसे सरकी?” 
सुनकर रामबोला हताश हो गया। एक बार शिकायत भरा सिर उठाकर बरसते आकाश को देखा, फिर और कुछ न सूझा तो अम्मा से लिपटकर लेट गया। स्वयं भीगते हुए भी उसे यह संतोष था कि वह अपनी पालनहारी को वर्षा से बचा रहा है। पर यह संतोष अधिक देर तक टिक न पाया। पार्वती अम्मा तब भी पानी से भीग रही थी।आकाश में बिजली के कौधें बीच-बीच में लपक उठते थे।बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर रामबोला को लगा कि मानों चैनसिह ठाकुर अपने हलवाहा को डांट रहे हैं। रामबोला अनायास ही ताव में आ गया। उठा और फिर नये श्रम की साधना में लग गया। दूसरे छप्पर के ढीले पड़ गए अजंर-पंजर को कसने के लिए पास ही खलार में उगी लम्बी घास-पतवार उखाड़ लाया। रामबोला ने भिखारी बस्ती के और लोगों को जैसे घास बंटकर रस्सी बनाते देखा था वैसे ही बंटने लगा। जैसे तैसे रस्सियाँ बंटी, जस तस ट्ट्टर बाँधा। अब जो उसकी आधी से अधिक उघड़ी हुई छावन पर ध्यान गया तो नन्हे मन के उत्साह को फिर काठ सा गया। घास-फूस, ज्यौनारों में जूठन के साथ-साथ बाहर फेंकी गई पत्तलों और चिथड़े -गुदड़ों से बनाई गईं वह छोटी-सी छपरिया फिर से छाने के लिए वह सामान कहाँ से जुटाए? कूढ़े पर पड़ा हुआ माल वह इस बरसात में कहाँ ढूढे़गा। देव आज प्रलय की बरखा करके ही दम लेगें। हवा के मारे औरों के छप्पर भी पेगें ले रहें हैं। अभी तक अपनी-अपनी छाबनों को बचाने के लिए सभी तो तूफान से जूझ रहे हैं-
“तब हम अब का करीं ? हमारी पेट भी भूखा है। हम नान्हें से तो हैं हनुमान स्वामी, अब हम थक गए भाई।अब हम अपनी पार्वती अम्मा के लग जायके पौढंगे। अब बरसे तो बरसा करे। हम क्या करे बजरंगबली, तुम्हीं बताओ।तुमसे बने भाई तो राम जी के दरबार में हमारी गुहार लगाय आओ, और न बने तो तुमहुँ अपनी अम्मा के लग जायके पौढौ।”
रामबोला खिसियाना सा होकर रेंगकर अपनी छपरिया में घुसा। उससे खीचकर पार्वती अम्मा का हाथ सीधा किया तो वे पीड़ा से कराह उठी, पर बड़ी देर से एक ही मुद्रा में पड़ी हुई जड़ बाहँ सीधी हो गई। स्नायुकंपन हुआ, जिससे उनके शरीर का आधा भाग थोड़ी देर तक काँपता रह।बालक के लिए यह आश्चर्यजनक, भयदायक दृश्य तो अवश्य था पर उसे यह कंपित देह पहले की मृतवत्‌ देह की स्थिति से कहीं अधिक अच्छी भी लगी।
“पार्वती अम्मा, पार्वती अम्मा”
“हाँ, बचवा” पार्वती अम्मा का वेदना में बुझा स्वर सुनाई दिया।
“हम तुमको आगे ढकेलेंगे। तुम एक बार जोर से कराहोंगी तो जरूर, पर तुम्हारी ये जकड़ी देह खुल जायगी। बरखा से तुम्हार बचाव भी हुई जायगा।”
बुढ़िया माई ना-ना कहती ही रही पर रामबोला ने उनकी बगल में लेटकर कोहनी से ढकेलना आरम्भ कर दिया। 'जय हनुमान स्वामी’ का नारा लगाकर, दातँ भींच और सिर झटकाकर रामबोला ने अपनी पूरी की पूरी शक्ति लगा दी। पार्वती अम्मा कराहती हुई पीछे धकिल गई। बालक अपनी जीत से खुश हआ। गौर से देखा पर इस बार पार्वती अम्मा के किसी भी अंग में कंपन न हुआ।उन्हें खाँसी अवश्य आई और वे देर तक 'राम-राम” शब्द में कराहती रहीं बस, परन्तु अब वे भीग‌ तो नही रहीं हैं।बरसात झेलने के लिए रामबोला की पीठ है। खाँसती कराहती अम्मा की पीठ सहलाते हुए, विजयी पूत ने इठलाते स्वर में ऐसे चुमकारीं भरे अन्दाज से पूछा कि मानों बड़ा छोटे से पूछ रहा हो- “पार्वती अम्मा, बहुत पिरात है ?” 
“चुपाय रहौ बच्चा, राम-राम जपौ |”
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“राम-राम राम-राम रटते ही मैंने दुखों के पहाड़ झेले हैं” - स्मृतियों में खोकर बोलने वाले बाबा का करुण स्वर अब वर्तमान की पकड़ लेकर बातें करने लगा-“अपना-पराया दुख देखता हूँ तो मन अवश्य ही भर उठता है। पर उस कोमलता में भी मेरी सहनशक्ति राम के सहारे ही अडिग बनी रहती है।अपने तो एक अवलम्ब समर्थ सीतानाथ सब संकट विमोचन हैं-
“तुलसी की साहसी सराहिये कृपाल राम
तास के भरोसे परिनाम को निसोच है।”

वातावरण बाबा के ओजस्वी स्वर के जादू से बँध गया था। मंत्र-मुग्धता के क्षणों को कथारस के आग्रह से भंग करते हुए वेनीमाघव जी ने विनयपूर्वक पूछा- “आप उन्हे अम्मा न कहकर पार्वती अम्मा क्यों कहते थे गुरू जी? ”
“उन्होंने ही सिखलाया था। बड़े होकर एक बार हमने पूछा तो कहा कि ब्राह्मण के बालक हो। हमें अम्मा कहते हो यही बहुत है, बाकी हमारा नाम भी लिया करो।”
“फिर उनका क्या हुआ प्रभु? वे स्वस्थ हो गईं ?” रामू ने पूछा।
“अभागे का करम-खाता क्या कभी सरलता से चुकता है? बिना किसी औषधि के, बिना खाए-पिए राम-राम करती वे फिर चंगी हो गईं। उस घटना के कदाचित‌ चार-छह महीनों के बाद तक वे जीवित रहीं थीं | पर उन अन्तिम महीनों मे भीख माँगने के लिए मैं ही जाया करता था। बीच में कभी एक आराध बार कदाचित‌ वह मेरे साथ गईं हों तो उसका कोई विशेष स्मरण अब नहीं रहा।” 
“आपका रामबोला नाम उन्होंने ही रखा था?” रामू ने फिर प्रश्न किया।
“राम जाने, बेटा। हाँ, पार्वती अम्मा से यह अवश्य सुना था कि मैंने बोलना राम शब्द से ही आरम्भ किया था। भिखारिन की गोद में पला, भूख के हेतु सहानुभूति जुटाने का साधन बनकर अपना चेतनाक्रम पानेवाला बालक भला और बोल ही क्या सकता था।कदाचित्‌ पार्वती अम्मा ने या मेरी तोतली वाणी से राम-राम सुनकर किसी और ने इस विशेषण को मेरी संज्ञा बना दिया।
क्रमशः

Friday, 24 March 2023

tc 16

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
16-

“आपके घर की मुनिया दासी की सास?”
“हाँ, ऐसी झोपड़ी में रहती थी जिसमे वह सीधी खड़ी भी नही हो सकती थी। पेड़ों की टूटी हुई टहनियों को जस तस बाँधकर सरपत घास और ढाक के पत्तों से बनाई गई और वह भी अनपढ़ हाथों की कला। आँधी या लू चले तो पत्तें उड़ उड़ जाएँ , कभी चरमरा कर गिर भी पड़े। आए दिन उसकी मरम्मत करनी पड़ती थी, फिर भी उसकी दीन-हीन दशा कभी सुधर न पाई। बरसात भर भीगी धरती पर वह हमें कलेजे से लगाकर और अपने आँचल से ढँककर बौछारों से बचाने का निरर्थक प्रयत्न करती थी।”
“तब तुम बहुत नान्हें से रहे होगे भैया?” राजा भगत ने पूछा।
“चार-पाँच बरिस की आयु से तो हमको याद है, फिर वे बिचारी मर गई। ऐसे ही एक बरसात के दिन हम भिक्षा माँगकर लौट रहे थे कि एकाएक बड़ी जोर से आँधी और पानी आ गया।” 
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मन पटल पर बीते दृश्य सजीव हो उठे। चार-पाँच वर्ष का नन्हा-सा बालक
कंधे पर झोली लटकाए आँधी पानी में बढ़ा चला जा रहा है। भागने का प्रयत्न करे तो फिसलने का भय लगता है और धीरे चले तो आँधी पानी के तेज झोंके उसे डगमगा देतें हैं। सहसा देर से कड़कड़ा रही बिजली बच्चे से, दो-तीन सौ कदम दूर एक पेड़ पर गिरी। बच्चा भय के मारे दौड़ने लगता है और चार-पाँच कदम के बाद ही फिसल के गिर पड़ता है। झोली का अन्न बिखर जाता है। बच्चा उठता है। हवा पानी और कीचड़ उसे उठने नही दे रहे हैं। झोली की टोह लेता है, वह कुछ दूर पर छितरी पड़ी है। उसकी बड़ी मेहनत की कमाई, दिन भर की भूख का सहारा पानी में बहा जा रहा है। वह उठने की कोशिश से बार-बार फिसलता है। भीख में पाया हुआ आटा गीला और बहता हुआ देखकर वह रो पड़ता है। 'हाय हाय हाय' बिलखता हुआ फिर सरक-सरक कर तेजी से अपनी झोली के पास जाता है और उसे उठाकर झटपट कंधे पर टाँगता है। कीचड़ सनी थैली से आठे का पानी चू-चूकर उसकी पसली पर बह रहा है। आकाश फिर गरजता है। सहमा बच्चा उठकर चलने के लिए खड़ा होने का प्रयत्न सावधानी से करता हैं और अपने आपको घर की ओर बढ़ाने में सफल भी हो जाता है। घर बहुत दूर नही। पर घर है कहाँ? झोंपड़ियों के मानदण्ड से भी हीनतम आठ दस छोटी छोटी झोपड़ियों की बस्ती के लिए यह तूफान प्रलय बनकर आया था। अधिकाँशत झोंपड़ियाँ या तो उड़ गई थीं या फिर ढही पड़ी थीं। भिखारियों के टोले मे सभी अपने-अपने राज महलों की रक्षा करने के लिए जूझ रहे थे। उन्हीं में से एक कोने पर बना पार्वती अम्मा का घास-फूँस और ढाक के पत्तों का राजमहल भी ढहा पड़ा था। बहुत से ढाक के पत्ते और गली हुईं फूस टट्टर में से निकल चुकी थी। उसके बचे कुचे भाग के नीचे पड़ी पार्वती अम्मा कराह रही थी। उनकी गृहस्थी के मटके, कुल्हड़ टूटे पड़े थे। 
बच्चा अम्मा कहकर झपटता है। ट्टटर के नीचे दबी पड़ी हुई बुढ़िया का आगे निकला हुआ हाथ पकड़ कर खीचनें का निष्फल प्रयत्न करता हुआ रो उठता है। बुढ़िया ने कराहकर आँखें खोली, बुझे स्वर में कहा- “किसो को बुलाय लाओ, तुमसे न उठेगी।
बच्चा बस्ती भर मे दौड़ता फिरा-“ए मंगलू काका, तनी हमारी अम्मा को निकाल देव। उनके ऊपर छप्पर गिर पड़ा है, ए भैसियाँ की बहू, ए सलौनी काकी, ए बचुआ की आजो, ए फेकवा भैया...... परन्तु न काका ने सुना, न भैया ने, न आजी ने । पूरी बस्ती इस प्रलय प्रकोप के कारण त्रस्त है। गोदी के बच्चे और अंधे लगड़े लूले असहायजन हर जगह रिरिया रहे हैं। बहुत से भिखारी इस समय आसपास के गाँवों मे अपनी कमाई करने गए हुए हैं। अत्यंत अशक्त जन ही पीछे छूट गए हैं। जैसे तैसे करके वे अपने ही ऊपर पड़ी से निबट रहे हैं, फिर कौन किसकी सुने।
मूसलाधार पानी में भीगता निराशा में डूबा हुआ रामबोला कुछ क्षणों तक स्तब्ध खड़ा रहा, फिर धीरे-धीरे अपनी गिरी हुई झोंपड़ी के पास आया। देखा, पार्वती अम्मा का हाथ वैसे ही बाहर निकला भीग रहा था। उनके मुँह और शरीर पर भीगते छप्पर का बोझ भी यथावत्‌ ही था। रामबोला की मनोपीड़ा कुछ कर गुजरने के लिए चंचल हो उठी। इधर-उधर सिर घुमाकर उपाय की खोज की। छप्पर का जो भाग फूस पत्ते विहीन होकर पड़ा था, उसके एक सिरे पर बाँस का एक छोटा टुकड़ा बड़े बाँस से जुडा हुआ बँधा था। बालक को लगा कि यही उपाय है।बाँस के इस टुकडें को खींच लिया जाए, फिर इससे अम्मा की देह पर पड़े हुए छप्पर को ऊँचा उठा दिया जाय जिससे कि अम्मा उसके नीचे सरक‌ कर पौढे़ ।उपाय सूझते ही काम चल पड़ा।बाँस का टुकड़ा खींचना शुरू किया तो छप्पर की पुरानी सुतली ही टूट गई। टूटने दो, अभी तो इस सिरे का छप्पर उठाना है।छप्पर के एक सिरे के नीचे बाँस का टुकड़ा अड़ाकर उसे उठाना आरम्भ किया। छप्पर का कोना तो तनिक सा ही उठ पाया पर जोर इतना लगा कि कीचड़ में पावँ फिसल गया। गिरा, फिर उठा, अबकी बार घुटने टेककर बैठा और फिर बाँस अड़ाया। छप्पर कुछ उठा सही पर नन्हें हाथ वो नहीं सँभाल पाए। बालक को अपनी पराजय तो खली ही पर अम्मा ऊपर का बोझ तनिक सा उठकर फिर मुँह पर गिरने से जब कराही, तब उसे अनचाहे अपराध की तरह और भी खल गया। ताव में आकर, जै हनुमान स्वामी, जोर लगाओ' ललकार कर दूसरी बार छप्पर उठाने में रामबोला ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी।छप्पर लड़खड़ाया, पर उसे गिरने न दिया, और भी जोशीले हुंकारे भर भर कर वह अन्त में एक कोना उठाने मे सफल हो ही गया। फिर दूसरे कोने को उठाने की चिन्ता पड़ी। 'इसे काहे से उठाएँ?” कोई मतलब की चीज दिखलाई न पड़ी। पड़ोसी के यहाँ कुछ खपाचिया पड़ी थीं, एक बार मन हुआ कि उठा लाए पर कुछ ही देर में गाली-मार के भय से वह उत्साह उड़नछू हो गया। टहनी काम के योग्य सिद्ध न हुई।
क्रमशः

