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गोपी गीत
प्रसिद्ध है कि राम-राज्य में सब प्राणी आधि-व्याधि एवं मनस्ताप से मुक्त थे-
‘नाधयो व्याधयश्चासन् दैवभूतात्महेतवः।
मृत्युश्चानिच्छतां नासीत् रामे राज्यं प्रशासति।।’
गोस्वामी तुलसीदास कहते हें -
‘सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्मनिरत श्रुति नीती।
बयरु न कर काहू सन कोई, राम-प्रताप विषमता खोई।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।
दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम-राज काहू नहिं व्यापा।।’
एक कथा है- राघवेन्द्र रामचन्द्र के शासन काल में किसी ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु हो गई; अपने मृत पुत्र को लेकर ब्राह्मण ने राजदरबार में पुकार की; महाराजा रामचन्द्र अत्यन्त चिन्तित हो पड़े; प्रस्तुत समस्या-निराकरण हेतु जाबालि-वामदेवादि ऋर्षि-महर्षियों को निमंत्रित किया गया और उसका हल खोजा गया। तात्पर्य कि सम्यक् शासन-पद्धति से ही प्रजा का कल्याण सम्भव है। स्वधर्म-निष्ठा ही श्रेयस्कर है-
‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।’
विष्णु की पालनी-शक्ति के द्वारा ही जगत् सुरक्षित है; जीवन सुरक्षित रहने पर ही सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान की चर्चा सम्भव होती है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘रामचरित-मानस’ का भी महातात्पर्य एकमात्र परात्पर परब्रह्म राम में ही है तथापि अवान्तर तात्पर्य अन्यान्य विषयों में भी है।
स्वयं गोस्वामीजी कहते हैं-
‘नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। रामनाम अवलंबन एकू।’
इसका यह तात्पर्य नहीं कि सम्पूर्ण अध्ययन-अध्यापन यज्ञ-तप आदि सम्पूर्ण क्रिया-कलाप को बन्द कर दिया जाय। गोस्वामीजी स्वयं ही कहते हैं -
‘भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज-निज कर्म निरत श्रुति-रीती।’
वेद-शास्त्रानुमोदित मार्ग के अनुसार व्यक्ति स्वधर्म एवं स्वकर्म में स्थिर रहे। ‘राम-नाम अवलंबन एक’ का तात्पर्य भी यही है कि एक राम-नाम के साधन बिना इतर सम्पूर्ण साधन शून्यवत् हैं। जैसे अंक के सहयोग से प्रत्येक शून्य भी क्रमशः शताधिक मूल्यवान होता जाता है परन्तु अंक रहित हो निष्प्रयोजन हो जाता है वैसे ही राम-नाम-अंक बिना सम्पूर्ण अन्य साधन निष्प्रयोजन हो जाते हैं-
‘राम-नाम एक अंक है, सब साधन हैं सुन्यं
अंक गए कुछ है नहीं, अंक रहे दस गुन्य।’
गोस्वामीजी की यह विशेषता है कि राम को ही परब्रह्म प्रतिपाद्य मानते हुए भी मूलतत्त्व से विस्मृत नहीं होते। गौरी की स्तुति करते हुए गोस्वामीजी गौरी को ही ब्रह्म कहते हैं-
‘जय जय गिरिवरराज किसोरी।
जय महेस मुखचंद चकोरी।।
जय गजबदन षडानन माता।
जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
नहिं तब आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाव बेदु नहिं जाना।।
भव भव विभव पराभव कारिनि।
विश्व विमोहिनि स्ववश विहारिनि।।’
ब्रह्म का लक्षण है, ‘जन्माद्यस्य यतः’, ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् ब्रह्म’ जिससे सम्पूर्ण प्रपन्च उत्पन्न होता है, जिसमें सम्पूर्ण प्रपन्च स्थित रहता है और जिसमें सम्पूर्ण प्रपन्च लीन हो जाता है वही ब्रह्म है। गौरी भी ‘भव भव विभव पराभव कारिणी’ हैं अतः गौरी भी ब्रह्म है। तात्पर्य कि जैसे कोई नट लीलार्थ अनेक वेष धारण कर अनेक भावों का प्रदर्शन करता है तथापि वह वैसे ही परात्पर परब्रह्म ही लीलार्थ अनेकधा प्रकट होते हैं तथापि अपने मूल स्वरूप में तटस्थ है।
‘जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।’
अस्तु, परात्पर परब्रह्म प्रभु ही राघवेन्द्र रामचन्द्र स्वरूप में भी, व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र स्वरूप में भी प्रकट हुए। गोस्वामीजी कहते हैं-
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।
अनन्त ब्रह्माण्डनायक परात्पर परब्रह्म प्रभु से ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एवं उनके तत् तत् ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उमा रमा ब्रह्माणी आदि प्रादुर्भूत होते हैं। शंकराचार्यजी कहते हैं-
‘गोपान् विष्णुयुतानदर्शयदजं विष्णूनशेषांश्च यः।’
अनन्त, अखण्ड, परात्पर, कार्य-कारणातीत परब्रह्म ही कार्यरूप ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि विभिन्न रूपों में प्रकट हो जाते हैं; वह परात्पर कार्यकारणातीत परब्रह्म प्रभु ही ‘रामायण’ के महातात्पर्य का विषय राघवेन्द्र रामचन्द्र एवं जनकनन्दिनी जानकी हैं; वही सच्चिदानन्द तत्त्व ‘भागवत’ के अनुसार व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं; ‘विष्णुपुराण’ के अनुसार श्रीमन्नारायण विष्णु हैं; ‘स्कन्द’ एवं ‘शिवपुराण’ के अनुसार भूतभावन, विश्वनाथ भगवान् शिव हैं; वस्तु-तत्त्व एक होते हुए भी रूप विभिन्न हैं। ‘सेवक स्वामि सखा सिय-पिय के।’ कहकर गोस्वामीजी ने भी शिव का राम के साथ अभेद स्थापित किया है। अल्पश्रुत अल्पज्ञ में ऐसो अभेद-भावना सम्भव नहीं हो पाती और बहुश्रुत खल भी अभेद को नहीं समझ पाते फलतः दोनों ही विपरीतार्थ की कल्पना कर लेते हैं।
(गोपी गीत -करपात्री महाराज)
क्रमश:
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