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गोपी गीत
जो ज्ञानी है, वह युक्त (योगी) है, वही सर्व-कर्म-कृत् है। ‘एष एव पन्था, एतत्कर्म, एतद् ब्रह्म, एतद् सत्यं’ यही सन्मार्ग है और यही सत्य है। ‘अधिकस्याधिकं फलं अमितस्यामितं फलं’ का साधन होने के कारण यही सत्य है।
‘यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्ति एवमेनं सर्वं तदभिसमेति।’
अर्थात, जैसे कृतसंज्ञक द्यूत को जीत लेने पर द्यूत के त्रेता, द्वापर, कलि ये तीनों पाश भी उसके अन्तर्गत आ जाते हैं-द्युत में लगायी सम्पूर्ण सम्पत्ति विजित हो जाती है वैसे ही आपके साक्षात्कार से सम्पूर्ण श्रोती-स्मार्त्त क्रिया-कलापों का अर्थ सिद्ध हो जाता है। गाड़ी वाले सयुग्वा रैक्व की कथा इसी भाव की द्योतक है। रैक्व ब्राह्मण था; वह सम्वर्ग-विद्या का उपासक था; सम्वर्ग-विद्या ही प्राण-विद्या किंवा हिरण्यगर्भ-विद्या है। कुछ सिद्धगण हंस रूप धारण कर आकाश-मार्ग से जा रहे थे; राजा जानश्रुति अपने महल की छत पर विश्राम कर रहा था, उसने सुना कि एक हंस दूसरे हंस से कह रहा है कि ‘भल्लाक्ष, ओ भल्लाक्ष! देख, राजा जानश्रुति का तेज आकाश-मण्डल में फैल रहा है। उसका उल्लंघन न कराना अन्यथा दग्ध हो जाओगे।’ दूसरे हंस ने उत्तर दिया,
‘कम्वर एनं एतत् सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमान्थेति।’
‘क्या यह सयुग्वा रैक्व है कि नभोमण्डल में प्रस्तृत उसका तेज हमें दग्ध कर देगा?’ हंस रूप सिद्धों का वार्तालाप सुनकर राजा जानश्रुति को बड़ी ग्लानि हुई और वह सयुग्वा रैक्व को खोजने लगे। सयुग्वा रैक्व ने ही राजा जानश्रति को उपदेश दिया कि जिसने स्वकाश परात्पर परब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया, उसने सम्पूर्ण धर्म-कर्म का अनुष्ठान कर लिया।
‘सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते’
संसार भर के सम्पूर्ण कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में ही होती है, ‘अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वमोशे’ आप ही सम्पूर्ण उपदेशों के महातात्पर्य हैं,
‘प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा।’
आप ही सम्पूर्ण तनु-धारियों के परम-प्रेमास्पद बन्धु हैं;
‘गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्।
योऽन्तश्चरति सोऽध्यक्षः क्रीडनेनेह देहभाक्।’
आप ही गोपांगनाओं एवं उनके पतियों के भी तथा अन्यान्य सम्पूर्ण प्राणिमात्र के भी अध्यक्ष हैं, सबके द्रष्टा हैं, अतः आपकी उपासना से ही सम्पूर्ण उपासना सम्पन्न हो जाती है। अस्तु, गोपांगनाएँ कह रही हैं कि हे प्रभो! आप केवल व्रजेन्द्रनन्दन, श्रीकृष्णचन्द्र ही नहीं हैं अपितु ‘अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्’ सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तरात्मा, द्रष्टा भी हैं; ‘न स्वान्तरवृत्तं बहु वक्तव्यं’ आप सर्वसाक्षी हैं अतः आपके प्रति अपने भावों को, आपके विप्रयोगजन्य अपने संताप को अभिव्यक्त करने की आवश्यकता ही नहीं; आप स्वयं ही हमारे त्रास को जानते हैं अतः हे प्रभो! कृपा करो, शीघ्र दर्शन दो।
वे अनुभव करती हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ‘हे गोपांगनाओ! तुम लोगों में मद, अहंकार का प्रादुर्भाव हुआ एतावता तुम भक्त नहीं रहीं; तुम्हारे अहंकार के कारण ही मैं अन्तर्धान हो गया हूँ। भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उत्तर देती हुई वे कह रही हैं; हे प्रभो! हम तो भक्त नहीं हैं परन्तु आप तो अपने परम भक्त विखनस ब्रह्मा की प्रार्थना से सात्वतों के, यादवों के कुल में ‘विश्वगुप्तये’ विश्व-रक्षा-हेतु अविर्भूत हुए हैं। विश्व के अन्तर्गत अभक्त, चेतनाचेतन, पुण्यापुण्य प्राणिमात्र आ जाते हैं एतावता आपको हमारा भी रक्षण करना चाहिये।
‘नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः।’
अर्थात, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, गुणात्मा, सर्वाधिष्ठान, अप्रमेय, सर्वसाक्षी, अनन्त ब्रह्माण्डनायक, परात्पर परब्रह्म प्राणिमात्र के कल्याण-हेतु ही अवतरित होते हैं।
‘कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो, यान्ति तन्मयतां हिते।’
अर्थात, जैसे कोई दीपक-बुद्धि से भी चिन्तामण की ओर अग्रसर हो तो भी उसको प्राप्ति चिन्तामणि की ही होगी वैसे ही काम, क्रोध, भय, स्नेह आदि किसी भाव से भगवान् को भजने वाले को भी परात्पर परब्रह्म को ही प्राप्ति होगी। अतः हे प्रभो! आप द्वारा हमारा संत्राण होना ही चाहिए।
गोपांगनाएँ पुनः कल्पना करती हैं मानों भगवान् श्रीकृष्णचंद्र उनसे कह रहे हैं, 'यथावसरं भविष्यति’ ‘हे गोपांगनाओं! यथावसर तुम्हारा भी संत्राण हो ही जायगा।’ जैसे धरती में बोया बीज यथाकाल ही फलित होता है वैसे ही मुझमें तुम्हारी जो प्रीति है, भक्ति है, यह भी यथावसर ही फलित होगी; यथाकाल तुम्हें हमारा दर्शन मिलेगा और तुम्हारा परम कल्याण होगा। वे उत्तर दे रहीं है, प्रभो! आपका यह अवतार ‘सात्वतां कुले’ भक्तों के कुल में हुआ है अतः आपको अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी। इस अवतार विशेष में ईश्वरीय नियम-पालन का निर्बन्ध मान्य नहीं। गुरु-दक्षिणा-हेतु मृत गुरुपुत्र के जीव को आप यमपुरी से भी लौटा लाए; कथा है कि महर्षि सान्दीपनि से चतुष्षष्टि कलाओं एवं वेद-वेदांगों का अध्ययन कर लेने पर श्रीकृष्ण ने गुरु से दक्षिणा-हेतु प्रार्थना की।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:
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