Tuesday, 19 February 2019

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गोपी गीत

‘ज्ञान मुत्पद्यते पुंसा क्षयात् पापस्य कर्मणः’ पाप के क्षय होने पर ज्ञान का उदय होता है; ‘एकाग्रता लक्षणा शुद्धिः’ एकाग्रता ही शुद्धि है। विक्षेप एवं लय दोनों ही अन्तःकरण की अशुद्धियाँ हैं; स्वरूप-स्फुरण प्रतिबन्ध ही लय-आवरण है तथा सर्व-प्रपन्च-स्फूर्ति ही विक्षेप है। अस्तु, आवरण एवं विक्षेपशून्य अन्तःकरण ही धर्ममय अन्तःकरण है; इस शुद्ध धर्ममय अन्तःकरण से वेद-वेदांग-विचार द्वारा ब्रह्याकाराकारित बुद्धि स्फुरित होती है; तात्पर्य कि शुद्ध धर्ममय एकाग्र अन्तःकरण से ही ब्रह्य-साक्षात्कार सम्भव है।
सुदृढ़-प्रबोधजन्य साक्षात्कार ही फल पर्यवसायी होता है। मनु-कथन है- जैसे कच्चे घड़े में एकत्रित जल बह जाता है वैसे ही असंगत अंतःकरण से उद्बुद्ध ज्ञान भी क्षरित हो जाता है। साथ ही यह भी शास्त्र सिद्धान्त है कि जैसे दुहे हुए दूध को शत कोटि प्रयास करने पर भी गो के थन में पुनः प्रविष्ट करा देना सर्वथा असम्भव है वैसे ही ब्रह्य-साक्षात्कार हो जाने पर क्षरण भी कदापि सम्भव नहीं।

परस्पर विरोधात्मक उपर्युक्त उक्तियों का समाधान यही है कि विपरीत भावना-शून्य-साक्षात्कार हो जाने पर क्षरण कदापि संभव नहीं; ब्रह्य-साक्षात्कार आविर्भूत हो जाने पर उसका विलयन असम्भव है; तथापि असंयत चित्त से असम्भावनायुक्त अदृढ़़-साक्षात्कार होने पर क्षरण स्वाभाविक है। ‘महाभारत’ में प्राप्त राजा नहुष की कथा इसी तथ्य की सूचक है।

विधु-विष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।

कदाचित असम्भव भी सम्भव हो जाय, वारिचर जल से विरक्त हो जाय, चन्द्रमा विष झरने लगे तब भी तुम राम से विमुख न होना; क्योंकि कदाचित् ज्ञान होने पर भी मोह न मिटे तथापि विपरीत भावनारहित दृढ़ साक्षात्कार हो जाने पर क्षरण सर्वथा असम्भव है। तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः एकत्व-दर्शन होने पर शोक तथा मोह का समूल विनाश हो जाता है। भगवत्-साक्षात्कार, भगवद्-विज्ञानरूप वैद्युताग्नि से तृणपर्णादि स्थानीय अज्ञान एवं तज्जन्य अहंकार आदि दग्ध हो जाते हैं। अतः हे प्रभो! हमें आपका दृढ़ साक्षात्कार हो।

चतुर्थ श्लोक-
न खलु गोपिकानन्दनो भवान् अखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख! उदेयिवान् सात्वतां कुले॥4॥

अर्थात, हे सखे! तुम केवल गोपिकानन्दन ही नहीं हो, अपितु समस्त शरीरधारियों के अन्तर्यामी, सर्वसाक्षी भी हो, ब्रह्माजी के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर विश्व की रक्षा हेतु ही आपका यदुकुल में, सात्वतवंश में आविर्भाव हुआ है।

गोपांगनाएँ कह रही हैं, हे सखे! आप केवल व्रजेन्द्रनन्दन, गोपिकानन्दन, यशोदानन्दन, विचित्र-सौन्दर्य-माधुर्य-पूर्ण, दिव्य-अद्भुत-लीला-नायक श्रीकृष्ण ही नहीं हैं अपितु सच्चिदानन्दघन, परमानन्दकन्द, परात्पर परब्रह्मस्वरूप अन्तरात्मदृक् भी हैं। प्राणिमात्र के अन्तरात्मा का द्रष्टा साक्षी ही अन्तर्यामी किंवा आत्मदृक् है-तात्पर्य यह कि व्रजांगनाओं ने श्रीकृष्ण का अनुगमन केवल परमप्रेमास्पद-कान्त-बुद्धि से ही नहीं किया अपितु वे उनके मंगलमय आम्दृक् स्वरूप से भलीभाँति परिचित थीं।

‘यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरंग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्।
अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा।’

अर्थात् भगवान्‌ श्रीकृष्ण का अनुसन्धान करती हुई व्रजांगनाएँ वृन्दावन तक चली आयीं। उनको उपदेश देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कह रहे हैं, हे व्रजांगनाओ! तुम इस समय यहाँ कैसे चली आयीं? पति की सेवा, अपत्यों (सन्तानों) का लालन-पालन, गुरुजनों एवं बन्धुजनों की शुश्रूषा तथा अनुवर्तन ही स्त्रियों का परम धर्म है अतः तुम अपने-अपने घरों को वापस लौट जाओ।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिये गये इस उपदेश का अनुवाद करती हुई वे कह रही हैं, हे प्रभो! आप धर्मज्ञ हैं ‘धर्मविदा त्वयोक्तम्’ आपने हम स्त्रियों के लिए धर्मोपदेश किया; यह तो उचित ही है तथापि ‘नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयात् न चान्येन पृच्छतः’[1] जब तक कोई धर्म-सम्बन्धी प्रश्न न करे तब तक धर्मज्ञ को भी विधिपूर्वक धर्म का उपदेश नहीं करना चाहिये; हम तो आप द्वारा किए गए उपदेश को भी सर्वथा उचित ही मानती हैं; तथापि ‘सर्वेषां उपदेशानां पदे महा-तात्पर्यविषयीभूते परस्मिन् ब्रह्मणि त्वय्येव इदं सर्वमस्तु’ वेदादि सम्पूर्ण शास्त्रों के जिने भी उपदेश हैं सबका महातात्पर्य परब्रह्म परमात्मा ही है।

‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’

सब वेद परात्पर परब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं।

‘अग्निहोत्रं जुह्यात् स्वर्गकामः’ ‘दशंपौर्णमासाभ्यां यजेत्’ ‘सन्ध्यामुपासीत’

अर्थात अग्निहोत्र करो, दर्शपौर्णमासादि यज्ञ करो, सन्ध्यावन्दन करो, आदि वेदों में प्राप्त विभिन्न आदेशों का भी परम तात्पर्य परब्रह्म परमात्मा में ही है। सम्पूर्ण श्रौत-स्मार्त्त क्रिया-कलापों का एकमात्र उद्देश्य यही है कि प्राणी बाह्य दृष्टि से विनिर्मुक्त हे अन्तर्मुख हो जाय। जैसे ‘कण्टकेन कण्टकोद्धारः’ कंटक से ही कंटक निकाला जाता है वैसे ही वैदिक-काम-कर्म-जाल से ही पाशविक-लौकिक-काम-कर्म-जल का अतिक्रमण किया जाता है। अन्तर्मुख होने पर ही प्रत्यक् चैतन्याभिन्न परब्रह्म तत्त्व का साक्षात्कार संभव है। जिसने भगवत्-साक्षात्कार कर लिया उसने सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का, सम्पूर्ण धर्म-कर्मों का सम्यक् अनुष्ठान कर लिया।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:

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