Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

ऐसे अद्भुत विद्यार्थी से जो न तो अद्यावधि प्राप्त हुआ और न भविष्य में ही प्राप्त हो सकता है क्या माँगा जाय ऐसा विचार करते हुए महर्षि सन्दीपनि कहने लगे, ‘हे पुत्र! तुमने जिस अद्भुत कौशल से विद्या ग्रहण् की वही सम्यक् गुरु-दक्षिणा है तथापि तुम्हारा आग्रह ही है तो मुझे मेरा वह पुत्र ला दो जो प्रभास-क्षेत्र में समुद्र में डूबकर मृत्यु को प्राप्त हुआ था। मेरी पत्नी अपने उस पुत्र की ही अभिलाषा रखती है।’ गुरु-पुत्र का अनुसन्धान करते हुए श्रीकृष्ण समुद्र-गर्भ में गए; वहाँ गुरु-पुत्र को न पाकर यमपुरी में गए और यमराज से गुरु-पुत्र के जीव को लौटा लाए।

हे प्रभा! मृत गुरु-पुत्र को कालान्तर में उसी स्वरूप में ला देना लौकिक नियमों से परे ही है; अघटित-घटना पटीयान्, भगवदीय-स्वात्म-वैभव द्वारा ही ऐसा लोकोत्तर चमत्कार सम्भव हुआ; तब फिर केवल हम व्रजांगनाओं के लिए ही यथावसर प्रतीक्षा की आवश्यकता क्यों कर हो रही है? इतना ही नहीं विशेषानुग्रहवशात् आपने स्वयं ही अपनी प्रतीक्षा का खण्डन भी किया है; कथा हे कि भगवान् श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के संग्राम में शस्त्र-ग्रहण न करने की और अनन्य भक्त शन्तनु-सुत भीष्म ने श्रीकृष्ण को शस्त्र-ग्रहण करा देने की प्रतिज्ञा की। भीष्म ने भीषण बाण-वर्षण द्वारा ही समयानुसार भगवत्-पूजन किया; अन्ततोगत्वा भगवान् श्रीकृष्ण रथ का पहिया चक्र-स्वरूप लेकर दौड़ पड़े; भगवान् ने अपनी प्रतिज्ञा भंग करके भी भक्त की प्रतिज्ञा रख ली। हे प्रभो! आपने भक्त की प्रतिज्ञा को मान देने के लिए अपनी प्रतिज्ञा का भी खण्डन कर दिया यह भी तो नियम-पालन-निर्बन्ध के विपरीत ही हुआ तब केवल हमारे ही सम्बन्ध में नियम-पालन-निर्बन्ध की, यथावसर की प्रतीक्षा क्यों? हे प्रभो! हमारे सन्ताप का अनुभव कर हमें शीघ्र दर्शन दो। श्रीधरस्वामी का कथन है-

‘न निर्गुणं न सगुणं वन्दे तत् प्रेम-बन्धनम्।
यद् बद्धं मुक्तिदं मुक्तं ब्रह्मक्रीडा मृगीकृतम्।’

अर्थात, मैं निर्गुण अथवा सगुण की पूजा नहीं करता; मैं तो उस प्रेमबन्धन की वन्दना करता हूँ जिसके वशीभूत हो स्वयं मुक्त एवं मुक्तिप्रद परात्पर परब्रह्म भी बद्ध हो गया। इस प्रेम-बन्धन के वशीभूत ही अपरिमेय भी परिमित हो गया; अनन्त ब्रह्माण्डनायक, सर्वाधिष्ठान, सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् भी गोपांगनाओं का क्रीड़ा-मृग बन गया। राजा-महाराजाओं के अन्तःपुरों में महारानियों के मनोविनोदार्थं मृगों को लालन-पालन किया जाता था; ये मृग अत्यन्त अनुकूल बनाए जाते थे अतः इनसे महारानियाँ यथेच्छा विनोद किया करती थीं। अद्वैतमतानुसार भी परात्पर परब्रह्म स्वतंत्र एवं सत्य-संकल्प है अतः स्वयं मुक्त एवं मुक्तिप्रद भी है तथापि ‘उपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्’ इस प्रेम-बन्धन के कारण ही उपनिषदर्थ परब्रह्म भी उलूखल में बँध गया; स्वयं परब्रह्म ही उनका क्रीड़ामृग बन गया।
हे प्रभो! आप तो गोपिका-नन्दन हैं; ‘गोपिकाः व्रजसुन्दरीः नन्दयति इति गोपिकानन्दनः’ व्रजसुन्दरियों का नन्दन करने वाले, आनन्द-प्रदान करने वाले ही हैं। अन्तर्धान होकर अपने विप्रयोगजन्य तीव्र ताप से हम गोपांगनाओं को दग्ध न करें। भगवत्-सम्भोग-सुख से अद्भुत प्रेमरस उद्भूत होता है; तदर्थ ही विप्रयोगजन्य तीव्र ताप की भी अत्यन्त तीव्र एवं मार्मिक विशिष्ट अनुभूति होती है।

‘राम-गमन वन अनरथ मूला।
जो सुन विस्व सकल भं सूला।’

पारमार्थिक दृष्टिकोण से राघवेन्द्र रामचन्द्र के वन-गमन के कारण वैदिक मर्यादा की सुरक्षा, धर्म का संत्राण, रावण का वध, देवताओं के संकट का विनाश, इन्दादिकों को उनके राज्य की पुनः प्राप्ति आदि अनेक शुभ फल हुए तथापि व्यवहारदृष्ट्या सम्पूर्ण जगत् ही संत्रस्त हो उठा।
‘विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः।
अपिवृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पांकुरकोरकाः।
उपतत्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च।
परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च।’

अर्थात भगवान राघवेन्द्र रामचन्द्र के वियोगजन्य तीव्र ताप से अयोध्या की नदियों का जल भी वैसे ही खौल उठा जैसे अदहन (चावल पकाने के लिए चढ़ाया हुआ जल) खौलता है। महाराज दशरथ के प्रति कहा जा रहा है ‘हे राजन्! आपके राज्य के सम्पूर्ण वृक्ष एवं लताएँ भी अपने पुष्प, शाखा, पल्लव, अंकुरादिकों के संग परिम्लान हो गये हैं, झुलस गये हैं। जब जड़ भी ऐसी दशा को प्राप्त हो रहे हैं तब चेतन की स्थिति का वर्णन कौन कर सकता है? भगवान् श्री राघवेन्द्र रामचन्द्र के समय की कथा तो निश्चय ही अकथ है जबकि आज भी ‘रामायण’ के पाठक को ‘अयोध्याकाण्ड’ के अन्तर्गत राम-वन-गमन का वर्णन पढ़ते हुए भाव-विह्वलता में अश्रुपात होने लगते हैं। किसी काल में महर्षि वाल्मीकि भी रोये थे। ‘अनर्घ राघव’ के रचयिता श्री मुरारि मिश्र, ‘उत्तर-रामचरित’ के रचयिता भूवभूति तथा ‘चम्पू रामायण’ के रचयिता राजा भोज कहते हैं कि -

‘तादृग्विधामपि कथां कथयन् स्ववाचा’
वल्मीकजन्ममुनिरव कठोरचेताः।’
(गोपी गीत -करपात्री जी महाराज)
क्रमश:

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