Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

‘न खलु गोपिकानन्दनः’ मानिनी नायिका की उक्ति है। श्रृगार-सिद्धान्तानुसार दो प्रकार की नायिकाएँ मान्य हैं; एक दाक्षिण्यती नायिका जो सर्वथा प्रिय के अनुकूल आचरण करती हैं, दूसरी वाम्यवती जो परम-अनुरक्ता होते हुए भी सदा ही प्रिय के विपरीत आचरण करती हैं। वाम्यवती नायिका का प्रणय विशेषतः सरस होता है अतः श्रृंगारशास्त्रानुसार वाम्या का ही अधिकाधिक मान होता है। रासेश्वरी, नित्य-निकुंजेश्वरी, राधारानी परम-वामा हैं। रासलीला के अन्तर्गत गोपांगनाओं को अत्यन्त दर्प हुआ फलतः उनमें प्रतिकूल आचरण उत्थित होने लगे; दक्षिणा ने वामा का एवं वामा ने दक्षिणा का धर्म अपनाया; अपने अलौकिक सौभाग्यातिरेक के कारण परम-वामा राधारानी भी कह उठीं ‘नय मां यत्र ते मनः।’ अर्थात् ‘जहाँ आपका मन हो वहीं मुझे ले चलो’ अतः भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गए।

कहा जाता है कि ‘श्रीमद्भागवत’ में राधारानी का उल्लेख नहीं है; वस्तुतः यह कथन निराधार है। ‘भागवत’ में राधारानी का उल्लेख परीक्षतः ही हुआ है। भगवान् श्रीकृष्ण किसी एक सखी के साथ अन्तर्धान हुए।
‘अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीती यामनयद् रहः।’

गोपांगनाएँ परस्पर कह रही हैं -
‘धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाङ्घ्रयब्जरेणवः।’
अर्थात, हे सखो! जिस एक सखी को लेकर श्रीकृष्ण अन्तर्धान हुए हैं वही ‘परम सौभाग्यशालिनी है। उस सखी विशेष की तुलना में हमारा सौभाग्य नीरस है। श्लोक में प्रयुक्त ‘एका’ एवं ‘काचित्’ विशेषण राधावाचक है। ‘एका’ शब्द प्रधानार्थ में प्रयुक्त होता है; राधारानी ही सर्वाधिक प्रधाना है।
‘कं प्रमात्मकं सुखं क्षणे-क्षणे आचिनोतीति काचित्।’

अर्थात, जो प्रेमात्मक सुख का प्रतिक्षण आचयन करे वही ‘काचित्’ है; वृषभानुकुमारी, नित्य-निकुन्जेश्वरी, राजराजेश्वरी राधारानी ही भक्त-हृदय में क्षण-प्रतिक्षण अनुराग एवं आह्लाद-वर्धिका हैं अतः वे ही ‘काचित्’ हैं। ‘आराधितः वशीकृतः हरिः अनया’ वश में कर लिया है हरि को जिसने वह अलौकिक सौभाग्यशालिनी ‘अनया’, ‘एका’ आदि शब्दों से राधा ही अभिप्रेत है। ‘राधामितः गतः राधितः शकन्घ्वादित्वात्पररूपम्’ जैसे कथन में भी राधा का उल्लेख स्पष्टतः हुआ हैं कृष्णोपनिषद् गोपालतापनीयोपनिषद्, गर्गसंहिता, ब्रह्यवैवर्तपुराण, नारदपुराण आदि ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर राधा का विशेष वर्णन प्राप्त है। वस्तुतः विभिन्न शास्त्रों के अर्थ का समन्वय करने पर ही शास्त्र का तात्पर्य सम्यक्तया प्रतिपादित होता है।

देवता लोग परोक्षप्रिय होते हैं। वेदों में कर्मकाण्ड का प्रतिपादन अस्सी हजार मन्त्रों में हुआ है; कर्म से उपासना सूक्ष्मतर है अतः उपासना का प्रतिपादन केवल सोलह हजार मन्त्रों में ही हुआ; कर्म और उपासना दोनों से ही सूक्ष्मतर है ज्ञान, ज्ञान का प्रतिपादन कुल चार हजार मन्त्रों में ही हुआ। राधातत्त्व सूक्ष्मतम है अतः इस तत्त्व का प्रतिपादन अल्प शब्दों में परोक्षतः ही किया गया है। उदाहरणतः-
‘तं इदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते।’