tc 15

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
15-

चौकी के सामनेवाली दीवाल पर चूने से सूर्य का गोला बनाकर बाबा ने कभी गेरू से सीताराम लिख दिया था। फीके पड़ने से बचाने के लिए बार-बार पोते जाने से लिखावट और गोला तनिक विरूप तो अवश्य हो गया था किन्तु मौजूद था। चौकी पर रेशमी चादर और गद्दा बिछा था। बावा संतुष्ट मुद्रा में चारों ओर देखकर चौकी की ओर बढ़े। चादर को एक कोने से उठाकर देखा। नीचे बिछी हुई अपनी पुरानी चटाई को देखकर प्रसन्न हुए। 
“रामू, ये गद्दा इत्यादि ठाठ बाट हटाओ”
सेठ जी के चेहरे पर फीकापन भाँपकर राजा भगत बोले- “अब बिछा है तो बिछा रहने देव। तुम्हारी बूढी हड्डियो को सुख मिलेगा।”
बाबा ने बच्चों की तरह से मचलकर कहा- “नही, अंतकाल में अपनी आदत क्यों बिगाड़ू।”
रामजियावन के घरवालों ने तब तक गद्दा-चादर उठा डाला था। चौकी पर बैठकर बाबा अपनी पुरानी चटाई पर हाथ फेरते हुए बोले-“ब्रह्मदत्त दमड़ी -दमड़ी की दो लाए थे। बारीक बुनी है। एक हमको दी और एक घाट पर बिछाई। हमारी तो जस की तस धरी है।”
“हाँ , हमें याद है महाराज, घाट पर ऐसी ही चटइया रही, वह तो कई बरस भए टूट गई।” 
“दास कबीर जतन तें ओढ़ी,
ज्यो की त्यो घरि दीनी चदरिया”- कहकर बाबा हँसने लगे। उन्हें हँसते देखकर सभी खिलखिला पड़े।बरसाती मक्खियों सी चिपकी भीड़ बड़े मनुहार के बाद गई। सेठानी जी चाहती थी कि उनके द्वारा रखी हुई पादुकाओं को गोसाईं जी यदि यहाँ रहते हुए निरंतर न पहने तो कम से कम एक बार उसमे पैर ही डाल दे जिससे कि वे सेठानी की पूजा की वस्तु हो सके। रानी साहब का मन रखने के लिए नई कलम और चाँदी की दवात भी रखनी ही पड़ी।इस प्रकार कुछ देर के बाद ही भोजन हो सका, बाबा तथा उनकी मण्डली के भोजन करते न करते ऐसी मूसला धार वर्षा आरम्भ हुई कि थोड़ी ही देर में पनारे बह चले। भोजन करके बाबा फिर अपनी कोठरी मे आ गए। वेनीमाधव जी तथा राजा भगत दूसरी कोठरी में टिकाए गए थे। रामू बाबा के साथ था।उससे पैर दबबाते हुए बाबा को कंपकंपी आ गई। थोड़ी देर बाद रामू का ध्यान बाबा के सिरहाने दीवार के कोने पर गया। दीवार के सहारे छत से पानी की लकीर बह रही थी।इससे रामू को विशेष चिन्ता व्यापी और वह अपने गले से तुलसी माला उतारकर कन्धे पर पड़े अँगोछे में हाथ छिपाकर जप करने लगा। थोड़ी देर में'खल-खल' की आवाज कानों में पड़ी। आँखें खोलकर पहली दृष्टि सोते हुए गुरू जी पर और दूसरी बहती दीवार पर डाली। पानी अब अधिक तेजी से बह रहा था। धरती के कोने से मटमैला पानी मोटी धार में बह रहा था और उसी से 'खल-खल' की ध्वनि हो रही थी। रामू की आँखे अब उधर ही टिक गईं। सहसा धरती के सिरे से एक बड़ा मिट्टी-का लोदा पानी के साथ धप्प से फर्श पर गिरा। ऊपर से आनेवाले पानी की धार और मोटी हुई। द्वार से आँगन में झाँका, पानी बहुत ज़ोरों से बरस रहा था।आकाश मे बिजली ऐसे कड़क रही थी मानों इसी छत पर टूटकर गिरेगी। अब रामू से बैठा न रहा गया। बिना आहट किए चौकी से उठा और सोते हुए महापुरुष के चेहर पर एक दृष्टि डालकर फिर द्वार से बाहर निकलकर, छप्पर पड़े, जगह-जगह से चुआते हुए दालान से होकर आगे वाली कोठरी के द्वार पर पहुँचा । देखा कि राजा भगत सो रहे हैं और वेनीमाधव जी आँगन की और मुँह किए बैठे सुमिरनी के घोड़े दौड़ा रहे हैं।रामू ने संकेत से उन्हें बाहर बुलाया और कहा -“ब्रह्मचारी जी आप तनिक प्रभु के पास बैठ जायें। वे सो रहे हैं और कोठरी में पानी चूआते -चूआते अब पनाला बह चला है। मैं भीतर कहने जा रहा हूँ।” बेनीमाधव जी तुरन्त बाबा की कोठरी को ओर चल पड़े। जाकर देखा कि दीवार से बहकर आते हुए पानी से कोठरी के गोबराये हुऐ फर्श पर तलैया बन रही है। वे द्वार के पास ही खड़े हो गए। गुरू जी गहरी नींद मे थे। कुछ देर बाद वे अचानक बड़बड़ाए -“राम-राम , फिर बेचेनी से करवट बदली। 'खल- खल खल-खल' ध्वनि से आँखें खुल गईं। तकिये से सिर उचकाकर बहता कोना देखा, फिर छत देखी, फिर बेनोमाधव की ओर ध्यान गया, बैठ गए, कहा- “रामू इसी के उपचार की चिन्ता में गया होगा।”
“हाँ गुरू जी, मिट्टी की दीवार है, कहीं अधिक पोल हुई तो ये फिर रोक न पाएगी। पानी बड़ी जोरों से पड़ रहा है।” 
“हाँ , जब स्वप्न में उत्पात हो रहा था तो जाग्रतावस्था में भी उसका कुछ न कुछ प्रमाण तो मिलना ही चाहिए। राम करे सो होय।” 
“क्या कोई बुरा स्वप्न दखा था आपने?” “स्वप्न में हम काशी में थे। विश्वनाथ जी के दर्शन करके गली मे आए तो सहसा उनका नंदी हमें सींग मारने के लिए झपटा। हम राम-राम गोहराने लगे तभी नींद खुल गई। ऐसा लगता है कि अब हमारी आयु शेष हो चली है।”
सुनते ही बेनीमाघव जी सहसा भावुक हो गए। आँखें छलछला उठी, हाथ जोड़कर बोले- “अपने श्रीमुख से ऐसे अशुभ वचन न कहे गुरू जी। आपका जीवन हमारी छत्रछाया है।”
तब तक रामू, रामजियावन और उनके छोटे भाई रामदुलारे आ पहुँचे। बहती दीवार के कोने का निरीक्षण करके रामदुलारे बोला- “ई मूसन की करतूत है। ऊपर नाज सुखावा गवा रहे ना। अबहिं ठीक होत है दादा, महाराज जी का दूसरी कोठरी मा ले जाव।”

रामू और बेनीमाधव जी उन्हे सहारा देकर उठाने के लिए झुके, सरककर आगे आते हुए बाबा ने हँसकर कहा-“अरे बेटा, बालपने में तो हम ऐसी झोपड़ी में रहे हैं कि पानी गलावे और घूप तपावे। हमारी पार्वती अम्मा कहे कि जिससे राम जी तपस्या कराते हैं उसे ऐसा ही महल देते हैं।” हँसते हुए यह कहकर वे सहारे से उठे।
कोठरी मे भीड़-भाड़ होने से राजा भगत की आखँ खुल गईं। उन्हें इस कोठरी मे अचानक आने का कारण बतलाया गया। तब तक बेनीमाधव जी भी चौकी पर बैठ गए। बेनीमाघव जी ने छूटा हुआ प्रसँग फ़िर उठाया-"पार्वती माँ कौन थी गुरू जी ?” 
“मेरी शरणदायिनी, जगदंबा रूपिणी बूढ़ी भिखारिन।”
क्रमशः

Wednesday, 22 March 2023

tc 14

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
14-

इस हल्ले-हुल्लड़ में रामजियावन का स्वमहत्त्व भाव जो उमड़ा तो ऊँचे स्वर मे लहककर गाने लगे-

चित्रकूट महिमा अमित, कही महामुनि गाय। 
आइ नहाये सरितवर सिय समेत द्वय भाय॥

किसी का भाव से राम-महिमा को छेड़-भर देना ही बाबा को बहिर्लोक से प्रभुलोक में ले जाने के लिए यथेष्ट होता है। पयस्विनी की घारा में राम- लक्ष्मण उन्हें तैरते हुए अपने पास आते दिखाई देने लगे। गदगद होकर हाथ जोड़े हुए उन्हे मार्ग देने के लिए वे जो हड़बड़ाकर पीछे हटे तो पैर लड़खड़ाया और वे जल में ही फिसल पड़े।
घाट पर हाहाकार मच गया। नदी गहरी नहीं, डूबने का भय नहीं, पर चोट लगने का तो है। कई लोग उन्हे बचाने के लिए जल मे कूद पड़े, किन्तु बाबा के पास ही खड़े रामू ने चट से उन्हें थाम लिया।तब तक और लोग भी पहुँच गए थे। उसी समय चित्रकूट नगर के महासेठ भी पालकी पर आरूढ़ होकर आ पहुँचे। बाबा थोड़ा पानी पी गए थे और एक पैर में मोच भी आ गई थी, वैसे वे मन से स्वस्थ थे। लगभग सत्तर वर्ष की आयु के रौबीले सेठ जी ने घाटवाले के तखत तक सहारा देकर लाए जाते ही बाबा को घुटने टेककर प्रणाम किया। पहचानने की मुद्रा के साथ बाबा ने पूछा- “जगन्नाथ साहू के पुत्र है? ”
“जी हाँ महाराज, वेदेहीशरण मेरा नाम हैं। आप ही का दिया हुआ।”
“हाँ , याद आया। आपके विवाह के समय की बात है, पहले आपका नाम....”
सेठ जी हँसकर बोले- “अरे अब उसकी याद भी न दिलाइए महाराज जी, नाम का बड़ा प्रभाव होता है। चलिए आपको लेने आया हूँ। घटा बड़ी जोर से घिर आई है, जाने कब बरस पड़े।”
बाबा मीठे भाव से बोले- “आपके घर फिर कभी अवश्य आऊँगा । इस समय तो मैं अपने स्वर्गवासी मित्र ब्रह्मदत्त के घर जाकर अपनी राम कोठरिया में ही विश्राम करूँगा।” 
“जहाँ महाराज जी की इच्छा हो, रहें।इनके यहाँ भी सब प्रबन्ध हो चुका है। (आकाश की ओर देखकर ) घटा घिरी है, दिन भी चढ़ रहा है, भोजन विश्राम की बेला हुई। आपके वास्ते पालकी आई है।” 
मोच के कारण गोस्वामी जी ने सेठ जी की यह सेवा स्वीकार कर ली। पालकी पर विराजमान, भीड़ से घिरे हुए बाबा प्रसन्न मुद्रा में भी ऐसे अलिप्त भाव से चले जा रहे थे कि मानों वह अपनी काया में रहते हुए भी उससे बाहर हों। चामत्कारिक रूप से अपनी ख्याति के बढ़ने पर बाबा को प्राय: अपने ऊपर गर्व हो जाया करता था।इस खोखले अभिमान के नशे से वे बहुत जूझे हैं और सधते-सधते अब मन ऐसा हो गया है कि जप की गुफा में बैठकर उनका मन बेहोशी के पत्थर से स्वयं को ढकँ लेता है। फिर बाहर सड़क चलती रहे, या हजारों के मजमें में रहे लेकिन उससे मन के निरालेपन को कोई आँच नहीं आती। वह अपने में मगन रहता है, न देखता है, न सुनता है। केवल गगन शब्द सुनता है। सधते सधते नाम जप अब बाबा का विश्वास बन गया है। घर पहुँचते न पहुँचते तक बादल गड़गड़ाने लगे थे। रामजियावन के घर के लम्बे चबूतरे पर, छतों पर स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ खड़ी थीं । रामजियावन की ओर देखकर बाबा हँसते हुए बोले- “ओहो आज तो तेरे घर पर धावा हुआ है रे”
“महात्माओं को ठहराने का यही फल मिलता है।” बाबा के इस कथन पर रामजियावन समेत आस-पास के सभी लोग हँस पढ़े।पालकी ज़मीन पर उतारी गई। 
राजा भगत बोले- “अरे, अभी भीड़ कहाँ भई है भैया। कल परसों से देखना, धरती पर तिल रखने को भी जगह न मिलेगी।”
बाबा उतरने लगे।सेठ जी ने आगे बढ़कर सहारा दिया। भीड़ और निकट खिचँ आई, चरणरज के भूखे भिखारी झपटे।रामजियावन ने अपने भाई को ललकारा। बीस-पच्चीस जवानों ने भीड़ से जूझते हुए बाबा को अपने घेरे मे ले लिया। वे चबूतरे की ओर बढ़े। छाया की भाँति साथ रहने वाला रामू पण्डित, सेठ, राजा भगत, रामजियावन आदि भक्तों की सेवा-उमंग का मान रखते हुए भी बाबा की सुविधा-असुविधा पर पूरा ध्यान रखे हुए था। सेठ जी सहारा तो दे रहे थे परन्तु घेरा तोड़ने के लिए निकट आती भीड़ के रेलों से चौंक सहमकर आगे पीछे भी हो जाते थे। इससे बाबा के कंघे को फटका लगता था। रामू ने बड़ी विनम्रता के साथ सेठ को अलग करके बाबा का भार ले लिया। वे सुख से सीढ़िया चढ़ गए। सैकड़ों कण्ठों का जयघोष जैसे ही निनादित हुआ वैसे ही बादल भी गरज उठे। बाबा चबूतरे पर खड़े हो गए और दोनों हाथ ऊपर उठाकर जनता को शांत किया, फिर कहा- “देखो, चित्रकूट वालों की रामगुहार सुनकर गगन भी गूँज उठा। अब आप सब अपने अपने घर जाओ। परसों से हम रामायण सुनाएगें और कल हम यहाँ दिन-भर रहेगें नहीं, इसलिए कल कोई न आए। जै जै सीताराम।” 
भीड़ का पिछला भाग रामघोष करता हुआ बिखरने लगा, लेकिन आगे के लोग अब अपने-आपको चरणरज पाने का अधिक हकदार समझकर चबूतरे पर चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। वेनीमाधव, रामजियावन आदि ने तुरन्त घेरा कसने के लिए ललकारा।बाबा ने फिर सबको थामा, जोर से कहा-“हमारे पैर में मोच आ गई है। आज सब जने हमें क्षमा करें।जै-जे सियाराम।” बाबा ने स्त्री पुरुषों की भीड़ को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। इस समय जप- विश्वास और विम्बसिद्धि का कर्म दोनों ही गतिशील थे। बाबा के सामने अनेक सीतायें और अनेक राम थे।एक रूप रूपाय, मानों मन का एक-एक अणु धरती आकाश के ओर से छोर तक अपनी बिम्बशक्ति से जागृत और सक्रिय हो उठा था। दृष्टि बाहर से भीतर तक एक सीधे राजपथ जैसी हो गई थी। जुड़े हुए हाथ भीतर नाम-जप से जुड़ कर मानों मन का प्रतीक वन गए थे।
कोठरी में प्रवेश किया।वही पुरानी जगह, वही कुश आसन बिछा पीढ़ा और सामने रखी हुई चौकी।उसपर उनकी मिट्टी की पुरानी दवात और सरकंडे की कलम भी वैसे ही रखी थीं, लेकिन उसके पास ही चाँदी का पीढ़ा, चौकी, चाँदी, की दवात और नई कलम भी रखी थी। पीढे़ पर रखी पुरानी खड़ाउएँ एक ओर रखी हुई थीं।
क्रमशः

