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गोपी गीत
इस पद का निवृत्तिपक्षीय अर्थ भी है। श्रुति-कथन है कि भगवान् विरुद्धधर्माश्रय हैं; वे अनन्य-कल्याण गुणगण के आकर सगुण भी हैं तो निर्गुण भी हैं; अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड-उत्पादक, पालक एवं संहारक भी हैं, निष्क्रिय भी हैं। भगवत्-स्वरूप का निरूपण करते हुए श्रुतियाँ भी चकित हो जाती हैं। ‘यं चकितमभिषत्ते श्रुतिरपि’ (शिवमहिम्न) सर्वसाधारण को श्रत्यर्थ में व्यामोह होता है। यही श्रुतियों द्वारा परब्रह्मार्थ का गोपन है। तात्पर्य कि श्रुतियाँ परब्रह्मार्थ का निर्देश परोक्षतः ही करती हैं; ‘नेति-नेति’ आदि वचनों के द्वारा अतद्-व्यावृत्ति से अतद् वस्तु का आरोपण करती हैं। ब्रह्माश्रित वस्तु ही अतद् है। अतद् का अपनोदन, उसकी व्यावृत्ति (निषेध) अपूर्व, अबाह्य आदि शब्दों से की जाती है। परब्रह्म अपूर्व और अबाह्य है। तात्पर्य कि अकारण एवं अकार्य है। ‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते।’ कार्य-कारण-रहित परब्रह्म को प्रावरित करने वाली श्रुति ही गोपांगना है। इस ‘गोपिकानाम् श्रुतीनाम् नन्दनो भवान् न इति न खलु शब्दो निषेधार्थकः।’ वेद-वाक्य गोपद-वाच्य श्रुति को आप आनन्दित न करते हों ऐसा भी नहीं है; तात्पर्य कि आप द्वारा ही वेदों का प्रामाण्य भी सिद्ध होता है। अतः आप आतमदृक् होते हुए भी गोपिकानन्दन नहीं हैं ऐसा भी नहीं है।
अनेक आचार्यों ने इस पद के अपने-अपने मतानुसार अनेक अर्थ लगाए हैं। विश्वनाथ चक्रवर्ती के भावानुसार गोपिकाएँ कह रही हैं ‘न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनाम्’ हे सखे! आप आत्मदृक् हैं, शुद्ध आत्मा ही अन्तरात्मा हैं, अन्य सम्पूर्ण बहिरात्मा हैं।
‘इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु पराबुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः।
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।
पुरुषान्न न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः।’
अर्थात, इन्द्रियाँ अर्थ की अपेक्षा करती हैं; इन्द्रियों से पर मन, मन से पर बुद्धि और बुद्धि से पर महान् आत्मा, महत् तत्त्व है; महत् तत्त्व से पर अव्यकत एवं अव्यकत से पर विशुद्ध आत्मा, परब्रह्म सर्वान्तरात्मा है।
‘अन्तरात्मदृक् अन्तरात्मा च दृक् च दृक् दृगेव।
रूपं दृश्यं लोचनं दृक् तद् दृश्यं दृक् च मानसम्।
दृश्याघीवृत्तयः साक्षी दृगेव न तु दृश्यते।।’
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धात्मक प्रपन्च ही दृश्य है; इस सम्पूर्ण दृश्य के द्रष्टा श्रोत, चक्षुरादि इन्द्रियाँ हैं; सम्पूर्ण इन्द्रियों का द्रष्टा मन तथा मन एवं मनोवृत्तियों का द्रष्टा ही अखण्ड साक्षी, सर्वद्रष्टा, शुद्ध अन्तरात्मा ‘दृक्’ है। अस्तु, विश्व-प्रपंच, इन्द्रियाँ तथा मन क्रमशः दृश्य एवं द्रष्टा दोनों ही हैं परन्तु शुद्ध आत्मा ही अखण्ड द्रष्टा है। एतावता गोपांगनाएँ कहती हैं, ‘हे सखे! आप ही अखिल प्राणियों के अन्तरात्मदृक् हैं। ‘विखनसा विश्वगुप्तये’ अर्थितः ब्रह्मा की प्रार्थना से विश्वपालन हेतु ही आपका आविर्भाव हुआ है अतः हे सखे! कुपित न होकर हम पर दया करो, शीघ्र दर्शन दो। आप द्वारा प्रेरित होकर आपके सख्यामृत-सिन्धु में अवगाहन कर हम सुख-बुध खो चुकी हैं अतः आपके ऐश्वर्य को भूल जाती हैं।’ भगवान् के विराट् स्वरूप-दर्शन से भयभीत हो भक्त अर्जुन भी प्रार्थना करने लगता है कि हे विभो! आपमें सख्य-भाव के कारण ही मैंने प्रमादवश आपके प्रति हे सखे! हे यादव! आदि सम्बोधनों का प्रयोग किया।
