Tuesday, 19 February 2019

69

69-
गोपी गीत

प्रेमी भ्रमर भी उन कमल-दलों के साथ ही हाथी के पैरों के नीचे पिस गया। तात्पर्य कि प्रेम-रज्जु-कृत बन्धन ही सर्वातिशायी सशक्त-बन्ध होता है। इस प्रेम-बन्धन के कारण ही अपरिमेय भी परिमित हो जाता है, अनन्त-कोटि-ब्रह्माण्डनायक, परात्पर, परब्रह्म भी प्राकृत-शिशुवत् यशोदा रानी के उलूखल से बँधे आँसू टपकाने लगते हैं।

अथाव ‘विश्वेषां गुप्तिः, विश्वस्य परमा गुप्तिः विलयः।’ ब्रह्मा द्वारा प्रार्थित होकर आप विश्व-संहार के लिए ही आविर्भूत हुए हैं। तात्पर्य कि जिसको विश्वशान्ति वांछित न हो ऐसे ही व्यक्ति ने श्रीकृष्ण-स्वरूप में विश्व-संहार-हेतु जन्म लिया है तथापि ईश्वर भी नियति का उल्लघन करने में समर्थ नहीं अतः संपूर्ण जीवों के फलोन्मुख-कर्मों के भोग-सम्पन्न होने पर ही प्रलय सम्भव है एतावता सम्पूर्ण विश्व-संहार में असफल होकर आप अन्तर्धान हो हम गोपांगनाओं के ही संहार में प्रस्तुत हो रहे हैं-

‘भ्रमति भवानबलाकवलाय वनेषु किमत्र विचित्रम्।
प्रथयति पूतनिकैव वधूवधनिर्दयबालचरित्रम्।’

अबलाओं के भक्षण-हेतु ही तो आप वन में भटकते रहते हैं। पूतना-वध जैसा आपका निर्दय बाल-चरित्र ही इस बात को व्यक्त कर रहा है।
‘सात्वतां कुले-गोपानां कुले-भक्तानां कुलेऽभूत्, अतः न तेषामेवऽनुरूपो भवितव्यः! हे सखे! वेदानुसार भी आप सर्वसखा, सर्वहितकारी, सर्वसृहृद् एवं जीवमात्र के परम-अंतरंग हैं अतः आप द्वारा हमारा संरक्षण ही अभिप्रेत है। सगुण साकार सच्चिदानन्द ईश्वरस्वरूप से आह्लादक भाव ही विशेषतः अभिव्यीजत होता है क्योंकि समान में ही सख्य सम्भव है। यदा-कदा भगवान् के विचित्र रूपों में भी पूर्ण भावोद्रेक हो जाता है।
शंकराचार्य के शिष्य, नृसिंह-भक्त, पद्मपादाचार्य की कथा ऐसे ही विरलभाव की द्योतक है। विकासवाद क्रमानुसार भगवान् मत्स्य, कच्छप, वराह, नृसिंह आदि विभिन्न रूपों में आविर्भूत हुए। कथा है कि भगवान के नृसिंह-रूप में आविर्भूत होने पर भगवती लक्ष्मी भी भयभीत हो गई। अदृश्य, अचिन्त्य, अग्राह्य, अलक्षण, अव्यक्त, अगोचर, अव्यपदेश्य, निर्विकार, मन-वचनातीत में प्रेम सम्भव नहीं। ‘पररीत्यैव परो बोधनीयः’ अर्थात् जो प्रतीति से ही बोधगम्य है। साधक की बुद्धि में भगवान् का अभिव्यन्जन जिस रूप में होता है उसी रूप में आपका प्राकट्य होता है। सजातीय में ही पूर्ण प्रेमोद्रेक सम्भव है।
अस्तु, संकोच के सम्पूर्ण हेतुओं का अपनोदन करने के लिए अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड-नायक आप गोपकुल में हमारे सजातीय बनकर प्रकट हुए; सम्पूर्ण शास्त्रीय मर्यादाओं से विनिर्मुक्त हो गोपाली-प्रियरूप में ही आपका आविर्भाव हुआ। सख्य-भाव की अभिव्यन्जना में ही प्रेम-वैभव पूर्णतः प्रस्फुटित होता है। आपकी यह अन्तर्धान-लीला सम्पूर्ण रस का व्यापादन करने वाली है। अतः हे सखे! हे व्रजेन्द्रनन्दन! आप प्रकट हो जायँ।
‘न खलु गोपिकानन्दनो भवान्’ आप गोपिका-नन्दन नहीं हैं। ‘गोपायति परं ब्रह्मेति गोपिका, माया’ जो ब्रह्म को परावृत कर ले वह गोपिका ही माया है। ‘नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।’ इत्यादि वचनानुसार परब्रह्म का आवरण माया द्वारा होता है।
‘तस्याः गोपिकायाः नन्दनो न कदाचित् भवति’ आप उस माया गोपिका के कार्य कदापि नहीं हैं। ‘कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः’ सम्पूर्ण जीवमात्र कार्योपाधिक हैं केवल ईश्वर ही कारणोपाधिक है। तात्पर्य कि चैतन्य ही माया के कार्य अन्तःकरणादि से उपहित होकर जीवपदवाच्य होता है। अस्तु, हे सखे! आप गोपिकानन्दन, माया के कार्य नहीं हैं किन्तु मायातीत, कार्यकारणातीत, सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी अन्तरत्मदृक् हैं।

भाव-विभोर व्रजांगनाओं में पुनः श्रीकृष्णकृत प्रश्न का स्फुरण होता है; वे अनुभव करती हैं मानो श्रीकृष्ण उनसे कह रहे हैं कि ‘हे गोपालियो! मुझे मायातीत, कार्यकारणातीत जानते हुए भी मेरे प्रति स्त्री-घातकी, निष्करुण, निर्दयी आदि रुक्ष वचन क्यों कहती हो?’ वे उत्तर देती हैं, हे सखे! आपके हृदय में अपने प्रति करुणा उद्बुद्ध करने के लिए हम ऐसे कठोर वचन कह रही हैं। ‘हृदय प्रीति मुख वचन कठोरा’ आपसे विप्रयुक्ता, विरह-व्याकुला हम आपकी अनुरागिणी जनों की दर्पाभास-जनित कोपोक्तियों पर ध्यान न देकर आप हमारी अन्तर्वेदना को समझें। ईश्वर की विशेषता यही है कि वह बाह्य-व्यापार-निरपेक्ष-आत्मदृक् है।

‘रहती न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सत बार हिए की।’
जिसने एक बार वस्तुतः भगवद्-चरणारविन्दों की शरणागति स्वीकार कर ली उसके अनेकानेक बहिरंग अपराधों को भी भगवान् सर्वथा भुला देते हैं।

‘सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।’
अर्थात, ईश्वर ही सर्वभूतों का एकमात्र स्वाभाविक सुहृद् है। संसार के सम्पूर्ण सौहार्द कृत्रिम हैं। अस्तु, गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे सखे! आप सर्वसुहृद् हैं, सर्वसाक्षी हैं, अतः हमारी विरहार्तिजन्य कोपोक्तियों पर ध्यान न दें वरन् हमारे प्रेमोद्रेक का अनुभव कर शीघ्र ही प्रत्यक्ष हो जायँ। हे सखे! आप आत्मदृक् हैं, साथ ही, गोपिका, यशोदारानी के भी सूनु हैं अतः हम गोपांगनाओं का आपसे विशेष सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध के कारण भी आपको हमारे सहायतार्थ दौड़ पड़ना चाहिए। अपने लोगों की सुरक्षा स्वजनों पर ही आधारित होती है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...