Tuesday, 21 March 2023

tc13

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
13-

बाबा प्रगाढ़ श्रद्धा के नशे में अपने अंदर ही अंदर झूमने लगे। पर्वत की ओर देखते हुए वे हाथ बढा़कर अपनी ही कविता की पंक्तियाँ सुनाने लगे-

चित्रकूट अचल अहेरी बैठयो घात मानों, पातक के बात घोर कारज सम्हारिवे।

ऐसा लगता है कि मानों कलिणग आज तक यहाँ प्रवेश करने का साहस भी नही कर पाया है। यहाँ अब भी जगदम्वा सहित रामभद्र निवास करतें हैं और लखनलाल सदा वीरासन पर बैठकर पहरा दिया करतें हैं।
रामू ने पूछा- “क्या अयोध्या में भी आपको ऐसा ही अनुभव होता है?
बाबा क्षण भर के लिए मौन हो गए फिर गंभीर स्वर में कहा- “सीताराम तो हिये में समाए है, जहाँ जाता हूँ वही वे ही वे दिखलाई पड़तें हैं। फिर भी अयोध्या सदा मुझें अगम कूप के समान लगी, जिसमे डूबकर बैठ रहने को जी चाहता है। अयोध्या का अनुभव मूक, पर चित्रकूट सदा मुखर है। (भाव-विभोर होकर गाने लगे)

राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चितचारु। तुलसी सुभग सनेह वस सिय रघुवीर विहारु॥

रामघाट पर पहुँचते ही राजा भगत को तो बहुत-से लोग पहचान गए परन्तु बाबा को अपना कोई पूर्व परिचित न दिखाई दिया।
“अरे भगत है, आओ- आओ, जय सियाराम ” एक अधेड़ वय के घाटवाले नें राजा भगत से रामजुहार करते हुए गोसाईं बाबा और उनके दोनों शिष्यों की ओर देखा, चन्दन घिसते हुए उनसे भी जै सियाराम की, फिर बाबा को देखा, फिर देखा, दृष्टि हटती भी नहीं और मिलती भी नहीं। कौन महात्मा है?
“जै सियाराम, जै सियाराम। राम जियावन महाराज, तुमरे वप्पा कहाँ हैं?” - राजा भगत ने अपने कंधे पर पड़ी हुई चादर उतारकर तखत झाड़ना आरम्भ कर दिया।
“बप्पा तो राम जी के घर गए।यह तीसरा महीना चल रहा है।”
“अरे” - रामजियावन घाटवाले से कह कर राजा भगत बाबा से बोले - “भैया विराजो”
“यह तो ब्रह्मदत्त का तखत है।” बाबा ने पहचानते हुए कहा, फिर घाटवाले को ध्यान से देखकर बोले- “रामजियावन” 
“अरे बाबा आपकी जटा-दाढ़ी न रहै से पहिचान न पाए।” कहते हुए गदगद भाव से झपटकर रामजियावन उनके पैरों पर गिर पड़ा। आशीर्वाद पाकर फिर रोते हुए बोला- “इत्ती वेला वप्पा होते तो”-  गला भर आया, कुछ कह न सका। आँसू पोंछने लगा।
“क्या कुछ माँदे हुए थे?” राजा भगत ने पूछा।
“नहीं , अरे भले-चंगे, दरसन के काजे आए, हियाँ बैठे, सबसे बोलते-बतियाते रहे। फिर बोले कि जी होता है कासी जी जाएँ, विस्वनाथ बाबा के दरसन करे, और बाबा का नाम लिया कि इनके आसरम में अपना अंत समय बितावें।बोलते बोलते उनका दम घुटे लागा। हम पूछा, बप्पा का भयो। तब तक उतै लुढ़कि पड़े।”
“राम-राम”
“बड़े भले रहे बरमदत्त महाराज। तुमरे बड़े भगत रहे भैया।”
“ब्रह्मदत्त मेरे परममित्र और उपकारी थे।जब यहाँ आया तब उन्हीं के घर पर रहा।” बाबा ने कहा । |
गद्गद स्वर में राम जियावन बोला- “आपकी कुठरिया तो महराज हमारे घर में अब दरशन का अस्थान बन गई है। रामनौमी को भीड़ की भीड़ आती है। आपकी चौकी, पूजा का आसन, पंचपात्र, सब जहाँ का तहाँ धरा है।”
“ठीक है, वहीं रहूँगा।” 
“अरे बाबा, हम सब जनों का भाग जागा जो आप पधारें।”
घाटवाले के घर के बाहरी भाग मे एक बड़ा-सा कच्चा आँगन था। उसी में कुछ कोठरियाँ भी बनी थीं, जो सम्भवत. यात्रियों के ठहरने के लिए ही बनवाई होगीं। बाबा की कोठरी कोने मे थी।भीतर कच्चे अहाते की ओर भी उसका एक द्वार खुलता था इसलिए हवादार थी। बाबा की चौकी, पूजा का स्थान आदि सब वैसा का वैसा ही था, स्वच्छ और सुव्यवस्थित। वहाँ प्रतिदिन प्रात.काल राम जियावन की बेटी गौरी और भतीजी सियादुलारी सस्वर रामायण पाठ करती हैं। दो तोर्थवासिनी विधवा रानिया तथा चित्रकूट के सेठ परिवार की स्त्रियाँ, सब मिलाकर आाठ-दस सम्भ्रांत महिलाओं का जमाव होता है। राम जियावन के परिवार को उससे अच्छी वाषिक आय भी हो जाती है। लड़कियाँ आठ नौ साल की हैं, कण्ठ बड़ा ही मधुर है। स्व० ब्रह्मदत्त ने अपनी पोतियों को बचपन से ही रामायण रटाना आरम्भ करा दिया था। किसी राम-भक्त धनी यजमान से दक्षिणा लेकर उन्होने राजा भगत की मार्फत ही रत्नावली जी की प्रति से मानस की एक प्रतिलिपि तैयार कराई थी। मानस-पाठ की कृपा से उन्होंने बहुत कमाया। वे राम से अधिक तुलसी भक्त थे। सोरों से विक्रमपुर आकर बसने पर बाबा जब पहली बार राजा के साथ चित्रकूट आए थे तभी से उनका नेह- नाता बंध गया था। रामघाट पर ही उन्होंने वाल्मीकीय रामायण बाँची थी। संसारी होने के बाद एक बार फिर कथा बाँचने के लिए यहाँ बुलाए गए थे।
तब पत्नी के साथ आए थे और ब्रह्म दत्त के यहाँ ही टिके थे।संसार त्याग करने के बाद बाबा जब यहाँ आए तब पहले तो गुप्तवास किया परन्तु ब्रह्मदत्त ने एक दिन उन्हें देख लिया और घेरकर अपने घर ले आए। तदुपंरान्त मठ का गोस्वामी पद ग्रहण करने से पहले एक बार फिर आए। ब्रह्मदत्त के घर पर ही टिके और रामघाट पर रामचरित मानस सुनाया था। अपनी इस यात्रा मे बाबा चित्रकूट के जन-मानस में ऐसे बस गए थे, कि उनके यहाँ से जाने के बाद भी उनकी स्मृति रूपी पतंग को किंवदंतियों की लम्बी डोरी बाँधकर लोग-बाग आज भी उड़ाया करते हैं।

रामजियावन ने बाबा के शुभागमन का समाचार जब अपने घर भेजा तब गौरी और सियादुलारी रामायण बाँच रहीं थीं और नियमित रूप से आनेवाली स्त्रियाँ सुन रहीं थीं। स्त्रियों में बात पहुचीं तो बिजली बनकर घर-घर पहुँच गई। घाट पर कानोंकान उडी़ तो दम-भर में जनरव बन गई। हाठ-बाट, गली- गली, जहाँ देखो वहीं यह चर्चा थी कि गोसाईं जी पधारे हैं। पिछली पीढ़ी वालों का पुराना नेह और नई पीढ़ी का कौतूहल उमड़ा । बहुत से लोग तो अपना काम धाम छोड़कर रामघाट की ओर लपके। जिस समय बाबा स्नान करने के लिए नदी में पैठे उस समय घाट पर पचास तो जन जुट आए थे। इधर- उधर से भीड़ बरावर आती ही जा रही थी। 
“वो रहे महाराज--वो ! इन्हें राम जी साच्छात दरसन देतें हैं। यहाँ बहुत दिनों तक रह चुके हैं। बरसों बाद आए हैं। आहा.. कैसा तेज है।” 
क्रमशः

tc 12

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
12-

घर के अन्दर से दो-तीन नारी कण्ठों के कल्हाटे सुनाई पड़ने लगे। पंडाइन डाटँना भूल गई। 
“हाय मोर हुलसिया। अरे मोर मूबोली-ननदिया... अरे हमको छोड़के तुम कहाँ गईं, रा....म !” 
पंडाइन वहीं की वहीं धम्म से बैठ गईं और दोनो हाथ अपनी आँखो पर रखकर विलाप करना आरम्भ कर दिया। मंगने बाजा बजाना बन्द करके किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े-खड़े कभी पंडाइन और कभी आपस में एक दूसरे को मुँह बाये ताकने लगे। इसी समय पंडाइन के पति यानी बचवा के बप्पा और भैरोसिह भी दौड़ते हुए आ पहुँचे। पण्डित आत्माराम भी उसी समय अपने घर के द्वार पर दिखलाई दिए। दोनों हाथों से किवाड़ों का सहारा लेकर वे ऐसे खड़े हुए मानों कोई बेजान मूर्ति खड़ी हो। आँखें शून्य में खोते-खोते सूज गई थीं। पुरुषों का साहस न हुआ कि मुँह से कुछ कहे, नारी- क्रंदन बाहर भीतर एक-सी ऊंची गति पर बढ़ रहा था।अधेड़ आयु के हट्ट -कट्टे पांडे यानी बचवा के बाप, आत्माराम जी के पास जाकर खड़े हो गए। भैरोंसिह उनके पीछे-पीछे चले आए। बधावा बजाने वाले चुपचाप सिर लटकाकर उल्टे पावों लौट चले। पंडाइन धरती पर हाथ पटक- पटककर विलाप करती रही। पांडे की आँखे कटोरियों सी भर उठी, भरे कण्ठ से कहने लगे- “चार बरसों मे भैया-मैया पुकार के मोह लिया और अब आप चली गई निगोड़ी।अब कौन राखी बाँधेगा मुझे ? हुलसिया, तू कहाँ गई री, हाय, ये क्या हो गया राम।” दीवार से सिर टिकाकर पांडे फूट-फूटकर रोने लगे।आत्माराम वैसे ही खड़े रहे।दो-तीन और लोग भी आ गये-
“हरे राम, आज तो गाँव की विपदा का अंत नहीं है।”
“पांडे जी, यह रोने-घोने का समय नही है। वेडिनें कुवँरीजू को लेके मसान की राह से ही जमना पार जाएँगी। अभी पता लगा है कि चार नावें रोकी गई हैं। हम सबको लेके उधर ही जाते हैं। चार-पाँच जने यहाँ हैं। जल्दी-जल्दी अर्थी लेके पहुँचों और मेहरारू सब जमना जी नहाय के वहीं कोनेवाले टूटे सिवाले में जायके बैठें, जरूरत पड़े तो सिवाला के नीचे जोगी बाबा की गुफा है, चमेलिया जानती है, वहाँ छिपके बैठ जाना। अच्छा तो हम आतमा.... क्या कहें भैया ? ऐसा अभागा जन्मा तुम्हारे घर कि घर ही उजड़ गया।”
पंडाइन उठकर रोती बिलखती भीतर चली।

