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गोपी गीत
वल्लभाचार्यजी कहते हैं, श्रीमद्भागवत का श्लोक है - ‘स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा। कोशलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः।’ अर्थात, ये श्रीराम वही हैं जिनके दर्शन, स्पर्श एवं अभिगमन मात्र से सभी कौशलवासी योगियों के उपयुग्त दिव्य-धाम को गए। राम एवं कृष्ण के विभिन्न कल्पावतारों में भी अवान्तर भेद मान्य है। ‘रामायण’ के राम पूर्णतम पुरुषोत्तम हैं। इसी तरह विभिन्न कल्प में प्रादुर्भूत कृष्ण में भी अवान्तर भेद हैं। तात्पर्य कि अपने उपास्य स्वरूप में, स्वधर्म एवं स्वकर्म में अनन्य-निष्ठा ही सिद्धि का मूलमन्त्र है यद्यपि मूलतः सम्पूर्ण ही वेदान्त-वेद्य परात्पर परब्रह्म-स्वरूप ही है।
शिव-भक्त कहता है ‘विरहीव विभो प्रियामयं परिपश्यामि भवन्मयं जगत्’ हे प्रभु! जैसे विरही जगत् को प्रियामय देखता है वैसे ही मैं भी सम्पूर्ण जगत् में आपका ही दर्शन करूँ ‘न विद्यस्तत्तत्त्वम् वयमिह तु यत्त्वन्न भवसि’ हे प्रभो! आपसे भिन्न अन्य कुछ न देखूँ। ‘शरणं तरुणेन्दुशेखरः शरणं मे गिरिराज कन्यका। शरणं पुनरेव तावुभौ, शरणं नान्यदुपैमि दैवतम्’ तरुणेन्दुशेखर भगवान् शिव ही मुझे शरण दें; गिरिराज-कन्या राजराजेश्वरी ही मुझे शरण दें।
गोस्वामी तुलसीदास में शुद्ध सिद्धान्त-निष्ठा के साथ ही साथ राघवेन्द्र रामचन्द्र स्वरूप में अनन्यता भी है; इसी तरह बहुश्रुत सज्जन भी सम्पूर्ण शास्त्रइतिहास एवं वेद-पुराणादि ग्रन्थों के अर्थ का समन्वय करते हुए यह जानता है कि सम्पूर्ण ग्रन्थों का महातात्पर्य एकमात्र कार्य-कारणातीत परात्पर परब्रह्म प्रभु ही हैं तथापि उपासना-हेतु अपने उपास्य स्वरूप में हो अनन्यनिष्ठ रहता है।
‘गीता’ का कथन है ‘यस्तं वेद स वेदवित् जो बीज-मूल सहित अश्वत्थ वृक्ष को जानता है वही वेदवित् है। अश्वत्थ हो जगत् है; जो इस जगत् एवं उसके अधिष्ठानभूत सर्वेश्वर परात्पर परब्रह्म को जान लेता है वही वेदविद् है। श्रीमद्भागवत में भी ऐसा ही लिखा है-‘इत्यस्यां हृदयं लोके नान्यो मद्वेद कश्चन’ इसका हृदय भगवान् को छोड़कर दूसरा कोई नहीं जानता। ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्’ वेद मेरा ही अभिधान कहते हैं, मेरा ही विज्ञान करते हैं, मेरा ही अनुवाद, मेरा ही आपोहन तथा मेरा ही अवशेषण करते हैं।
अर्थात, अध्यारोप एवं अपवाद के द्वारा निष्प्रपन्च परब्रह्म का ही प्रपन्चन वेद करते हैं। इस सिद्धान्त को जिसने जान लिया वही वेदविद् है, वही कर्म-उपासना एवं ज्ञानकाण्ड की यथार्थ सम्यक् व्यवस्था कर सकता है। संक्षेप-शारीरककार लिखते हैं -
‘वक्तारमासाद्य यमेव नित्या सरस्वती स्वार्थसमन्वितासीत्।
निरस्तदुस्तर्ककलंकपंका नमामि तं शंकरमर्चिताङ्घ्रिम्।’