अर्थात, ‘इदं सर्व नामरूपक्रियात्मकं जगत् आत्मस्वरूपेण अदर्शमित्युक्तवान् इदंकारास्पदम्।’ सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च को आत्मस्वरूप से जिसने देख लिया उसका नाम इदन्द्र है। सर्वान्तरात्मा हिरण्यगर्भ ने ही अपने-आपको सम्पूर्ण विश्व-प्रपन्च में रूप में देखा अतः हिरण्यगर्भ हो इदन्द्र है। इदन्द्र के एक ‘द’ को परोक्ष कर दिया अतः इदन्द्र ही इन्द्र कहलाये; लोकव्यवहारानुसार भी परोक्ष सम्बोधन ही मान्य होता है।

‘जोग जुगति तप मन्त्र प्रभाऊ।
फलइ तबहि जब करिअ दुराऊ।’

योग-युक्ति, मन्त्र-तप आदि भी परोक्ष रहने पर ही प्रभावशील होते हैं। वेदविज्ञ सम्पूर्ण वेदों का उच्च स्वर से पाठ करते हुए भी गायत्री-मन्त्र के प्रसंग में चुप हो जाते हैं, उपांशु-जप करने लगते हैं। ‘मत्रि-गुप्तपरिभाषणे।’ वेद एवं स्तुति आदि का स्फुट स्वर से ही पाठ प्रभावशील है, पर मन्त्र का उपांशुजप ही महत्त्वपूर्ण है। ‘राधा’ परमानन्द कृष्णचन्द्र का गुप्त मन्त्र है; शुकदेव भी ‘राधा’ मन्त्र का ही जप करते हैं। सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान्, अखण्ड-ब्रह्माण्ड-नायक परात्पर, परब्रह्म का गुप्त मन्त्र होने के कारण ‘राधा-मन्त्र’ अत्यन्त गोपनीय है।

कथा-प्रसंगानुकूल गोपांगना कह रही हैं-‘इति न जानीमः’ अर्थात् हे सखे! हम निर्णय नहीं कर पा रही हैं कि आप कौन हैं? हम प्रेयसी जनों के घनीभूत ताप से आप द्रवीभूत नहीं होते अतः आप गोपिकानन्दन भी नहीं हो सकते क्योंकि गोपिका यशोदा तो अन्य के किन्चिन्मात्र दुःख से द्रवीभूत हो जाने वाली हैं। साथ ही वे दयामयी हमारी रक्षा हेतु सतत प्रयासशीला भी हैं। यदि आप गोपिकानन्दन होते तो अवश्य ही अपनी माता के दयामय स्वभाव का लेशमात्र प्रभाव आप पर भी पड़ा होता। आपके विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से हम दग्ध हो रही हैं यह जानकर भी आप हमारे रक्षा हेतु प्रकट नहीं होते अतः ऐसा प्रतीत होता है कि ‘विखनसार्थितो विश्वगुप्तये’ विखनसा, ब्रह्मा द्वारा प्रार्थित होकर विश्वरक्षा हेतु भी आपका आविर्भाव नहीं हुआ है। ‘सख उदेयिवान् सात्वतां कुले’ हे सखे, आपका आविर्भाव सात्वत्, भक्त-कुल में भी नहीं हुआ है। भक्त सत्त्वगुणी होता है; यदि आप भक्त-कुल में प्रादुर्भूत हुए होते तो निश्चय ही आप इतने कठोर, निर्दय एवं निष्करुण नहीं हो सकते; हिंसा, परद्रव्यहरण एवं परदारहरण आदि क्रूर गुण आपमें नहीं आ पाते। यदि आप सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी, सर्वान्तर्यामी आदि आत्मदृक होते तो निमिषमात्र के लिए भी आपका वियोग क्योंकर सह्य हो सकता? अन्तरात्मा से निमिषपर्यन्त विप्रयोग भी प्राणिमात्र के लिये असह्य है। अतः हे सखे! अपने प्राकट्य द्वारा हमारा सर्वप्रकारेण सशोधन करें।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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