आत्माराम एक ओर सरक गए और उनसे कहा- “भौजी, मुनियां को भेज देना।”
बाहर खडा पुरुषवर्ग टिकड़ी बनाने के लिए बाँस काटने चला गया। आत्मा- राम दरवाजे से बाहर आकर खड़े हो गए। गाँव एकदम सूना, घर सूने और आत्माराम के लिए तो बाहर-भीतर सब सूना ही सूना था, सब मनहूस था।
मुनिया दासी आँसू पोंछती हुई बाहर आई। आत्माराम ने उसे एक बार देखा फिर मुँह घुमाकर दूसरी ओर देखते हुए कहा- “उस अभागे को गाँव से बाहर फेंक आओ मुनियाँ”
“कहाँ फेकव महाराज ?”
“जहाँ जी चाहे ,उसकी महतारी का कहा कर ” 
“जमना पार हमारी सास रहती हैं। आप कहो तो उनकी .....”
“जौन उचित समझ वही कर। हम तुम्हें चाँदी के पाँच,सिक्‍के देंगे। अपनी सास को दे देना।जा, उसकी महतारी की मिट्टी उठने से पहले ही उस अभागे को दूर ले जा, जिससे उसकी पाप छाया अब किसी को भी न छू पावे।”
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नब्बे वर्षीय महामुनि महाकवि गोस्वामी तुलसीदास के शान्त सौम्य मुखमण्डल पर बकरीदी द्वारा कहे गए अपने पिता के इन शब्दों को सुनकर पीड़ा की लहराती छाया पड़ने लगी। वे आँखे मूँदे घ्यानावस्थित मुद्रा में बैठे थे। राम उन्हे पंखा झल रहा था।बकरीदी मियाँ सुना रहे थे- “बड़े महाराज तो शमशान ही से क्या जाने कहाँ चले गए। बुजुर्ग लोगों का कहना रहा कि संन्यासी हुई गए।मुनियां जब इन महाराज को अपनी सास के पास छोड़के गाँव लौटी तब तलक हियाँ तो कयामत आ चुकी रही। मुगल और अब्यू खाँ के सिपाहियों ने मिलके बिक्रमपुर गाँव को मिट्टी मे मिला दिया। राजकुँवरी ने जमना में डूबके अपनी इज्जत बचाय ली और जो महाराज तब अभागे बताए गए रहें उनके दरसन करके अब सारी प्रजा अपना भाग सराहती है।”
बाबा सुनकर मुस्काए, मस्ती में दाहिना हाथ बढा़कर सुनाने लगे-

जायो कुल मंगल, बधावनों बजायो,
सुनि भयो परितापु पापु जननी-जनक को। 
बारेते ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन,
जानत हो चारि फल चारि ही चनक को।
तुलसी सो साहेब समर्थ को सुसेवक है,
सुनत सिहात सोचु विधिहुँ गनक को।
नामु राम, रावरो सयानो किधों बावरो, 
ज्यों करत गरिरीते गरु तून तें तदक को।

सुनकर सभी गदगद हो उठे । राजा भगत ने कहा- “खरे सोने-सी बात कही भैया, जिसके राम रखवारे हों उसका ग्रह-नक्षत्र भी कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं।
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चित्रकूट क्षेत्र में प्रवेश करते ही बाबा के जरा-जीर्ण गात में मानों फिर से तरुणाई आ गई। उनके मानस-लोचनों में सीता सहित तापस वेषधारी धनुर्धर राम लक्ष्मण ललक-ललककर उभरने लगे। दूर हरे-भरे पर्वतों की चोटियाँ, जगह जगह झरते हुए मनोरम झरने, धनुष की कमान-सी बहती हुई पयस्विनी नदी... बाह्म दृष्टि को जिधर भी सौन्दर्य लुभाता था उधर ही उन्हें अपने आराध्य दिखलाई पड़ने लगते थे। राम सौन्दर्य-पुँज हैं। बाबा ने जब-जब जितनी सुन्दरता देखी है तब-तव उनकी कल्पना का राम-सौन्दर्य अवचेतना के कुहासे से और अधिक निखरकर प्रकट हुआ है। यह भाव-विकास का क्रम पिछले ४०-४५ वर्षो में आगे बढ़ा है। सारा चित्रकूट क्षेत्र राम मे रमा हुआ आत्मविस्मृतिकारी लग रहा है | बाबा चल रहे है पर बाहरी गति में उनका ध्यान इस समय तनिक भी नही है। वह खुली आँखों देख भी रहे है पर दृष्टि बाहर से भीतर तक प्रशस्त राजमार्ग-सी दौड़ रही है। हरीतिमा है, कालिमा है, अनन्त प्रकाशमय नीलिमा है जो स्मृति के क्षेत्र में साकार होते हुए भी विस्मृति का छोर छूकर निराकार हो जाती है। कुछ बखानते नहीं बनता। गूँगा गुड़ खाए पर बताए कैसे। यह सौन्दर्य नदी-सा तरल, फूल-पत्तों सा कोमल, झरनों -सा प्रवाहमान और पर्वतों -सा अडिग वज्र कठोर है। ये कुसुम और वृक्ष दोनों के छोर छूकर सर्वशक्तिमान-सा आभासित हो रहा है।सैलाब-सा उमड़कर भाव अपनी उमड़न में अब सहज हो चला। पशु-पक्षियों से भरा-पूरा वन जिसमें यत्र-तत्र सिद्धों और साधकों की पर्ण कुटिया बनी हैं।
क्रमशः

Monday, 20 March 2023

tc 11

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
11-

पंडित आत्माराम ने उदास स्वर में कहा-“हमारा बेटा बुरी साइत में आया है।” 
“हैं, महाराज? ” 
“भुक्तमूल नक्षत्र।महतारी बाप के लिए तो काल बन के आया हैं, काल।”
द्वार पर खड़ी दासी का चेहरा भय से जड़ हो गया। वह भीतर भागी। कोने की कोठरी के आगे पडांइन दीवार से टिकी बैठी हुई जोर-जोर से पंखिया झल रही थी। उन्हें देखकर दासी वहीं आकर धम्म से यों बैठ गई मानों उसका दम निकल गया हो।  
“क्या भया, मुनियाँ?”
 “का कही, महाराज कहत है कि महतारी-बाप के लिये काल आया है।” 

उसी समय सुकरू अहिर की अम्माँ झपाटे के साथ घर में घुसी और दरवाजे से ही चिल्लाकर कहा- "राजकुँवरी को पकड़ लइ गए भौजी।” 
“हैं”
“और रानी जू कूएँ में फांदि मरीं। महल की औरतों का बड़ा बुरा हाल हुई रहा है।” 
जंगल में लगी आग की पृष्ठभूमि में बंधी हुई राजमणियों के साथ छकडों और खच्चरों पर लदा हुआ लूट का माल लेकर मुगल सिपाही जीत और लूट की मस्ती में गाते, बीच-बीच में एकाद बन्दी अथवा बंदिनी पर चाबुक बरसाते अपने पड़ाव के सामनेवाले बड़े तंबू की तरफ बढ़ रहें हैं। तम्बू में सरदार मसनद पर बैठा बेडिनों का नाच देख रहा है।सिपाही तम्बू में लूट की मूल्यवान वस्तुएँ लाकर सामने रखतें हैं, फिर औरतें लाई जातीं हैं और अंत मे एक अति सुन्दरी नवयौवना। उसे देखते ही नाचना भूलकर बेडिन के मुँह से बेसाख्ता निकल गया-“कुँवरीजू” 
सरदार ने राजकुमारी के सौन्दर्य को उपेक्षा भरी दृष्टि से देखा, पूछा- “तू कौन है?” 
“राजकुँवरी , सरकार” - वेडिन ने राजकुमारी का परिचय दिया। “खामोश, इसे बोलने दे। नाम बतला” राजकुमारी तमतमाया मुख झुकाए मौन खड़ी रही। सरदार ने नाचने वाली से कहा -“झोटा खींचकर इसका सिर उठा।”
बेडिन झिझकी, फिर कुँवरी की ओर बढ़ी ही थी कि उसने हाथ बढ़ाकर बेडिन के गाल पर जोर से एक थप्पड़ मारा। बेडिन चकराकर गिर गई।
सरदार ने दूसरी बेडिन से कहा-“देखती क्या है, शाहजादी साहबा की लातों से खातिर कर, ये बातें से नही मानेगी।”
दोनों वेडिने राजकुमारी पर टूट पड़ीं।सरदार सोने के गगरे से जवाहरात निकालकर देखने लगा।
राजकुमारी के अपमान की खबरें गाँव में पहुचीं। बरगद तले इस समय अधिक लड़ाकौं की भीड़ थी। आस-पास के दो तीन गाँवों के लोग जुट आए थे।
“सुना है मुगल लोग धौकलसिंह को राजगद्दी देंगे।”
“ये धौकल और अब्यू खाँ पठान तो बडे़ दगावाज निकले।बिचारे राजासाहेव को लड़वाय दिया और आप आयके बवैरियो में मिल गए।”
“कोऊ इन गद्दारन की गरदन काट लावे तो हम वहिके चरन घोय-धोय के पियव। सारे हमार कुँवरीजू का वेडनिन तें पिटवाइन”
“पिटवाया ही नहीं , उन्हें वेडनियो के हाथों सौंप भी दिया है। इस अपमान का बदला जरूर लिया जाएगा। हम लोगों में तो कौल-करार हुइ चुका है। आज रात मुगलों की छावनी पे हमारा धावा होगा। जिसमें अपनी मर्दानगी का मान होय वो हमारे साथ आव और हम जौ आज धौकलवा सारे का मूड़ अपने हाथ से न काटा तो असल छत्री के बेटा नहीं।”
“और राजकुँवरी कहाँ है?”
“घौकल सिंह के कब्जे में है। सुना है बेडनियो को दुइ सौ मोहर दै के उनको खरीद......”
“क्या ? ये धौकलवा अब इतना गिर गवा है ? हम तुमरे साथ हैं चंदनसिंह। आज बिक्रमपुर के सूर-बीरों की तलवार का पानी देखना।”

बहुत दूर नही, गाँव की सीमा के भीतर ही कहीं काक डोलक मजीरों और बधावे के गीतों की आवाज झंझाने लगी।
“हैं, मरघट में दीवाली ! ये बधावे कौन “बजवाय रहा है?”
“अरे, अब कलजुग है चन्दनसिह। परमेसरी पंडित अब्यू खां पठान के ज्योतिषि भये हैं। आत्माराम महाराज के घर बेटा हुआ है तन, इसीलिए पंडिताइन ने भाई के घर बधावा भेजा है |”
“अरे, तो आज का मनहूस दिन ही मिला रहा इन्हे ?”
“परमेसुरीदीन के लिए मनहूस थोड़े है। अब्बू खाँ पठानी से गद्दारी करके मुगलों से मिल गए और परमेसुरी अपने साले आतमा महाराज को धोखा देके, अब्बू खां के ज्योतिषी बन गए, लम्बी भेंट पाय गए”
आत्माराम जी के बैठके में पंडाइन भौजी आँसू पोंछती सिर झुकाए खड़ी थी।उकड़ू, बैठे हुए आत्माराम जी का मुखमण्डल क्रोध और क्षोभ से बिफर रहा है। उनके बहनोई ने उससे ही अब्यू खाँ जमीदार के भविष्य की खैर-खबर पूछी और उन्हे कोरा सवा टका देकर बाकी दक्षिणा आप हड़प गए ।अब अपनी सम्पन्नता और उनकी विपन्नता का ढोल पीटने के लिए इतनी धूमधाम से बधावा भेज रहें हैं।आत्माराम की आंखें क्रोध के मारे छलक पडी़, कहा-“सत्यानाश जाय इस दुष्ट का। हमारे दुर्भाग्य पर हँसने के लिए यही अवसर मिला था उसे? वह सन्निपात में पडी़ है, गाँव शोक-मग्न है और यह गद्दारों का हिमायती बाजे बजवा रहा है।“
“अरे परमेसुरी को तो सात गाँव के लोग जानते हैं। भूलो उस नासपीटे को, भीतर आओ। हुलसिया हमार अब जाय रही है। ऐसा हत्यारा जनमा है कि बिचारी को न बैद मिला न दवा-दारू हुई सकी । हाय राम ज़ी, यह क्या गजब कर डाला है ईसुरनाथ।” पंडाइन फिर रो पड़ी और पल्‍ले से आँखें ढँक लीं।
“जाय के क्या करूँगा भौजी? (आकाश की ओर दृष्टि-संकेत करके ) अव तो वहीं भेंट होगी।” कहते हुए आँखे फिर छलछला उठीं। बाजे और पास सुनाई पड़ने लगे थे।
“जाओ, तुम्हें हमारी सौंह। चमेली जिजिया, तुम इनको भीतर लिवा ले जाओ।हम इनको भगाय के आतीं है।”पडांइन भौजी क्रोधावेश में बैठक से बाहर निकल आईं। घर के उढ़के हुए द्वार खोलकर माई के चबूतरे पर चढ़कर
खेत के पार बरगद के नीचे जुटे हुए पुरुष समाज को गुहारा- “ए भैरोंसिंह, सुकरू, बचवा के बप्पा।अरे दुइ तीन जने हियाँ आवौ हाली-हाली।ए बचवा के वप्पा .....”
उधर से भी गुहार का जवाब सुनकर पंडाइन चबूतरे से उतरी और सीढ़ियों पर मत्था टेककर कहा- "हे मैया, अब अपना कोप बाँधि लेव महतारी। गाँव की ये विपदा हरो जगदबा।अब तो करेजा काँप उठा है हमार। का होई है
महरानी?” 
बाजे बहुत पास आ चुके थे और उसकी प्रतिक्रियावश पंडाइन का भय- कम्पित अश्रु-विगलित स्वर क्रोधावेश में सहसा प्रचण्ड हो गया। वे कोसने कोसती हुई बाजेवालों की तरफ लपकी- “अरे सत्यानास जाय, गाज गिरे तुमरे ऊपर और तुमको भेजनेवाले के ऊपर।चुपाओ सबके सब।हुआँ त्राह-त्राह मची है और तुम ........”
क्रमशः

