Tuesday, 19 February 2019

68

68-
गोपी गीत

‘सर्वपरिग्रहभोगत्यागः।
कस्य सुखं न करोति विरागः।’
सर्व प्रकार के भोग एवं परिग्रह का त्याग किसको सुख नहीं पहुँचाता? जो जितना ही भोग एवं परिग्रह में संसक्त होता है वह उतना ही संसार-जाल से आबद्ध होता जाता है और जितना ही भोग एवं परिग्रह से मुक्त होता जाता है उतना ही परमात्मा के निकट जाता है।
‘विखनसार्थितो.......... सात्वतां कुले उदेयिवान्’ जैसी उक्ति से श्रीकृष्ण के प्रति गोपांगनाओं द्वारा किया गया व्यंग्य भी ध्वनित होता है।

‘वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्।
यद् देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि।’

अर्थात, हे सखि! देवकी-सुत कृष्णचन्द्र के पादारविन्द की लक्ष्मी से संयुक्त होकर यह वृन्दावन-धाम अखण्ड भूमण्डल को दिव्य कीर्ति को विश्व में प्रसारित कर रहा है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण को देवकी-सुत कहा गया है। ‘द्वे नाम्नी नन्दभार्याया यशोदा देवकीति च’ (गर्गसंहिता) नन्द-पत्नी के देवकी एवं यशोदा दो नाम थे अतः श्रीकृष्ण देवकी-सुत भी कहलाए। गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे कृष्ण! आप व्रजेन्द्र-गेहिनी, नन्दरानी गोपिका के पुत्र नहीं हैं; आप तो देवकी के पुत्र हैं। नन्दरानी गोपिका यशोदा तो स्वभावतः कल्याणमयी, करुणामयी, परदुःखकातरहृदया हैं; यदि आप उनके पुत्र होते तो निश्चय ही हमारे दुःख से द्रवित हो जाते; हम व्रज-वनिताओं की व्यथा को जानते हुए भी आप अन्तर्धान हो ही रहे हैं; आपकी इस कठोरता को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि आप क्षत्राणी देवकी के पुत्र हैं अतः स्वभावतः ही कठोर हैं। ‘सात्वतां यादवानां कुले न तु गोपालानां कुले उदेयिवान्’ आपका आविर्भाव सरल-हृदय, स्नेहमय गोप कुल में नहीं अपितु सात्वत-यादवों के कुल में ही हुआ है। गोप-बालक तो सदा ही कहा करते थे ‘गोरे नन्द यशोदा गोरी तुम कत स्याम सरीर?’ नन्द बाबा भी गोरे हैं, यशोदा भी गोरी हैं परन्तु हे कृष्ण! तुम तो काले हो; निश्चय ही तुम नन्द बाबा और यशोदा के पुत्र नहीं हो; ये लोग तुम्हें कहीं से माँग-जाँचकर उधार ले आए हैं अथवा खरीदकर ले आए हैं। सहचरों की ऐसी व्यंग्योक्ति से खीझकर बाल-कृष्ण अपनी अम्मा के आँचल से उलझ जाते ‘माँ! अम्मा! बता दे, क्या मैं तेरा बालक नहीं हूँ?’ वात्सल्यमयी, करुणामयी, कल्याणी अम्बा यशोदा बालक को अंक में भरकर कहती ‘वत्स! भगवान् विष्णु की आराधना के फलस्वरूप हमने तुझे प्राप्त किया है। भगवान् विष्णु

‘अलसीपुष्पसंकाशं पीत-वासमच्युतं।
ये नमस्यन्ति गोविन्दं न ते यान्ति पराभवम्।’

‘श्रीमन्नारायण-विष्णु पीत वस्त्र धारण करने वाले तथा अलसी पुष्प की तरह नील हैं। यही कारण है कि तेरा रंग श्याम है। तो तू मुझे सर्वाधिक प्यारा है।’ बालकृष्ण प्रसन्नता से झूम उठते। बाल-सूर्य-रश्मि-संश्लिष्ट प्रफुल्लित अलसी पुष्प की मनोहर-भव्य-श्यामलता अत्यन्त विचित्र होती है; यह वर्णनतीत सौन्दर्य अवश्य ही अनुभाव्य है।