अर्थात्, शंकराचार्यरूप वक्ता को पाकर वेद-लक्षणा-सरस्वती स्वार्थसमन्विता हुई। तात्पर्य कि शंकराचार्यजी द्वारा वेदों का यथार्थ अर्थ किया गया; कर्मकाण्ड का अवान्तर तात्पर्य तत् तत् देवता की आराधना एवं तज्जन्य फल-प्राप्ति तथा चित्त की एकाग्रता के द्वारा ज्ञानकाण्ड का प्रतिपाद्य निरावरण परब्रह्म में ही सबका तात्पर्य निर्धारित किया गया। अज्ञ, अल्पज्ञ अथवा बहुश्रत खल के लिए कदापि संभव नहीं। एतावता श्रुतियाँ प्रार्थना कर रही है। कि हे प्रभु! आपका साक्षात्कार ही विषरूप जड़ता, अज्ञता, अल्पज्ञता का अपनयन करने वाला है; आपके साक्षात्कार से ही हमारा प्रामाण्य व्यवस्थित रह सकता है अतः आप प्रत्यक्ष होकर विषरूप जड़ता से हमारी रक्षा करें। बहुश्रुत खल भी सर्वदा-सर्वत्र विपरीत-भाववश अनर्थ की ही कल्पना करता है। कहते हैं -
‘अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रन्जयति।’
अर्थात, अज्ञ को अनायास समझाया जा सकता है, विशेषज्ञ को और सरलता से समझाया जा सकता है पर दुरभिमानी अल्पज्ञ को अथवा खल को ब्रह्मा भी सन्तुष्ट नहीं कर सकते जैसे गीली लकड़ी न जलती है, न बुझती है वरन धुएँ का कारण बन सबको सन्तप्त करती है वैसे ही अल्पज्ञ एवं बहुश्रुत खल दोनों ही वेद-ऋचाओं एवं सम्पूर्ण ग्रन्थों का संयत-समन्वित अर्थ न कर अनर्थ ही करते हैं; अतः कहते हैं कि श्रुतियाँ ऐसे अल्पज्ञ अथवा बहुश्रुत खल से भयभीत हो अपनी रक्षा के लिए परात्पर परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रही हैं- ब्रह्म-साक्षात्कार ही बहुश्रुत की विपरीतार्थ-कल्पनारूप व्याल एवं अल्पज्ञ की अज्ञतारूप व्याल का अन्तक है अतः ब्रह्म-आविर्भाव-हेतु श्रुतियाँ प्रार्थना कर रही हैं।
‘वर्षमारुताद् वयं रक्षिताः’ दुःखरूप वृष्टि के लिए जो मारुततुल्य हैं; जैसे प्रचण्ड वायु के चलने पर मेघ फट जाते हैं वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार रूप मारुत से दुःखरूप मेघों का विध्वंस हो जाता है।
‘वैद्युतानलाद्’ तृण-पर्ण स्थानीयं अज्ञानं विद्युत तिनका और पत्ते के तुल्य जो अज्ञान, वही विद्युत् है। तत्संभूतं वैद्युतं-अहंकारादिकम् अज्ञानम् तस्य अनलात्-दाहकात् तात्पर्य कि अज्ञान एवं अहंकार दोनों को दग्ध करने वाला भगवत्-तत्त्व-साक्षात्कार है अतः हे प्रभो! अपने साक्षात्कार से अज्ञान एवं अहंकार रूप तात्कालिक अग्नि से हमारी रक्षा करें।
‘वृषमयात्मजाद् वयमपि रक्षिताः’ वृष से हमारी रक्षा हो; ‘वृषो धर्मः निष्कामकर्मलक्षणो धर्मः शुद्धो धर्मः वृषः’ अर्थात् निष्काम कर्म लक्षण शुद्ध धर्म ही वृष है अथवा ‘वर्षति कामान् इति वृषः’ जैसे बादल से जल की वृष्टि होती है वैसे ही धर्म से सम्पूर्ण अभिलषित पदार्थों की वर्षा होती है अतः धर्म ही वृष है। भगवान् शंकर ‘वृषाकपि’ हैं। भगवान् शंकर का नन्दी, वृष स्वयं धर्म है; धर्म-विशिष्ट अन्तःकरण पर ही भगवान् का आविर्भाव सम्भव है। ‘वर्षति कामान् तथा आकम्पयति क्लेशान् इति वृषाकपिः’ जो वांन्छित पदार्थों की वर्षा करने वाला एवं दुःख को कँपा देने वाला हो वही ‘वृषाकपि’ है। अस्तु, हमारे अन्तःकरण निष्काम शुद्ध-लक्षण-धर्ममय वृषमय हों; ‘वृषमये-अन्तःकरणे जातः तस्मात् वृषमयात्मजाद्’ धर्ममय अन्तःकरण से ही ज्ञान उद्बुद्ध होता है। ‘जातं ज्ञानं’ ज्ञान से उद्बुद्ध होने पर ही भगवत्साक्षात्कार सम्भव है।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:
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