Saturday, 18 March 2023

tc 10

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
10-

बाबा की बात पर राजा भगत भी बोल उठे- “बकरीदी भइया ने एक बार हमें तुम्हें सुनाया भी रहा। तुमको याद है न, भइया?”
“इसी ज़मीन का सौदा करने राजा के साथ इनकें यहाँ गया था। तब इन्होंने ऐसे रोचक ढंग से पिछले समय की बातें सुनाई कि आँखन के आगे उनके सजीव चित्र उभर आए थे।” 
गणपति जी भी उत्साह भरे स्वर में बोले- “बकरीदी काका, यह लोग बड़ी दूर से सुनने की खातिर आए हैं।”
बकरीदी काका ने एक बार अपनी झुकी कमर को तानकर सीधी करने का प्रयत्न किया, कहने का जोश छाती में फूला, घुँधली आँखें दूर अतीत में सधी पर वैसे ही खाँसी आ गई। बूढ़ी काया के भीतर जागती जवानी का संघर्ष उनके चेहरे पर तमककर उभरा और खाँसी को रुकना पड़ा।कुछ क्षण अपने गले की खराश पर विजय पाने में लगे, जिससे आवाज का जोश फिर कुछ थका थका सा हो गया। धीरे-धीरे बात उठाई, कहा- “अब हमारे भीतर वैसा जवानी का जोस तो रहा नहीं बच्चा, बाकी यह बात है कि हमारे अब्बा बताते रहे कि गोसाईं महाराज का जनम भया रहा उस दिन, वहीं बिरिया अब्बा बड़े महाराज के पास हमारे ग्रह-नछत्तर पूछने के लिये गए रहे....”
“बकरीदी भैया, राजकुआरी और बेड़नियों की बात बताओ पहले। तभी तो इन पंचों को गाँव की विपदा का अंदाजा लगेगा।”
राजा भगत की बात पर बकरीदी मियां ने समर्थनसूचक सिर हिलाया और नये जोश में कहना शुरू किया -“हाँ, तो ये भया कि हुमायूँ बादसाह रहे। तौन उनके बाप पठानों से दिल्‍ली फतह कर लिये और फिर चारों ओर देस में कयामत आयै गई। मुगल ऐसी जोर से आए कि कुछ न पूछौ। कही राजपूतों से ठनी, कही पठानों से कटाजुज्क हुआ। बस लूटपाट, मारकाट, आगजनी, यही हाल रहा। हमारे राजा साहेब जैसपुर के पठानों के साथ रहे।तब मुगल राजा साहेब की गढ़ी घेरि लीनी।आसपास के गावँन मा गुहार पड़ गई। हमरे गाँव की सरहद पर ब्राह्मन, छत्तरी, अहिर, जुलाहा सातों जात के सूरमा हरदम डेरा डाले रहे।
पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिपकर खड़े हुए लगभग सौ-सवा सौ बहादुर उत्तर दिशा की ओर देख रहे हैं। उस दिशा में लगभग कोस भर की दूरी पर एक विशाल जंगल जल रहा है। लड़ाकों की गरज हुंकार कानों के पर्दे फाड़ रही है और उससे भी अधिक हजारों मनुष्यों का आर्तनाद भरा कोलाहल इन बहादुरों के चेहरों पर निराशा, क्षोभ और जोश की उड़न-परछाइयाँ डाल रहा है। कोई किसी से बोल नही रहा। मिलने पर आँखें प्रश्नों के उत्तर में प्रश्न ही पूछतीं हैं। आवाजें सुन-सुनकर इन लड़ाकौं में से किसी का ध्यान बरबस अपने हथियार लाठियों-भालों और तीर-कमानों पर जाता है, कलेजों से हताश निश्वाँस ढल पड़ती हैं।
गाँव में माई के थान पर कुछ बुढ़ियाँ आपस में खुसुर-फुसुर बातें कर रहीं हैं- “अरे ई दैउ के बज्जर अस जौन-जौन गरज रहे है उनसे कौन जीत सकत है भला।”
“हमे तुम्हें तो आत्मा की बहुरिया ने अटकाय लिया। नहीं तो अपनी बिटियन बहुरियन के साथ हम भी जमना पार हुई जातीं अब तलक।”
“अब भाई, जनम मरन तो कोऊ के बस की बात है नाहीं। हुलसी बिचारी तो आप दुखियाय रही है। कल संझा के बखत इत्ते-इत्ते दरद उठे पर फिर बन्द हुई गए। रात से तौ बिचारी के ज्वर भी चढ़ि आया है। हमतें रोय के कहै कि भौजी जाने कौन ब्रह्मराक्षस हमरे पेट में आयके बैठा है।
“अरे, महराजिन, ये लड़ाई झगड़ा , जीता-मरना तो रोज का खिलवाड़ है। हमरी जिठानी के भी बाल-बच्चा होय वाला है आजकल में। हम भी तो अटके बैठे है, का करें। हुसैनी जोलहा आय रहा है।इसकी घरैतिन ने भी तौ परी कि नरौ बेटा जना है।” सुकरू अहिर की घरैतिन बोली।
हुसेनी जुलाहा अपनी बगलों में बैसाखिया लगाए इधर ही आ रहा है। चेहरे से खाता-पीता खुश और आयु में ३५-४० के बीच का लगता है। भाई के चबूतरे पर बैठी महराजिनो में से एक बूढी ने पूछा -“हुसेनी, लड़ाई का समाचार कुछ पायो?”
“सलाम बुआ। धौकलसिंह गद्दारी कर गए। गढ़ी टूट गई है। राजा साहेब मारे गए। अब लूट मची है।”
“तब तो जानो कि हमारा गाँव बचि गया। मुगल अब इधर न आवैं साइत।”
“हाँ , कहा तो यही जाय रहा है, बाकी बुआ, लुटेरे-जल्लादन का कौन ठिकाना।”
मैदान तें लगे हुए घर के द्वार से एक कुरूप प्रौढ़ा दासी निकली और हुसेनी द्वारा बुआ कही जाने वाली बूढी से हड़बड़ाहट भरे स्वर में कहा- “पंडाइन भौजी, चलौ-चलौ, दाई बुलावत है, बखत आय गया।”
पंडाइन जल्दी से उठी। हुसैनी बोले-“हम भी महराज के पास आए है, चलौ।” 
छोटी सी कच्ची बैठक में पचीस-तीस बरस की आयु वाले दुबले-पतले चिन्तातुर ज्योतिषी आत्माराम चटाई पर छोटी सी चौकी पर रखे कभी पोथी के पन्ने और कभी पंचाग पर दृष्टि डालकर मिट्टी की बत्ती से पाटी पर कुछ गणित भी फैलाते जाते हैं। तभी हुसैनी की बैसाखियाँ दरवाजे पर खटकती हैं।
“सलाम महराज”
“आशीर्वाद, बैठो-बैठो”
“हमारे लड़के के नछत्तर विचारे महराज?”
“हुँ हुँ, अभी बताते हैं।” हिसाब पूरा किया और आत्माराम ने हताश होके पाटी और बत्ती चटाई पर एक ओर सरकाकर निश्वाँस ढील दी।
“क्या कोई असगुन विचार में आया महराज?”
“तुम्हारे लड़के की बात नहीं। राजा साहेब न बचेंगे”
“वह तो मर गए, महाराज”
“क्या, खबर आ गई है?”
“हाँ , इत्ती विरिया तो गढ़ी में लूटपाट चल रही है, कत्लेआम मचा है। अल्ला मिया की मरजी। अच्छा अब हमको आप बताय दे तो हम भी भागे। तारीगाँव में खाला के घर पर सब बाल-बच्चन को छोड़ आए हैं , वहीं लौट जायें।”
“तेरा बिटौना तो सौ बरस का आयुर्वेल लैंके आया है भागवान। जमीन- जैजाद पुत्र-कलत्र जावत सुख भोगैगा।हमने आज भोरहरे ही विचार किया था।”

दासी ने दरवाजे पर आकर उत्साह से थाली बजाई। सुनकर हुसैनी और आत्माराम पण्डित के चेहरे चमचमा उठे। हुसैनी ने कहा-“मुबारक होय महाराज, हम अच्छी साइत से आए हैं।”पण्डित आत्माराम तब तक अपनी जलघड़ी वाली कटोरी के भीतर बनी रेखाओं को देखने में दत्त-चित्त हो गए थे। जलघड़ी का बारीकी से परीक्षण करके पंचाग पर नजर डाली।
क्रमशः

Friday, 17 March 2023

tc 9

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
9-

ध्यानमग्न बाबा की तनी हुई देह, परम शांत मुखमुद्रा को कुछ देर तक बड़े भाव से दखते रहने के बाद गणपति बोले- “यह आयु और उस पर भी जवानों की सी फुर्ती, नियम से व्यायाम करना और बिना थकावट इतनी भीड़ से निपटना इन्हीं का काम है। हम तो इनके बच्चे समान हैं पर इस उनहत्तर-सत्तर की आयु मे ही थक गए।”
राम सोत्साह वोला- “अरे काशी के अकाल और गिल्टी की महामारी के दिनों में इन्हें देखते आप। दसों दिशा डोल-डोल कर काशी का हाहाकार अपने भीतर के राम बल से रौंदते चलते थे।”
“सुना है, उन दिनों यह आप भी गिल्टी से पीड़ित रहे थे?”
“वह तो वात रोग हुआ था। इन्होंने बड़ा दु:ख झेला पर उसमें भी जब तक शरीर चले तब तक दूसरों का दुख भी झेलते ही रहते थे। इन्हीं के उत्साह से हम सैकड़ौ जवान थककर भी न थक पाए। दिन-रात रोगियों की सेवा करते, शव ढो-ढो कर फूँकते और आठों पहर सीताराम की गुहार लगाकर अपना मनोबल बढ़ाया करते थे और सचमुच हममें से दो लड़को को छोड़कर कोई न मरा।”
तब तक बेनीमाधव जी भी आ पहुचें। बातों का रस गहरा हो चला। बेनीमाधव जी की कथा जिज्ञासा अब बड़ी बेसबर हो चुकी थी। राम से चिरौरी करने लगे कि किसी जुगत से बाबा को अपनी जीवन कथा सुनाने के लिए प्रेरित कर दो। गणपति जी को सहसा एक सूझ आईं, बोले -"अच्छा, हम आपकी बात बनाय देंगे। हम जाते हैं और रजिया काका, वकरीदी काका को लेकर पहुँचते हैं। रजिया काका को साथ लेंगे तो बात का प्रँसग अपने-आप सध जायगा।”
बेनीमाधव उपकृत नयनों से उन्हें देखने लगे। गणपति जी तीव्र गति से दो डग चले फिर पलटकर रामू से कहा-“रामू जी, जाते समय गुरू जी के फला- हार के लिए हमारे घर पर एक आवाज़ लगाते जाइएगा। तैयार तो सब रहेगा ही।”
आधी-पौन घड़ी वाद ही बाबा का आधा आँगन गुलजार हो गया, आधा गिरे मलवे से भरा था। चटाइयों पर बकरीदी, राजा भगत, सत बेनीमाधव, गणपति उपाध्याय तथा गाँव के दो-एक सम्भ्रांत लोग बैठे थे।तुलसी के गमले के पास बाबा का आसन लगा था, पास ही बायीं ओर के दालान में रतना मैया का ठाकुरद्वारा था। चौकी पर मैया द्वारा पूजित बाबा की चरणपादुकाएँ रखी हुई दिखलाई दें रहीं थीं। उसी दालान के दूसरे छोर पर कोने में चूल्हा बना था और रसोई के कुछ बर्तन रखे थे। चूल्हे से कुछ हटकर कोठरी का बन्द द्वार भी दिखलाई दे रहा था। बारिश और धूप से बचाव के लिए जिस ओर चूल्हा बना था उसके सामने वाले दालान का द्वार फूस की छपरी से ढंका हुआ था। दाहिनी ओर का सारा भाग ध्वस्त पड़ा था।बाबा का मुख और दूसरों की पीठ बैठकवाले दालान की तरफ थी।

बात राजा भगत ने आरम्भ की, बोले-“हमारा तो यह मन होता है कि दुई दिन हमारी अमराई में बिताओ। हम तुम्हारी मालिश करेंगे। संग संग कसरत करेगें, डोलेगें, आम खाएगें, दूध पिएगें और मगन हुइके भजन-भाव करेगें। यह लड़के, चेला-चाटी कोई वहाँ न रहेगा।”
“वाह काका, तुमने तो अपने ही स्वारथ की बात सोची।” गणपति जी ने मीठी शिकायत की।
राजा वोले- “हमारा यह स्वारथ भी बड़ा है पण्डित।जब तक भौजी कीजिम्मेदारी रही तब तक तो हमारे मन मे कहीं चिन्ता नागिन जरूर रेंगती रही पर अब दसों दिसा से मन मुक्त है। दुइ दिन इनके चरन और सेइ लें तो हमारी सब साधें पुरी हो जायें।”
बाबा प्रसन्‍त मुद्रा में बोले- “ठीक है तो आज चलो।” 
“आज तो भैया, हमारे घर में तुम जूठन गिराओगे, बाल बच्चों का यह सुख हम न छीनेगें।”
“आज यहाँ रहेगें तो कल तुमको हमारे संग चित्रकूट चलना पड़ेगा। वहाँ सत्संग होगा।”
राजा भगत प्रसन्‍न होकर बोले-"यह तो और अच्छी बात है। अरे अब हम घर से मुक्त हैं। लड़के बालक घर-गिरस्ती सभालते हैं। एक भौजी का बंधन रहा तो वह रामघर चली गईं।अब हम तुम्हारे संग-संग ही डोलेंगे भैया, पर इन बातों से पहले अब हम गाँव के मतलब की एक बात पूछ लें कि अब यह घर तुम किसे सौंप रहे हो?”
अपनी काया की ओर इंगित करके मुस्कराते हुए बाबा बोले- “हमार घर तो यह है, वह भी जब तक राम न छुड़ावे।”
बकरीदी बोले- “यह घर तो भैया अब गाँव भर की अमानत है। हमारी तो फकत यह राय है कि इसमें मन्दिर स्थापित कर दिया जाय और तुलसीदास महाराज की बैठक में लड़के पढे़ं।”
सभी ने एक स्वर मे समर्थन किया। राजा बोले- “तो फिर हम एक बात और कहेगें। गनपती महाराज को पुजारी बनाय के ई जगह सौंप देव। इनके घर भर ने लगन तें भौजी की सेव़ा की है, और भैया के भी पुराने चेले हैं।”
“हाँ, रत्ना के लिए भेजी गई यह रामचरित मानस की प्रति और उनके व्यवहार की वस्तुए इसी के पास रहते से मुझे भी संतोष होगा।तारापति न रहा, गणपति तो है।”
वेनीमाधव जी के चेहरे पर भी अपने शिष्यत्व का फल प्राप्त करने की उतावली झलक उठी। बड़ी चतुराई से बात उठाई, पूछा- “यह घर आपका पैतृक निवास है? ”
“नही, वह पुराने विक्रमपुर गाँव के खडंहर तो आधे से अधिक जमना जी में तभी समा गए थे जब हम पंच नान्हें-नान्हें रहे। महाराज की जन्मभूमि भी जमना जी में समा गई | पुराने लोग बताते रहे कि तुलसी भैया को लैके मुनिया कहारिन जब गाँव तें चली गई तो एक साधू आया और कहि कि आज ई गाँव का सर्वनास होयगा, जिसे बचना होय वह गाँव छोड़ के चला जाय। उसके दुइ घड़ी बाद मुग़लों की फौज आई। बड़े महाराजा, भैया के पिता, मारे गए। सब गाँव स्वाहा हुइ गवा। हम लोगों के पुराने बंधु हम सबको लेके तारीगावँ भागे रहै। बड़ी प्रलय मची रही, राम-राम” - राजा भगत ने बतलाया।
“बेनीमाधव, तुम्हारी इच्छा पूरी होने का अवसर आ गया है। मेरे राम जी का पावन जीवनचरित महादेव भोलानाथ ही उद्घाटित कर सकते थे किन्तु मुझ अकिंचन की जन्मकथा यह बकरीदी भैया और राजा भगत ही सुना सकते हैं।”
क्रमशः

