Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

वाल्मीकि ही इतने कठोरचेता हैं जो ऐसी कथा को भी बारम्बार कह सकते हैं। नागोजी भट्ट कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि कठोरचेता नहीं हैं अपितु अतिशय भाव-विह्वलता में प्रलाप कर रहे हैं। इसी तरह गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘रामचरितमानस’ के अयोध्याकाण्ड का पाठक यह जानते हुए भी कि राघवेन्द्र रामचन्द्र परात्पर परब्रह्म हैं, उनके विप्रयोगजन्य संताप से विह्वल हो स्वभावतः रो पड़ता है। भगवान् रामचन्द्र के अनन्य भक्त पवन सुत हनुमानजी तो यही वरदान माँगते हैं कि ‘मैं निरन्तर ही भाव-विह्वल हृदय एवं अश्रुपूरित-नयन से भगवत्-कथामृत का पान करता रहूँ!’ सनातन गोस्वामी कहते हैं -

‘सन्त्यवतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतो भद्राः।
कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति।।’

अर्थात् पुष्करनाथ श्रीमन्नारायण विष्णु के अपरिगणित अवतार हुए परन्तु व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण से अन्य ऐसा कौन स्वरूप है जिसने लताओं में भी प्रेम प्रदान किया हो। श्रीकृष्ण-सम्बन्ध से लताएँ भी प्रेमार्द्र हो मधु-धाराएँ टपकाने लगीं।

‘नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मनस्तमोपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्।’
अर्थात, व्रजधाम के वृक्ष एवं लताएँ भी अपने पल्लव एवं शिखाओं से भगवत्-पाद-पंकज संस्पृष्ट-भूमि के संस्पर्श-हेतु वृन्दावन-धाम की भूमि पर झुक आईं। तात्पर्य कि जिसने भगवत्-सम्भोगजन्य लोकोत्तर आनन्द का अनुभव किया हो वही भगवद्-विप्रयोगजन्य तीव्र संताप का भी अनुभव कर सकता है; व्रजांगनाओं ने श्रीकृष्ण-सम्भोग-सुख का आस्वादन किया अतः उन्होंने ही भगवद्-विप्रयोगजन्य तीव्र संताप का भी विशिष्टरूपेण अनुभव किया; अन्य लोगों के लिए वैसी तीव्रानुभूति सम्भव ही नहीं हो सकी।

भाव-विभोर भक्तों के मन में भगवल्लीलाओं का स्फुरण होता है; भावभरी गोपांगनाओं के मन में भी श्रीकृष्ण द्वारा किये गये प्रश्न का स्फुरण होता है; वे अनुभव करती हैं कि श्रीकृष्ण प्रश्न कर रहे हैं, ‘निरन्तरमसम्यग्भाषिण्यः गोपाल्यः मां सम्यक् असमीक्ष्यभाषिण्यः।’ ‘स्वभावतः निरन्तर असम्यक् वचन बोलने वाली गोपियों! मुझे आत्मदृक् स्वरूप समझते हुए भी तुम लोग मेरे प्रति असंख्य-स्त्री-घाती, पातकी, मित्र-द्रोही, विश्वास-घाती आदि रुक्ष-वचन क्यों बोल रही हो? तुम्हारी ऐसी असंगत धारणाओं के कारण अब ऐसे एकान्त स्थान में चला जाऊँगा जिससे तुम लोगों के जीवन-पर्यन्त मेरा दर्शन ही न हो सके।’

ऐसी कठोर भावना के उद्बुद्ध होने पर गोपांगनाएँ तुरंत ही अपने भावों को परिवर्तित कर कहने लगती हैं, ‘न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिदेहिनामन्तरात्मदृक्।’ अर्थात्, आप केवल गोपिकानन्दन ही नहीं अपितु समस्त शरीरधारियों के आत्मदृक्, अन्तरात्मा के द्रष्टा भी हैं। वैष्णवाचार्यों ने अन्तरात्मा का अर्थ अन्तःकरण ही किया है अतः ‘अन्तरात्मदृक्’ का अर्थ अन्तःकरण के द्रष्टा, सर्वसाक्षी ही हैं। ‘आत्मानम्, जीवात्मानम्, अन्तरात्मानम् पश्यतीति अन्तरात्मदृक्।’ अर्थात्, जीवात्मा का अन्तर्यामी, जीवात्मा का द्रष्टा ही आत्मदृक् है। अतः सखे! आप हमारी अन्तर्वेदना के स्वयं साक्षी हैं। आप हमारे हृद्गत उपतापों को जानते हैं अतः आप भलीभाँति जानते हैं कि हम आपसे कोई कृत्रिम बात नहीं कह रही हैं; हमारे सन्तापों को जानते हुए हम पर कृपा कर शीघ्र ही दर्शन दें।

हे विभो! नन्दरानी, व्रजेन्द्रगेहिनी, यशोदारानी परमदयामयी, कल्याणमयी एवं करुणामयी हैं; यदि आप उनके पुत्र होते, यदि उनके उदर से ही आविर्भाव हुआ होता तो निश्चय ही आपमें यह निष्ठुरता नहीं आ पाती।हमारे मदनमोहन, श्यामसुन्दर तो कारुण्य-माधुर्य गुणगणोपेत हैं; अस्तु, निश्चय ही हम अनुरागिणी-जनों के दुःख से द्रवित हो प्रत्यक्ष हो जाते परन्तु आप तो हमारे सन्ताप से सर्वथा निरपेक्ष हैं; उदासीनता, असंगता आदि तो आत्मदृक् के ही गुण हैं।

‘उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः संगरहितो।
भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः।।
अकस्मादस्माकं यदि न कुरुते स्नेहमथतद्।
वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि।।’

अर्थात, आप तो उदासीन, स्तब्ध, अगुण एवं असंग पिता हैं, पुष्कर-पत्र के तुल्य निर्लेप हैं अतः आप हमारे सुख-दुःख की चिन्ता से रहित हैं।

‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।।’[2]

अर्थात्, एक ही शरीररूपी वृक्ष पर जीवातमा एवं परमात्मारूप दो समान शोभन पक्षी बैठे हैं; दोनों में सख्य भी है फिर भी जीवात्मारूप पक्षी कर्मफल को भोगता है परन्तु परमात्मा असंग है, द्रष्टा-स्वरूप है; एक नहीं खाता इसलिए शुद्ध रूप से प्रकाशमान है। जैसे दाहकत्व-प्रकाशकत्व-रहित लौह-खण्ड भी अग्नि-तादात्म्यापत्ति से दाहकत्व-प्रकाशकत्व-गुणयुक्त हो जाता है वैसे ही जीव भी सर्वशक्तिमान्, सर्वसमर्थ, सर्वान्तर्यामी से ही भोगोत्पादिनी विषय-ग्रहणानुकूला शक्ति को ग्रहण करता है तथापि परमात्मा ‘अनश्नन्’ ही रहता है; जीव भोक्ता है; परमात्मा द्रष्टा है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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