‘सखेति मत्वा प्रसंभ यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अज्ञानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।’
तात्पर्य कि सरल-भाव के उद्बुद्ध होने पर स्वभावतः ऐश्वर्य का तिरोधान हो जाता है। विश्वनाथ चक्रवर्ती के ही अनुसार एक अन्य भाव यह भी है कि गोपांगनाएँ कह रही हैं ‘हे सखे! अन्य के किञ्चित् दुःख से द्रवीभूत हो जाने वाली, व्रजेन्द्रगेहिनी, नन्दरानी, गोपिका यशोदा के पुत्र आप नहीं हैं।यदि आप गोपिका-नन्दन होते तो अवश्य ही हमारे इस घनीभूत सन्ताप से द्रवीभूत हो जाते। आप आत्मदृक हैं क्योंकि सर्वदृष्टा अन्तरात्मा ही सर्वसाक्षी रूप से जीवमात्र के संग सर्वदा सर्वत्र रहते हुए भी सर्वथा परोक्ष एवं असंग ही रहता है। ‘विखनसार्थितो विश्वगुप्तये, विशेषेण खनति, अवदारयति’ रचयिता ब्रह्मा ने अपनी सृष्टि की वृद्धि-हेतु आपसे अपने स्वरूप को परोक्ष रखते हुए ‘विश्वस्य जगतो गुप्तये प्रावरणाय’ आविर्भूत होने की प्रार्थना की थी; यही कारण है कि यहाँ व्रजधाम में आपको सर्वेश्वरता, सर्वज्ञता, अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायकता सर्वथा अज्ञात रहती है। हे आत्मदृक्! आपके साक्षात्कार से प्राणिमात्र मुक्त हो जाते अतः ब्रह्मा की मनोरथ-पूर्ति हेतु आपने स्वयं को अज्ञात रखने के लिये लोक-विरुद्ध अनेक लीलाएँ कीं। अथवा ‘विश्वं स्तिमितं जगत्। तस्य गुप्तये प्रावरणाय भवान् उदेयिवान्’ अर्थात् कतिपय लोगों के आवरण के लिए आविर्भूत होने की प्रार्थना की। इसीलिए जरासन्ध आदि अत्यन्त आस्तिक जन भी आपके इस विरुद्ध-धर्माचरण से भ्रमित हो गये। व्यामाहजन्य इस बन्ध के कारण ही उनकी गणना अमर-कोटि में हुई। हे सखे! सृष्टि-वृद्धि हेतु ही आपका आविर्भाव हुआ है अतः आप प्रकट होकर हमारी रक्षा करें।
वल्लभाचार्य के भावानुसार, श्रीकृष्ण-वियोगजन्य तीव्रताप से संतप्त गोपिकाएँ ‘न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मृदक्।’ जैसी व्यंग्याक्ति द्वारा श्रीकृष्ण से अपना पार्थक्य सिद्ध करते हुए कह रही हैं, हे सखे! स्वजन के प्रति ही उपालम्भ संभव होता है। जो अपना नहीं है, जिससे अपना कोई सम्बन्ध नहीं उसको उपालम्भ नहीं दिया जा सकता।’ यदि आप व्रजेन्द्रगेहिनी, नन्दरानी गोपिका यशोदा के पुत्र होते तो आपसे हमारा भी कुछ सम्बन्ध होता क्योंकि वे हमारी सास तुल्य हैं, हम सब उनकी पुत्र-वधूवत् हैं।
‘विखनसार्थितो विश्वगुप्तये, विशेषेण खनति, वेदार्थम् विशेषेण विचारयति इति विखना’ अर्थात वेदान्त का विशेष विचारक ब्रह्मा ‘विखनसा प्रोक्ता धर्माः वैखानसाः’ विखना प्रवर्तित धर्म ही वैखानस धर्म है, वैखानस मतानुसार वेंकटेशाद्रि में वेंकटेश को पूजा विशेषतः प्रतिपादित है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:
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