Thursday, 16 March 2023

tc 8

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
8-

अशोक वाटिका ध्यान-पटल से ओझल हो गई है। एक ओर काशी के भदैनी क्षेत्र की एक कोठरी में मानस लिखते हुए स्वयं और दूसरी ओर इस घर के ऊपर वाले कमरें में उदास रत्ना, जो मानों शब्द-प्रवाह में बहकर आती है और लिखते हुए तुलसीदास के हृदय में विराज जाती है, फिर बिन्दुवत‌ श्री सीताराम की इष्ट मूर्ति ध्यान-पट पर आती है और क्रमशः इतनी विराट हो जाती है कि अब केवल युगल चरण ही दृष्टि के सामने हैं, उसमें प्रणत रत्ना है और वे हैं। बिम्ब में ठहराव आ गया है। बिन्दु फिर बिन्दु हो जाता है। बाबा की बाहरी काया आनन्द विभोर मुद्रा मे मूर्ति सी निश्चल है।

बाहर बादलों की गड़गड़ाहट है, तेज़ तूफान और वर्षा की सायँ-सायँ है। बिजली का भयानक धमाका होता है। कमरा हिल उठता है, ध्यान भंग हो जाता है। “भैया, भैया, प्रभु जी, गुरू जी,” शब्दों की घबराहट और दालानवाले द्वार के किवाडों की भड़-भड़ सुनकर वे उठे और द्वार खोले। कमरे के भीतर तीन आकारों से पहले हवा के झोंकों ने प्रवेश किया और दिया बुझ गया।
“घर गिर रहा है, भैया, भागौ भागौ। ऊपर वाले कमरे पै गाज गिरी है, सब गिर पड़ा” -कहकर श्यामो की बुआ छाती पीटती हुई 'राम-राम' बड़बड़ाने लगी।
बाबा कमरे से बाहर निकलकर दालान में आ गए। तीखी बोछारों से वह जगह भीग रही थी। दीवार से चिपककर खड़े होने पर भी पानी से बचाव नहीं हो सकता था। आँगन में घना अधेरा होने के कारण ,ठीक तरह से यह अनुमान ही नहीं लग पाता था कि कितना भाग टूटा।
बाबा बोले- “यहाँ कब तक खड़े रहेगे, भीतर चलो।
“अरे भैया, जो यह भी भरभरा के गिर पड़ा तो क्या होयगा?”- श्यामो की बुआ घबराकर बोली। 
“तो हम सब ढोल बजाते भये एक साथ बैकुण्ठ पहुँचेंगे और कहेगे कि रामजी इस डरपोक डोकरिया को भी ले आए हैं।”
रामू और बेनीमाधव हँस पड़े। बिजली फिर चमकी, जल्दी-जल्दी दो बार उजाला हुआ, सारा आँगन ईंटों से भरा पड़ा था। बाबा का ध्यान बीती स्मृतियों के स्पर्श से बच न सका। 
जब गृह-प्रवेश हुआ था कितनी धृमधाम थी।पण्डितों की पूजा, ज्यौनार फिर गाँव की स्त्रियों ने मंगल गीत गाते हुए नववधू को प्रवेश कराया था।गाय थी, दो दास थे।रत्ना सारे घर में काम-काज करती कराती व्यस्त डोला करती थी।पति-पत्नी हिडोलें में सोते नन्हे तारापति को मुग्ध दृष्टि से देखकर फिर एक-दूसरे को देख रहे हैं- फिर कुछ ध्यान न आया, कलेजे मे साँस भर आई और ठण्डी होकर बाहर निकल गई।भीतर जाते हुए बोले- “वाह रे भाग्य। कभी घर न बसने दिया मेरा।”
“पर प्रभु जी, आपका घर तो अब जन-जन के हृदय मे बस गया है।”
“सुखी रहो बच्चे, तुमने मेरी भूल सुधारी। राम जी की उदारता को क्षण- भर के लिए भी बिसारना नमकहरामी है। इतना साधते-साघते भी मन मोह की कीच मे फिसल ही जाता है। राम-राम।”
इतने ही में गणपति और उनके कुछ बाद राजा के लड़के-पोते अपने साथ में कुछ और लोगों को लिए हुए आ पहुँचे। गाज गाँव में ही गिरी है, कहाँ गिरी, इसका सही अनुमान न होने पर भी राजा ने अपने बेटों को बाबा की कुशल- मंगल पूछने के लिए भेजा। कुछ पास-पड़ौसी भी टाट के बोरे ओढ़े आ पहुचे, फिर पड़ोस से दो मशालें आईं। कमरे-दालान की स्थिति देखी गई। यह भाग भी अधिक सुरक्षित न था। 
बाबा बोले- “जो भाग गिरना था वह गिर चुका। तुम लोग भी चिन्ता मुक्त होकर अपने-अपने घर जाओ। तुलसी को एक रात शरण देने के लिए यह स्थान अभी सक्षम है।”
बाकी सब तो बाबा की आज्ञा से लौट गए पर गणपति ने वहीं रात बिताने का हठ किया। ऐसे हठ से भौजी की असल चेली का हठ भी भला क्योंकर न प्रेरित होता। बहुत कहने पर भी वह न गई।रतजगा करने का निश्चय हुआ और कीर्तन होने लगा।

दो दिनों तक बाबा भक्‍तों की भीड़ से इतने, घिरे रहे कि उन्हें दिन में तनिक भी विश्राम न मिला। (सबेरे संकटमोचन पर कथा सुनाते और दिन भर अपने घर पर रोग शोकधारी नर-नारियों को धीरज और विश्वास देते हुए किसीको काशी विश्वनाथ की भभूत और किसीको मत्रं देकर अपनी बला प्रेम से हनुमान जी के चरणों में फेंकते हुए उन्होंने दो दिनों में हजारों की भीड़ निबटाई। दूसरे दिन सांयकाल घोषित भी हो गया कि बाबा कल यहाँ से चले जायेगें। कहाँ जायेगें यह पूछने पर भी किसीको न बतलाया गया।
नब्बे वर्ष के तपस्वी के चेहरे पर रोग की हल्की छाप तो थी पर थकावट का नाम न था। इसे देखकर गाँववाले तो चकित हुए ही बेनीमाधव जी भी चकित हो गए। सुकर खेत में भी बाबा के दर्शनार्थ बड़ी भीड़ उमढ़ आया करती थी, पर वहाँ हवा फैल गई थी कि बाबा चार महीने रहेगें, इसलिए दर्शनार्थियों की दैनिक सँख्या मे संतुलन आ गया था। उन्हें विश्राम करने का अवसर मिल जाता था।बेनीमाधव जी ने बाबा के प्रति काशीवालों की भक्ति-भावना के भी अनेक प्रदर्शन देखे हैं। काशी में भीड़ तो नित्य ही रहती पर बाबा चूकि वहीं के निवासी रहे, गलियों -महल्लों मे प्राय: डोल भी आते हैं इसलिए वह दाल में नमक की तरह उनके जीवनक्रम में रमे हुये हैं। परन्तु राजापुर का यह विशाल जन- समूह तो वेनीमाधव जी के लिए अपूर्व था। हिन्दू, मुसलमान, अमीर, गरीब में कोई भेद नहीं, सबको जात और वर्ग एक है, वे आर्तजन है। उनके तन-मन नाना बाघाओं से पीड़ित होकर घबरा उठे हैं, उन्हें सहारा और प्रेम चाहिए। तुलसी, राम का खास दास, अथक भाव से रामजनों को सेवा करता रहा। संयोग यह भी रहा कि बदली रही पर पानी न बरसा।
तीसरे दिन तड़के मुँह अधेंरे गणपति जी और रामू पण्डित अपनी नियम पूजा से खाली हो चुके थे किन्तु बाबा का ध्यान पूरा होने में अभी देर थी। वेनीमाधव जी भी लम्बी माला जपते हैं पर उनका जप बाबा से पहले पूरा हो जाता है। उस समय तक स्नानार्थी आने लगते हैं। आज भी आने लगे थे।
क्रमशः

Wednesday, 15 March 2023

tc 7

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
7-

मैं तो प्रभु का एक तुच्छ सेवक मात्र हूँ।”
“तो क्‍या मेरी इच्छा पूरी न होगी, महाराज?” 
“रामचंद्र जाने। सब कुछ उन्हीं की इच्छा से होता है किन्तु हमारे जीवन- वृत्त में धरा ही क्‍या है। जन्म-काल से लेकर अब तक केवल अपार दुःख-दुर्भाग्य ही मेरे साथ रहा है। लोक में कहीं ठौर-ठिकाना न मिला, परलोक की जानता नहीं। मेरे जीवन में जो सारतत्त्व है वह केवल राम ही है”
“वही तो दर्शाना चाहता हूँ , गुरू जी 
चरितों में रामचरित ही श्रेष्ठ है”- रामू बोला-"आप ही ने बखाना है प्रभु कि राम के दास का महत्व राम से भी अधिक होता है। संत जी की इच्छा लोका की इच्छा है।”
“मानस में, विनय पदों मे, कवितावली और दोहों में अपनी अनेक रचनाओं में मैंने अपने जीवन की अनुभूतियाँ ही तो समर्पित की हैं।कुछ पण्डितों नें दग्ध वाण द्वारा मुझ पर यह लाछंन लगाया कि नारी के प्रति मेरे मन में घृणा और उपेक्षा का भाव है।”
“यदि हो भी तो इसमे अनुचित क्या है प्रभु? विर्वत को सांसारिक सामनाओं और कामिनियों से मन मोड़ने के लिए उनकी उपेक्षा करनी ही पड़ती है।सत्य है महाराज, भगवान शंकराचार्य भी कह गए हैं कि नारी नरक का द्वार है। इस वासना के.....”

बाबा ने टोका- “यह चर्चा फिर कभी हो सकती है।विश्वास करो बेनीमाथो।रामू, भीतर का दीप जला दे पुत्र, मैं वहीं सोऊँगा।
“जो आज्ञा प्रभु, किन्तु भीतर तो बड़ी गर्मी है।”
“भीतर की गर्मी बाहर की गर्मी को दबा देती है।"
रामू को फिर कुछ कहने का साहस न हुआ।वह भीतर वाले दालान के अहाते से दिया उठा लाया, कमरे का बुझा दीप आलोकिक किया फिर मृतक के स्थान का दीप भी जलाने चला तो बाबा बोले-“उसे रहने दे। दालान का दिया यहीं रख दे और विश्राम कर।”
“आप अकेले रहेंगे, प्रभु ?
“अकेला क्यों, मेरी बुढ़िया मेरे साथ रहेगी, भाई।”
“तो चौकी .....”
“चौकी बिछावन की दरकार नहीं।उसके धरती पर छूटे हुए प्राण मुझे यहीं मिलेंगे, जा।”
रामू आधे क्षण तक स्तब्ध खड़ा रहा, फिर कुछ कहने पूछने का साहस न बटोर सकने के कारण दिया बालकर द्वार बन्द कर दिए। चबूतरे बाले द्वार के सामने वेनीमाघव खड़े थे। बाबा ने उधर के द्वार भी बन्द कर लिए और उस स्थान पर जा बैठे जहाँ उनकी पत्नी ने अपनी देह त्यागी थी। थोड़ी देर सिर झुकाए बैठे अपने दाहिने हाथ से उस जगह की मिट्टी सहलाते रहे, जहाँ रत्ना का मस्तक था। ध्यान में प्रिया का अंतिम रूप दर्शन था और मनोदृष्टि में चार आँखे एक-दूसरे मे लीन होकर आनन्दमग्न थीं।