‘यादवानां कुले उदेयिवान् न गोपांगनाकुले’ आप गोप-कुल में नहीं अपितु यादवों के कुल में उत्पन्न हैं एतावता आप निष्करुण हैं; आपकी इस निष्करुणता के कारण ही ऐसा प्रतीत होता है कि ‘विश्वगुप्तये भवान् न उदेयिवान्’ आपका आविर्भाव विश्व-रक्षा-हेतु नहीं हुआ है किन्तु ‘अविश्वगुप्तये विश्वस्य गुप्तिर्विश्वगुप्तिः, न विश्वगुप्तिः अविश्वगुप्तिस्तस्यै’ विश्व-संहार-हेतु ही हुआ है। यही कारण है कि आपके विप्रयेाजन्य तीव्र-ताप से दग्ध हो हम आपकी अनुरागिणी-जन मरणोन्मुखी हो रही हैं फिर भी आप प्रत्यक्ष नहीं हो रहे हैं, दर्शन नहीं दे रहे हैं। आपके इस निष्ठुर व्यवहार से संसार भर में जितने भी आपके भक्त हैं वे सब भी दशमी-दशा (मृत्यु) को प्राप्त होंगे और सम्पूर्ण विश्व ही निस्सार हो जायगा, ध्वंस हो जायगा।

हे सखे! आप गोपिका, यशोदारानी के पुत्र दामोदर भी नहीं हो सकते। दामोदर अर्थात् दाम, रज्जु है जिसके उदर में। जिसका अत्यन्त बलशाली हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु जैसे भयंकर दानव भी नहीं बाँध सके, जो स्वयं ही अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अखिलेश्वर प्रभु हैं वही यशोदारानी के स्नेह वशीभूत हो उनके ऊखल में बँध गया।
‘बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि;
प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्।
दारुभेदनिपुणोऽपि षडंघ्रिः
निष्क्रियो भवति पंकज-कोशे।।’

अर्थात, यद्यपि संसार में अनेक प्रकार के बंधन हैं परन्तु प्रेम-रज्जु-कृत बन्धन तो सर्वथा ही विलक्षण है। कठोरातिकठोर काष्ठ को भेद देने में निपुण षडंघ्रि (भ्रमर) भी कमल को कोमलातिकोमल पँखुड़ियों में विवश होकर रह जाता है और उसके साथ ही पिस भी जाता है।
‘रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्रीः।
इत्यं विचिन्तयति कोषगते द्विरेफे,
हा मूलतः कमलिनीं गज उज्जहार।’

अर्थात, भ्रमर कमल-पुष्प-मकरन्द-पान में लीन था तभी सूर्य भगवान् अस्ताचलगामी हो गये; कमल मुकुलित हुआ; भ्रमर भी उस मुकुलित कमल में ही बँधा रह गया; नेह भरा भ्रमर अपने प्रेमास्पद कमल की पँखुड़ियों को काटने में विवश हो विचार कर रहा है कि पुनः रात्रि व्यतीत होगी, पुनः सुप्रभात होगा; सूर्योदय होने पर मुकुलित कमल पुनः प्रस्फुटित होगा; कमल के पुनः प्रस्फुटित होते ही मैं मुक्त हो जाऊँगा। परन्तु हा, हन्त! रात्रि व्यतीत होने से पूर्व ही कोई महामत्त गजेन्द्र उस सरोवर में अवगाहन करता हुआ उन कमलिनियों को समूल उखाड़ता-रौंदता आ घुसा।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

No comments:

Post a Comment

158 last

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी  158- फूटि-फूटि निकसत लोन राम राय को। कैलास फड़क उठे, बोले- "मित्र, तुम महात्मा तो हो ही पर खरे, कवि पहले ह...