“सीताराम ! सीताराम “- रत्ना का स्वर है। कहाँ से आ रहा है? सबेरे धरती पर दिखलाई पड़ती अद्धांगिनी अब माया की तरह विलुप्त है। 
“सीता- राम ! सीताराम ! - कहाँ है? ” मन के झरोखे से झाँक रही है, दिये की लौ में देख रही हैं। धरती पर टिकी हथेली उठकर गोद में बाये हाथ की खुली हथेली पर आ जाती है, काया में सधाव आता है, आँखें दिये की लौ पर टिक जातीं हैं। दोनों भौहों के बीच बाबा के ध्यान-बिन्दु में उसका सूक्ष्म मन जुगनू- सा उड़ता हुआ प्रकट होता हैं और शीश दिये की लौ में समा जाता है। उनकी अन्तंदृष्टि में लौ लघु से विराट होती जाती है। उनकी कल्पता में पूरा कमरा अनंत विद्युत प्रकाश से ऐसा जगमगा जाता है, मानों कमरे का फर्श और दीवारें ईंट -चूने की न होकर मणिजटित हों। 
“सीताराम ! सीताराम !“- कानों मे गूँज समाई है, जिसमे अपना और रत्ना का स्वर गंगा-यमुना के समान एक में घुला-मिला है। गूँज की गति तीव्र से तीव्रतर हो रही है, शब्द शब्द न रह कर मधुर वाद्यध्वनि से गुँजरित हो रहे हैं। मणि-मणि में धनुषधारी राम और जगदम्बा सीता प्रसन्‍नबदन अभय मुद्रा में खड़े हैं। बाबा का मुख-मण्डल आनन्दलीन हैं। छोटे-छोटे अनंत विद्युत्‌ कण तीव्र गति से घुलते-मिलते एकाकार धारण करते इतने बढ़ जाते हैं कि अन्तंदृष्टि में केवल युगल चरण ही दिखलाई दे रहे हैं और फिर दृष्टि को एक मीठा झटका लगता है, रत्ना माँ के चरणों में झुकी बैठी है।पर मैं कहाँ हूँ ? नई व्याहुली-सी अलंकृत रत्ना तनिक चेहरा घुमाकर इन्हें देखती है, फिर नटखट गुमानी मुद्रा में पूछती है- “मुझे साथ लाए थे? ”
प्रश्न मन को सकुचाता है, फिर किंचित उत्तेजित होकर स्वर फूटता है- “तुम कब मेरे साथ नही रहीं?”
“तुम मुझे भला क्यों रखोगे, नारी-निन्दक” -रत्ना ने मीठी आँखे तरेरी।
“कौन कहता है ?”
“सारा जग ”
“पर क्या यह सत्य है ?”
“शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी ”
“मात्र यही क्यों और भी अनेक वाक्य हैं, परन्तु वे कथा- प्रसंग मे आए हुए पात्रों के विचार हैं?”
“और तुम्हारे ?”
“जिनके श्रीचरणों में मेरी आसक्ति है उन्हीं के श्रीमुख से वे विचार भी प्रकट हुए हैं। तुम्हारे विरह और प्रेम के उद्गार इतने शुद्ध थे कि वे राम के उद्गार बनकर जानकी माता के प्रति अर्पित हो गए-

“देखहुँ तात बसत सुहावा, प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।”
'देखहुँ' शब्द की ध्वनि मात्र से नया बिब जाग्रत‌ हो उठता है- 
वन से तापस राम तुलसी के स्वर में लक्ष्मण से कह रहे हैं-

“लछिमन देखत काम अनीका। 
रहहिं धीर तिन्हें कै जग लीका। 
एहिकें एक परम बल नारी। 
तेहिं तें उबर सुभट सोइ भारी।”

“उबर कर अपना पल्‍ला छुड़ा तो लिया मुझसे। फिर मैं कहाँ?
“तुम्हारी वासना से तो उबरा किन्तु तुम्हारे प्रेम में भी तो डूब गया और ऐसा डूबा कि.....
“पता ही न चला” (हँसती है)
“प्रेम हो और पता न चले?” 
अशोक बाटिका में राम-विरहिणी सीता के पास कपीवर श्रीराम का सदेश लेकर पहुँचतें हैं....मन के संकेत मात्र से कल्पना का दृश्य उभर आता है। हनुमान के हृदय में खड़े राम अशोक वन में बैठी सीता को देख रहें है और कपि कह रहे हैं-

“कहेउ राम वियोग तब सीता। मोकहूँ सकल भये बिपरीता॥ 
नवतरुकिसलय मनहुँ कृसानू। काल निसा सम निसि ससि भानू॥ 
कुवलय विपिन कुत वन सरिसा। वारिद तपत तेल जनु वरिसा॥ 
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिविध समीरा॥ 
कहेहु ते कछु दुख घटि होई। काहि कहहुँ यह जान न कोई॥ 
तत्त्व प्रेम करि मर्म अरु तोरा। जानत प्रिया एक मन मोरा॥”
क्रमशः

Tuesday, 14 March 2023

tc 6

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
6-

बाबा बेचारे उन्हें कैसे मना करें। काल, समाज अथवा अपने ही मन से आघात खाकर वे भी तो अपने आराध्य से ऐसा ही हठ करतें हैं। ऐसी ही विनय, ऐसा ही विलाप, अश्रुवर्षण उन्होंने भी बार-बार किया है। अपने भीतर राम- भरोसा पाने से पूर्व वे भी श्रद्धावश ऐसे ही अनेक साधु-संतो के पैर पकड़कर राम जी का दर्शन कराने के लिए गिड़गिड़ाते थे। उन्होनें भी गहरी उपेक्षा, तीखे- कड़वे वचन, भूख- दारिद्रय क्या नहीं सहा? आज राम- नाम के प्रताप से वे यह दिन भी देख रहे है कि राजा-रंक सब उनके आगे भिखारी बनकर चिनौरिया करते हैं। फिर भी उन्हे लगता है कि श्रीराम के चरणों में उनकी प्रीति-अतीति अभी पूरी नही हुई परन्तु दुनिया समझती है कि वे श्रीराम सरकार के दर्शन करा सकते हैं। “हे राम, तुम्हारे नाम की महिमा और तुम्हारे ही शील से आज मुझे तो यह गौरव देखने को मिला है उसे देखकर मैं बहुत संकुचित हो रहा हूँ।”
भावों ने उद्देलित होकर अपनी अंत:स्थल का स्पर्श पाया, मन में चलते हुए शब्द अब लयात्मक गति पाने लगे-
“द्वार द्वार दीनता कही काढ़ि रद, परि पाहूँ।
हैं दयालु दुनी दस दिसा दुख दोष दलन छम.....
दया कियो न संभाषन काहू।
द्वार द्वार.....

“जा बहिनी जा। राम-राम रटती आगँन में सो जा। राम जी तुझे सपने में दर्शन देंगे।”
फिर गाते हुए बैठक में प्रवेश कर गए, मृतक के रिक्त स्थान पर दिया जल रहा था। एक क्षण उसे देखते खड़े रहे, फिर बाहर का द्वार खोला और चबूतरे पर आ गए। 
रामू की एक आदत पड़ गई है, गुरू जी जब बिना कागद-कलम लिए ही भाव- वश होकर गुनगुनाने लगते हैं तो उनके पीछे-पीछे वह आप भी उन्ही शब्दों को उसी गायन पद्धति से दोहराने लगता है। उसे एक बार का सुना याद हो जाता है।
बाबा चौकी पर बैठ गए। पद गुनगुनाते दोहराते हुए रामू झट से अपने कंधे पर रखा अ्ंगोछा उतारकर गुरू जी के चरण पोंछने लगा। गुरु के चलित अन्तर्भाव का झटका बाहर पैरों मे प्रदर्शित हुआ। एक चरण का झटका रामू के हाथों को और दूसरा घुटने को लगा। बहते भाव को अपनी इस बाहरी हरकत से ठेस न पहुचें इसलिए उसने बड़ी फुर्ती और मुलायमियत से गुरु का लटका हुआ बाँया चरण अपने दाहिने हाथ से दबा लिया और गुनगुनाहट को तनिक ऊँचा उभार देकर गुरुमुख की ओर आदतवश देखने लगा, यद्यपि अधेरे पांख की रात में इतनी दूर से उसे बारीकी से कुछ सूझ नहीं सकता था। बाबा की भाव-घारा, अवाघ गति से बढ़ रही थी, किन्तु अब स्वर में रोष भी प्रकट हो रहा था।

‘तनु जन्यों कुटिल कीट ज्यो तज्यों मातु पिताहें।
 (स्वर का रंग बदला) काहे को रोष?काहे को रोष दोष काहि घौ मेरे ही,
अभाग मोसों सकुचत छुद् सब छाहूँ।

रोष का शमन होते ही और सारी पंक्तियाँ घाराप्रवाह गति से गाई गईं।रामू को एक बार भी अपना स्वर उठाकर बाबा की सहायता नहीं करनी पड़ी। बाबा का स्वर आत्म निवेदन रस में भीगता ही चला गया। अंत तक आते-आते स्वर इतना कोमल हो गया था कि करुणा और आनन्द में भेदाभेद करना ही कठिन था।गुरुमुख गंगा में दोनो शिष्य भी तैरते और डुबकियाँ मारते हुए छक रहे थे, लेकिन सबसे अधिक सुख तो भौजी की असल चेली ने पाया। बैठक के द्वारे वह चौखट से टेक लगाए बैठी थी। बड़ी ठसक भरे संतोष के साथ अपने उठे हुए घुटनों पर मुट्ठी बँधी बाँहों को लपेटकर उन पर अपनी ठोढ़ी टिकाकर सुन रहीं थी।
संत वेनीमाघव ने उठकर गुरू जी के चरणस्पर्श करके कहा- “कृतार्थ भया महाराज। आपके जन्म-काल के त्याग वाली बात हमारे मन मे चल रही थी। उसे आपने कृपापूर्वक अपनी वाणी से और उत्तेजित कर दिया है और जब इतनी उमस बढ़ाई है तो कृपापूर्वक मेह भी अवश्य ही बरसाइयेगा। मेरे और लोक-कल्याण के लिए अनुचर की झोली मे आपका जीवन-वृत्त पड़ जाय तो सेवक का यह जन्म सफल हो जाय । वे संत कौन थे जिन्होंने....”
श्यामो की बुआ खुद भी अपने भैया से कुछ निवेदन करना चाहती थी। उन्हें भय हुआ कि एक शिष्य जब इतनी लम्बी बकवास कर रहा है तो निगोड़ा दूसरा भी कही न लपक पड़े, इसलिए झट से उठी और चलती बात में भैया के पैरों पड़कर कहना चालू किया- “भैया, तुम पूरे अन्तर्रजामी हो। हमार जी जुड़ाय गया। अरे हम अपनी भौजी की असल चेली और चमत्कार देखि निगोड़ी मैनो। अब हम कहेगी कि हमरी खातिर भैया ऐसा भजन रचि के सुनाइन कि सुनते एकदम से हमार मोच्छ हुई गई। अरे, हम तो तुम्हारी दया से तर गई भैया। चलती विरियां भौजी हमैं इन चरनन की सरग-सीढ़ी दे गई।”
भावावेश में आकर श्यामो की बुआ रोने लगी।बाबा ने बुआ की झुकी पीठ पर हल्की उंगली कोचकर छेड़ा- “अरी तू तो यहाँ तर के बैठ गई, वहाँ तेरी भौजी का दिया बुझ गया।”
“हाय राम” कहके बुआ उठने को हुई कि बाबा ने उनके सिर को अपने हाथ से थपथपाकर कहा- “रहने दे, हमने तो ऐसे ही छेड़ दिया। रतना का दीपक तो हमारे हिरदे में दीपित है। जा, सो जा।अब भौजी भैया रटना छोड़कर सीताराम सीताराम रट,जा।”

पद-रचना के समय पैर पोंछने का काम रुक गया था, वह रामू ने बुआ बाबा संवाद की अवधि में कर डाला। अब इस प्रतीक्षा में था कि बाबा लेटें और वह चरण चापना आरंभ करे, किन्तु बाबा पैर पर पैर रखे वैसे ही बैठे रहे।
रामू ने गद्गद स्वर मे कहा- “विनय के २७५ पद आज रच गए प्रभु।”
खोई हुईं हाँ कहकर बाबा मस्ती मे आकर धीरे-धीरे गाने लगे-

साथी हमरे चलि गये, हम भी चालनहार कागद में बाकी रही ताते लागत बार॥

बाबा ने इतने करुण स्वर में गाया कि शिष्यों की आँखें भरने लगीं। बेनीमाघव बोले-“हम तो आपका ग्रथांवतार कराने के लिए आतुर हो रहे हैं और आप कबीर साहब के शब्दों की आड़ लेकर मरण कामना कर रहे हैं । अपने अनुचरों पर इतना अन्याय न करे गुरू जी।”
“अवतार धारण करने पर अविनाशी ईश्वर को भी मृत्यु के माध्यम से ही अपनी लीला संवरण करनी पड़ती है।
क्रमशः

Monday, 13 March 2023

tc 5

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
5-

संत वेनीमाधव जी की आयु पचास-पचपन के बीच में थी और रामू पण्डित अभी इकतीस के ही थे। वेनीमाधव गत सात-आठ वर्षों से अपने आपको बाबा का शिष्य मानते हैं। कुछ महीनों तक वे काशी मे उनके पास ही रहे थे किन्तु उनके बेलगाम मन को बाबा के सिद्ध गोस्वामीत्व से इतना भय लगता था कि उनमें प्रतिक्रियाएं उठने लगी थीं। तब बाबा ने उनसे कहा-“वटबृक्ष के नीचे दूसरा पौधा नहीं उगता, बेनीमाधव, तुम वाराह क्षेत्र में रहो और मन को सधाओ। बीच-बीच में जब जी चाहे यहाँ आ जाया करो।” 
तबसे वे प्रति वर्ष अपना कुछ समय गुरु सेवा में बिताते हैं। 
रामू बचपन से ही उनके साथ है। काशी की महामारी के दिनों मे उसमे बाबा के आदेशानुसार किशोरों का सेवक दल सगंठित करके काशी में बड़ा काम किया, फिर अपने पितामह के देहान्त के बाद वह उन्हीं के पास रहने लगा। बाबा ने ही उसे संस्कृत पढ़ाई है। अब वही उनकी देखभाल करता है, हरदम बाबा का मुखारविन्द ही निहारता रहता है। वह उनकी एक-एक भाव-भंगिमा को पहचानता है। उसकी अचूक और निष्कपट सेवा-भावना, अध्ययनशीलता और गायन तथा काव्य-प्रतिभा से प्रसन्‍न होने के कारण बाबा उसे पुत्रवत‌ चाहते हैं।
इन दोनों शिष्यों के साथ बाबा जब घर पहुँचे तो देखा कि लेटने के लिए उनकी चौकी बाहर चबूतरे पर लगाई गई है और गणपति उपाध्याय पास ही में खड़े उनकी बाट देख रहे हैं। घर का द्वार खुला देखकर वे भीतर चले गए। दालान से बैठक मे झाँककर देखा, जहाँ उनकी पत्नी ने प्राण तजे थे वहीं श्यामो की बुआ दिये की बत्ती ठीक कर रही थी। बाबा रात में पहचाने नहीं, पूछा- “कौन है भाई।”
“अरे हमको चीन्हें नाहीं भैया, हम है सिउदत्त सिंह की बहिन गंगा।”
“भला-भला, यहाँ सोएगी तू ?”
“हम न सोवैगें तो दिया कौन देखी?”
"हम”
“अरे इत्ते बड़े महात्मा हुइके तुम हियाँ पौढियों? बड़ी उमस है।"
“और तेरे लिए उमस नहीं है ?”
“हम तौ भैया, तुम जानौ कि जवते तुम सन्यासी भये तब से यहीं पर भौजी की सेवा में ही रहीं हैं। भौजी कहै, स्यामो की बुआ, तुम्हारी ऐसी सेवा कोई नही कर सकत है। हमहीं तो आज भिनसारे मैनो को हियाँ बैठाय के बाहर लोगन का बुलाव की खातिर गई रही। इत्ते में तुम आय गयौ, औरन क़ो भीतर आवे न दियो, मना कि हैव। हम आन लागे तो सव पंच हमैं रोकि लिहिन। कहार की पतोहू निगोड़ी अंतकाल के दरसन पाय गई और हम जो जनम-भर उनकी असल चेली रही सो बाहर रह गईं।” श्यामो की बुआ पछतावे के मारे रो पड़ी।
भोले मुँह से शिकायत और रोना सुनकर बाबा को मन ही मन में हँसी आ गई, समझाते हुए कहा- “अच्छा, अच्छा, सोच न करो। तुम्हारी सेवा राम जी के खाते मे लिखी है।”
श्यामो की बुआ आँसू पोंछते हुए बोली -“अरे उनके खाते से हमारा कौन परोजन। भला-बुरा कहै वाले तो सब पंच हिया रहते हैं। मैना निगोड़ी दिन-भर सबते कहत फिरी कि उसने तुम्हारा चमत्कार देखा। सब जनी हमते कहै कि बुआ, मैना भागमान है, पुन्न लूट ले गई। तुमरे चरनन की सौंह भैया, आज दिन-भर हमको ऐसी रुवाई छूटी है ऐसी छूटी है कि (रोने लगी, फिर रोते-रोते ही कहा) एक तो हमार भौजी चली गईं दूसरे राम जी ने हमरा भाग खोटा कर दिया।” 
बुआ फूट-फूटकर रोने लगी।बाबा थके हुए थे।एक तो अद्धांगनी के अवसान से उनका मन एक सीमा तक अवसन्न था और फिर दिन-भर अपने भक्‍तों की श्रद्धा के अंघाक्रमणों का त्रास भी सहा था। इसके अलावा आज उन्हें चलना भी अधिक पड़ा था। बाबा के आदेश से गणपति अपने घर चले गए। रामू चाहता था कि गुरू जी विश्राम करें और वह पैर दावे। आज उन्हें सोने में भी अवेर हो गई थी। रामू को गुरु का कष्ट सदा असह्य था। वह उन्हें श्यामो की बुआ के व्यर्थ क्रंदन से मुक्त कराना चाहता था।
वेनीमाधव जी भी पहली बार गुरू जी की जन्ममभूमि में आए थे। गुरु के संबंध में कुछ बाते आज वे अकस्मात्‌ ही जान गए थे और बहुत्त कुछ जानने के लिए उत्सुक थे। उनका संघर्षशील मानस एक महापुरुष के संघर्पशील जीवन से अपने लिए बल ग्रहण करना चाहता था। थोड़ी देर पहले ही गुरू जी महाराज ने अपने बालमित्र की बात का उत्तर देते हुए बड़ी कचोट और व्यंग के साथ कहा था कि जन्मते ही घर से कुटिल कीट की तरह निकाल फेंके गए थे। इस बात का क्‍या रहस्य है? उनका जीवन-वृत्त क्या है? वाराह क्षेत्र इनकी गुरुभूमि है। कौन थे इनके गुरु? वाराह क्षेत्र मे बेनीमाधव बाबा ने जब एक दिन उनसे पूछा था तो उत्तर मिला था कि नररूप में नारायण मेरी बाँह गहने के लिए आ गए थे। फिर प्रश्न किया तो कहा कि अवसर आने पर सुनाएँगे। इसके कुछ ही दिनों बाद अचानक राजापुर आने का कारण बतलाए बिना ही वे ऐसा संयोग साधकर यहाँ के लिए चले कि अपनी जीवन संगिनी का अंतिम क्षण मोक्षकारी बना दिया। क्‍या महाराज पहले ही से जान गए थे? इस प्रकार वेनीमाघव जी अपने भीतर अनेक प्रश्नों से पीड़ित थे और उसका समाधान पाने को आतुर भी। पर यह बुढ़िया तो पीछा ही नहीं छोड़ रही, क्या किया जाय।
श्यामो की बुआ बाबा के चरण पकड़कर बैठ गई थी। वह रोए ही जा रही थी, हठ साधकर अपनी ही कहती चली जा रही थी। बाबा के दोनों चेलों ने उनसे विनती करनी चाही पर वे और भी चढ़ गईं, रामू के पैर को एक हाथ से ढकेलने का आवेश दिखलाकर कोध में बोली-“दूर हटो। तुम कौन हो हमको समझावे वाले? यह हमारे भैया हैं। हजारन को राम जी के दरसन कराइन है, मरती विरिया हमारी भौजी को भी कराए। निगोड़ी मैना हमको घोखा देके पुन्यात्मा बन गई। (रोकर) हम अपती भौजी की असल चेली, और हमहीं दरसन न कर पाईं।हम अब हम इनके चरन न छोड़गें। इन्हे हमारा उद्धार करना ही पड़ेगा। भौजी कह गई है हमसे की श्यामो की बुआ, तुम्हीं असल चेली हो।” श्यामो की बुआ ने बाबा के पैर पकड़कर क्रंदन ताण्डव मचा डाला।
क्रमशः

Sunday, 12 March 2023

tc 4

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी 
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ध्यान पट अरुण पीत हो गया, जैसे किसी रंगमंच की काली यवनिका उठा दी गई हो और यवनिका चारों ओर से गोलाकार होकर सिमटती हुई पीतपट के बीचों बीच अधर मे लटककर नाचने लगी।वह पीतपट ऐसा है जैसे विद्युत रेखा चौड़ी होकर फर्श की तरह फैल जाय और उसका अणु-अणु निरंतर कौंधने लगे। यह चमक श्याम बिन्दु के चारों ओर आ-आकर यों पछड़ती है जैसे तट पर सागर की लहरें पछाड़ खाती हैं। लहरों के छीटों से श्याम बिन्दु में एक आकार निर्मित होने लगता है। बिन्दु की श्यामता को वह आकार अपने आप में तेजी से समोने लगता है।अरूण पट के मध्य में कोटि मनोज लजावन हारे, सर्वशक्तिमान परम उदार सीतापति रामचन्द्र का आकार इस तरह झलकने लगा कि जैसे ब्रह्म बेला में दुनिया झलकती है।इस दृश्य का आनन्द हृदय में भरने लगता है और अधिक स्पष्टता से दर्शन कर पाने का आग्रह ध्यान को और एकाग्र करता है। बाबा को लगता है कि गंगा मानो उलटकर अपने उद्यम स्रोत श्रीरामचन्द्र के कंजारुण पद-नख मे फिर से समा रही हो, फिर और कुछ ध्यान नहीं रहा।भीतर बाहर केवल भाव भगवान है, तुलसीदास की कंचन काया एकदम निश्चेष्ट है। वे समाधिलीन हैं।

दोपहर तक राजापुर गाँव में कही तिल रखने की भी जगह नही बची थी। हर व्यक्ति बाबा के दर्शन पाना चाहता था। घकापैल मच रही थी। 'तुलसी बावा की जय, रतना मैया की जय, जय-जय सीताराम” के गगनभेदी नारों से किसी की बात तक नहीं सुनाई पड़ रही थी । गोस्वामी जी महाराज का आगमन सुनकर आस-पास के अनेक छोटे बड़े ज़मींदार और सेठ-साहुकार भी आए थे। मखाने, ताबे के टके, चांदी के दिरहम, सोने के फूल, पंचमेल रत्नों की खिचड़ी, जो जिससे बन पड़ा , अर्थी पर लुटाया। गरीबो-मंगतो की झोलिया भर गईं। विमान के झागे ढोल-दमामे, नरसिहे, घंटा-शंख-घडियाल बजाते कोस-भर का रास्ता चार घंटे में पार हुआ। सूर्यास्त के लगभग बाबा ने मैया की चिता में अग्नि दी। उस समय विरक्त महात्मा की आँखों से भी आँसू टपकने लगे। यह देखकर आस-पास खड़े उनके भक्तगण भाव विगलित हो गए। जन समाज सीताराम- सीताराम की रटन में लीन हो गया ।
सीताराम की गुहार बाबा के कानों में ऐसे पड़ी जैसे कोई अंधा बन्द गली में चलते-चलते दीवार से टकराकर अपना सिर चुटीला कर ले।मन को पछतावा हुआ, 'हे प्रभु, तुम्हारी यह माया ऐसी है कि जन्म भर जप-तप साधन करते- करते पच मरो तब भी इससे पार पाना उस समय तक महा कठिन है जब तक कि तुम्हारी ही पूर्ण कृपा न हो। सुनता हूँ , विचारता हूँ , समझता भी हूँ , यहाँ तक कि अब तो दूसरों को विस्तार से समझा भी लेता हूँ पर मौके पर यह सारा किया धरा चौपट हो जाता है। हे हरि, वह कौन-सी अनुभूति है जिसे पाकर मैं इस मोह जनित भव दारुण विपत्तियों के संत्रास से मुक्त हो सकूँगा। मेरे मन को वह ब्रह्म-पीयूष मृदु शीतल रस पान करने का कब अवसर मिलेगा कि जिससे वह झूठी मृग जल तृष्णा से मुक्त हो सके। अगले शुक्ल पक्ष की सप्तमी को आयु के नव्बे वर्ष पूरे हो जायगें। अब भला मैं और कितने दिन जिऊँगा जो तुम मुझे आशा निराशा की चकरघिन्नी में नचाते ही चले जाते हो। दया करो राम, अब तो दया कर ही दो।आँखें फिर भर गईं।
पीछे भीड़ में'सीताराम-सीताराम' हो रहा था, कहीं-कहीं बातें भी हो रही थीं-
“चुपाय रहो शास्त्री, अवसर देखी, यह प्रेमाश्रु हैं”
“प्रेमाश्रु और ज्ञानी बहावे? अरे, भरी जवानी में हमारी दुइ-दुइ पत्नियाँ मरीं, और कसी रस की गगरिया,मदनमोहिनी, जिन पर आठौं पहर हम प्रेम से अपने प्राण निछावर करते रहे पर हमने तो एक्कौ आँसू न बहाया। चट से तीसरी ब्याह लाए और आत्मसंगम के बदले गर्ग संहिता का उपदेश याद करे लगे कि--
“दुर्जृदा शिल्पिना दासा दुष्टस्य पटहा: स्त्रिय ताडिता मार्दव यान्ति नते सत्कार भाजनम्‌।”

“यौं तौं इन्होंने भी लिखा है कि 'शुद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।” 
“लिखने से क्या होता है जो अमल में लावे सो ज्ञानी”
“पण्डितवर, अपने गाल बजाने के लिए क्या यही अवसर मिला है आपको?”-उत्तेजनावश रामू का स्वर तनिक ऊंचा उठ गया ।
“रामू ” बाबा ने पीछे घूमकर देखा।रामू और बेनीमाघव बाबा के पीछे खडे थे। उनसे दस कदम पीछे कोनें में अघेड़ वय के वैष्णव तिलकधारी शास्त्री और त्रिपुण्डधारी सुमेरु जी थे | बाबा की गर्दन पीछे मुड़ते ही वे दोनों चोर की तरह पीछे दुबक गए, यद्यपि बाबा ने उनकी ओर देखा तक न था। बाबा का आदेश पाते ही रामू का क्रोध से तमतमाया हुआ चेहरा विवश भाव से नीचे झुक गया।
शमशान से लौटने पर बाबा की इच्छा थी कि संकटमोचन हनुमान जी के चबूतरे पर सोएँ, पर बड़े-बड़े लोग उनके विश्राम के लिए राजसी ,सुख प्रस्तुत करने को आतुर थे। हर एक उन्हे अपने शिविर में ठहराना चाहता था। राजा अहिर इन बड़ो की बातों से बिगड़ गए, बोले-“भैया औरे काहे सोवैं? अरे, हियाँ उनका घर है, गाँव है, जन्मभूमि है।”

घर, गाँव , जन्मभूमि, यह शब्द बाबा के मन में तीन फाँसों से चुभे, व्यंग फटा, हँसीं आई, कहा- “घर घरेतिन के साथ गया। गाँव तुम्हारे नाम से बजता है और रही जन्मभूमि वह तो सूकर खेत में है भाई।यहाँ से तो कुटिल कीट की तरह माता-पिता ने मुझे जन्मते ही निकाल फेंका था।”
राजा के चेहरे पर ऐसी कंप चढ़ी कि मानो बाबा को घर-गाँव से निकाल फेंकने का अपराध उन्ही से हुआ हो, किन्तु उनका मन बचाव के लिए तुरंत ही एक सूझ पा गया, मुस्कराये, फिर कहा-“तो उसमे बुराई क्या भयी? गाँव से निकले तो राम जी की सरन में पहुंच गये हैं”
तुलसी बाबा भीतर ही भीतर कट गए, सिर भुकाकर कहा- “नीकी कही। तुम खरे गोस्वामी हो रजिया, मेरा बहका पशु पकड़ लाए। ठीक है, मैं उसी घर मे रहूँगा जिसे तुम मेरा कहते हो।”
राजा और बाबा की बातो में ऐसी पहेली उलझी थी कि जिसे सुलझाए बिना न तो बेनीमाधव जी को चैन पड़ सकता था और न राम द्विवेदी को।
क्रमशः

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